दक्खिनी हिंदी साहित्य के विकास में हिन्दू पंथ एवं संतो का योगदान

             आदिलशाही, कुतबशाही, बहमनी, निजामशाही मुस्लिम शासक एवं सूफी संत उत्तर भारत से दक्षिण में शासन करने, व्यापार तथा सूफी मत का प्रसार करने के लिए आये थे | साथ में वे अपने साथ उत्तर भारत की प्रचलित भाषा हिंदी के खड़ीबोली के रूप में अरब एवं फारसी शब्दों से मिश्रित भाषा  को भी लेकर आये  | जिस पर अहिन्दी भाषी प्रदेश महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंद्रप्रदेश, गुजरात, तमिलनाडू आदि के स्थानीय भाषा का प्रभाव पड़ा | जिससे एक नई भाषा का जन्म हुआ | जिसे हम दक्खिनी हिंदी कहते हैं | दक्खिनी के इस रूप में हिन्दू-मुस्लिम एवं भाषा को जोड़ने की क्षमता थी | संतो ने इस रहस्य को पहचाना और अपनी वाणी से राष्ट्रीय एकता, समता, बंधुता, लोककल्याण, ईश्वर भक्ति, प्रेम, मानवता का संदेश जन-जन तक पहुँचाया था |

              दक्खिनी हिंदी की समृद्धि के लिए सात बिंदु देखने को मिलते हैं | १.मुस्लिम शासक-{आदिलशाही, कुतबशाही, बहमनी, निजामशाही} २.व्यापार-{मुस्लिम व्यापार एवं व्यवहार } ३.सूफी संत ४.प्रादेशिक भाषा {मराठी, तमिल, तेलगु, कन्नड़, गुजराती } ५.हिन्दू संत-{ चक्रपाणी निलम्बकर, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम, श्री.माणिक प्रभु आदि }६.नाथपंथी वारकरी सम्प्रदाय{नामदेव-एकनाथ} ७.महानुभाव पंथ{ चक्रपाणी निलम्बकर} ८.सकलमत सम्प्रदाय-{ श्री.माणिक प्रभु–ज्ञानराज प्रभु } | हमारे शोध का विषय इन्हीं आँठ बिन्दुओ में से एक हिन्दू संत हैं | दक्खिनी हिंदी को समृद्ध करने में दक्षिण भारत के हिन्दू संतो का महत्वपूर्ण योगदान हमे यहाँ देखने को मिलता हैं | जिसमे सबसे पहले नाम आता हैं,

 

१.नाथपंथ से सम्बन्धित वारकरी सम्प्रदाय के संत :-

    नामदेव, एकनाथ, तुकाराम,

२. महानुभव पंथ  के तीसा साहित्य के रचेता संत:--

     दामोधर पंडित, कवयित्री महदायिसा, चक्रपाणी निलम्बकर,

३.सकलमत सम्प्रदाय के संत :-

    माणिक प्रभु, मार्तण्ड प्रभु, ज्ञानराज प्रभु आदि संतो ने अपना योगदान दिया हैं |

 

१.महानुभव पंथ  के तीसा साहित्य के रचेता संत:-

 

           महाराष्ट्र में महानुभव पंत का योगदान मराठी साहित्य में बहुतायात रूप में देखने को मिलता हैं | तत्कालीन प्रशासकीय एवं व्यापार-व्यवसाय, व्यावहार की भाषा के रूप में दक्खिनी हिंदी को अपने तीसा साहित्य का माध्यम बनाया था | कई संतों ने तीसा साहित्य के माध्यम से एकता,मानवता, ईश्वर भक्ति आदि का संदेश दिया था |

‘’ महाराष्ट्र के माहानुभाव पंथ के कवियों द्वाराइसके प्रयोग के उदाहरण मिलने लग जाते हैं |

