दही की दमक

दूध दही और मक्खन मट्ठा

दें न खुदा तो किसके बस का

    इसमें कोई शक नहीं है | भाग्यवानों को ही मिलाती हैं ये नियामतें | बेटी आज परीक्षा देने जा रही थी | माँ दही-पेड़ा लिए उसके सामने खडी थी | बोली, दही खाकर जा, पास हो जाएगी | कोई भी काम शुरू करने से पहले थोड़ा सा दही ज़रूर खा लेना चाहिए | इससे न केवल शुरूआत अच्छी होती है बल्कि काम में सफलता भी मिलती है |

    इस धारणा का कोई वैज्ञानिक आधार शायद ही मिल सके लेकिन हमारे समाज में दही-संबंधी यह विश्वास सदियों पुराना है | दही के सेवन से स्वास्थ्य संबंधी सैकड़ों लाभ हमें पता ही हैं तो कोई भी काम शुरू करने के लिए सफलता हेतु दही-सेवन के विश्वास को पाले रखने में आखिर हर्ज ही क्या है ? सो इस धारणा को हम दृढ़ता के पाले हुए है |

   दूध से बनी चीजें, जिनमें दही भी है, बड़े यत्न पूर्वक बनाई जाती हैं | कहते हैं दूध को दुखी करने से दही बनता है, दही को सताने से मक्खन बनता है और मक्खन को परेशान करने से घी बनता है | दही, मक्खन और घी कोई मुफ्त में ही नहीं मिल जाता | इन सबके लिए दूध का बलिदान करना पड़ता है |

    शायद इसीलिए अंग्रेज़ी चिकित्सा में दक्ष डाक्टरों को इन दिनों दूध पर बड़ा तरस आने लगा है | उन्होंने घोषणा कर दी है कि दूध, दही, मक्खन, घी आदि, वस्तुओं का सेवन बिलकुल न करें | इससे शरीर में चर्बी की मात्रा बढ़ती है और चर्बी बढ़ने से क्या कुछ नहीं हो सकता | धमनियों में जम जाए तो हार्ट अटैक तक पड़ सकता है | मेरी बेटी के लिए तो ये सब वर्जित हो गए | एक तो वैसे भी वह ह्रदय रोग से ग्रस्त है और सोने में सुहागा यह कि उसे दही से ज़बरदस्त ‘एलर्जी’ भी घोषित कर दी गई है | मेरी तो राय है, आप भी टेस्ट करा लें | कहीं आपको भी तो नहीं है, दही से अलर्जी |

    हमारे ठेठ भारतीय मन का चिकित्सकों के बहकावे में आना ज़रा मुश्किल ही लगता है | हम लोग तो रोज़ एक गिलास दूध पीने वाले ठहरे और हमारे खाने की थाली में अगर प्रतिदिन  खट्टे-मीठे स्वाद वाले शानदार दही की एक कटोरी न हो तो खाना बद-स्वाद लगता है | हमारे शास्त्रों में तो दही के फायदे ही फायदे गिनाए गए हैं | इसे वात, पित्त नाशक बताया गया है | मुंह के छालों के लिए लाभकारी है | पाचन में मददगार यह खुद भी आसानी से पचने वाला कहा गया है | और भी न जाने कितने चिकित्सकीय गुणों से भरपूर है यह |

     और तो और, यह भी बताया गया है कि दही न सिर्फ खाएं, लगाएं भी | दूसरों से काम निकालने के लिए उन्हें मक्खन तो खैर हम लगाते ही हैं आप अपने चहरे और बालों में दही लगा कर उन्हें धो डालें तो चेहरा और बाल दोनों ही चमकने लगते हैं | हंसने की बात नहीं है आप दही को अपनी सारी त्वचा में लगाकर स्नान कर लीजिए त्वचा भी चमक उठेगी | दही में तो सुन्दरता के अनेक राज़ छिपे है | बेसन, चन्दन और हल्दी का पाउडर इसमें मिला लें तो यह और भी तेजस्वी हो जाता है !    

    दही बहुत कुछ आलू की तरह है | शक्ल सूरत पर मत जाइए | दोनों का चरित्र देखिए | दोनों ही बड़े उदार और मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध निभाते हैं | लगभग हर सब्जी के साथ आलू मित्रता निबाहने में निपुण है | आलू-मटर, आलू-गोभी, आलू-पालक, आलू-शलजम, आलू-टमाटर, आदि-आदि | इसी तरह दही भी है | उसकी लस्सी तो हम पीते ही हैं, दही-बड़ा, दही रायता, दही चावल, (विशेषकर दक्षिण में) “दोई- माछ” (बंगाल में) दही-चूडा (बिहार में ), इत्यादि, भी बड़े स्वाद से खाते हैं | हाल ही में मकर संक्रांति का पर्व था | भारत में कई जगह मकर संक्रांति से नया साल शुरू होता है | बिहार में लोग इसे दही- चूडा खाकर मनाते हैं | वहां मसल मशहूर है, जैसे पानी के बिना होली वैसे ही दही-चूडा के बिना संक्रांति | उत्तर भारत में भी खिचडी खाकर नए साल की शुरूआत करते हैं | लेकिन खिचडी कोई अकेले थोड़ई खाई जाती | खिचडी के चार यार – दही, पापड़, घी अचार | ज़ाहिर है, दही इनमें सबसे पहले है |

