दोहे – सतविन्द्र कुमार राणा

सुख ही सुख होगा सदा, यही सोचना भूल।
सुंदर मोहक पुष्प सह, मिलते ही हैं शूल।।
चहुँदिश  लख कर गंदगी, क्यों मन होता बोर?
पुष्प कमल का जनक भी, होता कीचड़ घोर।।
कर्म बड़ी है साधना, करनी बहुत जरूर।
जितना करने से बचें, उतना सुख से दूर।।
नारी बिना मकान है, खाली छत औ भीत।
घर का देती रूप वह, चले बाँधती प्रीत।।
लोभ,झूठ औ छल कपट, कब ठीक अहंकार।
दया,दान, हरि प्रेम से, होता बेड़ा पार।।
जल्दी करना हे मनुज, ठीक नहीं हर बार।
सोच-समझ कर कर्म कर, होगा बेड़ा पार।।
शंका को मत दीजिए, मन में कोई स्थान।
चिंता का यह मूल है , रिश्तों की ले जान।।
शक़ मन में उत्पन्न हो , कर लो उचित निदान।
यदि पोषित होता रहे,  हर लेता सम्मान।।
काला कागज कायदा, यदि जनता अंजान।
जन-जन इसको जान ले, तब है ठीक विधान।।
कुदरत से सब सीख लें, जीने का कानून।
माटी-पर्वत-वन बिना, धरती होगी सून।।
बदरा काले छा रहे, उमड़ रहा है प्यार।
धरती भीगे नेह से, रिमझिम पड़े फुहार।।
बरखा सावन में हुई, नहीं सजन जी पास।
रिमझिम पड़े फुहार जब, बढ़े मिलन की प्यास।।
मानवता भी धर्म है, धर्म जगत आधार।
जब जन भूले धर्म को, करता अत्याचार।।
धर्म सनातन एक है, बाकी सब हैं पंथ।
सबके अपने देव हैं, सबके अपने ग्रंथ।।
हिंदी का सम्मान है, हर हिंदी का मान।
हिंदी सोच विचार की, हिंदी ही है जान।।
 - सतविन्द्र कुमार राणा
प्रकाशित: 5 लघुकथा साँझा संकलन,साँझा गजल संकलन,साँझा गीत संकलन, काव्य साँझा संकलन, अनेक प्रतिष्ठित साहित्यक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ, पत्रिकाओं के लघुकथा विशेषांकों में समीक्षाएं प्रकाशित,साहित्य सुधा, साहित्यिक वेब openbooksonline.com, ,साहित्यपेडिया, laghuktha.com,लघुकथा के परिंदे समूह में लगातार रचनाएँ प्रकाशित।
सह-सम्पादन: चलें नीड़ की ओर (लघुकथा संकलन प्रकाश्य), सहोदरी लघुकथा-१
सम्प्रति: हरियाणा स्कूल शिक्षा विभाग में विज्ञान अध्यापक पद पर कार्यरत्त।
शिक्षा: एमएससी गणित, बी एड, पत्राचार एवं जन संचार में पी जी डिप्लोमा।
स्थायी पता: ग्राम व डाक बाल राजपूतान, करनाल हरियाणा।

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