तिलचट्टा

शब्बो आज एकदम निश्चिन्त थी. उसके चेहरे पर कोई परेशानी या चिंता की लकीर ढूंढने से नहीं मिल रही थी. मां की खोली में बैठी थी एक सुकून से. ‘साला आज कोई फिकरिच नई’ उसके चेहरे ने खोली की पतरे की दीवारों से कहा. स्टोव धधक कर जल रहा था. शब्बो की मां रशीदा बेगम चाय का पानी चढ़ा चुकी थी. रशीदा बेगम ने चाय पत्ती की पुड़िया फाड़ी और टोप के खौलते पानी में डाल दिया. फिर शक्कर, फिर एक कप दूध को भी वहीं पहुंचा दिया. दुपट्टे से हाथ पोंछते हुए रशीदा बेगम अपनी बेटी शब्बो के पास आके बैठ गई.

शाम के पांच बज चुके थे. लोहे के पलंग पर लेटी-लेटी शब्बो अब से लेकर आनेवाली सुबह तक की प्लानिंग कर चुकी थी. पहले तो दोनों मां-बेटी चाय पीएंगी. एकदम कड़क चाय, ऐसी कड़क कि जीभ पर एक घंटे तक स्वाद बना रहे. फिर वह अपने बालों में तेल लगवाएगी. और कल सुबह सिर को धो कर एकदम झकास हो जाएगी. ये समय बदन एकदम भारी-भारी लग रहेला है उसको. उसने अपनी बगलों को सूंघकर देखा – यक्‌ कईसी तरी बास आ रेली है. नहाने से पहले उनको भी साफ करेगी. अभी थोड़ी देर में जाके  शैंपू और हेअर रिमूवर क्रीम लेके आएगी.

आज थर्टी फर्स्ट है – बोले तो साल का आखिरी दिन. आज की रात वो सो के बिताएगी. उसके अब्बू और उसका सबसे छोटा भाई दोनों कल सबेरे तक चाय और वड़ा-पाव का ठेला लगाएंगे. उदरीच जुहू चौपाटी पे कितने सालों से उसका बाप येईच धंदा करता आ रहा है. पर अभी तक उसको कोई परमानंट जगा नहीं मिली. दस साल पहले जुहू पे कितने ठेले वाले, टपरी वाले को मुंसीपालटी ने पक्की जगह बना के दी. ‘पर अपून के अब्बू की तकदीर खराब थी साली.’ सोचते-सोचते शब्बो के मुंह से गाली निकली.

‘अल्ला ….कायको मुंह से गाली निकलती है रे शब्बो.’ अम्मी उसके सामने खड़ी थी. दोनों हाथ में चाय से भरी कप-बसी थी.

‘ले चल गरम-गरम चाय पी. मगज को थोड़ी ठंडक मिलेगी.’ अम्मी ने बड़े प्यार से उसके हाथों में कप-बसी थमायी. कप में भरी चाय भी मां की ममता की तरह छलककर बसी में गिर गयी. शब्बो ने चाय उड़ेलकर बसी होठों से लगा ली.

‘जरा सबर कर….इतनी गरम चाय मत पिया कर….हलक जल जाएगा….’ अम्मी चिंता से बोल उठी.

‘नई रे अम्मी….ये चाय की बसी भी किस्मत जईसीच होती है क्या पता होठों से लगने से पहले ही हाथ से फिसल जाए….’ शब्बो होंठ चाटते हुए बोली.

बेटी की इस हरकत पर अम्मी मुस्कुराए बिना नहीं रही.

चाय खत्म करके शब्बो ने खाट पर से ही झुककर कप-बसी नीचे सरका दी.

‘अम्मी तेल लगा दो ना बालों में….’ बालों का जूड़ा खोलते हुए शब्बो ने मां को मस्का लगाया. क्योंकि रशीदा बेगम मोरी में रखे बरतनों को पहले साफ करने के चक्कर में थी. आज बेटी बहुत दिनों बाद मां के घर आई थी. और आज मां-बेटी बहुत दिनों बाद घर में अकेली थीं. इसलिए पूरे घर में निश्ंिचतता का माहौल था. रशीदा बेगम ने तेल की बोतल उठाई. उसका माथा ठनका. बोतल खाली थी.

‘रुक मैं बाजू में से जाके लाती हूं.’ रशीदा बेगम ने तेल की कटोरी उठायी.

‘अम्मी थोड़ी जास्ती लाना, अक्खे बदन में लगाऊंगी.’ शब्बो ने मां को ताकीद की.

रशीदा बेगम तेल लेके लौटी, बोली ‘नशीब ! मिल गया. नई तो महीने के आखिरी दिन में कुछ मांगने जाओ तो किदर मिलता है.’ शब्बो ने भी मां की हां में हां मिलाई.

रशीदा बेगम ने घर में पड़ी कपूर की दो गोली उठाई पक्कड़ से उसे मसलकर तेल में डाल दिया. उंगलियों से कपूर को तेल में घोलते हुए वह भी खाट पर बैठ गई.  मां उंगली के पोरों से उसके बालों में तेल लगाने में लग गई. तभी मां की नजर बचा कर शब्बो ने अपनी सलवार ढीली कर ली. अपनी दो उंगलियां तेल में डुबोकर फटाक से सलवार के अंदर कर ली. अनुभवी मां की नजर से कुछ छुपा नहीं. मां ने अनदेखा करना चाहा पर दो पल भी खुद को रोक नहीं पाई. ‘क्या हुआ शब्बो, दिखा तो…..’

‘क्या कुछ भी तो नई!’ शब्बो ने पक्के खिलाड़ी की तरह झूठ बोला. रशीदा बेगम कुछ नहीं बोली. वह बेटी के झूठ को पकड़ना नहीं चाहती थी. जरूर वही बात होगी अब शब्बो अपने दुख को, दर्द को छुपा कर बेपरवा होना सीख गई है. मां के विचारों की तरह उसकी उंगलियां बेटी के बालों में फिरने लगीं.

‘अम्मी और कसके रगड़ना.’ शब्बो को बहुत अच्छा लग रहा था.

‘मम्मी देखो तो जूं हो गई है क्या? आजकल सिर बहुत खुजाने लगा है.’ शब्बो की फेहरिश्त बढ़ती जा रही थी. रशीदा बेगम को अब चश्मे के बिना बिलकुल न दिखता था. कई महीने से आंखों का नंबर बढ़ गया था. पुराना चश्मा बेकार हो गया था. फिर बेटी की मिन्नत पर उसने आंखे मिच-मिचाकर कई बार देखा. पर नाकामयाब रही. हार कर बोली, ‘कपूर वाला तेल लगा दिया है. जुएं होंगी तो मर जाएंगी. अब चल चोटियां बनाने दे मुझे…..’

