जीवनधारा

शायद सच कहा हो उन्होंने  …..ना, नहीं ये हो ही नहीं सकता,बिल्कुल गलत बात है !  मन मस्तिष्क में मंथन चल रहा था ,पता नहीं क्या सच है! क्या झूठ ? कहने वालों का क्या? पवन के उड़ते वेग को किसी ने पकड़ पाया है !पकड़ने की चाह में नाकामयाबी ही मिली है।वैसे भी दुनियादारी का उसूल है जो हाथ नहीं आते उनमें बस खोट ही निकालते हैं । गला काट दो इस कदर कि गले मिलना भी चाहो तो मिल ना सको,इसी फलसफे पर तो दुनिया चल रही है आजकल।
कुछ महीने  पूर्व बगल के फ्लैट  में रहने आई युवा लड़की सबके आकर्षण का केन्द्र थी।
कुछ बात तो थी उस लड़की में जो आज की पीढ़ी में देखने नहीं मिलती ।
अब वही लड़की अनसुलझी पहेली बन मेरे दिलो-दिमाग पर यूँ  छाती जा रही  थी जैसे अमर बेल किसी वृक्ष की शाखाओं   पर लिपट जाती है । जैसे जैसे लिपटती  जाती है वैसे-वैसे वृक्ष ठूंठ बनता जाता है,कहीं ये अनचाही बेल मुझसे लिपट कर मेरे आदर्शवादी व्यक्तित्व पर ही ग्रहण ना लगा दे,सोच कर ही काँपने लगी थी।
     मैं भारतीय संस्कारों में बंधी ,  पति परिवार के इर्द-गिर्द  घूमती अपने घर को ही संसार समझती थी। इस युवती से पहले नजरों से अभिवादन का आदान-प्रदान हुआ फिर  धीरे-धीरे उसके क्रियाकलापों का  आँखे पीछा करने लगी। शालीनता व सलीके से पहने कपड़े,  सौम्य और सुन्दर  व्यक्तित्व किसी को बरबस अपनी ओर खींच लें, पर उसकी आँखो में बसी वीरानगी  और होठों पर हर वक्त की चुप्पी बहुत ही रहस्यमय लगती थी। किसी से कोई मतलब नहीं, एक आवरण ओढ़े अपने खोल में घुसी रहती । नियत समय पर ताला लगते और खुलते देख मुझे लगा शायद नौकरीपेशा है और हम जैसी गृहस्थन से मिलना तौहीन समझती हो।
फिर भी हमने चाय नाश्ते के बहाने दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो उसने भी दीदी के रिश्ते में बांध मुझे गले लगा लिया,पता चला किसी एन.जी.ओ में काम करती है।अनाथ और वासना की शिकार लड़कियों के दर्द के बारे में बातें करती उम्र में आधी लड़की एकाएक मुझे खुद से ज्यादा बड़ी लगने लगी।धीरे धीरे प्रगाढ़ता बढती चली गई पर जब भी मैं उसके विवाह की बात करती तो हल्की मुस्कान के साथ बात बदल देती “दीदी मेरा जीवन उन लोगो के लिए है जिन्हें उनके परिवार के साथ समाज ने भी त्याग दिया है, कुछ करना चाहती हूँ उनके लिए…गंभीरता से कहते कहते ना जाने अचानक  खामोशी  के साथ किस दुनिया में चली जाती । विचित्र सी लगती ये लड़की पर मोह माया बढ़ती जा रही थी । समाज सेविका के रुप में आयु से छोटी होने के बावजूद पूजनीय लगती,  निस्वार्थ भाव से उसने अपना जीवन उन के लिए समर्पित कर दिया था जो समाज की जीवन धारा से कट गये थे या काट दिए गये थे।मैं भी पति से छुपाकर गाहे-बेगाहे उन लोगों के लिए उस लड़की को कुछ पैसे दे आती और दिल ही दिल समाज के लिये कुछ ना कर पाने की व्यथा से  उबरने की कोशिश करती।