महानुभाव पंथ के दामोधर पंडित {बारहवीं सदी}और कवयित्री महदायिसा{तेरहवीं-चौदहवी सदी}

की कुछ रचनाओं की भाषा हिंदी हैं |इस पंथ के चक्रपाणी निलम्बकर ने दक्खिनी में

‘तीसा’ साहित्य रचा, जो देवनागरी लिपि में उपलब्ध हुआ हैं |’’

  तीसा साहित्य की कोई सामग्री ना उपलब्ध होने के कारण हम यहाँ मात्र उनके योगदान के विषय में चर्चा कर रहे हैं | आशा हैं, भविष्य में इस आधार पर नये शोधार्थी इस पर अवश्य कार्य करेंगे |

 

२.नाथपंथ से सम्बन्धित वारकरी सम्प्रदाय के संत :-

 

१.नामदेव:- {१२७१-१३५१ }

           संत नामदेव मराठी एवं हिंदी के प्रसिद्ध कवि संत भक्त हैं | आपने मराठी में अभंग लिखकर मराठी साहित्य को समृद्ध किया हैं, वहीं हिंदी में कई पदों की रचना कर मानवतावाद, हिन्दू-मुस्लिम एकता, जाति-पाति का विरोध, वर्णव्यवस्था पर व्यंग्य, बाह्याडम्बर, पाखण्ड भक्ति का खण्डन, मन की शुद्धता, गुरु महिमा,  ईश्वर प्रेम के उद्दात रूप का चित्रण,  आत्मनिवेदन आदि उनके पदों की विशेषता हैं |  उनके पदों का अध्ययन करने पर ज्ञात होगा कि आपके पदों पर मराठी भाषा का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता हैं | दक्खिनी हिंदी में रचित निम्न पद के अंतर्गत विरहिणी आत्मा प्रियकर रूपी परमात्मा के वियोग में तडप रहीं हैं | उनके प्रियकर उन्हें छोड़कर कहीं प्रदेश चले गए हैं | होली के अवसर पर उनकी याद और भी तेज हो गई हैं | उनका दिल कहीं पर भी नहीं लगता हैं | फिर से बसंत आया हैं | मधुकर गुंजन कर रहा हैं | पर वे लौट के नहीं आये| जब से वे गये हैं, विरहिणी ने न स्नान किया हैं, नाहीं अपने बालों में तेल लगाया हैं; और नाहीं माँग में सिंदूर भरा हैं |  प्रियकर परमात्मा के जाने से ना उने रात में चैन आता हैं और ना ही दिन में | मौसम बदल गया फिर भी वे नहीं आये | दाम्पत्य भाव को अभिव्यक्त करने वाली निम्न पंक्ति दक्खिनी हिंदी का एक उदाहरण हैं |

 

नामदेव कहते हैं,

मोर पिया बिलम्यो परदेस, होरी मैं का सौं खेलौं ।
घरी पहर मोहिं कल न परतु है, कहत न कोउ उपदेस ॥1॥
झरयो पात बन फूलन लाग्यो, मधुकर करत गुंजार ।
हाहा करौं कंथ घर नाहीं, के मोरी सुनै पुकार ॥2॥
जा दिन तें पिय गवन कियो है, सिंदुरा न पहिरौं मंग ।
पान फुलेल सबै सुख त्याग्यो, त्याग्यो, तेल न लावों अंग ॥3॥
निसु बासर मोहिं नींद न आवै, नैन रहे भरपूर ।
अति दारुन मोहिं सवति सतावै, पिय मारग बडि दूर ॥4॥

 

