डेफनबेकिया

“सा…..ला……डेफनबेकिया कहीं का” मैंने गुस्से में कहा और पीछे मुड़कर तेज कदमों से चलकर खुशाल के बंगले से बाहर आगया। जिस बंगले मैं घन्टों बैठकर गप्पे मारा करता था, उस दिन मैं कुछ सैकण्ड ही रुक पाया था।
खुशाल का नाम शहर के प्रमुख पैसों वालों मैं गिना जाता है। शहर के सबसे मंहगे समझे जाने वाले क्षेत्र में उसका शानदार बंगला है। बंगले के रखरखाव के लिए ही बहुत से लोग रखे हुए हैं। इसीसे मैंने अनुमान लगाया था कि खुशाल बहुत पैसे वाला है। अधिक जानने की मैंने कभी कोशिश नहीं की थी। अधिक जानने की आवश्यकता मुझे अनुभव नहीं हुई थी। आजतक  मुझे समझ नहीं आया कि खुशाल से मेरी व किश्वर की पहचान को मित्रता का नाम दिया जा सकता है या नहीं। हम तीनों के परिवेश में अन्तर अधिक, समानता कम है। किश्वर एक फैक्ट्री में डाइंग मास्टर का काम करता है। मैं एक सरकारी स्कूल में शिक्षक हूँ। खुशाल के विषय में आप जानते ही हैं।
हम तीनों को जोड़ने वाला एक मात्र बिंदु था साहित्य प्रेम। किश्वर गीत लिखता है। गाता भी अच्छा है। मैं कहानी व व्यंग्य लिखता हूं। खुशाल को साहित्य लिखने का समय नहीं मिल पाता। उसे रचनाकारों के मुंह से साहित्य सुनने का शोक है। स्थानीय साहित्यकारों की संगोष्ठियों में हमारी मुलाकाते होती रही थी। खुशाल मेरी व किश्वर की रचनाओं से कुछ अधिक ही प्रभावित था। खुशाल हमें अपने घर बुलाने लगा। पहले हमें खुशाल के बंगले पर जाने पर झिझक होती थी। उसके व्यवहार ने धीरे धीरे सब सामान्य कर दिया। हम घन्टों उसके यहां बैठते। खुशाल हमारी रचनाएं सुनता। फिर उनकी समीक्षा किया करता था। मुझे लगता कि खुशाल स्वयं नहीं लिख पाता और हमारे लिखे में भागीदारी निभा कर सजृन सुख पाने का प्रयास करता है। इसमें कुछ बुरा भी नहीं था। यह सिलसिला वर्षों से निरन्तर चलता आरहा है।
खुशाल का एक शोक और था जो उसे आम धनपतियों से अलग करता था। खुशाल को पौधों से बहुत लगाव है। अपने बंगले अहाते में उसने अनेक पौधे लगा रखे हैं। यूं तो पौधों की देखभाल के लिए एक अशंकालीन माली रखा हुआ है, समय मिलने पर खुशाल स्वयं पौधों को पानी देना पसन्द करता है। पौधों के पोषण व धूप-छाया का भी पूरा ध्यान रखता है। दिन के समय खुशाल के यहां जाना होता तो वह हमें अपने छोटे मगर समृद्ध बगीचे में अवश्य ले जाता। पौधों के विषय में खुशाल की जानकारी भी अच्छी थी।
खुशाल के बगीचे की एक बात मुझे अखरती थी। उसने कई घमलों में डेफनबेकिया लगवा रखा था। डेफनबेकिया की चमकदार हरी पत्तियों पर पीले चक्कते पाए जाते हैं। देखने में सुन्दर लगता है। खुशाल ही क्यों अनेकों लोगों की पसन्द है डेफनबेकिया। नर्सरी वाले इसे गोपीकृष्ण के नाम से बहुत मंहगे में बेचते हैं। मैंने एकबार नर्सरी वाले से पूछा था कि डेफनबेकिया गोपीकृष्ण कैसे होगया?  बाबू जी आपने बिहारी जी का दोहा नहीं सुना – मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोय, जा तनु की झाँई परे, स्याम हरित दुति होय। डेफनबेकिया में राधा व कृष्ण साक्षात उपस्थित रहते है। नर्सरी वाले की बात पर में मुस्करा कर रह गया था।
डेफनबेकिया के प्रति मेरी नापसन्द का कारण इसका अनुपयोगी होना है। डेफनबेकिया की कोशिकाओं में नुकीले क्रिस्टल पाएं जाते हैं। जब कोई इसकी पत्ती को चबाता है तो क्रिस्टल गले में अटक कर परेशानी पैदा कर देते हैं। एक बार मैंने खुशाल को टोकते हुए कहा था कि डेफनबेकिया को इतना सिर क्यों चढ़ा रखा है। केवल रूप ही सब कुछ नहीं होता, व्यक्ति हो या वस्तु, उसे उपयोगी भी होना चाहिए। खुशाल कुछ नहीं बोला हंस कर रह गया था। बाद में खुशाल के माली ने मुझे बताया था कि बगीचे वाली जमीन पर धूप बहुत कम आती है। फूलों के पौधें वहां नहीं लगाए जा सकते।  सुन्दर पत्तियों के पौधों को चुनना पड़ा है। माली का वह तर्क भी मुझे अधिक प्रभावित नहीं कर पाया था।
उस दिन सुबह किश्वर ने फोन कर मुझे अस्पताल बुलाया था। फोन पर किश्वर की कांपती आवाज से मैंने अनुमान लगा लिया था कि वह परेशानी में है। अस्पताल में पता चला कि किश्वर के पेट में बहुत दर्द है। पीड़ा नाशक देने से कुछ राहत हुई है। डाक्टर का कहना था कि ऑपरेशन करने पर ही स्थायी आराम मिलेगा। ऑपरेशन के लिए कम से कम दो लाख की तुरन्त आवश्यकता थी। किश्वर की पत्नी रजनी ने बताया कि उसके पास ऐसा कुछ नहीं है जिसको गिरवी रख कर रुपए उधार लिए जासकें। मैंने रजनी से कहा चिन्ता मत करो, कुछ इन्तजाम हो जाएगा।
मुझे तुरन्त खुशाल याद आया। मेरा अनुमान था कि दो लाख रुपए खुशाल के लिए कोई बड़ी रकम नहीं है। संकट की घड़ी में खुशाल मदद अवश्य करेगा। किश्वर के ईलाज की बात करते ही वह रुपए निकाल कर मेरे हाथ पर रख देगा। यही उम्मीद लेकर में खुशाल के पास गया था। मेरा अनुमान जन्म के कुछ ही मिनिट में बाद ही धरासायी होगया। रुपए उधार मांगते ही खुशाल के चेहरे के भाव बदल गए थे।
खुशाल बोला अभी तो मेरे पास नहीं है, कुछ इंतजाम करते हैं। मुझे खुशाल की वह बात नागवार लगी। मेरा अनुमान था कि खुशाल बहाना बना कर बात को टाल रहा है। किश्वर के साथ उसकी कोई हमदर्दी नहीं है।
मुझे लगा कि मेरे सामने खुशाल नहीं डेफनबेकिया का पौधा खड़ा है।  अपने लिए जीने वाला दिखावटी जीव है। मुझे लगा कि पर पीड़ा को अनुभव नहीं करने वाला इंसान कैसे होसकता है ? क्रोधवश मेरे मुंह से उसके लिए डेफनबेकिया शब्द निकल गया। मेरे कानों ने सुनना व मस्तिष्क ने सोचना ही बन्द कर दिया था। खुशाल आगे क्या बोला था उस पर ध्यान दिए बिना मैं उसके यहां लौट आया था।
मेरे बचत खाते में दो लाख रुपया नहीं था। तभी मुझे याद आया कि दो एफडी बच्ची की शादी के लिए करा रखी है। उनपर ऋण के रूप में दो लाख  आसानी से मिल जाएगा। इस विचार ने मेरे गुस्से को बहुत कुछ ठण्डा कर दिया था। मैंने अस्पताल लौटकर रजनी को बताया कि धन की व्यवस्था होगई है। कल ऑपरेशन करवा लेते हैं।
कुछ समय बाद रजनी ने किसी को कहा नमस्कार भाई साहब। मेरी नजरें भी उस ओर उठ गई। देखा को खुशाल खड़ा था। मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। सच पूछों तो मुझे समझ ही नहीं आरहा था कि खुशाल को वहां देख मैं कैसे रियेक्ट करूं?
रजनी को मैंने खुशाल के व्यवहार के विषय में कुछ नहीं बताया था। वैसे छुपाने जैसा भी कुछ नहीं था। मगर मेरी यह धारणा रही है कि कभी कभी सच भी जहर बन जाता है। रजनी को आशा थी कि खुशाल किश्वर की मदद को अवश्य आगे आएगा। यदि मैं रजनी को खुशाल के व्यवहार का सच बता देता तो वह निराशा में डूब सकती थी। रजनी के निराश होने बुरा प्रभाव किश्वर देखभाल पर पड़ सकता था। रजनी के चहेरे की अशान्ति किश्वर के दर्द को बढ़ा देती।
“हाँ मैं डेफनबेकिया की तरह अनुपयोगी हूँ। तुम जानते हो डेफनबेकिया  कष्ट तो पहुँचा सकता है मगर किसी की जान नहीं लेता। मैं भी किश्वर के प्राण को संकट में नहीं डाल सकता। मैंने पैकेज से अधिक धन अस्पताल के खाते में ट्रान्सफर कर दिया है। अब कोई परेशानी नहीं होगी” खुशाल ने मेरे समीप बैठकर धीरे से कहा था, बात समाप्त होते ही खड़ा हो गया।  तेज कदमों से चलता खुशाल अस्पताल से ठीक उसी तरह बाहर होगया जिस तरह मैं उसके बंगले से निकला था।
 

