‘तेवरी’ ग़ज़ल नहीं है क्योंकि -

आदरणीय विद्वान् साथियो !
‘ तेवरी ‘ ग़ज़ल नहीं है क्योंकि –

‘ वृहद हिंदी शब्दकोश ‘ [ सम्पादक- कालिका प्रसाद ] के षष्टम संस्करण जनवरी – १९८९ के पृष्ठ -४९० और ४९३ पर तेवर [ पु . ] शब्द का अर्थ – ‘ क्रोधसूचक भ्रूभंग ‘, ‘ क्रोध-भरी दृष्टि ‘ , ‘ क्रोध प्रकट करने वाली तिरछी नज़र ‘ बताने के साथ-साथ ‘ तेवर बदलने ‘ को – ‘ क्रुद्ध होना ‘ बताया गया है | ‘ तेवरी ‘ [स्त्री. ] शब्द ‘ त्यौरी ‘ से बना है | त्यौरी या ‘ तेवरी ‘ का अर्थ है – ‘ माथे पर बल पड़ना ‘ , ‘ क्रोध से भ्रकुटि का ऊपर की और खिंच जाना ‘ |
वस्तुतः तेवरी सत्योंमुखी चिन्तन की एक ऐसी विधा है जिसमें शोषण , अनीति , अत्याचार आदि के प्रति स्थायी भाव ‘ आक्रोश ‘ , से ‘ विरोधरस ‘ परिपक्व होता है |
कुछ अति ज्ञानी साहित्यकार ‘तेवरी ‘ को ‘ ग़ज़ल ‘ का ही रूप मानकर काव्य की इस नूतन विधा पर हमले बोलते आ रहे हैं और ‘ तेवरी ‘ को ‘ ग़ज़ल ‘ ही मानने या मनवाने पर आमादा हैं | ‘ तेवरी ‘ ‘ ग़ज़ल ‘ कैसे है ?, वे इस प्रश्न का उत्तर देने से कतराते हैं | वे हर समय तेवरीकारों को कुछ इस तरह गरियाते हैं – ” तेवरी – कवि मन – बहलाव के मदारी प्रतीत होते हैं |” [ डॉ. राजेश्वरी शांडिल्य ] या ” आप ग़ज़ल को ‘ तेवरी ‘ क्यों कहना चाहते हैं ? [ डॉ.सुधेश ]
ऐसे सवालों को लेकर हमारा उत्तर सिर्फ इतना – सा है – ” कोठे पर बैठने वाली चम्पाबाई और साम्राज्यवादियों से टक्कर लेने वाली रानी लक्ष्मीबाई में क्या अन्तर है , उसे पहचानो | प्रेमिका को बाँहों में भरने के जोश और कुव्यवस्था से पीड़ित आमजन के आक्रोश को एक ही खाने में फिट मत करो | ”
हमारे ऐसे ही अनेक उत्तरों को दरकिनार कर ग़ज़ल के महापंडित अन्ततः ऐसे व्याख्यान उतर आये हैं – ” बुरा न मानें तो एक बात कहूं – ” अब तक पढ़ी तमाम तेवरियाँ . ग़ज़ल का बिगड़ा रूप हैं | ” [ज्ञान प्रकाश विवेक ]

 

तेवरी और ग़ज़ल में मूलभूत अन्तर क्या है , आइये इसे समझने का प्रयास करें -

ग़ज़ल का अर्थ है – ‘ प्रेमिका से प्रेमपूर्ण बातचीत ‘ , जबकि तेवरी का अर्थ है – ‘ कुव्यवस्था का विरोध ‘, इसी कारण तेवरी को समकालीन यथार्थ की सत्योंमुखी प्रस्तुति के रूप में माना – स्वीकारा गया है |

तेवरी का स्थायी भाव ‘ आक्रोश ‘ और इससे बनने वाले रस का नाम ‘ विरोध ‘ है | जबकि ग़ज़ल एक प्रणय – गीत होने के कारण शृंगार रस की विधा है |

ग़ज़ल की सम्पूर्ण व्यवस्था में एक ही बहर अर्थात् छंद का समावेश किया जाता है , जबकि तेवरी के हर तेवर [कथित शे'र ] में दो छंदों का समावेश कर सम्पूर्ण तेवरी को दो – दो छंदों में भी लिखा जाने लगा है | तेवरी की पहली , तीसरी , पाँचवीं , सातवीं ….पन्क्तियों में मान लो यदि कोई सोलह मात्राओं का छंद निर्धारित किया गया हो तो दूसरी , चौथी , छठी , आठवीं … पन्क्तियों में 14 , 18 , 25 , 30 मात्राओं का अन्य छंद प्रयोग में लाया जा सकता है | इस प्रकार ग़ज़ल के छंद से अलग विशेषता वाला पृथक दो पन्क्तियों [कथित मिसरे ] का तेवर [कथित शे'र ] बनाया जा सकता है | कम से कम मेरी तेवरियों में इस विशेषता का आलोक आपको अवश्य मिलेगा | मेरी प्रस्तुत तेवरी या तेवरियों में एक नहीं अनेक नये छंदों का मकरंद आप सबको चकित कर सकता है | नया या नये छंद का नाम क्या है या होना चाहिए , सुधिजन बताने का कष्ट करते हैं तो मुझ पर कृपा होगी |

