तुमने कहा था, इसलिए….


नीलांबरी आज बहुत खुश थी। नासिक में उसकी पोस्टिंग पूरी होने वाली है। अब वह नयी जगह जाएगी, नए लोगों से मिलेगी। नई भाषा, नई संस्कृति सीखेगी।…. और हां, नए दोस्त भी बनाएगी। इसी तरह उसे अपने भारत देश को जानने का मौका मिलता है।
नीलांबरी विश्र्वमित्रा सैनिक अस्पताल में डॉक्टर है। वह देश की सेवा करने वाले जवानों की सेवा करती है। इसी में नीलांबरी को परम सुख मिलता है। नीलांबरी बचपन से ही सैनिक बनना चाहती थी। वह सेना में भर्ती होकर देश की सीमा पर लड़ने जाना चाहती थी। और भारत माता के चरणों में अपने प्राण न्योछावर कर देना चाहती थी। जब कभी वह देशभक्ति के गाने सुनती, देशभक्ति की फिल्में देखती तो देश पर मर-मिटने की तीव्र इच्छा उसके मन में हिलोरें लेने लगती। जब भी वह अपने बड़े होने की कल्पना करती तो खुद को साड़ी या गहनों में नहीं बल्कि वर्दी पहने एक सैनिक के रूप में देखती।
बचपन में वह सबसे कहा करती थी कि बड़ी होकर सेना में भर्ती होगी और देश के दुश्मनों को चुन-चुन कर मार डालेगी। नीलांबरी की बात पर सब हँसते कि सेना में लड़कियों का क्या काम?
उसकी सहेलियां चिढ़ातीं, ‘तुझे पता भी है, दुश्मन कैसे होते हैं? बड़े खूंख्वार। राक्षस जैसे! बड़ी-बड़ी मूंछें, शेर जैसे पंजे! तू चुहिया जैसी, वे तो तुझे चुटकी में मसल देंगे।’
सहेलियों के डराने पर नीलांबरी सच में डर जाती। कभी-कभी यह डर उसके सपने में भी आता। सपना देखती कि वह किसी निर्जन जगह पर वर्दी पहने खड़ी है। रात का अंधेरा है और कंपाने वाली ठंडी। इतने में कंटीले तारों के उस पार बॉर्डर से कई दुश्मन उसकी ओर बढ़ते हैं। ये मोटे-तगड़े, लंबे-लंबे नाखून, भेड़ियों जैसी आंखें। उसे पकड़कर सब खाने वाले ही थे कि तभी आसमान पर एक हैलीकॉप्टर धड़धड़ाने लगता है। एक जवान रस्सी से नीचे उतरता है और उसे ऊपर खींच लेता है।
हैलीकॉप्टर में देखती है तो यह एअरफोर्स ऑफिसर उसका दोस्त है-देव।
नीलांबरी की आँख खुल जाती है। वह इस बात पर खुश होती है कि देव भी उसकी तहर डिफेंस में है।
‘… पर है तो यह सब सपना ही न!’ यह सोचकर नीलांबरी उदास हो जाती है। सुबह वह उठती है तो अपनी मम्मी से सपने का जिक्र करती है।
मम्मी, नीलांबरी से कहती हैं, ‘बेटा, पहले अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। इस साल तुम्हारी बारहवीं की बोर्ड एग्जाम है। अगर अच्छे नंबर नहीं आए तो सेना में कैसे भर्ती होओगी?’
मम्मी की बात सुनकर नीलांबरी में जोश आ जाता है और वह जोश-खरोश के साथ पढ़ाई में जुट जाती है।
नीलांबरी बचपन के दिनों में खोई रहती है कि उसका सेल फोन बज उठा। उसने देखा यह उसकी सहेली डॉ. अंजली पुरी का फोन है। नीलांबरी ने फोन पर बात की। पता चला कि अंजली के पति डॉ. महेश शहर से बाहर हैं। इसलिए दोनों सहेलियों ने तय किया कि आज रात का खाना वे किसी होटेल में खाएंगी और समय मिला तो गोदावरी नदी के तट पर ‘गोदा पार्क’ की सीढ़ियों पर बैठकर पानी में पाँव लटकाए ‘छप-छपाकछई’ करेंगी।
नीलांबरी को अच्छा लगा कि इसी बहाने एक बार और शहर घूम आएगी। तीन महीने बाद यह शहर छोड़कर जाना है ही तो क्यों न वह इस शहर को फिर से देख ले जो उसकी यादों में हमेशा के लिए बस जाए। नीलांबरी ने घड़ी देखी-पांच बज रहे हैं। उसकी ड्यूटी खत्म होने में अभी एक घंटा बाकी है।
रात आठ बजे नीलांबरी तैयार होकर अंजली के नर्सिंग होम पहुंच गयी। वह अपने केबिन में मरीज को देख रही थी। जैसे ही केबिन खुला, नीलांबरी अंदर घुस गई। अंजली तो नीलांबरी को देखती ही रह गई। ब्लू रंग की शिफॉन साड़ी में नीलांबरी बेहद खूबसूरत लग रही थी।