अम्मी ने खूब गट्टी-गट्टी दो चोटियां बनाईं लाल रिबन से सिरे बांधकर उनको मोड़कर फूल बनाकर गांठे लगा दीं. फिर सुरमेदानी की सींक से शब्बो की आं.खों में सुरमा भी लगा दिया और ठुड्डी पर एक काली बिंदी भी-नजर ना लगे उसकी शहजादी को. बचपन में सांवली शब्बो बिलकुल खूबसूरत नहीं लगती थी. पर जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही वह निखरने लगी थी. उसकी सांवली काया तंबई-सी चमक उठी थी. वह बला की खूबसूरत तो नहीं थी फिर भी हर कोई उसे नजर भर कर देखना चाहता था. जाने कैसी ताब थी उसके अंदर! जाने कैसी बेचैनी थी उसके अंदर! दुनिया भर की मालूमात हासिल कर लेना चाहती थी. अब्बू के साथ-साथ चाय की टपरी पर जाती तो चाय कम बनाती, समंदर को ज्यादा निहारती. कभी सोचती समंदर है जो उसे बुला रहा है. तो कभी पांवों से चौपाटी की बालू खोदने लगती – जैसे इस बालू में उसका कुछ खो गया है.

उसका लिखने-पढ़ने का मन करता मगर उसे मदरसे में कौन ले जाता. बड़ी दूर था उसका मदरसा. उसका भाई पास के मुंसीपाल्टी के स्कूल में पढ़ने जाता मगर उसके दादा लड़की जात को स्कूल भेजने के सख्त खिलाफ थे. उसकी तरह उसकी दोनों बहनें भी न तो मदरसे जा पाईं न स्कूल. दोनों भाइयों को मटरगश्ती करने से फुरसत मिलती तो पढ़ते. उसकी दोनों बहनों ने घर में सिलाई-कढ़ाई, बुनाई सीखकर गृहस्थी की पढ़ाई पूरी कर ली थी. अब वे एक अच्छी बीवी बन सकती थीं.

मगर शब्बो वह तो खुद को शबाना आजमी समझती थी. औरतों को भी पढ़ने-लिखने का हक है. आजादी से जीने का हक है और पूरी दुनिया की औरतों को यह हक शब्बो ही दिलाएगी. आखिर शब्बो को इतनी अकल आई कहां से…..? शब्बो बड़ी होशियार थी. उसने अपने भाइयों की किताबें पढ़ डालीं. अपनी चाल में रहने वाली, दूसरी लड़कियों की मदद से उसने कच्ची-पक्की अंग्रेजी भी सीख ली थी. चाल सिस्टम में रहने के कारण वह दूसरी भाषाएं भी धड़ल्ले से बोल लेती थी….

अब उसके अब्बू और भाई भी लिखा-पढ़ी में शब्बो की मदद लेने लगे थे. अम्मी सोचती थी कि उसकी इतनी गुनी बेटी के लिए रिश्ता आसानी से मिल जाएगा. दोनों बेटियों के जैसी तकलीफ इसके लिए नहीं उठानी पड़ेगी. शब्बो भी सोचती-उसको तो कोई शहजादा ही मिलेगा. वह तो ठाट करेगी. बिरादरी में है कोई उसके जितनी पढ़ी-लिखी. पोथी बांचने वाले भी अपनी तकदीर नहीं बांच पाए तो शब्बो की क्या औकात है तकदीर के सामने……

…तभी एक सिसकारी फूटी शब्बो की. …..सोचते-सोचते वह अपने बदन में तेल लगाती जा रही थी. सलवार उसने ऊंची कर रखी थी और बेखयाली में उंगलियां जख्म को कुरेद बैठीं.

‘क्या हुआ, मुझे दिखा…’ रशीदा बेगम खुद को रोक नहीं पाई. उसने झटके से शब्बो की सलवार खींच ली. बायीं जांघ पर दो छोटे पपोटे बने हुए थे. बीड़ी से जलाए गए….

‘उस कंबख्त नासपीटे, हराम के जने ने क्या गत कर दी तेरी….’ रशीदा बेगम की आंख से पानी और मुंह से आग बरस रही थी.

‘हिजड़ा……तेरा बदन बेच-बेच के खा रहेला है फिर भी भड़वे की हवस नहीं मिटती….खुदा उस पर कहर बरसाए…..उसको दोजख में भी जगा न मिले.’ जाने कितनी बददुआएं दीं रशीदा बेगम ने अपने दामाद हामिद को……

शब्बो इत्मीनान से बैठी थी. मां को थमता न देख बोली, ‘जाने दे अम्मी! अपना मूड मत खराब कर. आज मेरे को बाहर जाने का नई है. तो चल अपुन दोनों जश्र मनाएंगे  थर्टी फर्स्ट का. आज सेवइयां खाने का मन है. तू शोरबा भी बना ले, थोड़़ा कबाब भी मंगवाले. अपुन टीवी देखेंगे और पार्टी करेंगे.’

बेटी को चहकता देख रशीदा बेगम ने अपना मूड ठीक करने की कोशिश की. रशीदा बेगम उठकर सेवंई ढूंढने के लिए डिब्बे खंगालने लगी. सेवई मिल गई तो दाल के डिब्बे में रखे अपने खजाने में से कुछ मुड़़े-तुड़़े नोट निकाले. फिर परेशानी से बोली – ‘इतने पैसे पूरे नहीं पड़़ेंगे.’ शब्बो ने अपने पर्स में से बटुआ निकाला और अम्मी को थमा दिया. रशीदा बेगम बाहर चली गई.

शब्बो टीवी देखने में लगी रही. रिमोट से चैनल बदल-बदल कर देखने लगी. ‘थर्टी-फर्स्ट’ का कहीं कुछ भी प्रोग्राम नहीं आ रहा था. अभी शाम के सात भी नहीं बजे थे. आठ बजे के बाद सब शुरु होगा. यह ध्यान आते ही वह न्यूज चैनल देखने लगी. न्यूज में क्या पुलिसवाले, क्या नेता, मंत्री लोग-सब बोल रहे थे कि  थर्टीफर्स्ट का बंदोबस्त अच्छा है. पब्लिक को जास्ती फि करने का नई. पुलिस वाले ड्यूटी पर रहेंगे. डरने का कोई बात नहीं. खबरें देख कर शब्बो ने अपने ढंग से उनकी समीक्षा की. पुलिसवाले ही तो सबसे ज्यादा टेंशन देते हैं. गुंडे और पुलिस दोनों से डरती है पब्लिक और वो भी ….पिछले साल वो एक हवलदार ने उनको एक कस्टमर के साथ देख लिया था. हवलदार ने उसके सामने ही कस्टमर को दो झापड़़ कान के नीचे बजाकर पांच सौ में छोड़़ा और उससे भी पांच सौ जबरदस्ती ले लिए थे. याद करते-करते शब्बो का खून खौल उठा. हामिद वहीं दूर कोने में खड़़ा चौकसी कर रहा था. हवलदार के जाने के बाद वह उसके करीब आया. हामिद भी शब्बो पर बरस पड़़ा था.

