जीवन की रेत

जीवन की रेत को
मुट्ठी में जकड़ कर देख
फिसल जाये मुट्ठी से
हथेली में फिर भरकर देख
नाविक जो खड़ा नदी के तीरे
पानी की गहराई से मुख मोड़े
गहराई में उतरकर देख
भँवर में फिर फँसने के लिए
हवाओं को ना जाने दे
दम में भर ले साँसों की तरह
पानी के सैलाब पर
नाम अपना लिखवाने के लिए
दुविधा को देख सुविधा की तरह
सुविधा को भी शरमानेे दे
बस मुट्ठी को इतना न जकड़
खुल के वो जाये जकड़
फिसलने दे रेत को मुट्ठी से
अपनी मनमानी करने के लिए
- शालिनी मोहन

शिक्षा  एम बी ए
विभिन्न राष्ट्रीय,अन्तर्राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित। अहसास की दहलीज़ पर साझा काव्य संग्रह के.जी. पब्लिकेशन द्वारा  २०१७ में प्रकाशित।रश्मि  प्रकाशन लखनऊ से कविता संग्रह दो एकम दो  वर्ष २०१८ में प्रकाशित
पता : सिंगसान्द्रा, बंगलुरू, कर्नाटक।

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