अंजली ने शरारती अंदाज में कहा, ‘आओ, आओ, मेरी नीलम परी! आज तो तुम आर्मी की नहीं, एअर फोर्स की, आई मीन टू से – आसमान की परी लग रही हो।’
अपनी तारीफ सुनकर नीलांबरी हंस पड़ी। और हंसते-हंसते लगा जैसे कुछ उसकी आंखों में चुभ गया है। आंखें नम हो गईं और दिल भारी…। तभी अगली पेशेंट अंदर आ गई। नीलांबरी इंतजार करने को कहकर बाहर निकल आई।
बाहर आकर वह बैठने के लिए जगह ढूंढ़ने लगी। पांच औरतें अभी भी थीं। डॉ. अंजली गायनोकोलॉजिस्ट है। इसलिए उसकी मरीज औरतें ही होती हैं। कम से कम एक घंटा तो लगेगा ही। नीलांबरी ने अनुमान लगाया। तब तक क्या करे वह? गार्डन एरिया में एक बेंच पर आकर नीलांबरी बैठ गई। कान में ईयरफोन लगाकर एफएम रेडियो सुनने लगी। रेडियो जॉकी ने किसी श्रोता की फरमाइश पर गाना लगाया-कोई दर्दभरा गीत था। नीलांबरी उदास हो गई। न चाहते हुए भी कभी-कभी देव याद आ ही जाता था। और आज जब अंजली ने अनायास ही उसे ‘नीलम परी’ कहा तो देव आंखों में घूम गया। देव जब भी उससे टेलीफोन पर बातें करता था तो उसे नीलम परी कहता था।
फिर चिढ़ाने के लिए कहता, ‘तुम परी तो कहीं से लगती ही नहीं।’
नीलांबरी कितना चाहती थी कि देव भी उसके साथ नेशनल डिफेंस एकेडमी ज्वाइन करे। एक दिन अखबार में पूरे पेज का विज्ञापन छपा था। राष्ट्रीय सुरक्षा अकादमी में भर्ती होने का आह्वान था। पढ़कर नीलांबरी देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत हो गयी। जब उसने इस बारे में अपने पापा से बात की कि तो उसका सारा जोश ठंडा पड़ गया। पापा ने बताया कि सेना में बॉर्डर पर लड़ने वाली सैनिक के तौर में लड़कियों की भर्ती नहीं होती। पापा ने उसमें यह उम्मीद जरूर जगाई कि वह उच्च शिक्षा प्राप्त करके सपोर्टिंग आर्म्ड के रूप में इंजीनियर या डॉक्टर के रूप में सेना में भर्ती हो सकती है।
नीलांबरी ने सोचा कि वह सैनिक नहीं बन सकती तो क्या हुआ देव ही सही। वह खुद जाकर एन डी ए का फॉर्म ले आई कि देव इसे भर दे। फॉर्म लेकर वह सीधे देव के घर पहुंची। वे दोनों बचपन के दोस्त थे। इसलिए सारे काम एक-दूसरे को बता कर करते थे।
नीलांबरी के पिता पेशे से एडवोकेट थे और अपने एक दोस्त के साथ एक लॉ-फर्म चलाते थे। उन्हीं के क्लाइंट थे देव के पिता। बिजनेस से हुई पहचान दोस्ती तक पहुंची और दोस्ती घर तक। इन सात-आठ सालों में दोनों परिवारों के बच्चे एक-दूसरे से घुल-मिल गए थे। पर इधर दो सालों से देव के पिता को बिजनेस में घाटा होने लगा था। एक-दो बार तो नीलांबरी के पिता ने अपनी तरफ से मदद भी की थी।
नीलांबरी और देव दोनों ही अपने भाई-बहनों में छोटे थे। देव के बड़े भाई की शादी एक साल पहले ही हुई थी। उसकी भाभी तो कभी-कभी मजाक में नीलांबरी को अपनी देवरानी भी कह देती थी। झेंप के मारे नीलांबरी बात बदल दिया करती थी। उसे बचपन में अपना नाम ‘नीलांबरी’ पसंद नहीं था। वह अपना नाम नीलम ही लिखा करती थी। घर में सब उसे ‘नीलू’ बुलाते थे। और देव, वह तो उसे नीलम परी कहा करता था।
…तो आज जब अंजली ने उसे नीलम परी कहा तो नीलांबरी को बरबस ही देव याद आ गया। और देव के साथ बीस साल पुरानी वह आखरी मुलाकात भी।
नीलांबरी यानी नीलू ने देव से एन डी ए का फॉर्म भरवाया फिर दोनों फार्म जमा करने पोस्ट ऑफिस गए। वहां से लौटकर जुहू की बस पकड़कर वे जहू-चौपाटी चले गए। दोनों खूब खेले चौपाटी की रेत में। घुटनों-घुटनों पानी में भीगे। भेलपुरी खायी, काला-खट्टा गोला खाया और शाम होने से पहले बस पकड़कर घर लौट आए।