‘भाग नहीं सकती थी रंडी कहीं की. इदर खड़़ी होके उसका थोबड़़ा देख रही थी.’

‘मैं क्या करती जाने किधर से आ गया वो.’

‘मेरे को कुछ नहीं मालूम! कल एक तारीख है. खोली का भाड़़ा देना है. कैसे भी करके रातभर में अढ़़ी हजार रुपया चहिए.’

उस रात अढ़़ी हजार रुपए के लिए शब्बो ने गिन के सात चढ़़ाए…..

सातवां वह हवलदार जिसने शब्बो को रंगे हाथों पकड़़ा था और उसके पांच सौ भी छीन लिए थे.

पिछले साल के कड़़वे वाक्ये को याद कर शब्बो का मूड खराब हो गया.

उसकी जबान शराब पीने को मचलने लगी. एक कड़़वाहट दूसरी कड़़वाहट से खत्म होती है शायद…..शब्बो कितनी बदल गई है. आज वह धड़ल्ले से शराब-सिगरेट पीती है. मुंह से गालियां बकती है. इस धंधे में जितना ये सब करो पैसा ज्यादा मिलता है. पहले तो वह अपना भाव बढ़़ाने के लिए यह सब ढोंग करती थी. अब यह ढोंग उसकी सच्चाई बन गया है. और उसकी सच्चाई, ढोंग बन गई है. हामिद शब्बो का दूसरा शौहर है.

शब्बो का पहला शौहर कोई और था. जब वह १९ साल की थी तब उसका निकाह हो गया था. दूल्हे मियां तीन साल से कहीं दुबई में नौकरी करते थे. इन तीन सालों में दूल्हे मियां ने कमा-कमाकर अपना घर भर लिया था. दूल्हे मियां के घरवाले चाहते थे कि घर में एक पढ़़ी-लिखी दुल्हन आए जो उनके साहबजादे के साथ अंग्रेजी में गिटपिट कर सके. बिरादरी में ही उन्हें शब्बो यानी शबनम के बारे में पता चला. लड़क़ी का रंग थोड़़ा दबा हुआ था पर देखने में खूबसूरत लगी सो रिश्ता पक्का हो गया.

शब्बो भी अपनी तकदीर पर इतरा रही थी कि पढ़ऩा-लिखना उसके काम आया.

शादी के छह महीने शब्बो के लिए किसी जन्नात से कम न थे. खुशियों की भी एक उम्र होती है. शब्बो की खुशियों की मियाद पूरी हो चुकी थी. खुशियों को दहलीज के भीतर आने में एक उम्र खप जाती है मगर बुरा वक्त दाखिल होने के लिए बस एक सूराख ढूंढ लेता है.

शब्बो के शौहर फारुख के दुबई जाने का वक्त आ चुका था. इमीग्रेशन वीजा, वर्कपरमिट जैसे सरकारी कागजात बनवाने के चक्कर में कई हफ्ते खर्च हुए पर काम न बना. इधर पता चला कि समय पर न पहुंच पाने के कारण दुबई मेंकंपनी का कांट्रेक्ट हीखत्म हो गया. इधर वीजा संबंधी कानून सख्त हो जाने के कारण फारुख को कोई दूसरी कंपनी से भी वर्क परमिट नहीं मिल पाया.

हजारों रुपए कमाने वाला फारुख अब बेरोजगार था. आठ जनों का परिवार फारुख की कमाई से चलता था. घर में तंगी होने लगी. कलह बढ़ऩे लगी. इन सबका ठीकरा शब्बो के सिर फूटा. उसी के मनहूस कदम जब से इस घर में पड़़े बरकत चली गई. ताने सुन-सुनकर उसके कानपक गए थे. फारुख कहीं काम पर लगता तो महीने-दो-महीने से ज्यादा टिकता नहीं. दुबई न जा पाने की फ्रस्ट्रेशन उस पर इस कदर हावी हो गई थी कि वह अपने मुल्क लायक रहा ही नहीं. शब्बो अपने शौहर के दुख-दर्द को समझती थी. उसकी तकलीफ बांटना चाहती थी मगर फारुख उसे अपना समझे तब ना. शौहर की बेरुखी उससे सही नहीं जाती. वह खुद को बेईज्जत समझती. मगर एक औरत क्या कर सकती है?

….एक औरत क्या नहीं कर सकती है!

 

शब्बो ने नौकरी के लिए भाग-दौड़़ शुरू कर दी. ससुराल वाले इसके लिए भी राजी न हुए . फारुख को शराब की लत लग गई थी. छोटे-मोटे उधार चुकाने में शब्बो के गहने एक-एक करके उतरते चले गए. आखिरकार शब्बो ने घरवालों की परवाह न करते हुए स्टेशन के करीब एक नर्सरी स्कूल में आया की नौकरी कर ली. यह नौकरी पांच-छह महीने ही चली. नर्सरी स्कूल चलाने वाली मैडम को एक बड़़े स्कूल में नौकरी मिल गई तो उन्होंने अपनी नर्सरी बंद कर दी. मगर जाते-जाते शब्बो का भला कर गईं. मैडम ने शब्बो को एक फिल्म हीरोइन के घर पर आया की नौकरी दिलवा दी. इस हीरोइन ने शादी करके गृहस्थी बसा ली थी. उसकी बेटी भी एक साल की होने लगी थी. अब यह हीरोइन फिल्मों में वापसी करना चाहती थी और बेटी की देख-रेख के लिए एक अच्छी आया की जरूरत थी. शब्बो उसे पहली नजर में भा गई थी. अपने छोटे भाई को शब्बो ने ही पाला था इसलिए बच्ची को संभालने में उसे कोई दिक्कत नहीं आई. बल्कि उसके अंदर की ममता को एक सहारा मिल गया था उस बच्ची की सूरत में. शब्बो में सलीका था, हुनर था सो जल्दी ही उसने अपनी मैडम का दिल जीत लिया. धीरे-धीरे वह मैडम की खास हो गई थी. अब वह मैडम के बेडरूम में बेरोक-टोक आ सकती थी. शब्बो ने मैडम की सारी जिम्मेदारी संभाल ली थी. अब मां और बेटी दोनों का काम शब्बो के बिना नहीं चल पाता था. यह घर शब्बो को रास आ गया. अपना घर, अपना पति उससे छूटने लगा था. वैसे भी उसके शौहर को शब्बो के पैसे की फिक्र थी. हर महीने वह शब्बो की पगार हथिया लेता. बीच-बीच में वह शब्बो पर एडवांस लाने की जिद करने लगा. शब्बो ना-नुकूर करती तो तलाक की धमकी देने लगता.

