डायरी का पन्ना

शादी के पन्द्रह वर्ष बीत गए. वकिल साहब निःसंतान ही थे. डाॅक्टर, ओझा-गुनी, कहाँ-कहाँ नहीं चक्कर लगाया. लाखों खर्च किये, किन्तु सब व्यर्थ. जीवन से हताश/ निराश धर्मपत्नी पुत्र जनने की लालसा छोड़ चुकी थी. पत्नी को ढ़ांढ़स बंधाते वकिल साहब कहते, उदास होने की कोई बात नहीं. सब ठीक हो जाएगा. इस दिलासा से गायत्री का मन कुछ समय के लिये हल्का हो जाता.
रोज की भांति पत्नी के साथ आज भी माॅर्निंग वाॅक पर थे वकिल साहब. सांय-सांय बह रही कनकनाती हवा का साम्राज्य फैला हुआ था. खामोश सड़क लिहाफे मंे दुबकी पड़ी थी. सड़क पर थोड़ी दूरी तय करने के बाद नीचे झाड़ी के बीच से एक बच्चे के रोने की आवाज सुनाई पड़ी. ठंड से बच्चे का दम फूला जा रहा था. भागे-भागे झाड़ी तक पहुँचे मियां-बीबी., एक तौलिया में लिपटा नवजात नामालूम कब से रोए जा रहा था. प्रतीत होता था कुछ ही दिनों पूर्व धरती पर आया हो.
किस निर्दयी माँ ने ऐसा जघन्य अपराध किया होगा ? एक माँ की ममता की सारी सीमाओं को लांघ डाला, थोड़ी भी दया नहीं आयी ? कितनी कठोर हदय होगी वह ? किसी की नाजायज औलाद तो नहीं ? कोई बड़ी मजबूरी रही हो. जो भी हो माँ कहलाने का कोई हक नहीं उसे ?
ठण्ड से कांप रहे बच्चे को देखकर भौचक्की रह गई गायत्री गुस्से में कहे जा रही थी. किंकर्तव्यविमूढ़ वकिल साहब कभी बच्चे को देखते तो कभी गायत्री को. सही कहा संभव है, प्यार के प्रवाह में बहकर किसी अविवाहिता ने बच्चे को जन्म दिया हो. खैर परिणाम की चिन्ता किये बिना सीने से लगाए बच्चे पर गायत्री अपना ममत्व उढ़ेलती जा रही थी. औलाद की चाह में वर्षों से पलकें बिछाए उसे क्या मालूम कि बिना जने भी बच्चे उसकी गोद में किलकारी भरने लगेगें. बच्चे को छोड़ जाने वाली माँ के लिये अपशब्दों की बौछार लगाने वाली गायत्री अब सब कुछ भूल चुकी थी. भगवान तेरा लाख-लाख शुक्र है. सीने से चिपकाए बच्चे को, उल्टे पैर दोनों पति-पत्नी वापस लौट पड़े घर की ओर.
कहीं कोई बच्चे को लेने तो न पहुँच जाए ?
कई-कई दिनों तक इस आशंका में गायत्री को नींद नहीं आयी. संयोग से कोई दावेदार सामने नहीं आया.  खुद से बढ़कर गायत्री बच्चे की परवरिश करने लगी. उसकी सूनी गोद में हरियाली छा गई थी. पत्नी को खुश देख वकिल साहब भूल जाते अपनी सारी तकलीफें. इधर प्रेम व ममता की छांव में आलोक बड़ा होने लगा. क्षण भर के लिये भी अलग होता कि गायत्री के प्राण उड़ जाते. बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि आलोक ने पीछे मुड़े बिना एक-एक कर कई डिग्रियाँ हासिल कर ली. एक बड़ी कम्पनी का आॅफिसर भी बन बैठा. खूब मजे मे कट रही थी जिन्दगी.
वर्षों की एक पुरानी डायरी संयोगवश उसके हाथ लग गई. डायरी गायत्री की थी. पन्ना पलटते-पलटते अचानक वह रुक गया. लिखा था- ’’एक अद्द बच्चे की तड़प क्या होती है कोई मुझसे पूछे’’, जीवन के 15 वसंत इसी तड़प में कट गए. तुम्हें नहीं जानती, न ही पहचानती हूँ. चाहे तुम्हारी जो भी मजबूरियाँ रही हों, मेरी झोली में इस बच्चे को डालकर तुमने जो उपकार किया ताउम्र नहीं भूल सकती. यह मत समझना कि किस परिस्थिति में होगा तुम्हारा बेटा ? वह होगा भी या नहीं. तुम्हें पता चले, अवश्य एक बार देखने आना. अपनी पीड़ा से जरुर मुक्त हो जाओगी. डायरी के पन्ने पलटता-पलटता आलोक खो गया नेपथ्य में.
- अमरेन्द्र सुमन 