नीलू घर पहुंची तो मम्मी परेशान थीं। उस दिन तो नहीं दूसरे दिन मम्मी ने बताया कि देव की मम्मी नाराज हो रही थीं कि नीलू की सोहबत में देव बिगड़ रहा है। उन्हें अपने लाडले बेटे को सेना में नहीं भेजना है। सुनकर नीलू हैरत में पड़ गई। उसे आंटी यानी देव की मां के इतने नाराज होने का मतलब समझ नहीं आया। नीलू महसूस कर रही थी कि पिछले कई महीनों से आंटी उससे उखड़ी रहती थीं। देव के पिता कभी बड़े बिजनेसमैन थे। मगर आज उनका नीलू के पिता से मदद लेना आंटी को अखरता था।
नीलू कराटे क्लास जाती है। वॉली बॉल की वह नेशनल प्लेयर है। पिछले साल ही वह गणतंत्र दिवस की परेड के लिए दिल्ली जाकर आई थी। देव की मां को नीलू के ये लड़कों वाले काम नहीं सुहाते थे। उन्हें लगता था कि एक लड़की को लड़कियों की तरह ही रहना चाहिए।
जब १२वीं का रिजल्ट आया तो नीलू को ९३ प्रतिशत अंक मिले और देव को ८५ परसेंट। देव की मां को यह बात चिढ़ाने के लिए काफी थी। उन्होंने देव को मामा के पास सूरत भेज दिया जहां वह पढ़ाई के साथ-साथ मामा का डायमंड बिजनेस संभालेगा क्योंकि मामा के कोई बेटा नहीं था। पिछले साल से उनकी तबियत भी खराब रहने लगी थी।
नीलांबरी को पुणे के आर्म्ड फोर्सेस मेडिकल कॉलेज में एडमिशन मिल गया और वह डॉक्टरी की पढ़ाई में व्यस्त हो गई। मेडिकल कॉलेज में नया माहौल, नए दोस्त और सबसे बढ़कर पढ़ाई के साथ बेसिक मिलिट्री की ट्रेनिंग के अलावा शाम को गेम्स प्रैक्टिस। सब कुछ इतनी व्यस्त दिनचर्या कि दम मारने की फुरसत नहीं मिलती।
छुट्टियों में जब अपने घर मुंबई आती तो उसको अपना ही शहर बेरौनक और सूना-सूना लगता। क्यों? क्योंकि अब इस शहर में उसका दोस्त देव जो नहीं था। जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया नीलू के दिल से देव की स्मृतियां पीछे सरकती गईं।
मेडिकल इंटर्नशिप के दौरान वह तुषार के करीब आई। तुषार भी बचपन में सैनिक बनना चाहता था। मगर अब वह एक डॉक्टर के रूप में देश की सेवा करेगा। मेडिकल की डिग्री मिलने के बाद तुषार और नीलांबरी अब कैप्टन रैंक के डॉक्टर थे। उनको पहली पोस्टिंग एक ही जगह पठानकोट में मिली। संयोग जैसे समय और परिस्थितियों के साथ साठ-गांठ करके उन दोनों को मिलाने पर तुला हुआ था। दोनों चाहे कहीं भी रहें पर दिन में एक बार जरूर एक-दूसरे से टकरा जाते। जितने पल दोनों एक-दूसरे के साथ होते उमंग और उल्लास से भरे रहते। एक चमक तितली बनकर दोनों के चेहरे पर फुदकती रहती। आंखों की पुतलियों के भौरों गूंजने लगते। नेपथ्य में प्रेम के सतरंगी इंद्रधनुष खिल जाते। उन दोनों की धनात्मक ऊर्जा वातावरण को आप्लावित कर देती। आस-पास के लोग इसे महसूस करते पर समझ नहीं पाते। जिन्होंने समझा तो वे इस प्रेम को परिणति तक पहुंचाने के लिए तत्पर हो उठे। यह थीं नीलांबरी और तुषार की मां। मां को कैसे न पता चले कि उनकी संतान क्या चाहती है! हां, यह अलग बात है कि अक्सर इन चाहतों पर जमाने की रवायतें कुंडली मार कर बैठ जाती हैं।
छह महीने पहले जब तुषार की मां आई थीं तो मन ही मन नीलांबरी को अपने बेटे के लिए पसंद कर लिया और इस बार जब नीलांबरी की मम्मी एक महीने से साथ हैं तो उन्होंने अपनी बेटी की पसंद पर मन ही मन मुहर लगा दी है। मुहरबंद यह लिफाफा तो अब अगले महीने मुंबई जाकर ही खुलना था। आखिरकार अगले छह महीने बाद वह दिन भी आ गया जब नीलांबरी और तुषार अपनी ड्यूटी पर लौटे तो पति-पत्नी बनकर।