- विष्णुप्रसाद चतुर्वेदी

जन्मतिथि           २९ मार्च

शैक्षिक योग्यता       एमएससी (वनस्पति शास्त्र) राजस्थान विश्वविद्यालय   जयपुर बी.एड. राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर
 
पता                 तिलकनगर पाली राजस्थान
अनुभव               माध्यमिक व उच्च माध्यमिक कक्षाओं को विज्ञान ३० वर्ष,

लेखन                १९७१  से निरन्तर विज्ञान, शिक्षा व बाल साहित्य का लेखन। लगभग १००० के लगभग रचनाएँ राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय ख्याति प्राप्त पत्रिकाओं जैसे नन्दन.देवपुत्र,  बालभारती, सुमन सौरभ. बालवाणी. बाल वाटिका, बालहंस, बच्चों का देश बाल भास्कर, विज्ञान प्रगति काक राजस्थान पत्रिकाशिविरा, सरिता, मुक्ता, नवनीत ,कादम्बिनी, इतवारी पत्रिका,  विज्ञान कथा, विज्ञान गंगा, बालप्रहरी, सरस्वती सुमन , दैनिक  नवज्योति, नवभारत टाइम्स, दैनिक हिन्दुस्तान,  स्पंदन, शिक्षक दिवस  प्रकाशन, शैक्षिक मंथन.साहित्य अमृत. नया कारवां, आदि  में प्रकाशित

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