संदर्भ :-हिंदी कविता संत नामदेव

http://www.hindi-kavita.com/HindiAbhangSantNamdev.php


आपकी कविता में कबीर की भांति ईश्वर प्रेम का रूप देखने को मिलता हैं | विरहिणी आत्मा प्रियकर परमात्मा के वियोग में हैं | यह कवि विरह की दशा का वर्णन करते हुए एक स्थान पर कहते हैं कि मन के भीतर घटा घिर आयी घटा में बिजली चमक ने से विरह की तीव्रता और भी बढ़ गई है | वर्षा मिलन से चातक, मेंढक तथा मोर प्रसन्न हैं | नामदेव कहते हैं कि प्रेम की शाही बनाकर प्रियकर को खत भेजा हैं | जैसे ही मिले तुरंत चले आओ क्योंकि तुम्हारे बिना यह जीवन व्यर्थ जा रहा हैं |

 

दामिनि दमकि घटा घहरानी, बिरह उठै घनघोर ।
चित चातृक है दादुर बोलै, वहि बन बोलत मोर ॥5॥
प्रीतम को पतियां लिखि भेजौं, प्रेम प्रीति मसि लाय ।
बेगि मिलो जन नामदेव को, जनम अकारथ जाय ॥6॥

संदर्भ :-हिंदी कविता संत नामदेव

http://www.hindi-kavita.com/HindiAbhangSantNamdev.php

 

२.एकनाथ:- {१५२८-१५९९}

            भारत में एकनाथ को सहनशील संत के रूप में देखा जाता हैं | एक सरफिरे द्वारा एक सौ आंठ बार उन पर थूकना और एकनाथ का बार-बार स्नान करना, और उस सरफिरे का पश्चाताप होना की कथा प्रचलित हैं | ऐसे महान संत एकनाथ ने मराठी में कई सौ अभंग लिखे | उन्हीं एकनाथ जी ने तत्कालीन संचार की भाषा के महत्व को पहचान कर अपना संदेश दक्खिनी हिंदी में देकर दक्खिनी हिंदी साहित्य को समृद्ध किया हैं | 

              संत एकनाथ जन्म १५२८ महाराष्ट्र के पैठन जिला औरंगाबाद में ब्राह्मण परिवार में हुआ | आपके गुरु जनार्धन स्वामी हैं | आप ने मराठी में रामायण, भागवत आदि के साथ आपके लोकगीत भी प्रसिद्ध हैं। मृत्यु १५९९ ई. में फागुन महीने में हुई। इस प्रकार यह गोस्वामी तुलसीदास से तीस साल बाद आपकी मृत्यु हुई । कहा जाता हैं कि  जिस साल एकनाथ ने वाराणसी में अपने भागवत को समाप्त किया, उसी साल गोस्वामी ने ”रामचरितमानस” का आरम्भ किया था । उत्तर भारत में रहने से आपने हिंदी में भी पदों कि रचनाएँ की थी | मराठी भाषी होने के कारण स्वाभाविक था कि उनकी हिंदी पर मराठी का प्रभाव पड़े | मराठी के मिश्रण से वह दक्खिनी भाषा में रूपांतरित हो गई थी |गुरु द्वारा प्राप्त ज्ञान से ईश्वर की प्राप्ति आसानी से हो सकती हैं | गुरु के महत्व को प्रतिपादित करनेवाली पंक्तियाँ निम्न रूप में हमको देखने को मिलती हैं, 

 

आदि पुरूष निर्गुण निराधार की याद कर। मेरे गुरू परर्दिगार की याद कर।

जिने माया अजब बनाई। उस वस्ताद की याद कर।

गुरू गारूडी बीर पुरा। नैन चीर के पैही मुद्रा।

कान फार के खाये दिद्रा। अनहद ध्वनी धुमक बाजे।

ग्यानी कु ग्यान लगाऊँ। लोभे आंधे कू उडाऊँ।

फुक मारूं तो जा जा जा। बोध के पहाड़ पर जा।

बच्या जाहाँ आना नहीं, ताहाँ ज्या। मेरे सद्गुरू दाता कू शरन ज्या।

मेरे सद्गुरू दाता की इतनी-सी लकरी। मूल मंतर हात मो पकरी।

उक्त पंक्तियाँ नाथों के रहस्य को अभिव्यक्त करती हैं |

 