तंग आकर शब्बो मां के घर आती तो फारुख यहां भी आकर दंगा करता. शब्बो दिन-रात रोती रहती. उसे कहीं सुकून नहीं मिलता. मिलता भी तो उसके बचपन के दोस्त हमीद के चुटकुलों में. हमीद जब भी शब्बो को उदास देखता उसे कोई न कोई चुटकुला सुनाकर हंसा देता. उसके साथ वही हरकतें करता जैसे बचपन में किया करता. बचपन के दिनों में लौटकर शब्बो खिलखिला उठती थी.

हमीद के पास ढंग का कोई काम नहीं था. शब्बो एक दिन उसे भी अपने साथ बंगले पर ले गई काम के वास्ते.

मैडम ने हमीद से जाने क्या पूछा-वूछा और सीधे मना कर दिया. शब्बो को बहुत बुरा लगा. मगर वह कुछ बोल न पाई. इस बात को कुछ हफ्ते बीत गए. बात आई-गई हो गई. एक दिन मैडम अपने कमरे से बाहर नहीं निकली. दरवाजा बंद. बस साहब निकले और चले गए. सुबह काम पर आते ही शब्बो से भनक मिल गई थी कि रात में मैडम और साहब का जमकर झगड़़ा हुआ. साहब एक बहुत बड़़े इंडस्ट्रियलिस्ट थे. हीरोइन से शादी तो कर ली मगर शादी के बाद उसका फिल्मों में काम करना नागवार गुजरता था. अक्सर दोनों में कहा-सुनी हो जाती थी. शायद पिछली रात बात बढ़़ गई होगी. शब्बो का दिल धक्‌-धक्‌ हो रहा था. वह मैडम की हालत जानने को बेताब थी. बच्ची भी सुबह से बात-बात पर रोए जा रही थी. दोपहर तक शब्बो के लिए मैडम का बुलावा आ गया. बेडरूम में दाखिल होते ही शब्बो चौंक उठी. बेडरूम में चीजें इधर-उधर बिखरी पड़़ी थीं. मैडम का चेहरा उतरा हुआ, आंखें सूज कर पकौड़़ा हो रही थीं. मैडम ने बच्ची की खोज-खबर ली. शब्बो ने सहमते हुए मैडम को समझाया कि वह उठकर नहा धो ले तो उन्हें थोड़़ा अच्छा लगेगा. मैडम वॉशरूम जाने के लिए उठीं. शब्बो उन्हें सहारा देने के लिए आगे बढ़़ी मगर उसकी चीख निकल गई. उसने देखा मैडम का पारदर्शी नाईट-गाउन जला हुआ है और उनकी जांघों पर जलने के ताजा घाव हैं. जरूर यह सिगरेट के होंगे. यही नहीं मैडम की गोरी जांघों पर उसे पुराने पड़़ चुके दो-तीन दाग और दिखे.

वह मैडम की आंखों में देखती रह गई. सहानभूति पाकर मैडम की बड़़ी-बड़़ी आंखों से कई बूंद आंसू टपक पड़़े.

मैडम वॉशरूम में नहाती रही और बाहर शब्बो सोचती रही ‘..क्या हर औरत की तकदीर में आंसू ही हैं. एक नौकरानी अपने शौहर से पिटती है तो मालकिन भी अपने पति से मार खाती है…..’

वह तड़़प उठी – ऐ खुदा क्या यही है तेरी रहमत! मर्दों की दुनिया में यही है औरत की गत….’

तभी वॉशरूम का दरवाजा खुला तौलिएमें लिपटी मैडम बाहर आ चुकी थीं. शब्बो ने खुद को संभाला और मैडम का हाथ बंटाने लगी.

इस वाकये ने शब्बो को झकझोर कर रख दिया था. उसके भरम टूट चुके थे. वह शौहर के घर इस तरह जी रही थी जैसे कोई कर्ज चुका रही हो. धीरे-धीरे उसने अपनी पगार बचानी शुरू कर दी. वह हामिद की तरफ खिंचने लगी. कभी-कभी तो हामिद उसे लेने बंगले पर आ जाता. मैडम ने एक दिन बातों ही बातों में शब्बो को समझाया. उसे ताकीद भी की. मगर उस दिन शब्बो को मैडम की बात के मायने समझ नहीं आए या उसने समझने की कोशिश नहीं की. आज उसे मैडम की एक-एक बात याद आ रही है. मैडम ने यही कहा था-पहला मर्द छोड़ऩा मत, छोड़ऩा तो दूसरा करना मत!

और मैडम को याद करते-करते उसके हाथ अपने आप उसकी जांघों पर चले गए जहां जले घाव अब भी थे. साहब मैडम को सिगरेट से जलाते थे तो हामिद उसे बीड़़ी से दागता है. बस यही फर्क है.व्यक्ति बदलते रहते हैं चरित्र नहीं.

मैडम की याद आते ही शब्बो की आंखों में आंसू आ गए. ‘अगर आज मैडम होती तो मेरी यह हालत न होती.’ शब्बो ने खुद से हमदर्दी जाहिर की.

शब्बो पुरानी यादों को फिर याद करने लगी. मैडम और साहब के झगड़़े मीडिया में उछाले जाने लगे थे. अपनी बेटी के भविष्य को देखते हुए दोनों ने देश छोड़क़र लंदन में बसने का फैसला कर लिया. मैडम देश छोड़क़र क्या गइर्ं कि शब्बो फिर भरी दुनिया में बेसहारा हो गई.

शौहर की शराबखोरी दिन पर दिन बढ़ती जा रही थी. शब्बो ने फिर दूसरी जगह काम नहीं किया.

फारूख पैसों के लिए शब्बो से मार-पीट करने लगा. आखिरकार एक दिन शब्बो के मां-बाप आए और उसका तलाक कराके  उस दोजख से निकाल लाए. और इस तरह  ५ साल की शादी का अंत हो गया.

शब्बो हफ्तों खोली में मुंह ढंके पड़़ी रही. वह किसी को अपना मुंह नहीं दिखाना  चाहती थी. एक-एक दिन उसके लिए पहाड़़ होता जा रहा था. अपना वजूद  चट्टान की तरह भारी लगने लगा. रात को सोते में डरावने सपने उसे आते – किसी पहाड़़ की चोटी पर वह खड़़ी है. चारो तरफ वीराना, ऊपर उजाड़ स्याह आसमान, नीचे गहरी खाई…..