‘‘मणि बिला’’, केवट पाड़ा (मोरटंगा रोड), दुमका, झारखण्ड                                       
जनमुद्दों / जन समस्याओं पर तकरीबन ढाई दशक से मुख्य धारा मीडिया की पत्रकारिता, हिन्दी साहित्य की विभिन्न विद्याओं में गम्भीर लेखन व स्वतंत्र पत्रकारिता।
जन्म    :   15 जनवरी, (एक मध्यमवर्गीय परिवार में) चकाई, जमुई (बिहार)
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पुरस्कार एवं सम्मान  :शोध पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए अन्तराष्ट्रीय प्रेस दिवस (16 नवम्बर, 2009) के अवसर पर जनमत शोध संस्थान, दुमका (झारखण्ड) द्वारा स्व0 नितिश कुमार दास उर्फ ‘‘दानू दा‘‘ स्मृति सम्मान से सम्मानित। 30 नवम्बर 2011 को अखिल भारतीय पहाड़िया आदिम जनजाति उत्थान समिति की महाराष्ट्र राज्य इकाई द्वारा दो दशक से भी अधिक समय से सफल पत्रकारिता के लिये सम्मानित। नेशनल बुक ट्रस्ट ऑफ  इंडिया (न्यू दिल्ली) के तत्वावधान में झारखण्ड के पाकुड़ में आयोजित क्षेत्रीय कवि सम्मेलन में सफल कविता वाचन के लिये सम्मानित। नेपाल की राजधानी काठमाण्डू में 19 व 20 दिसम्बर (दो दिवसीय) 2012 को अन्तरराष्ट्रीय परिपेक्ष्य में अनुवाद विषय की महत्ता पर आयोजित संगोष्ठी में महत्वपूर्ण भागीदारी तथा सम्मानित। नेपाल की साहित्यिक संस्था नेपाल साहित्य परिषद की ओर से लाईव आफ गॉडेज स्मृति चिन्ह से सम्मानित । सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया वर्कशॉप में वतौर रिसोर्स पर्सन व्याख्यान। हरियाणा से प्रकाशित अन्तर्जाल पत्रिका अनहद कृति की ओर से अनहद कृतिः वार्षिक हिंदी साहित्यिक उर्जायानः काव्य-उन्मेष-उत्सव विशेष मान्यता सम्मान-2014-15 से सम्मानित। साहित्यिक-सांस्कृतिक व सामाजिक गतिविधियों में उत्कृष्ट योगदान व मीडिया एडवोकेसी से सम्बद्ध अलग-अलग संस्थाओं /संस्थानों की ओर से अलग-अलग मुद्दों से संबंधित विषयों पर मंथन युवा संस्थान, राँची व अन्य क्षेत्रों से कई फेलोशिप प्राप्त। सहभागिता के लिए कई मर्तबा सम्मानित।
कार्यानुभव: मीडिया एडवोकेसी पर कार्य करने वाली अलग-अलग प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा आयोजित कार्यशालाओं में बतौर रिसोर्स पर्सन कार्यो का लम्बा अनुभव। विज्ञान पत्रकारिता से संबंधित मंथन युवा संस्थान, रांची के तत्वावधान में आयोजित कई महत्वपूर्ण कार्यशालाओं में पूर्ण सहभागिता एवं अनुभव प्रमाण पत्र प्राप्त। कई अलग-अलग राजनीतिक व सामाजिक संगठनों के लिए विधि व प्रेस सलाहकार के रूप में कार्यरत।
सम्प्रति:  अधिवक्ता सह व्यूरो प्रमुख ‘‘सन्मार्ग‘‘  दैनिक पत्र व  ‘‘न्यू निर्वाण टुडे ‘‘ संताल परगना प्रमण्डल ( कार्यक्षेत्र में  दुमका, देवघर, गोड्डा, पाकुड़, साहेबगंज व जामताड़ा जिले शामिल ) दुमका, झारखण्ड ।   

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