सैनिक क्वार्टर में जश्न मनाने का एक सॉलिड बहाना मिल गया था। आने वाले संडे की रात सबने सुबह होने तक जश्न मनाया। अगले दो साल का वक्त हनीमून पीरियड में चला गया। इस तरह चाल साल भी बीत गए। तुषार हृदय रोग विशेषज्ञ था और वह चाहता था कि आगे इंटरवेंशनल कॉर्डियोलॉजी में स्पेशलाइजेशन करे। और यह तभी मुमकिन था कि नीलांबरी घर-परिवार की जिम्मेदारियों से उसे मुक्त रखे। वह अब मां बनना चाहती थी मगर उसने एक स्त्री की इस शाश्र्वत आकांक्षा और आवश्यकता को परे ढकेल कर अपने पति की महात्वाकांक्षा का सम्मान किया।
सेना में पति-पत्नी को ‘स्पाउस पोस्टिंग’ की प्राथमिकता दी जाती है। पर तुषार और नीलांबरी को अगली पोस्टिंग अलग-अलग मिली। और इतनी दूर कि दोनों बिछोह की कल्पना से हिल गए। तुषार को पोस्टिंग मिली मुंबई में और नीलांबरी को भेजा गया देश के पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश में स्थित तेंगा वैली। मुंबई से लगभग ३००० किलोमीटर दूर। चीन से एक दिन की दूरी पर जबकि रेलवे से मुंबई आने में चार दिन खर्च हो जाते हैं।
कितने भारी मन से बोरिया-बिस्तर बांधकर चली थी नीलांबरी। मुंबई एयरपोर्ट पर विदा होते हुए तड़प उठी थी वह। चश्मे के अंदर तुषार की आंखें भी भीगी हुई थीं। नीलांबरी जैसे ही जाने को मुड़ी तुषार ने भावातिरेक में उसे प्रगाढ़ आलिंगन में कस लिया और एक तप्त चुंबन उसके होठों पर रख दिया। मूर्ति सी जड़ हो गई वह…। वह तुषार को देख रही थी और तुषार उसे। दोनों एक सम्मोहन में बंधे। आखिर सिर को झटका देकर तुषार ने ही तोड़ा उस सम्मोहन को। दोनों अपने सैनिक वर्दी में थे। विरह के आंसुओं से दिलेरी के रंग को धूमिल नहीं कर सकते थे। तुषार ने नीलांबरी को सैनिक सैल्यूट मारा पत्युत्तर में नीलांबरी ने भी अपने पति को सैल्यूट किया।
फिर नीलांबरी ने कॉरीडोर की तरफ देखा जहां उसे विदा करने आए दोनों परिवार साथ खड़े थे।
दोनों को अलग-अलग रहते हुए भी एक अरसा बीत गया। अगली पोस्टिंग जब मिली तो दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। यह स्पाउस पोस्टिंग थी अंबाला छावनी में। विरह के दिन बीत चुके थे। दोनों हर पल साथ रहते। तीन साल की दूरियों ने उनके प्रेम को और उतप्त बना दिया था। अब साथ थे तो जीवन के दूसरे पहलुओं पर उनकी नजर पड़ी। उन्होंने महसूस किया कि सैनिक क्वार्टर के बाहर भी देश का विस्तार है। नागरिकों को भी उनकी जरूरत है। तुषार और नीलांबरी जब छुट्टी पर अपने गृहनगर मुंबई लौटते तो आस-पास की बस्ती के बच्चों को पढ़ा दिया करते। वहीं बस्ती में काम करने वाली एक सामाजिक संस्था से वे कई सालों से जुड़े थे। वे अक्सर गरीबों का इलाज भी करते। खाली समय में नीलांबरी लड़कियों को आत्म रक्षा के लिए मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग देती। दोनों बच्चों में आत्म-सम्मान और देशभक्ति की बीज बोते।
नीलांबरी और तुषार सही अर्थों में देशभक्त हैं। एक सैनिक के अलावा एक जिम्मेदार नागरिक भी। तुषार कहता है कि एक अच्छा नागरिक ही एक अच्छा देशभक्त बन सकता है। अपने देश से प्रेम करने के लिए जरूरी नहीं कि सेना में ही भर्ती हुआ जाए। हम अपने आस-पास के लोगों की मदद करके भी देशसेवा कर सकते हैं।
नीलांबरी यह मानती है कि हमें जो भी काम करना आता है उसके जरिए हम देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा सकते हैं। शिक्षक, इंजीनियर, डॉक्टर, वकील जैसे पेशे से जुड़े नागरिकों को कुछ समय निकालकर अपनी निःशुल्क सेवा सामाजिक संस्थाओं को देनी चाहिए।