हवा सायं -सांय बह रही है….दूर कहीं कुत्तों के रोने की महीन  आवाजें आ रही हैं. वह वहां से भाग जाना चाहती है पर पैर उठा नहीं पाती, मदद के लिए गुहार लगती है, मगर चिल्ला नहीं पाती. आवाज हलक में फंस कर रह जाती है….कुत्तों की आवाजें करीब आ रही हैं…..वह बेबस….डर के मारे बुत-सी खड़़ी रह जाती है. फिर वह बुत किसी पत्थर में बदल जाता है. आवाजें, हाथों की शक्ल आख्तियार कर लेती हैं.  वे पंजे किसी वहशी के पंजे हैं. नाखूनों में ताजा गोश्त लगा है….  तभी हजारों-हजार की गिनती वाले में पंजे बड़़ी बेरहमी से उसे धक्का दे देते हैं. पत्थर की शब्बो जा गिरती है खाई की ओर…..वह छटपटाती है, हाथ-पांव पटकती है, कहीं कोई सहारा मिल जाए….तो वह बच जाए…..इसी छटपटाहट में जाने कहां से एक लोहे की छड़़ उसके हाथ आ लगती है. लोहे की ठंडी छड़़ उसे हाथों में बर्फ की तरह सर्द लगती है.

वह चौंक कर हाथ छुड़़ा लेती है…..तभी शब्बो की नींद खुल जाती है. पसीने में लथ-पथ   वह भौंचक पड़़ी रहती है. मानो अपने पूरे होशो-हवास से समझने की कोशिश में लगी हो कि वह कहां है…..

दूर कहीं मुर्गे की बांग सुनाई दी. हां, वह अपनी खोली में थी, अपने अम्मी-अब्बू के घर….फारुख की दोजख से निकल आई थी. मगर दिमागी राहत नहीं मिली थी  अभी तक उसे. इसलिए वह हर रात ऐसे ही कुछ सपने देखने लगती. बिस्तर पर चादर ओढ़़े वह चुपचाप आंसू बहाती रहती. देर रात गए नींद आती तो सपनों के आ.जाब में उलझ-उलझ कर रह जाती.

पंद्रह-बीस दिन शब्बों के लिए इम्तहात के दिन थे. उसे अपनी सोच से लड़ऩा था, इस सोच से कि एक औरत का शौहर के बिना इस दुनिया में कोई वजूद नहीं है. औरत एक मर्द की ब्याहता हो सकती है, बेवा हो सकती है….मगर तलाकशुदा….! उफ ! यह हर्फ औरत के वजूद पर एक गाली से कम नहीं और शब्बो दिन-रात इसी गाली को जी रही थी.

अम्मी समझाती, अब्बू समझाते, पड़़ोसिनें समझातीं – मगर शब्बो पर कोई असर नहीं. कैसे वह यकीन करती आज इन लोगों की बातों पर कल यही लोग उसे  शौहर की  भरोसेमंद और नेक बीवी बने रहने की सलाह देते थे जब वह मायके रहनेचली आई थी. दीन की दुहाई और फर्ज का वास्ता देकर उसे ससुराल भेज दिया था.

….आज तलाक खाकर लौट चुकी शब्बो को लोग हमदर्दी दे रहे थे. गम खाने को कह रहे थे कि वह सब कुछ भूल जाए. कैसे सब-कुछ भूल जाए शब्बो…….कैसे ? वह खुद से ही पूछती. उसे भी अब खुद पर तरस आने लगा था. और इस तरस में एक मजा-सा आने लगा था.  घरवाले उसकी परवाह करने लगे थे. उसे तब और भी अच्छा लगता जब हामिद उनके घर गप्पे मारने बैठ जाता. उन पलों में शब्बो वह पुरानी वाली शब्बो बन जाती. अम्मी-अब्बू भी खुश थे शब्बो को चहकते देखकर .

हादिम अब तक कुंआरा ही था. वह यहां-वहां मटरगश्ती करता रहता. कहीं टिककर काम नहीं करता. अम्मी-अब्बू ने दोनों से बात की.

इद्दत (तलाक के बाद दुबारा शादी करने की अवधि) की  मियाद खत्म हो जाने के बाद एक दिन…..अच्छा दिन देखकर मौलवी से निकाह पढ़़ा दिया.

निकाह में मिले तोहफों से दोनों की गृहस्थी सज गयी थी. कुछ हफ्ते इसी खुमारी में बीत गए. शब्बो नए प्यार, नए शौहर से खुश थी. पिछला सब कुछ उसने जबरदस्ती भुला दिया था. फिर भी एक टीस उठ ही जाती जब पुरानी ससुराल का कोई जानने वाला उसे मिल जाता.

इस बार ईद का चांद शब्बो के लिए नई रोशनी लेकर आया. हिलाल के चांद की तरह शब्बो निखर उठी थी. माशा अल्ला रोज वह निखरती जा रही थी. जैसे आसमान के चांद से उसने होड़़ लगा रखी हो- किसका शबाब देर तक कायम रहता है ! पूरनमासी की रात जुहू-चौपाटी पर घूमते हुए हामिद उस पर फिदा हो गया था. वह खुद को रोक न सका. सरे आम उसने शब्बों को चूमना चाहा. मगर शब्बो उसे परे धकेल कर शरम के मारे अपनी खोली में आ पड़़ी. हामिद भी उसके पीछे लपका. दो बदन चांदनी के नूर में पिघल गए.

….शब्बो सातवें आसमान पर थी. शब्बो को पूरी दुनिया सुहानी लगने लगी. उसे खुद से प्यार हो गया था. अपनी देह से प्यार हो गया था. एक गुरुर आ गया था उसमें जो उसकी चाल में झलकने लगा था.

शब्बो को खुश देखकर उसके परिवारवाले भी खुश. दोनों बड़़ी बहनें अपनी ससुराल में संतुष्ट थीं. शब्बो को देखकर उनके जी को कुछ सुकून मिला था.

तीन-चार महीने वक्त की .गार में कैसे चले गए पता ही नहीं चला शब्बो को.

पर इसके बाद जो पता चला तो शब्बो को यकीन नहीं होता कि उसका हामिद ऐसा है. अल्हड़़-सा, मस्त-मौला हामिद क्या इतना बुरा है! वह यकीन नहीं करना चाहती थी मगर हर बीतता दिन उसके भरोसे की चादर में एक-एक धब्बा छोड़़ जाता. हामिद का मोबाइल इन दिनों खूब बिजी रहने लगा था. अब वह रातों को गायब रहने लगा. शब्बो से कहता रात पाली पर जा रहा है. शब्बो को हामिद का ये धंधा रास नहीं आ रहा था. वह हामिद से जिद करती कि उसे अपने धंधे के बारे में बताए. हामिद जब घर लौटता तो उसके मुंह से तो नहीं अलबत्ता कपड़़ों से जरूर शराब की गंध आती.

एक दिन जब नौबत मार-पीट पर उतर आई तो उस रात हामिद शब्बो को लेकर अपने धंधे की जगह पर पहुंचा. घर से दो-तीन स्टेशन दूर एक घनी बस्ती में एक बीयर बार में हामिद दाखिल हुआ. हामिद ने आंखों के इशारे से वहां  काम करनेवालों को अपने से दूर रहने को कहा.