     दही के बारे में तमाम हिदायते दी जाती हैं | सर्दियों में नहीं खाना चाहिए, रात में नहीं खाना चाहिए, गला खराब करता है | घाघ कवि का कहना है, सावन के बाद आने वाले भाद्र मास में दही नहीं खाना चाहिए | सावन साग न भादों दही | लेकिन कवियों की बात मानता ही कौन है ? दही के लिए तो सभी दिन और हर मौसम शुभ होता है |

     स्वाद के अनुसार दही की कई किस्में हैं | एक बार मैंने एक दक्षिण भातीय से पूछा, हमारे उत्तर भारत में तो चार ऋतुएँ होती हैं | दक्षिण भारत की कौन कौन सी ऋतुएँ हैं ? बोले इधर भी तीन अलग अलग मौसम तो होते ही हैं | गरमी, बहुत गरमी और बेहद गरमी | दही की किस्में भी कुछ इसी प्रकार की होती हैं | हल्का खट्टा-मीठा दही, मीठा पर थोड़ा अधिक खट्टा दही और बहुत खट्टा दही | पर बहुत खट्टे दही को भी आप चीनी या शहद मिला कर खाएं तो वह भी खट्टा-मीठा लगने लगता है | कहते हैं, अच्छा दही जमाने के लिए उसे मिट्टी के कुंडे में जमाना चाहिए | इससे दही में एक सोंधी सी महक आजाती है | बहुत से हलवाई दही को पाव या आधा किलो के कुल्लढ़ों में जमाते हैं | अपने कालेज के दिनों में जब मैं अकेला रहता था और मेरे पास बर्तन नहीं थे मैं दही का पाव-भर का कुल्लढ ही खरीद लाता था | काम चल जाता था |

     दही की एक ख़ास बात यह है कि इसे जमाने के लिए थोड़े दही की ही दरकार होती है, जिसे जामन कहते हैं | दूध गरम कीजिए, उसे थोड़ा ठंडा होने दीजिए और तब उसमे ज़रा सा जामन डाल दीजिए | कुछ घंटों बाद दूध जमकर दही बन जाएगा | पड़ोसी महिलाओं की दोस्ती अक्सर जामन के आदान-प्रदान से ही हो जाती है | बहन जी, थोड़ा दही दे दें, दही ज़माना है | बहुत से लोगों को यह आजतक समझ में नहीं आया, और उनमें से मैं भी एक हूँ, कि जिसने पहली बार घड़ी बनाई होगी उसने समय कैसे मिलाया होगा ? और जिसने पहली बार दही जमाया होगा वह दही का जामन कहाँ से लाया होगा? सोचते सोचते तो मेरा दिमाग ही दही हो गया है ! अंग्रेज़ी में जिसे ‘योगर्ट’ कहते हैं, वह वस्तुत; दही नहीं होता क्योंकि वह जामन से नहीं जमाया जाता | कहते हैं उसे किन्हीं दो ख़ास किस्म के बेक्तेरियाओं के मिश्रण से जमाते हैं |  

    वैसे बताते चलें, ‘योगर्ट’ एक तुर्की शब्द है | उन्नीसवीं शताब्दी में योगर्ट तुर्की से योरप और अमेरिका पहुँच गया | वहां बस तब से ही दही, सौरी ‘योगर्ट’, बनाना और खाना शुरू हुआ |  

    पता नहीं भारतवासियों ने दही खाना कब से शुरू किया | पर इतना तो तय है कि श्री कृष्ण के ज़माने में भी यह एक लाजवाब खाद्य पदार्थ था | कन्हैया चोरी से मक्खन खाते कई बार पकडे गए थे और दही लगभग पहुँच से बाहर, कितना ही ऊपर क्यों न रखा हो, बाल गोपाल उसे प्राप्त करके ही मानते थे | आज भी “दही-काँधो” का उत्सव हम बड़े धूम-धान से मनाते हैं | भारत में शायद इसी लिए दही को देवताओं का भोजन माना गया है | देवताओं को प्रणाम करते हुए उनके भोजन को भी ह्रदय से अभिनन्दन करता हूँ |  

          

- डा. सुरेन्द्र वर्मा

कवि, चिन्तक और व्यंग्यकार डा. सुरेन्द्र वर्मा की अभिरुचि कला और चित्रकारिता में भी अभिव्यक्त हुई है | उनके रेखाचित्रों की एक प्रदर्शनी इलाहाबाद संग्रहालय, इलाहाबाद में लग चुकी है जिसमे करीब ५० रेखांकन प्रदर्शित किए गए थे | हिन्दी पत्र पत्रिकाओं में भी उनके रेखांकन नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे हैं |
उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, इलाहाबाद के आमंत्रण पर उन्होंने प्रसिद्ध  चित्रकार प्रो. रामचंद्र शुक्ल पर एक मोनोग्राफ तैयार किया था | इसके अतिरिक्त आपकी कला संबंधी दो पुस्तकें – !, “कला विमर्श और चित्रांकन” तथा २, “भारतीय कला एवं संस्कृति के प्रतीक” – भी प्रकाशित और चर्चित हुई हैं
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