आज सुबह से ही अंदर ही अंदर एक अजीब सी बेचैनी हो रही थी।मौसम का मिज़ाज भी बिगड़ने लगा था,हवा के साथ धूल इस तरह उड़ रहा था मानो सब बरबाद करके ही छोड़ेगा। बार बार भगवान के मत्था टेकती,कुछ अनहोनी की आशंका से मन भयभीत हो रहा था तभी बगल की भाभी ने आकर आत्मीयता दिखाते बम विस्फोट किया…जिस लड़की को मानवता, ,करुणा और आदर्श की देवी मानती थी वह तो पेशेवर कोठे वाली थी, कल उनके पति ने उस लड़की को उस जगह देखा जहाँ कुलीन घर की लड़कियाँ पैर भी रखना अपमान समझती हैं । उनकी बातें  मेरे सिर से पार हो रही थी पर अविश्वास करने का कोई मजबूत आधार भी नहीं था क्योंकि सबूत के तौर पर मोबाइल से ली तस्वीर सामने थी। सर भन्ना रहा था, कैसे हो सकता है यह, अमावस्या की स्याह रात में शायद कुछ गलतफहमी हुई हो । उसकी सुनहरी छवि जो दिल में बसी थी कैसे धूमिल पड़ सकती है,ना ,ना! तस्वीर तो उसी की है पर ऐसे परिधान और लीपे पुते चेहरों के बीच वही तो थी जिसे हमने अपना  आदर्श बना रखा था । कैसी मासुम सी लगती थी, खुद को ठगी महसूस कर रही थी,उस लड़की के प्रति विश्वास चूर चूर हो रहा था पर दिल मानने को तैयार ही नहीं हो  रहा था ….सूखे पत्ते की तरह मन भी हवा के साथ उड़ रहा था ।नहीं, नहीं , वो फुल सी कोमल दिल की मल्लिका ऐसी नापाक हरकत कर ही नहीं सकती।दिल में चलते झंझावत को दिन भर किसी तरह उसके वापस आने तक रोके रखा,पर वो और  समाज के लिए उसका  कुछ करने का जज्बा चलचित्र की भाँति आँखो से होकर गुजर रहे थे , शरीर अनजाने भय से कांप रहा था , कैसे कोई मेरी भावनाओं से खेल सकता है… पति और बच्चे मुझे ‘ इमोशनल फूल’ गलत नहीं कहा करते ।
दोपहर से ही रह रह कर बारिश हो रही थी, पता नहीं ऊफनती भावना थी या पराजित होने का गम, मेरी आँखे भी भर जाती,नजरें तो खिड़की से होती बाहर बस उसे ही ढूंढ रही थीं, कब आये और कब मुझे सच्चाई पता चले। ताला खुलने  की आवाज  सुन अकचका कर बालकाॅनी में आ उसे निहारने लगी__वही मासूमियत … दिमाग पर दिल हावी होने लगा ,झूठी बात है सब।  सुनहरी  चिड़िया के पर कतरने का तरीका है  , आत्मग्लानि भी हो रही थी ,कैसे किसी की बातों पर आ उस पर शक करने लगी।बारिश के कारण मौसम कुछ ठंडा सा हो गया था,फटाफट  चाय पकौड़े ले उसका दरवाज़ा खटखटा दिया,शायद ग्लानि से उबरना चाह रही थी।
उसी भोलेपन के साथ उसने अभिवादन किया जिसने मुझे एक अनाम रिश्ते में बांध दिया था,कुछ परेशान दिख रही थी। बातों बातों में नौ साल की बच्ची का जिक्र करने लगी जिसे किसी वहशी ने अपना शिकार बना रास्ते में फेंक दिया था,उसके आँखो में पहली बार गुस्सा दिख रहा था पर मेरा मन तो सच्चाई जानने के लिए भटक रहा था,पूछ बैठी ” कल रात तुम कहाँ थी,उस मोहल्ले में किसकी सेवा कर रही थी जहाँ  सभ्य लोग कदम भी नहीं रखते” ।
खामोशी ने चादर पसार लिया,कोई जवाब नहीं , शायद इस सवाल के जवाब के लिए तैयार नहीं थी या कुछ बताना नहीं चाह रही थी।मैं भी आज प्रण कर आई थी बिना सच जाने यहाँ से जाऊँगी नहीं ।उत्ताल तरंगों के बीच वायु के समुद्र की भांति  – उसकी सांसे चल नहीं रही थी ,तैर रही थी।बार बार कुरेदने पर एकाएक मेरी तरफ पलटी….क्या जानना चाहती हैं आप? उस बदनाम गली में क्या कर रही थी मैं, यही ना! क्या करेंगी जान कर ,मुझसे सहानुभूति जता क्या सुनना चाहती हैं?आवाज की मखमलियत कहीं खो गई थी …हाँ मैं वहाँ थी पर आपको जिसने बताया ये सब ,उनसे पूछो वो वहाँ क्या कर रहे थे ,रातें रंगीन करने के लिये ये आयें तो भी सभ्य और हम लड़कियाँ मजबूरी में धकेले गये तो बदनाम तवायफ कहलाए।