दक्खिनी का पद्य और गद्य’– (श्रीराम शर्मा) पृष्ठ 57-66।  

 

५.तुकाराम:-

              महाराष्ट्र के मराठी सहित्य में  संत तुकाराम का बहुत बड़ा योगदान रहा हैं | आपने मराठी में ईश्वर भक्ति के साथ लोककल्याणकारी बातों को जन सामान्य की भाषा में अपनी वाणी को अभंगो के माध्यम से अभिव्यक्त किया हैं | महाराष्ट्र में आपके अभंग जन-जन में लोकप्रिय हैं | किन्तु आपका दक्खिनी हिंदी में भी अपनी वाणी से कई मौलिक पदों और दोहों के माध्यम से अपना संदेश जन-जन तक पहुँचाया हैं | दोहों और पदों में ईश्वर भक्ति के साथ, प्रेम,मानवता, अहंकार का त्याग, सुसंगति आदि को अभिव्यक्त किया हैं | 

 

काहे भुला सम्पत्ति घोरे[1] । राम राम सुन गाउ बाप रे[2] ।।धृ०।।

राजे लोक सब कहे तू आपना । जब काल नहीं पाया ठाना ।।१।।

माया मिथ्या मन का सब धन्दा । तजो अभिमान भजो गोविन्दा ।।२।।

राना रंक  डोंगर की राई। कहे तुका करे इलाहि ।।३।।

                                                   सन्दर्भ :-हिंदी कविता संत तुकाराम {कविता कोष}

 

संत तुकाराम जी कहते हैं कि सज्जनों धन-सम्पत्ति के मोह में ईश्वर को भूलना मत | मेरी बात सुनो राम नाम का जप करों | राजा-महाराजा हो या कोई अन्य काल के सामने कोई भी टिक नहीं पाया हैं | मोह-माया त्याग कर गोविंद की भक्ति करों | क्यों रंक हो या राजा, राई हो या पर्वत सबकी रचना उस परमेश्वर ने की हैं |

 

तुका संगत तीन्हसे कहिए,जिनथे दुख दुनाए ।
दुर्जन तेरा मू काला,थीतो प्रेम घटाए ।।

                                                  सन्दर्भ :-हिंदी कविता संत तुकाराम {कविता कोष}

तुकाराम संगति के महत्व को बताते हुए कहते हैं कि सत संगति से ही मनुष्य को सुख की प्राप्ति होती हैं |इसीलिए कल मुहे दुर्जन की संगति करने से रहा-सहा आनंद भी चला जाता हैं |

 

३.सकलमत सम्प्रदाय के संत :-

सकलमत पंथ या सम्प्रदाय के संतो में माणिक प्रभु, मार्तण्ड प्रभु, ज्ञानराज प्रभु आदि संतों के नाम गिनाये जा सकते हैं | आपका सकल मत एवं सकलमत पर आधारित पदों का दक्खिनी हिंदी में विशेष योगदान रहा हैं | हम यहाँ  निम्न रूप से संतों के योगदान पर चर्चा करते हैं,

१.माणिक प्रभु:-

        कर्नाटक हुमनाबाद को कर्म स्थली बनाने वाले, बहु आयामी प्रतिभा सम्पन्न संत माणिक प्रभु ने अद्वैत वेदांत पर आधारित सकलमत की स्थापना की हैं |उनका सकल मत अनेकता में एकता, बन्धुता, समता का संदेश देता हैं | आप ने हिन्दू-मुस्लिम,जैन-बौद्ध, सिख–इसाई आदि धर्मो, सम्प्रदायों, जातियों के मानसिक बंधन तोड़ कर उन्हें राष्ट्रीय एकता के सूत्र में पिरोने का काम किया हैं | सकलमत किसी भी धर्म, जाति, सम्प्रदाय का विरोध नहीं करता बल्कि उसकी प्रवृत्ति गुणग्राही हैं | जहाँ जो भी अच्छा दिखा उसे ग्रहण कर लिया | सकल मत के अनुसार प्रत्येक मनुष्य में भिन्न-भिन्न आत्मा हैं | वह सब ब्रह्म रूप हैं | किन्तु व्यक्ति ब्रह्म संचलित माया के कारन अज्ञान में रहता हैं | माणिक प्रभु भक्तो के अज्ञान को दूर करते हुए कहते हैं, पद ३२५