तुषार और नीलांबरी ने कई विद्यार्थियों को सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित किया। दोनों का मानना है कि देश के हर जवान को पढ़ाई खत्म होने के बाद अनिवार्य रूप से दो साल भारतीय सेना को देना चाहिए। तभी हम सही अर्थों में अपने देश से प्रेम कर पाएंगे। इस तरह तुषार और नीलांबरी ने देशभक्ति की परिभाषा को नए आयाम दिए।
इस बार फिर नीलांबरी और तुषार को अलग-अलग पोस्टिंग मिली थी। नीलांबरी नासिक में तो तुषार राजस्थान में।
दो साल पहले गोदावरी घाट पर यूं ही घूमते हुए डॉ. अंजली से नीलांबरी की दोस्ती हो गयी। खाली समय में दोनों एक-दूसरे के घर आने-जाने लगी थीं। दोनों जब मिल बैठतीं तो कभी बचपन की गलियों में चौकड़ी भरतीं तो कभी जवानी के झूले पर बैठ पांवों से आसमान छूने को ललक उठतीं। सिर जुड़ाए जाने किस बात पर खी-खी हंसती रहतीं। एक बार हंसी का सोता जो फूट जाता तो गोदावरी भी कल- कल करना छोड़ उनकी हंसी सुनने ठहर जाती। ठेले पर घाटी चटनी ठूंस-ठूंस कर वड़ापाव खातीं और नाक सुड़कती जातीं। कटिंग पेशल चहा पीते-पीते जीभ और जल जाती।
उन दोनों का आज भी ऐसा ही कोई इरादा था। किसी ठेलेवाले से ५-५ रुपए प्लेट कांदा-भजी लेकर खाते-खाते गोदावरी घाट तक जाने का। वहां से लौटते हुए किसी ढाबे पर खाना खाकर अपने-अपने घरों का रास्ता पकड़ना।
पर अब नीलांबरी को इंतजार भारी लग रहा था। घर से चली थी तो मन एकदम हल्का और प्रफुल्लित। मगर अब देव की याद से दिल बैठा जा रहा था और शरीर शिथिल…। कभी-कभी उसे देव याद आ जाया करता था तो वह  हठात्‌ अपने मन को रोक लेती कि उसे देव को अब याद नहीं करना चाहिए। वह डरती कि कहीं बचपन का खेह इस उम्र में ‘प्रेम’ के रूप में तो परिभाषित नहीं होना चाहता! उसने अपने मन का गठबंधन तुषार से कर लिया है तो देव को याद करना बेईमानी होगी। एक ईमानदार बीवी की तरह वह अपने मन को साथ-सुथरा रखना चाहती है।
…मगर अंजली के एक संबोधन ने एक के ऊपर एक तहायी हुई वर्जनाओं की दीवार ढहा दी। नीलांबरी का जी चाहा कि वह देव को याद करे, खूब-खूब याद करे। जी भर कर, मन भर कर। यहां कौन आ रहा है उसके मन की चौकसी करने? उसे वही देव याद आया, जुहू-चौपाटी से लौटते हुए… बस से उतर कर नीचे हाथ हिलाता हुआ। नीलू की बस आगे बढ़ गई और देव पीछे की दिशा में अपने घर की ओर… तब से दोनों ही विपरीत दिशा में इतना आगे बढ़ गए कि उन्हें कभी एक-दूसरे की खबर ही नहीं मिली। अगर स्मृतियों की कोठरी नहीं होती तो हम अपने प्रियजनों को खोने के बाद कभी नहीं पाते। ऐसे ही मन की किसी कोठरी में नीलू और देव डब्बा आई स्पाई, लंगोरी या फिर मंगूस खेलते रहते हैं। कभी-कभी देव कोई गाना भी गाता। पत्थर की दो चिप्पियां अपने दाएं हाथ की ऊँगलियों में फंसाकर नाक से गाता। जैसा कि उसने लोकल ट्रेन में एक भीख मांगने वाले बच्चे को देखा था। वह तान छेड़ता तो नीलू और बाकी के भाई-बहन, हंसते-हंसते बेहाल हो जाते…
‘गरीब की सुनो, वह तुम्हारी सुनेगा
तुम एक पैसा दोगे वो दस लाख देगा…’
देव गाते-गाते सबके सामने हाथ पसारता, पर हंसने में मगन बच्चे देख नहीं पाते कि नीलू देव के हाथ पर एक टप्पी मार देती।
एक दिन बचपन का साथी छूट गया और बचपन का खेला भी।
उस दिन हाथ हिलाकर ‘बाय’ बोलते हुए दोनों ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि यह उनकी अंतिम मुलाकात होगी।
इस समय उसे वही देव याद आ रहा था। १७-१८ साल वाला देव। …इतना सजीव जैसे उसी आंखों के सामने खड़ा हो, बिलकुल आंखों के सामने कि वह हाथ बढ़ा कर छू ले… क्या सच में…?
