थका हुआ दरिया

“भई , मैंने तो सुभाष का सारा काम बिना कुछ लिये दिये कर दिया “, दरिया के पानी में पावं डाले बैठे दो दोस्त बतिया रहे थे , ” अब चाहे वो मुझे थैंक्स भी न कहे । और तो और मैंने तो अब तक ये बात किसी को बताई भी नहीं , वो कहते हैं न नेकी कर दरिया में डाल , क्यों ? ….”

” नहीं ssss !” आज के मनुष्यों के मुंह से ये कहावत सुन -सुनकर थक चुका दरिया एकाएक चिल्ला पड़ा , ” बंद करो ये ‘ नेकी ‘ और ये कहावत बोलना अब ! बहुत हो चुकी तुम्हारी ‘नेकी ‘ । और करो तो करो पर मेरा नाम ऐसी ‘नेकी ‘ से जोड़ना बंद करो । ये तुम्हारी ‘नेकीयाँ ‘ मेहरबानी कर मुझमें मत डालो । गले – गले तक भर चुका हूँ मैं तुम्हारी ‘नेकी’ से ! वो देखो उस कोने पर , कमेटी वालों ने कल ही सफाई कर तुम्हारी सैकड़ों किलो ‘नेकी ‘ जमा कर रखी है मेरे किनारे ….”

दोनों ने देखा , दरिया के दूसरे कोने पर गीला गंदला सा प्लास्टिक कि छोटी – बड़ी थैलियों , शराब कि टूटी फूटी बोतलों , कंडोम के पैकेट्स , अस्पतालों का बायो मेडिकल वेस्ट , सड़े हुए हारफुलों , फटे हुए गुटका पाउच का कीचड़ में लिपटा ढेर, दुर्गन्ध फैला रहा था ।

 

- संतोष सुपेकर

संक्षिप्त परिचय : 

मध्य प्रदेश के उज्जैन नगर में जन्मे संतोष सुपेकर की मातृभाषा मराठी है लेकिन लेखन वे हिन्दी में करते हैं। उनके पिताश्री मोरेश्वरजी सुपेकर अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के जिमनास्टिक-कोच हैं। एम कॉम तथा पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्राप्त संतोष सुपेकर पश्चिम रेलवे में ‘लोको पायलट’ के पद पर कार्यरत हैं।

उनकी साहित्य सेवा को देखते हुए अनेक साहित्यिक संस्थाओं ने उनको सम्मानित एवं पुरस्कृत किया है।

कविता, लघुकथा एवं व्यंग्य उनकी प्रिय विधाएँ हैं।

‘साथ चलते हुए’(2004) तथा ‘हाशिए का आदमी’(2007) के बाद ‘बंद आँखों का समाज’ उनका तीसरा लघुकथा-संकलन है

 

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