बीयर बार क्या होता है – आज शब्बो अपनी आंखों से देख रही थी. सस्ती दारू के नशे  में चूर ग्राहक और उनको अपनी अश्लील अदाओं से लुभाती बार-गर्ल. ग्राहकों की बेहया हरकतें, बार-डांसर की बेहयाई देख शब्बो शर्म से नहा गई. उसने हामिद से आंखों ही आंखों में मिन्नात की कि वह उसे इस नर्क से वापस ले जाए. वह रात बड़़ी  भारी गुजरी शब्बो पर. पहलू में लेटा हामिद उसे आज हीरो नहीं विलेन लग रहा था.

पूरा हफ्ता बड़़ी बेकरारी में बीता शब्बो का. हामिद से बोलचाल बंद थी उसकी. अल्हड़़ हामिद अब पुराना हामिद नहीं था. था तो वह एक मर्द ही न और वो भी शब्बो का शौहर. ….तो भला शब्बो की ये मजाल कि वह शौहर को अपने बदन के करीब न आने दे. एक दिन हामिद टूट पड़़ा शब्बो पर. किसी गैर मर्द ने किया होता तो यह जबरदस्ती कहलाती मगर शौहर ने किया था. यह एक शौहर का हक था कि वह जैसे चाहे अपनी औरत को भोगे….उसका इस्तेमाल करे……

….और एक दिन हामिद ने अपनी औरत को इस्तेमाल कर वह हक भी पूरा कर लिया. हामिद खूब पैसेवाला बनना चाहता था. बीयरबार में काम करते-करते वह लड़़कियां भी सप्लाई करने लगा था. दूसरी औरतों को धंधे पर चढ़़ाते-चढ़ाते एक दिन अस्सल भड़़वागिरी पे उतर आया था. शब्बो जब गुस्सा होती तो हामिद को हिजड़़ा कहती और बदले में खाती उससे दो तमाचे.

….उस दिन हामिद का मूड बहुत अच्छा था. दुबई की एक पार्टी मिली थी उसको. दो-तीन दिन से वह उस  अरब की मेहमान नवाजी में लगा था. उसने चुन-चुनकर तीन अच्छे माल दिए थे उसको. मगर अरब के मुंह का स्वाद नहीं बदला. वह बार-बार हामिद को कोई अच्छा माल देने को कहता. हामिद समझ नहीं पा रहा था उसके टेस्ट को. अरब ने उसे समझाने की कोशिश की कि उसे क्या चाहिए? उस अरब को चाहिए थी कोई कमसिन  या कोई घरेलू टाइप की. मार्केट की माल नहीं चाहिए था उसे.

अब बात हामिद की खोपड़़ी में घुस चुकी थी. …और हामिद की खोपड़़ी घूम चुकी थी. दिमाग उसका भिन्नााने लगा था. कनपटियां गर्म और आंखे सुर्ख….जबान तालू से चिपकने लगी थी. जैसे उसने कोई तगड़़ा नशा कर लिया हो. अगर उसने अरब को खुश कर दिया तो अरब उसे खुश कर देगा. फिर छह महीने की छुट्टी…इतना माल मिलेगा उसे…मगर साला अभी भी खोपड़़ी चक्कर खा रहेली है. कैसे करेगा अपुन? हामिद ने बड़़ी मुश्किल से थूक निगला.

हामिद दिनभर घर में ही पड़ा रहा, बीड़ी फूंकते हुए.

 

हामिद की एक-एक हरकत पर शब्बो की नजर थी. वह हामिद के चेहरे से उसके दिल की बात समझने की कोशिश कर रही थी. हामिद की आंखों की पुतलियां बड़़ी तेजी से घूम रही थीं. हामिद का दिमाग जब चलने लगता था तो उसकी पुतलियां घूमने लगती थीं. शब्बो समझ चुकी थी कि मामला संगीन है. हामिद को वह उसके हाल पर छोड़़ देना चाहती थी मगर ज्यादा देर तक उसे नजरअंदाज नहीं कर सकी.

पूछ ही लिया, ‘क्या हुआ रे! कायको परेशान है? कोई लफड़़ा किया क्या? कोई पंगा लिया क्या?’

‘नई रे, कुच बी नई…..’ हामिद बीड़़ी फुंकता रहा. चाय गटकने के बाद उससे रहा नहीं गया, बोला, ‘शब्बो डार्लिंग, चल आज अपून घूमने जाएंगे चौपाटी पे… थर्टी फर्स्ट मनाएंगे….’

‘नक्की चलेगा ना तू , रात को धंधे पे खिसक तो नहीं जाएगा….’ शब्बो खुश हो गई. अब तक वह थर्टी फर्स्ट को चौपाटी पर अब्बू के साथ लोगों को चाय, वड़़ापाव खिलाती थी. आज वह खुद नए साल का जश्र मनाएगी.

शाम को हामिद ने ही शब्बो को सजने-धजने में मदद की. हामिद के इस नए रूप पर शब्बो फिदा हो गई.  ऑटो पकड़क़र दोनों जुहू किनारे आ गए. किसी नए प्रेमी की तरह दोनों जुहू की रेत में घूम रहे थे. कितना शोर था यहां…एक तरफ समुद्र हरहरा रहा था तो रेत पर सारा मीना बाजार लगा हुआ था. फिर भी ये शोर शब्बो को लुभा रहा था.

आज उसे हर चीज अच्छी लग रही थी. आसमान का सूरज दरिया में डूबने-डूबने को था. शब्बो का जी चाहा दौड़क़र सूरज को पकड़़ लाए….उसे डूबने न दे उसकी शाम की कभी रात न हो. फिर अपने ख्याल पर वह हंस पड़़ी.

उसने हामिद की ओर देखा. वह तो जाने किन खयालों में खोया सड़क़ की ओर निहार रहा था. शब्बो ने उसे टोका. ‘क्या रे! उदर क्या देखता है?’

‘कुछ नहीं वो होटल देख रहा था.’ हामिद बोला.

‘क्या रे कुछ बी देखता है. अपुन की क्या औकात वो होटल में जाने की?’ शब्बो बुझ गई थी हामिद की ख्वाहिश जानकर.

‘काय को नई, अपुन भी जा सकता है. पैसा हो तो कोई भी जा सकता है. चलेगी तू!’ हामिद की आंखों में चमक कौंध गई.

‘सच्ची रे! चलेगा तू… मेरी कसम!’ शब्बो को तो यकीन नहीं हुआ.

‘हां मेरी जान, चलेंगे…..पर अभी नहीं. थोड़ी और रात होने दे….’ हामिद ने घड़़ी देखते हुए कहा, ‘जा तब तक तू पानीपूरी खा के आ….मैं इदरीच बैठेला है.’

शब्बो पानीपुरी खाने चली गई. खाते-खाते उसने देखा – हामिद किसी से मोबाइल पर बात कर रहा था.

अंधेरा होने लगा था. हामिद शब्बो को लेकर उस बड़े से होटल में दाखिल हुआ. हामिद ने रिसेप्शन पर खड़े आदमी से कुछ बातें की.