 

‘’सब दुनिया मोह पसारा है | एक राम निराकार है | अंदर बाहर सबही भरा है ||ध्रु||

व्याप रहा जग सारा | झाडपाड़ जल पूर भरा है | फिर दुनिया से न्यारा है ||१||

झूठी काया झूठी माया |झूठा जगत बसाया है | माणिक कहे सब साधु कह गये |क्या मैं जानूँ गँवारा रे ||२||’’ पेज ९० पद्यमाला

 

अज्ञान का पर्दा हटते ही भक्त ईश्वर की भक्ति में लग जाता हैं | जैसे ही उसे यह ज्ञान प्राप्त होता हैं कि उसकी आत्मा ही स्वं ब्रह्म हैं | तब ‘’मैं वहीं हूँ “ की स्थिति उत्पन्न होती हैं |

जब प्रत्येक मनुष्य में इश्वर हैं, इसीलिए कोई किसी की निंदा नहीं करना चाहिये | निंदा करना अर्थात ईश्वर निंदा होगी |

    इसीलिए संत माणिक प्रभु सभी जाति, धर्मो, पंथो के लोगो को सकल मत अपनाने के लिए कहते हैं | क्यों कि सकलमत सहज मार्गी हैं | आसानी से इश्वर प्राप्ति ही इसका उद्देश्य हैं | इसका और एक उद्देश्य संसार चक्र या बाजार में भटके हुए जन-मानस को ज्ञान द्वारा मुक्ति का मार्ग बताना रहा हैं | संत माणिक प्रभु के पदों का जब हम अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि आपने हिंदी,मराठी,कन्नड़,तमिल,तेलगु आदि कई भाषाओँ में मौलिक उपदेश एवं सकलमत पर आधारित संदेश दिए हैं | आप के पदों में ब्रह्म,आत्मा,माया,सृष्टि आदि विषयों के साथ राम-कृष्ण, शिव आदि की भक्ति परक पद देखने को मिलते हैं |

 

२.मार्तण्ड माणिक प्रभु :-

         सकलमंत परम्परा में मार्तण्ड मणिक प्रभु का नाम भी बड़े आदर से लिया जाता हैं | आपने सकलमत का विस्तार करते हुए अपनी वाणी में जन को कभी सहज तो कभी फटकार ते हुए उपदेश दिया | उनकी दक्खिनी हिंदी में अभिव्यक्त बेखौफ वाणी का एक उदाहरण निम्न नुसार देखा जा सकता हैं | जहाँ वे माया के हाथ की कठपुतली बने जन मानस को उदेश देते हुए कहते हैं कि हमेशा गुरु का उपदेश सुनिये | हम सकलमत पंथ वाले बेखौफ होकर कहते हैं कि मनुष्य माया के हाथों की कठपुतली हैं | वह माया के कारन जनम मरन के फेरे में पड़ा भटकता रहता हैं | राम नाम की शक्ति से ही उसे मुक्ति प्राप्त हो सकती हैं

 

