डॉ पुष्पिता अवस्थी के उपन्यास ‘छिन्नमूल’ की एक समीक्षा

पुष्पिता अवस्थी का उपन्यास छिन्नमूल अभी पढ़ ही रहा हूँ। लेकिन कुछ लिखे बिना नहीं रहा गया। इसे नीदरलैण्ड में अपने आवास पर मुझे यह बताते हुए भेंट किया था कि कल ही इसे कुसुमांजलि फाउण्डेशन का वर्ष के श्रेष्ठ उपन्यास का पुरस्कार मिलने की सूचना मिली है और आप पहले व्यक्ति हैं जिसे बता रही हूँ। सुसमाचार का प्रथम श्रोता बन कर मुझे खुशी हुई और मैंने उन्हें बधाई दी।

छिन्नमूल उन भारतवंशियों की संघर्ष गाथा है जो डेढ़ सौ वर्ष पहले यूरोपियनों द्वारा गिरमिटिया मजदूर बना कर कैरिबियाई देशों में ले जाए गए थे। खास कर यह सूरीनाम के भारतवंशियों पर केन्द्रित है। सूरीनाम का कॉलोनियल नाम डच गुयाना है। भारतवंशी वहाँ सैंतीस प्रतिशत हैं, पर व्यवस्था में आनुपातिक भागीदारी अब भी नहीं है। कुछ भारतवंशियों ने अथक परिश्रम और संघर्ष से समृद्धि पाई है और इन्होंने नीदरलैण्ड, यानी हॉलैण्ड तक भी अपनी हैसियत बना ली है। सूरीनाम और नीदरलैण्ड का कॉलोनियल संबंध प्रगाढ़ है और यह अपनी अच्छाई और बुराई दोनों के साथ उपन्यास में प्रकट होता है।
हिन्दुस्तानी, कफरी (निग्रो) और मलाई (जावानीज़) जातियों से बने देश सूरीनाम की सभ्यता और संस्कृति के खुलेपन और भोगवादी जीवन-दृष्टि को वहाँ की नैसर्गिक छटा के साथ उभारा गया है। शहरों, प्लाण्टेशनों, खदानों, नदियों और जंगलों का सघन परिचय कराता यह उपन्यास वहाँ के आदिवासी अमर इण्डियनों तक पहुँचाता है।
अमर इण्डियनों के रहन-सहन, खान-पान और जीवन व्यापार का इतना निकट परिचय है कि अचरज होता है।  जन-जीवन से संबंध रखने वाली चीजों की संज्ञाओं को हिंदी के साथ सूरीनामी भाषा में भी दिया गया है। इससे कथा-प्रवाह बाधित नहीं होता, बल्कि सूरीनामी जातीय-संस्कृति का निकटतम परिचय मिलता है।
अमर इण्डियन जाति की जीवन-शैली, उनकी आस्था और विश्वासों की बारीक जानकारी सहसा मारियो वार्गास ल्यूसा केद स्टोरीटेलर की याद दिला देती है जो लातिन अमेरिकी देश पेरू के एक प्रमुख आदिवासी समूह के इर्द-गिर्द घूमता है। उसी तरह छिन्नमूल भी आदिवासी जीवन दृष्टि और हमारी आज की सभ्यता के बरक्स उसकी अस्मिता को एक बड़े प्रश्न के रूप में खड़ा करता है। आदिवासियों के कसावा की पापड़ जैसी रोटी और कशीरी शराब जैसे जिन्सों का जिक्र दोनों उपन्यासों को एक ही कथा भूमि में लाता प्रतीत होता है। पर जहाँ द स्टोरीटेलर; आदिवासियों पर केन्द्रित गहन समाजशास्त्रीय अध्ययन पर आधारित जादुई यथार्थवादी उपन्यास है, वहीं छिन्नमूल; समूचे सूरीनाम पर केन्द्रित, अध्ययन और अनुभव पर आधारित यथार्थपरक उपन्यास है जिसमें स्मृति और आदर्श का पुट है।
भारतवंशी सूरीनामी रोहित नीदरलैण्ड में व्यवसाय करता है, लेकिन सूरीनाम में अपने पूर्वजों की निशानियों से उसका मोह नहीं छूटा है। बहन का परिवार भी यहीं रहता है। वह अपने पिता द्वारा बनवाए गए मन्दिर, स्कूल आदि का उद्धार करने आता है और जन-परिजनों की आर्थिक मदद भी करता रहता है। भारत से आई पत्रकार ललिता से उसकी निकटता बढ़ती है और वे एक होकर एक ही उद्देश्य को लेकर काम शुरू करते हैं। पूर्वजों के चिह्नों का संरक्षण और भारतवंशियों की बेहतरी।
पुष्पिता जी को इस बेहतरीन उपन्यास और कुसुमांजलि फाउण्डेशन पुरस्कार के लिए एक बार पुन: हार्दिक बधाई।

 

 

-   कामेश्वर पांडेय

 

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