तुम जरूर रोना

जब पहाड़ जैसा दुख
कलेजे पर आ बैठता है
अंधकार धूप सोख सोख
दुख को हरा रखता है
पहाड़ जैसे दुख को कलेजे पर उठाये
तुम रोना, जरूर रोना
वैसे ही रोना
जिस तरह भी तुम चाहो, तुम्हें अच्छा लगे
छाती पीट पीट, दहाड़ दहाड़
सबके सामने,अकेले में छुप छुप
हाथ पैर पटक पटक, देह को छोड़
तुम रोना, जरुर रोना
दुख को व्यक्त करने की
उतनी ही आजादी है
जितनी की खुशी को
इसलिए अपने कठोर दुख, असह्य पीड़ा को
एक छोर से दूसरी छोर तक नाप
तुम रोना, संतुष्टि भर रोना
और जब रोते रोते तुम्हारी आँखें सूनी हो जाये
सारे खारे पानी को
उलीचना अपने कलेजे पर
कि गीला रह सके कलेजा
और दुख बना रहे हरा
तुम रोना, जरूर रोना
किसी भी दिन  जब टाँगना
अपना कलेजा खूँटी पर
अपनी सूनी आँखों से
कहना सावन भादो को
कि जब आये
दे जाये तुम्हारी आँखों में
एक बूँद पानी
तुम रोना,जरूर रोना
- शालिनी मोहन
शिक्षा  एम बी ए
विभिन्न राष्ट्रीय,अन्तर्राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित। अहसास की दहलीज़ पर साझा काव्य संग्रह के.जी. पब्लिकेशन द्वारा  २०१७ में प्रकाशित।रश्मि  प्रकाशन लखनऊ से कविता संग्रह दो एकम दो  वर्ष २०१८ में प्रकाशित
पता : सिंगसान्द्रा, बंगलुरू, कर्नाटक।

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