‘’ग्यान गुरु उपदेसा सुनले हरदम| जड़चेतन की गुडिया बोले तुम हम | जपति अजपा माला सोहं सोहं || जड़ भूतनका पिंजरा महाराजनाम | जीवपंछी गारोड़ा फिरता सबधाम | फिर फिर जनमको धाय मिठु आत्माराम | सबद गुरु मुख जाना एक राम ही राम || जड़ चेतन बिन जगमे कोई जना मरा | मन भटका भंडवाड़ा मैं तूं तेरा मेरा | भुगति मुगति जूं सपना क्या भला बुरा | लटकी चौसर बाजी ना जीता हारा || क्यों डर लंडी माया दिलकी धुल झड़क | उठ सुन बेद ढनडोरा ब्रह्म हो फड़क | सकलमती हम संतो बोली बेधड़क | चिन्मार्तांड प्रकाश दृश्य की झलक || ‘’ पद १६३-पेज १६५ पद्यमाला

 

 

३.ज्ञानराज प्रभु:-

          सकलमत सम्प्रदाय के अगले प्रसिद्ध संत ज्ञानराज प्रभु का नाम बड़े ही आदर से लिया जाता हैं | आपका योगदान सकलमत एवं तत्संबंधी काव्य पदों की रचना द्वारा रहा हैं | ज्ञानराज प्रभु भी माणिक प्रभु की भांति ही बहुभाषा विद कवि हैं | आपकी कवितायेँ भी एकता, बन्धुता, लोककल्याण, प्रेम से जूडी हुई हैं | ईश्वर से प्रेम करते हुए वे उनसे बिनती करते हैं कि इस संसार रूपी बाजार के माया के बधन में बंधा हैं | इस मोह माया को त्याग कर वे ईश्वर भक्ति- ईश्वर के चरणों में समर्पित होते हुए मुक्ति की कामना करते हैं |

 

‘’ विक्रय कर संचित की गठरी और छोड़ गृह द्वार |

निकल पड़ा हूँ पाने प्रभु तब चरणों का आधार ||

बढ़ता जाता हैं प्रतिपल प्रभु , पापो का यह भार |

अब न प्रभो मुझसे होगा यह साँसों का व्यापार ||”

पेज १३ ‘ज्ञानलहरी’-ज्ञानराज माणिक प्रभु

ज्ञानराज प्रभु अपनी वाणी द्वारा विषय वासना के मोह में भटके हुए जन मानस को नाम स्मरण का मार्ग दिखाते हुए कहते हैं,

 

विषय वृत्ति का मार्ग भयानक, ले मन रथ को थाम |

ज्ञानसिन्धु प्रभु के चरणों में, रत हो जा निष्काम ||

पेज ७ ज्ञानलहरी’-ज्ञानराज माणिक प्रभु

      

     गुरु द्ववारा प्राप्त ज्ञान से आत्मा को अनुभूति होती हैं कि वह स्वयं ही ब्रह्म हैं | सकलमत कहता हैं कि आत्मा ही ब्रह्म हैं |

पद ६५

ब्रह्म हूँ ब्रह्म हूँ मैं –इसे भूलकर | जीव हूँ एक मैं ये समझता रहा |

सच्चिदानंद पूर्णता भूलकर | अल्पता शुद्र्ता में उलझता रहा |

ज्ञान से ज्ञात इतना हुआ है मुझे | ज्ञान ज्ञाता नहीं ज्ञान ही ज्ञेय है |

अब नहीं है अपेक्षा किसी दीप की | तेज से मैं स्वयं के सुलगता रहा ||पेज २३४ पद्यमाला

 

वस्तुतः इस प्रकार हम देख सकते हैं कि दक्खिनी हिंदी के विकास में मात्र मुस्लिम शासक, व्यापारी, सूफी संत, मुस्लिम कवियों ने ही नहीं अपितु अहिन्दी भाषी प्रदेश के हिन्दू संतो ने भी अपना अमूल्य योगदान दिया हैं | यह मात्र योगदान ही नही था बल्कि श्रेष्ठ रचनाओं के साथ एकता, बन्धुता, समता, मानवता, प्रेम, भक्ति, मुक्ति, ज्ञान आदि का संदेश भी दिया हैं | आपको धर्म, जाति, पंथ में बटे भारतीय समाज को एक करने का श्रेय भी जाता हैं | आप को मानवता का संगठक कहना ही उचित होगा | किसी भी भाषा की पहचान उसके समृद्ध साहित्य एवं कवियों या रचनाकरों से होती हैं | इस सन्दर्भ में भारतीय जनमानस में  नामदेव, एकनाथ, तुकाराम,मनोहर प्रभु,  माणिक प्रभु, मार्तण्ड प्रभु, ज्ञानराज प्रभु आदि का नाम बड़े आदर से लिया जाता हैं |