नीलांबरी आंखें फाड़-फाड़कर सामने देख रही थी। बिल्कुल वही, १७-१८ साल वाला देव। घुंघराले बाल। हल्की-सी दाढ़ी-मूंछें और लंबा कद। क्या समय पीछे लौट आया है? नीलांबरी बुरी तरह चौंकी।
उसने ध्यान से देखा-अरे, यह तो भरत है। डॉ. महेश का असिस्टेंट।
अंजली ने ही एक बार उसे बताया था कि यह लड़का यहां नासिक में अपने रिश्तेदार के पास गांव से पढ़ने के लिए आया था। मगर रिश्तेदार ने पढ़ाने के बजाए उसे अपने ढाबे में काम पर लगा दिया। महेश को इस लड़के में पढ़ने की ललक दिखी तो किसी तरह वे इसे अपने साथ ले आए। अब यह दिन में कॉलेज जाता है तो शाम को उनके साथ काम करता है। अंजली ने यह भी बताया था कि भरत डॉक्टर बनना चाहता है। यह सुनकर अच्छा लगा था नीलांबरी को।
वह भूल गई थी इस बात को। अभी उसे याद आया। मगर ये भरत उसे आज देव की तरह क्यों लग रहा है? पहले तो कभी उसे ऐसा नहीं लगा था।
नीलांबरी को अपनी ओर देखता हुआ पाकर भरत खुद उसके पास आया।
उसने कहा, ‘गुड इवनिंग मैम। कुछ चाहिए क्या?’
नीलांबरी झेंप गई। तुरंत बोली, ‘ओह नो थैंक्स।’
फिर आगे बोली, ‘तुम किस क्लास में हो?’
‘मैम, १२वीं में हूं।’ भरत बोला।
‘…तब तो बोर्ड एग्जाम होंगे। स्टडी कर रहे हो ना, अच्छी तरह?’ नीलांबरी ने पूछा।
‘यस मैम।’ भरत ने जवाब दिया।
‘अच्छा, तुम्हारा बर्थ डे कब आता है?’ नीलांबरी को उससे बातें करना अच्छा लग रहा था।
‘१५ अगस्त को।’ भरत बोला।
‘अरे वाह! स्वतंत्रता दिवस पर।  … तब तो तुम्हें सेना में जाना चाहिए।’ नीलांबरी खुश होकर बोली।
‘क्यों? क्या आपका भी जन्मदिन १५ अगस्त को आता है। इसलिए आप सेना में हैं।’ बड़ी मासूमियत से भरत ने पूछा।
नीलांबरी हंस पड़ी।
बोली, ‘नहीं, मेरा जन्मदिन २६ जनवरी को आता है। मगर मुझे बचपन से ही सैनिक बहुत पसंद थे। इसलिए मैं सेना में आना चाहती थी।’
फिर वह रुक कर बोली, ‘यू नो, भरत! आज, मैं, तुम या हम सभी चैन से जी रहे हैं। आजादी की हवा में सांस ले रहे हैं, क्यों? क्योंकि हमारा देश आजाद है। वह इसलिए कि देश की सरहदों पर चौबीसों घंटे, साल के तीन सौ पैंसठ दिन चाहे कड़ाके की ठंड हो या तपती गर्मी, निर्जन रेगिस्तान हो या ऊँची बर्फीली चोटी-हर पल, हमारे सेना के जवान, अपनी जान की बाजी लगाए देश की हिफाजत में खड़े रहते हैं। अगर हर कोई ये सोचने लगे कि एक मेरे सैनिक न बनने से क्या फर्क पड़ता है तो सोचो देश का कितना नुकसान होगा? देश सुरक्षित तो देशवासी सुरक्षित।’
नीलांबरी ने देखा- भरत के चेहरे पर खुशी झलक रही थी।
वह गद्गद् होकर बोला, ‘मैम, जबसे अंजली मैम ने आपके बारे में बताया था तब से मैं आपसे बात करना चाहता था। मेरा भी मन करता है कि मैं भी आपकी तरह सेना में भर्ती होऊं। मैं भी अपने देश के लिए कुछ करना चाहता हूं।’
‘वाह सच में!’ नीलांबरी को जैसे मन की मुराद मिल गई।
‘दैट्स गुड। जल्दी ही बाद एन डी ए का फॉर्म निकलने वाला है। मैं तुम्हें लाकर दूँगी। तुम ध्यान से पढ़ाई करना। पैसों की चिंता मत करना। मैं अंजली और डॉ. महेश से बात करूंगी तुम्हारे लिए।’
‘मैम आप कभी यूनीफार्म नहीं पहनती? मैं आपको यूनीफार्म में देखना चाहता हूं।’ भरत एक बच्चे की तरह चहक कर बोला।
‘ओके अगली बार में तुम्हें वर्दी की फोटोग्राफ्स दिखाऊंगी।’ नीलांबरी ने भरत से वादा किया।
भरत से मिले हुए नीलांबरी को महीना बीत गया। एक बार उसे तुषार से मिलने राजस्थान जाना पड़ा। दूसरी बार वह मुंबई चली गई।
शादी के ग्यारह साल बाद भी नीलांबरी और तुषार के अपना कोई बच्चा नहीं था। इसलिए रिश्तेदारों के बच्चे उनके लिए अपने बच्चों जैसे थे। वे सभी तुषार और नीलांबरी से जितना प्रेम करते थे उतना ही उन पर गर्व भी। हर बच्चा बड़ा होकर उन्हीं की तरह बनना चाहता था।
एक दिन नीलांबरी जब अंजली से मिलने गई तो भरत दिखाई नहीं दिया।
अंजली ने प्रेम भरा उलाहना दिया, ‘यार! तूने भरत पर ऐसा क्या जादू कर दिया है कि वह सेना में जाने की बातें करने लगा है। कई दिनों से तुम्हारे बारे में पूछ रहा था। इस समय स्कूल में उसके एक्जाम चल रहे हैं, इसलिए उसे छुट्टी दी है।’
इस बात को फिर २०-२५ दिन बीत गए। अखबार में एक दिन नेशनल डिफेंस एकाडमी में भर्ती का विज्ञापन निकला। नीलांबरी को जैसे इसी का इंतजार था। बरसों की साध पूरी होने वाली थी।
दूसरे दिन भरत को देने के लिए फॉर्म लेकर वह अंजली के पास पहुंच गई।
पर समय एक बार फिर उसका इम्तहान लेने के लिए आकर खड़ा हो गया। भरत उसे नहीं मिला।
अंजली ने बताया कि भरत की मां की तबियत बहुत खराब है इसलिए दो दिन पहले ही भरत अपने गांव चला गया।
नीलांबरी का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया। फॉर्म हाथ में लिए वह सोच रही थी कि जब भी वह यह फॉर्म किसी को देना चाहती है तो वह उससे दूर क्यों चला जाता है?