लंबी सांस छोड़ती फिर उसने कहा “दीदी मैंने कोठे पर जन्म नहीं लिया था,धकेल दी गई थी ।धीरे धीरे उसने बताना शुरु किया—
खानदानी और अमीर परिवार में जन्मी थी मैं।  अपने माता-पिता और भाई के साथ किसी शादी से वापस हो रही थी।रास्ते में कार दुर्घटना में सब मारे गये और मैं बदकिस्मत घायल पड़ी मदद की गुहार कर रही थी।मानवीय संवेदनाओं से शून्य समाज में किसी ने आगे बढ़ मदद किया भी तो किसी घायल के लिये नहीं,उसे तो अपने बाजार में सजाने के लिए एक नगीने की जरुरत थी जो नारी देह के रुप में पंद्रह साल की लड़की मिल गई।
घाव तो समय के साथ भर गये पर मन पर प्रति दिन कोड़े चलते,  हर रात  दुल्हन  बना दी जाती अलग-अलग दूल्हे की। विरोध करने पर मार पीट के साथ खाना भी बंद कर दिया जाता ,कच्ची उम्र की लड़कियों को धंधे में धकेल ये हराम की रोटी खाते,अंदर से सुलगती रहती पर कुछ नहीं कर पाती।ईश्वर से विश्वास उठ चुका था पर वहाँ से भागने के लिए कृतसंकल्प रहती और एक दिन  मुझे उस काली कोठरी से भागने का सौभाग्य मिला।नहीं जानती थी अब क्या होगा? ननिहाल ददिहाल ने मेरी कहानी सुन समाज के डर से मुझे अपनाने के लिए इंकार कर दिया । मेरे पास जिन्दा रहने का कोई आधार नहीं था ,आत्महत्या करने गई तो एक समाज सेविका के हाथों बचा ली गई और यहीं से मेरे जीवन में बदलाव आया,उनके साथ ने मेरे खोए स्वाभिमान को जगाया।चक्रव्यूह में फंसे अभिमन्यु की तरह अब बस युद्ध ही धर्म था,युद्ध ही कर्म था।मुझे युद्ध में उतरना था -उन दरिन्दों  के खिलाफ जो लड़कियों को देह मात्र समझ उन्हे रौंदना अपना अधिकार समझते हैं ।मेरे पास दो रास्ते थे या तो लड़ो या नियति समझ घुटने टेक दो,पर मन नहीं मानता मैं तो निकल गई पर मेरी जैसी कितनी बेकसूर आज भी जहन्नुम की जिंदगी जीने को विवश हैं ।मैने जो झेला और  किसी मासूम को ना भोगना पड़े, हाँ दीदी मैं गई थी उस बदनाम गली में पर वेश्यावृत्ति करने नहीं,मेरी तो कोशिश होती है हर  उस लड़की को  नरक से निकाल सकूँ जो अनजाने में यहाँ आ फंसी है,उनकी जरूरतें और ईलाज के लिए चंदा इकठ्ठा करती हूँ ।हमारे जैसे कुछ लोग उन्हे साक्षर बनाने की कोशिश कर रहें हैं , अगर मैं गलत हूँ और सभ्य समाज के लायक नहीं हूँ  तो मंजूर है मुझे……. बार बार जाऊँगी वहाँ।
मैं बुत बनी उसकी बात सुनी जा रही थी ,इतनी कम उम्र में इस लडकी ने क्या क्या झेला था,उफ़ आँखे थी कि बरबस बरसती ही जा रही थी,दम साधे उसे अकेले छोड़ वापस आ गई,आखिर इज्जतदार घर की बहू  एक तवायफ से कैसे रिश्ता रख सकती है।

दूसरे दिन  मेरी नजर फिर ताले लगाती उस समाज सेविका पर जा ठहरी,चाह कर भी कुछ बात ना कर सकी,निरीह नजर से उसने मुझे ऐसे देखा कि कंपकंपाती ठंड में भी मैं पसीने से तर बतर हो गई।

दिल ने उस लड़की के साहस को और  समाज की ठुकराई महिलाओं के प्रति  कुछ करने के जज्बे को सलाम किया।दरवाजे पर ताला आज भी बंद है और मैं उसे ढूंढती फिर रहीं हूँ ….शायद कहीं मिल सके वो और पहले  की तरह फिर गले लगा सकूँ ।
- किरण बरनवाल

शैक्षणिक योग्यता:बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक 
जमशेदपुर  , झारखंड

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