 

आधार संदर्भों  की सूची :-

१.     दक्खिनी का पद्य और गद्य’– (श्रीराम शर्मा)

२.     पद्यमाला –संकलन प्रकाशक, माणिकनगर

३.     तुकाराम की कविता [कविता कोष ]

४.    नामदेव की कविता [कविता कोष ]

 

 

-  डॉ. सुनिल जाधव

 

 

शिक्षा : एम.ए.{ हिंदी } नेट ,पीएच.डी

 

कृतियाँ :

 

कविता : १.मैं बंजारा हूँ  २.रौशनी की ओर बढ़ते कदम  ३.सच बोलने की सजा ४.त्रिधारा   ५. मेरे भीतर मैं

 

कहानी : १.मैं भी इन्सान हूँ  २.एक कहानी ऐसी भी                             .              

 

शोध :१.नागार्जुन के काव्य में व्यंग्य  २.हिंदी साहित्य विविध आयाम  ३.दलित  साहित्य का एक गाँव  

 

अनुवाद : १.सच का एक टुकड़ा [ नाटक ]

 

एकांकी १.भ्रूण  

 

संशोधन : १.नागार्जुन के काव्य में व्यंग्य का अनुशीलन

 

                 २.विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में लगभग पचास आलेख प्रकाशित

 

अलंकरण एवं पुरस्कार  : १.अंतर्राष्ट्रीय सृजन श्री पुरस्कार [ताशकंद]

 

                  २. अंतर्राष्ट्रीय सृजन श्री पुरस्कार  [दुबई]

 

                  ३.भाषा रत्न [दिल्ली]

 

                  ४.अंतर्राष्ट्रीय प्रमोद वर्मा सम्मान [कम्बोडिया ]

 

                  ५. विश्व हिंदी सचिवालय, मोरिशियस दवारा कविता का अंतर्राष्ट्रीय प्रथम

 

                      पुरस्कार       

 

विदेश यात्रा :  १.उज्बेक [रशिया ]  २.यू.ए.इ  ३.व्हियतनाम  ४.कम्बोडिया  ५.थायलंड

 

विभिन्न राष्ट्रिय अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में आलेख, कविता, कहानियाँ प्रकाशित :-

 

   नव्या ,सृजन गाथा, प्रवासी दुनिया, रचनाकार, पुरवाई, रूबरू, हिंदी चेतना, अम्स्टेल गंगा,

 

   साहित्य सरिता, आर्य संदेश, नव निकष , नव प्रवाह, १५ डेज,  अधिकार,  रिसर्च लिंक,

 

   शोध समीक्षा एवं मूल्यांकन,  संचारिका,  हिंदी साहित्य आकादमी शोध पत्रिका, केरल,  

 

   आधुनिक साहित्य,  साहित्य रागिनी, खबर प्लस ..आदि |     

 

ब्लॉग : navsahitykar.blogspot.com

 

काव्य वाचन :

 

       १. अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन, ताशकंद

 

       २. अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन,दुबई

 

       ३. विश्व कवि सम्मेलन, कैनडा

 

       ४. अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन,कम्बोडिया

 

सम्प्रति : हिंदी विभाग ,यशवंत कॉलेज, नांदेड

 

पता : नांदेड ,महाराष्ट्र -०५ 

 

 



 

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