तलाश

    लगभग चालीस वर्ष बाद राधे काका होली पर परिवार सहित मुम्बई से अपने गाँव आये । बदले-बदले गाँव को देख, काका रोमांचित थे उनकी आँखें गाँव के कण-कण को पहचानने का प्रयास कर रही थी । काका, देख कहीं रहे थे, चल कहीं रहे थे । तभी अचानक एक पुराने घर के अहाते से फेंका हुआ गंदा पानी काका के कपड़ों पर आकर गिरा, सब कपड़े खराब हो गये । बहु-बेटों को ये अच्छा नहीं लगा, वे भला-बुरा कहने लगे । आवाज सुनकर, एक बूढ़ी घर से बाहर आई और कहने लगी- बूढ़ी हूं , दिखाई नहीं देता, आप लोग मुझे माफ कर दो । बूढ़ी को देख व उसकी आवाज को सुन, भीगे हुए राधे काका बोले- ‘क्या तुम साबो भाभी तो नहीं हो !’ अरे, मुझे भाभी कहने वाले तुम कौन हो ? बूढ़ी ने कहा । पहचाना नहीं, “तुम्हारे मौहल्ले का सबसे ज्यादा शरारती बदमाश तुम्हारा देबर राधे ।” राधे का नाम सुनकर , बूढ़ी साबो की आँखों में आँसू आ गये और कहने लगी- “लाला मुझे माफ कर देना” नहीं, भाभी नहीं, ये तो मेरे पुराने कर्मो का फल है । मैं , भी तुम्हें होली के दिनों में बहुत सताया करता था मानों वो पुराना हिसाब आज चूकता कर दिया । बूढ़े राधे को साबो भाभी क्या मिली मानो वो पुराने बीते हुए दिन मिल गये जिनकी तलाश में वो मुम्बई से गाँव आये थे…

- विश्वम्भर पाण्डेय ’व्यग्र’

जन्म तिथि - १ जनवरी

पता- कर्मचारी कालोनी, गंगापुर सिटी , स.मा.(राज.)322201 (भारत)

विधा - कविता, गजल , दोहे, लघुकथा,

व्यंग्य- लेख आदि

सम्प्रति - शिक्षक (शिक्षा-विभाग)

प्रकाशन - कश्मीर-व्यथा(खण्ड-काव्य) एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित

प्रसारण - आकाशवाणी-केन्द्र स. मा. से कविता, कहानियों का प्रसारण ।

सम्मान - विभिन्न साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा सम्मान प्राप्त 

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