शब्बो का सारा ध्यान होटल देखने में लगा था. ‘क्या झकास होटल है.’ वह मन ही मन बोले जा रही थी ‘इधर का वॉचमैन भी कितना सही दिखता है.’ उसने नजरें घुमाकर पूरे होटल का जायजा लिया. घूमती आंखें रिसेप्शन पर टिक गयी.

‘ये लड़की लोक भी कितनी बूटीफूल दिख रही है. एकदम पिक्चर के माफिक. मैं भी पढ़ेली-लिखेली होती तो, इदरीच नोकरी करती. फिर मेरेको सब लोक बोलते-शबनम मैडम…’ शब्बो के मन में बचपन की खोई ख्वाहिशें तैरने लगीं. तभी हामिद ने शब्बों को हाथ पकड़कर हिलाया और उसे लेकर लिफ्ट की ओर बढ़ चला.

लिफ्ट में घुसते हुए शब्बो सोच रही थी – ‘ये क्या मेरेको होटल भी अच्छे से देखने को नई दिया.’

कुछ ही मिनटों में लिफ्ट २२वें फ्लोर पर जाकर रुक गई. हामिद कॉरीडोर के दायीं तरफ उसे लेकर चला. कुछ कमरे पार करने के बाद हामिद एक कमरे के सामने रुका. उसने दरवाजे को हाथ से धकेला. दरवाजा जैसे उन दोनों का इंतजार कर रहा था. बहुत ही शानदार कमरा था वह.

एक अधेड़ आदमी सोफे पर बैठा था. चेहरे से हिंदुस्तानी नहीं लगा वह. शब्बो की नजर उसकी भूरी आंखों पर पड़ी. घनी बरौनियों के बीच चाकलेटी पुतलियां अजीब-सी लगीं शब्बो को…जाने कैसी…हां कॉकरोच जैसी….बस्ती के मुंसीपाल्टी के संडास में अक्सर तिलचट्टे घूमते रहते हैं. जिन्हें देखकर उसे घिन आ जाती थी. सोचकर शब्बो का मुंह बुरी तरह बिगड़ गया.

हामिद ने यहां भी शब्बो को रुकने न दिया. कमरे में लगे एक अन्य दरवाजे को खोलकर वह दूसरे कमरे में ले गया उसे. ‘अइला…रूम के अंदर रूम’ शब्बो को हैरानी हुई. अंदर टीवी चालू था. शब्बो सबकुछ भूल कर टीवी पर थर्टी-फस्ट का प्रोग्राम देखने लग गई. हामिद उसे वहां बैठाकर बाहर निकल गया. अभी आता हूं – कहकर.

 

शब्बो इंतजार करती रही मगर वह नहीं आया. आई तो उसकी बदकिस्मती उस विदेशी की शक्ल में.

शब्बो सब कुछ समझ चुकी. दौड़कर दरवाजे की तरफ भागी. मगर उसकी तकदीर की तरह दरवाजा भी कसके बंद था. आज उसके दूसरे शौहर ने भी उसे बेइज्जत किया. एक ने उसे पैसे के लिए छोड़ा, दूसरे ने पैसे के लिए उसे कहीं का न छोड़ा.

शब्बो चीखना चाहती थी. उस विदेशी को नोच लेना चाहती थी. मगर इससे हासिल क्या होना था. विदेशी से तो वह बच जाती, पर क्या गारंटी कि वह अपने शौहर से फिर बच पाती.  विदेशी ने उसे दबोच लिया.

‘साला, भड़वा … हरामखोर तिलचट्टे….’ शब्बो गालियां बकने लगी. शब्बो का शरीर बेबस था, मगर जीभ उतनी ही तेजी से चल रही थी.

विदेशी ने अपने मुंह से शब्बो का मुंह बंद कर दिया. बोला – ‘अपने को हिंदुस्तानी औरते भोत पसंद, अऊर उनका ये साड़ी भोत पसंद.’

शब्बो को उसके बोलने का अंदाज अरबी जैसा लगा,  ‘….तो साला ये अरब का शेख होएंगा. खूब नोट दिया होएंगा. तबी तो हामिद का ईमान डोल गया होगा….’ अपने बदन पर अरबी का हाथ लगते ही शब्बो को घिन आ गई वैसे ही जैसे संडास में तिलचट्टे को देखकर …. वहां चिहुंक उठी जैसे कोई तिलचट्टा उसकी साड़ी में घुस आया….घिन के मारे उसकी आंखों में पानी भर आया.

शेख को शब्बो की पनीली आंखे भोत पसंद आई. शेख शब्बो का हिंदुस्तानी बदन भोगता रहा और शब्बो सोचती रही कि उसने हामिद का भड़वागिरी से कमाया पैसा खाया. आज वही कर्ज चुका रही है अपने बदन से…. वक्त का इंसाफ जब तक उसकी समझ में आया, वह अरबी अपना काम तमाम कर दरवाजे से उस पार जा चुका था.

कमरे में टीवी अब भी चालू था. शब्बो और रुक कर क्या करती? अपने बदन से बर्बादियों की गर्त को साफ कर शब्बो बाहर आ चुकी थी. खटके से उसने बाहर जाने का दरवाजा खोला, उसके पीछे हामिद भी लपका. हामिद को देखकर उसका खून खौल रहा था. लिफ्ट नीचे पहुंची तो वहां लाऊंज में लोगों का शोर उसे चिढ़ाने के लिए काफी था.

‘हैप्पी न्यू ईयर’ का गाना उसके दिमाग को छेदने लगा. तो ऐसे हुई शब्बो नए साल की शुरुआत!

घर पहुंचकर शब्बो सीधे सोने चली गई. वह रात में कोई तमाशा नहीं करना चाहती थी. मगर वह सो कहां पाई? जाने कैसी आशंकाओं के कीड़े उसकी देह में बिलबिल करते रहे. आशंकाएं उसे टुक-टुक कुतरती रहीं सारी रात….. दुश्चिंताओं की चीटियां उसकी चमड़ी छील-काटकर  नस-नस में दाखिल हो गईँ. किसी अनजाने डर का जहर उसके कलेजे, पसलियों से होता हुआ खून की बूंद-बूंद में बहने लगा. यह जहरीला खून उसके दिमाग की कोषों में समा गया.

पूरी रात न वह सो रही थी न जाग रही थी. सीने पर गैरत का पहाड़ आ गिरा था उसके. इस बोझ से मरी जा रही थी वह….. क्या रात, क्या सुबह …..उसका दिमाग वक्त का फर्क नहीं कर पा रहा था.

घर्र…..घर्र …..की आवाज ने उसके दिमाग में सरगोशियां कीं….वह झटके से उठ बैठी…..जैसे कोई तिलचट्टा फिर उसकी साड़ी में घुस आया हो……

शब्बो ने देखा – स्टोव घर्र…..घर्र….चल रहा है. उस पर चाय चढ़ी हुई है. और हामिद वहीं बैठा नोट गिन रहा है. दो मोटी गड्डिया हैं.