तेवरी के हर तेवर में एक नहीं दो-दो स्वरांत [कथित काफिये ] भी अब तेवरी की शोभा बढ़ाने लगे हैं , जबकि ग़ज़ल के हर शे’र में एक ही काफिया आता है | ठीक यही व्यवस्था तेवरी के समान्त [ कथित रदीफ़ ] पर भी लागू होती है |

इस व्यवस्था से उलट कहीं – कहीं ग़ज़ल के रदीफ़ – काफियों जैसी व्यवस्था यदि तेवरी में दृष्टिगोचर होती भी है तो यह व्यवस्था ‘ कवित्त ‘ में भी मिलती है | क्या ‘ कवित्त ‘ को ग़ज़ल कहने या मानने का साहस किसी में है ??

तेवरी में गीतात्मकता पायी जाती है अर्थात् इसके सारे तेवर एक दूसरे के पूरक बनकर सम्पूर्ण कथ्य को पूर्णता प्रदान करते हैं , जबकि ग़ज़ल का प्रत्येक शे’र अपनी स्वतंत्र सत्ता लिये हुए होता है |

 

ग़ज़ल से पृथक तेवरी की इन सारी विशेषताओं को दरकिनार कर अगर कोई ग़ज़ल का जानकार तेवरी को फिर भी ग़ज़ल मानता है तो उसे ‘नाटक ‘ और ‘ एकांकी ‘ , ‘लघुकथा ‘ और ‘ लघुकहानी ‘ तथा ‘चुटकला ‘ और ‘ व्यंग्य ‘ के अन्तर को ध्यान में रखते हुए यह बताना ही चाहिए कि ग़ज़ल की हू – ब – हू नक़ल ‘ हज्ल ‘ ग़ज़ल से अलग विधा कैसे और क्यों है ??

 

 

- रमेशराज

पूरा नाम- रमेशचन्द्र गुप्त

पिता- लोककवि रामचरन गुप्त   

जन्म-15 मार्च , गांव-एसी, जनपद-अलीगढ़

शिक्षा -एम.ए. हिन्दी, एम.ए. भूगोल

सम्पादन- तेवरीपक्ष [त्रैमा. ]

सम्पादित कृतियां

1.   अभी जुबां कटी नहीं [ तेवरी-संग्रह ]  

2. कबीर जि़न्दा है [ तेवरी-संग्रह]   

3. इतिहास घायल है [ तेवरी-संग्रह ]

4-एक प्रहारः लगातार [ तेवरी संग्रह ]

स्वरचित कृतियां

रस से संबंधित-1. तेवरी में रससमस्या और समाधान 2-विचार और रस [ विवेचनात्मक निबंध ]  3-विरोध-रस 4. काव्य की आत्मा और आत्मीयकरण

तेवर-शतक

लम्बी तेवरियां-1. दे लंका में आग 2. जै कन्हैयालाल की 3. घड़ा पाप का भर रहा 4. मन के घाव नये न ये 5. धन का मद गदगद करे 6. ककड़ी के चोरों को फांसी 7.मेरा हाल सोडियम-सा है 8. रावण-कुल के लोग 9. अन्तर आह अनंत अति 10. पूछ न कबिरा जग का हाल

शतक

1.ऊघौ कहियो जाय [ तेवरी-शतक ]  2. मधु-सा ला [ शतक ]     3.जो गोपी मधु बन गयीं [ दोहा-शतक ]  4. देअर इज एन  ऑलपिन [ दोहा-शतक ]  5.नदिया पार हिंडोलना [ दोहा-शतक ]  6.पुजता अब छल [ हाइकु-शतक ]

मुक्तछंद कविता-संग्रह

1. दीदी तुम नदी हो  2. वह यानी मोहन स्वरूप

बाल-कविताएं-

1.राष्ट्रीय बाल कविताएं

प्रसारण-आकाशवाणी मथुरा व आगरा से काव्य-पाठ

सम्मानोपाधि-

‘साहित्यश्री’,   ‘उ.प्र. गौरव’, ‘तेवरी-तापस’, ‘शिखरश्री’

अभिनंदन-सुर साहित्य संगम [ एटा ] , शिखर सामाजिक साहित्कि संस्था अलीगढ़

अध्यक्ष-1.सार्थक सृजन [ साहित्यक संस्था ]  2.संजीवन सेवा संस्थान ;सामाजिक सेवा संस्था 3.उजाला शिक्षा एवं सेवा समिति [ सामाजिक संस्था ]

पूर्व अध्यक्ष-राष्ट्रीय एकीकरण परिषद, उ.प्र. शासन, अलीगढ़ इकाई

सम्प्रति-  दैनिक जागरण’ से स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सम्बद्ध

सम्पर्क- 15/109, ईसानगर, निकट-थाना सासनी गेट, अलीगढ़   [ उ.प्र. ]

 

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