कुछ देर तक वह बुत बनी बैठी रही। फिर उसने अंजली को लिफाफा देते हुए कहा,
‘अंजली मैंने तो यही सुना है कि जिंदगी में दोबारा मौके आते हैं। तुम ये लिफाफा भरत के गांव पोस्ट कर दो। आगे ऊपरवाले की मर्जी।’
‘इसमें क्या है?’ अंजली ने पूछा।
‘एनडीए का फॉर्म है। मेरी फोटो और प्लीज तुम बुरा मत मानना। मैंने भरत से प्रॉमिस किया था कि उसे पैसों की चिंता करने की जरूरत नहीं है। इसलिए मैंने उसके नाम २५ हजार का चेक बनाया है।’ नीलांबरी ने जैसे गिड़गिड़ाते हुए अंजली से कहा।
‘ओके डोंट वरी। मैं कल ही भरत को भेज दूंगी’
अंजली ने अपनी सहेली की बात रख ली।

***

इसके अगले महीने नीलांबरी की पोस्टिंग श्रीनगर कश्मीर में हो गई। यहां आकर नीलांबरी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा, क्योंकि तुषार भी अगले सप्ताह से वहीं आने वाला था। सालों बाद दोनों फिर अपनी गृहस्थी में एक साथ थे। नीलांबरी इन दिनों बहुत खुश रहने लगी थी जैसे उसकी हर कमी पूरी हो गई हो।
समय का पंछी पंख लगाकर उड़ता जा रहा था। चौथा साल भी पूरा होने को था। नीलांबरी और अंजली की फोन पर बातें होती ही रहती थी। अंजली को भी भरत की फिर कोई खबर नहीं मिली थी।
दीवाली का त्योहार करीब आ रहा था। इस बार नीलांबरी ने अंजली और महेश को बच्चों के साथ दीवाली मनाने के लिए अपने यहां बुलाया था। नीलांबरी और तुषार दोनों खुश थे उनके आगमन को लेकर। पिछले दस दिनों से दोनों मेहमानों के लिए तैयारी कर रहे थे। पर दो दिन पहले ही अंजली और महेश दोनो ने फोन करके मांफी मांगी कि वे नहीं आ सकते क्योंकि महेश को अपने भाई के पास कनाडा जाना पड़ रहा है।
नीलांबरी तो यह सुनकर रुआंसी हो उठी। उसका सारा उत्साह फीका पड़ गया। फिर तुषार ने ही बात संभाली। उसने नीलांबरी का मूड ठीक करने के ही अपना अस्त्र निकाला। सावधान की मुद्रा में –
‘सर्दी हो या गर्मी, धूप हो या बरसात
बुखार हो या जुकाम, सोहर हो या शादी बारात
फौजी कभी नहीं थमेगा, कहीं नहीं रुकेगा
फौजी आगे बढ़ेगा, चाहे दिन हो या रात।’
कविता पढक़र तुषार ने अपनी मैडम कौ सैल्यूट मारा। नीलांबरी खिलखिलाकर हंस पड़ी-
तुषार की बेतुकी कविता पर या कड़क सैल्यूट पर? ये तो नीलांबरी ही जाने! कविता भले सही न बैठी हो पर तुषार का निशाना सही बैठ गया। उदासी दूर हो गयी थी। घर फिर जगमगाने लग गया था जैसे दीवाली आज ही आ गई है हो।
और दीवाली भी आई मगर इस तरह…? ऐसा तो किसी ने भी नहीं सोचा था कि इस बार की दीवाली, काली दीवाली बन जाएगी। अमावस्या की अंधेरी रात कहर बनकर जमीन पर उतर आएगी।
अभी दिन भी ढला नहीं था। शहर में सीरियल बम ब्लास्ट हुए। दो-दो मिनट के अंतराल पर चार बम फटे। आतंकवादियों का कायराना हमला था। दीवाली का बाजार तहस-नहस हो गया। सड़कें खून से रंग गईं। पूरे देश का ध्यान इधर बंटा कि, दुश्मनों की सेना ने सीमा पर आक्रमण कर दिया। पूरी छावनी को अलर्ट कर दिया गया।
