दाग

 

अतीत …..
वर्तमान की चादर में
रह रह कर चिपकता है ,
जाने कहाँ से उड़ते उड़ते
जमने लगते हैं
भूले बिसरे लम्हों के धूल कण ,
चाय के अमिट धब्बों सी फ़ैल जाती हैं
कुछ ख़ास यादें ,
कई जगह पर…..
चुइंगम की तरह चिपक गयी हैं
कलैंडर से निकल कर
कुछ साफ़ तारीखें भी ,
कुछ तेज़ाब सी रातों ने
सुराख़ भी किये हैं
नींद की चादर पर ,
जिनसे शुरू होता है
एक चलचित्र सिनेमा
छत के परदे पर
बत्ती बुझते ही ,
लेकिन कुछ निशान
हल्दी कुमकुम से खूबसूरत भी हैं ,
कुछ पुरानी धोती से बंधे
अमीर सिक्के से ,
कुछ पुष्ट कन्धों पर लदी हुई
उनींदी आँखों से ,
बचपन का इत्र आज तक महकता है
इन धब्बों में ,
जिनकी वजह से
उम्र की झुर्रियों में
हम आज तक बच्चे है
सचमुच
‘ दाग’ अच्छे हैं |

- संध्या सिंह 

जन्म: २० जुलाई 
स्थान: देवबंद जिला सहारनपुर , उत्तर प्रदेश 
प्रारंभिक शिक्षा: गाँव की पाठशाला में 
शिक्षा: स्नातक ( विज्ञान ) , मेरठ विश्वविद्यालय 
सम्प्रति: कुछ पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन , एक काव्य संग्रह और एक गीत संग्रह प्रकाशाधीन 
इसके अतिरिक्त स्वतन्त्र लेखन , हिन्दी के प्रचार – प्रसार से जुडी साहित्यिक गति विधियों में सहभागिता
पता: इंदिरा नगर , लखनऊ , भारत

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