‘वो पहला शराब पीता था. ये साला पैसा पीता है….’ शब्बो ने अपने दोनों शौहर की तुलना की. उसकी आंखों से गरम मोम की तरह दो आंसू पिघले. रात का दबा गुस्सा फुफकार उठा.

शब्बो नागिन की तरह झपटी. उसने स्टोव पर चढ़े भगोने को गिरा दिया. नोटों को लपककर उठाया और स्टोव की आंच पर चढ़ा दिया. नोट जलने लगे.

हामिद समझ भी न पाया एक पल में ही उसके मनसूबे राख में बदलने लगे. हामिद नोटों की ओर लपका. उसकी जली ऊंगलियों में जले नोट अब किसी काम के न थे.

गुस्से के मारे शब्बो पर पिल पड़ा. उसने लात और मुक्कों से शब्बो के सीने, पेट और कोख पर कई वार किए. शब्बों ने भी पैंतरा बदला. हामिद आज उसका शौहर नहीं उसकी गैरत का दुश्मन था. उसने भी अपनी पूरी ताकत से हामिद पर वार किए. अंत में निढाल पड़ गई और हामिद से पिटती रही. हामिद जब थक कर हांफने लगा तो घर से बाहर निकल गया.

अगले दो दिन खोली में नहीं आया. और जब आया तो पूरा दल्ला बन चुका था और अपनी बीवी को धंधे पर चढ़़ाने लगा. जब शब्बो उसका कहना नहीं मानती तो वह जलती बीड़ी से उसकी जांघों को चटका लगाता.

…शब्बो के टीस उठी. और वह पुरानी यादों से निकल आई. इस समय बैठी सोच रही थी कि दो साल पहले थर्टी-फर्स्ट की रात उसकी जिंदगी की रात बन गई है. वह दिन की रोशनी में आईने का सामना करने से डरती है. वह डरती है हर उस चीज से जो उसकी गैरत को झकझोरती है मगर नहीं झकझोरती तो हामिद की गैरत को. कभी वह सोचती खुदा को औरत को गैरत देना ही नहीं चाहिए था.

…..तभी धड़धड़ाता हुआ हामिद दाखिल हुआ. ‘चल, जाना है. मालूम नहीं है क्या तेरे को?’ हामिद बोला.

‘कैसे चलूं? तेरे को मालूम नहीं है क्या?’ शब्बो ने दांत पीसा.

‘चल उठ! किसी को मालूम नहीं पड़ेगा.’ हामिद ने रिरियाते कहा.

शब्बो जैसी थी उठ खड़ी हुई.

‘ये क्या मणिबेन बनेली है. क्या चीकट करके रखेली है. जा साबुन से थोबड़ा धो के आ….’ हामिद ने शब्बो के तेल लगे बालों पर ताना दिया.

शब्बो ने मुंह धोकर चेहरे पर पावडर मला. काजल, लिपस्टिक चुपड़ कर वह बाहर निकली. तभी अम्मी दिख गई.

वह शब्बो को एक ओर ले जाकर बोली, ‘आज कायको जाती है. कल नहा – धो के चली जाना.’ मगर हामिद शब्बो का हाथ पकड़ कर उसे खींचता हुआ आगे बढ़ गया और वह बुढ़िया बेबस देखती रह गई.

चौपाटी पे आके हामिद की गिद्ध निगाहें शिकार ढूंढने लगीं. दो-तीन शिकार मिले भी मगर उनको आज की शब्बो एकदम फूहड़ लगी. उन्हें अपनी थर्टी-फर्स्ट की रात एक फूहड़ के साथ बर्बाद करना गंवारा नहीं था.

ये सब देखकर जली-भुनी शब्बो का मूड थोड़ा ठीक हुआ. उसे लगा आज उसने अच्छा बदला लिया हामिद से. ऐसा सोचते ही फिर उसके मन में नागिन फुफकार उठी. तभी वहां उसे वही हवलदार अपनी ओर आते हुए दिखा जिससे हामिद ने सेटिंग कर रखी थी. उसे देख शब्बो के जेहन में संडास का तिलचट्टा उभरा.

हवलदार ने हामिद को आंख मारी, ‘अपुन का हफ्ता मिलेगा आज!’

‘आपकइच माल है ले जाओ साब.’ हामिद ने अपनी जान छुड़ानी चाही.

‘चल मेरी आयटम…..’ हवलदार चहककर शब्बो से बोला.

‘पर अपुन आज नहीं कर सकता.’ शब्बो ने लाचारी दिखाई.

‘काय को भाव खाती है.’ हवलदार ने धौस दिखानी चाही.

‘नई रे साब! समझा करो, आज अपुन नई कर सकती.’ शब्बो ने अपने चेहरे के भाव से समझाया और हवलदार तुरंत समझ गया.

‘साला…अपुन का तकदीरीच खराब है. आज थर्टी फर्स्ट नाईट फुकट में जाएंगा.’ वह मायूस हो गया था.

तभी शब्बो की आंखों में नागिन उभर आई – ‘संडास का तिलचट्टा’ आज उसकी सैंडिल के नीचे पड़ गया.

वह बोली, ‘साब! तुमने कबी मरद ट्राई किया है…?’

‘नई रे…..’ हवलदार की आंखों में हवस की चमक आ गई….

‘किदर मिलेंगा…’

शब्बो ने ऊंगली घुमायी जहां हामिद खड़ा था.

…और शब्बो ने अपने सैंडिल से उस तिलचट्टे को मसल दिया.

 

- सुमन सारस्वत

पत्रकार- साहित्यकार

प्रकाशित कृति : ’ मादाकहानी संग्रह
1. लोक भारती
2. लोकवाणी ( – सह लेखिका, दोनों महाराष्ट्र शैक्षणिक बोर्ड की कक्षा 10 वीं की हिंदी की गाईड )
संप्रति : कंटेंट राइटर ( टारगेट पुब्लिकेशन्स, मुम्बई ) 

सह संपादक : अम्स्टेल गंगा , नीदरलैंड 
                    वाग्धारा , भारत

पुरस्कार : महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी पुरस्कार
शिलांग हिंदी अकादमी पुरस्कार
सृजनश्री अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार, ताशकंद- उज़्बेकिस्तान
विश्वमैत्री मंच अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार, भूटान
नारी शक्ति महाराष्ट्र पुरस्कार
स्त्री शक्ति सेंट्रल मुम्बई पुरस्कार
मदन कला अकादमी पुरस्कार

2 thoughts on “तिलचट्टा

  1. अद्भुत कहानी, अतीक भाषा, मारके अंत ।
    आत्मीय बधाई ।
    डॉ हरीदास व्यायास ।

    • अद्भुत कहानी, सटीक भाषा, मारक अंत ।
      आत्मीय बधाई ।

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