लगातार दो दिन तक सीमा पर गोलियां दगती रहीं और सैनिक गोलियों से छलनी होते रहे। कितना दर्दनाक दृश्य था। पूरा सैनिक अस्पताल सैनिकों से भरा था। बमब्लास्ट के घायलों को भी यही भर्ती किया गया था। पूरे अस्पताल में चीख-पुकार मची। सीमा पर शहीद हुए जवानों के परिजनों का विलाप हृदय को दहला देता था।
ढेर सारे डॉक्टरों के साथ नीलांबरी और तुषार भी रात-दिन एक करके अपनी ड्यूटी पर लगे थे।
तुषार तो पिछले दो दिन से अपने क्वार्टर भी नहीं गया था। नीलांबरी घर से कुछ पका-वका कर लाती और दोनों अस्पताल में ही मिलकर खा लेते। नीलांबरी का तो इन कराहते सैनिकों को छोड़कर जाने का मन ही नहीं करता।
कुछ सैनिक तो इतनी कम उम्र के थे कि पूछो मत? कु छ तो अपनी पहली ही पोस्टिंग पर आए थे और घायल होकर यहां पड़े थे। किसी के पैर में, किसी के कंधे पर तो किसी को पसलियों में गोली लगी थी। इनमें से कइयों के बचने की उम्मीद नहीं थी। जो बच जायंगे वो शायद अपाहिज हो जाएं।
इन घायल सैनिकों को देख-देखकर नीलांबरी का कलेजा मुंह को आ जाता। वह डॉक्टर है तो क्या हुआ, है तो इंसान ही न!
बाहर घायलों के परिजनों को भूखे-प्यासे बिलखते देखती तो उनका दुख देखा नहीं जाता। जो शहीद हुए थे उनके रिश्तेदारों की वेदना उसके दिल को को चीर जाती।
नीलांबरी तो अब सोचने लगी थी कि युद्ध होने ही नहीं चााहिए। जमीन के टुकड़ों के लिए इंसानों का सीना छलनी कर दिया जाए यह कहां की इंसानियत है? युद्घ मानवता पर श्राप हैं। हमारी सभ्यता पर काला धब्बा।
यही सोचती हुई नीलांबरी आगे बढ़ी। अचानक एक वॉर्ड के अंदर उसकी नजर पड़ी। उसे बेड पर लेटा हुआ एक जवान दिखा।
वह ठिठकी- ‘अरे यह तो भरत है। नासिक वाला भरत।’
वह बदहवास-सी अंदर घुसी।
भरत ने भी नीलांबरी को पहचान लिया। वह खुशी से झूम उठा। उसने अपने पास खड़े व्यक्ति से कहा,
‘पापा, देखो डॉ. नीलांबरी….।’
उस व्यक्ति ने पीछे मुड़ कर देखा।
नीलांबरी के बढ़ते कदम ठिठक गए। वह वहीं जड़ हो गई।
‘यह क्या, यह तो देव है, देव। उसका अपना देव।’
कभी वह देव को देखती तो कभी भरत को।
‘ओह! भरत, देव का बेटा है। तभी…।’
‘कैसी हो नीलू?’ देव ने हौले से मुस्कुराकर पूछा।
‘पर… पर देव, ये भरत, तुमने इसे सेना में भर्ती करा दिया?’
नीलांबरी जैसे कुछ भी यकीन नहीं कर पा रही थी।
‘हां, तुमने कहा था। इसलिए…’ देव मुस्कुराया।

- सुमन सारस्वत

पत्रकारसाहित्यकार

प्रकाशित कृति : ’ मादा ‘ कहानी संग्रह
1. लोक भारती
2. लोकवाणी ( – सह लेखिकादोनों महाराष्ट्र शैक्षणिक बोर्ड की कक्षा 10 वीं की हिंदी की गाईड )
संप्रति : कंटेंट राइटर ( टारगेट पुब्लिकेशन्समुम्बई ) 

सह संपादक : अम्स्टेल गंगा , नीदरलैंड 
                    वाग्धारा , भारत

पुरस्कार : • महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी पुरस्कार
• शिलांग हिंदी अकादमी पुरस्कार
• सृजनश्री अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारताशकंदउज़्बेकिस्तान
• विश्वमैत्री मंच अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारभूटान
• नारी शक्ति महाराष्ट्र पुरस्कार
• स्त्री शक्ति सेंट्रल मुम्बई पुरस्कार
• मदन कला अकादमी पुरस्कार

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