छद्मावरण

जियालाल कां इस बात का संतोष था कि उसकी यह गलतफहमी आखिरकार दूर हो गयी कि जिंदगी को बिना तिकड़मबाजी के भी जिया जा सकता है। इसके लिए वह स्‍वयं को त्रिपुरारी जी का कृतज्ञ मानता था जिन्‍होंने उसके मस्तिष्‍क में व्‍याप्‍त संशय व साफ-सुथरी आदतों के दाग को ऐसा रगड़-रगड़ कर साफ किया जितना कोई पुराना से पुराना वफादार सेवक भी घर के बर्तनों को क्‍या साफ करेगा। ये त्रिपुरारी जी भी अजीब हैं। गॉव-कस्‍बे से लेकर बीच शहर में उनकी सम्‍पत्ति है। मकान,फ्लैट्,खेत,पुश्‍तैनी घर सब कुछ। फिर भी संतुष्‍ट होकर बैठने वालों में से नहीं हैं। किसी को औघढ़ दानी होकर ऐसा भला करेंगे कि वह सोच भी नहीं सकता है जैसे कि खुद जियालाल। कभी वे दुनियादारी के सामान्‍य नियमों का पालन करते तो कतिपय अवसरों पर इन सबसे ऊपर उठकर परोपकार के उदात्‍त शिखरों का आरोहण करने लगते। जिन नैतिक नियमों का प्राणपण से पालन करना वे जीवन का सार मानते थे उन्‍हीं से कभी-कभी ऊपर भी उठ जाते थे।

बैठक में मसनद से सटकर वे अपने सुपुत्र घनश्‍याम की प्रतीक्षा कर रहे थे। वह कॉलेज का युवा नेता कहा जा सकता था। वे देख रहे थे कि पिछले दिनों वह कई आन्‍दोलनों में सक्रिय तौर पर शामिल था। एक बार पुलिस उसे कुछ अन्‍य नेताओं के साथ पकड़कर ले गयी थी। त्रिपुरारी जी को जब यह तथ्‍य ज्ञात हुआ तो थाने में जाकर खुद पुलिस वालों से मिले एवं एकाध घंटे में छुड़ाकर ले आए। एक पिता के धर्म का पालन करते हुए उन्‍होंने उसे रास्‍ते में डॉट व उपदेश पिलाया परंतु घर पहुचकर अपनी अर्धांगिनी के समक्ष पूर्णत: सामान्‍य हो चुके थे। जब वह एक मॉ की तरह व्‍यथित होकर घनश्‍याम से मिली तो उन्‍होंने करीब-करीब भर्त्‍सना करने वाले अन्‍दाज में उसे दुर्बलता का प्रदर्शन न करने का निर्देश दिया। आखिर उनका पुत्र एक सामाजिक कार्य को अंजाम दे रहा था। ऐसे कार्यो में जेल यात्राऍ मील का पत्‍थर सिद्व होती हैं। उन्‍हें इस बात का मलाल अवश्‍य था कि कुछ करने से पहले उसे उनसे रणनीति पर विचार कर लेना चाहिए था। समझदार आदमी वह है जो आगे की चार चालें सोचकर कदम बढा़ए। खैर चलो शुरुआत तो की। स्‍थानीय अखबार में कल जरुर चर्चा होगी। घनश्‍याम को एक युवा नेता के रुप में प्रतिष्ठित करने की उनकी महत्‍वाकांक्षी परियोजना थी। एक जागरुक अभिभावक की भॉति प्रारंभ में वे अपने सुपुत्र को अभियांत्रिकी,चिकित्‍सा व प्रशासन जैसी कोई लाइन पकड़ाना चाहते थे। परंतु अध्‍ययन के प्रति उसकी विरुचि व शिक्षेत्‍तर विषयों में घोर आसक्ति देखकर वे पुर्नविचार करने पर बाध्‍य हो गए। उसके आई क्‍यू के निम्‍न स्‍तर पर उन्‍हें निराशा हुई। पर सूक्ष्‍म अवलोकन में पारंगत त्रिपुरारी जी यह भॉप गए थे कि वह पढ़ाई-लिखाई से इतर कार्यो में श्रेष्‍ठतर परिणाम दे सकता है। सो वह उसे उसी दिशा में उद्वत करने का उपक्रम करने लगे। क्षेत्र के विधायक पद के चुनाव में खड़ा करना उनका मध्‍यमकालीन उद्देश्‍य था।

घर पर धर्मपत्‍नी ने बताया कि उनके भाई सुदर्शन का फोन आया था। हालचाल ठीक है। अपने बेटे जयकांत को आपके पास भेज रहे हैं। कोई नौकरी दिलाने का अनुरोध कर रहे थे। वे बिना कुछ बोले ऑंखे बन्‍द करके विचार करने लगे। इस ध्‍यानावस्‍थ मुद्रा में किसी संत का संभ्रम उपस्थित होता था। कस्‍बे के अपने पुश्‍तैनी मकान के दो कमरे उन्‍होंने अपने अनुज सुदर्शन के परिवार को रहने के लिए दिया था। शेष चार किराए पर उठाकर आय का एक नियमित स्रोत बना दिया। यह राशि वे स्‍वयं रखते थे। भाई से कह रखा था कि तुम उस मकान में रहते हो हम लोग यहॉ दूसरे शहर में परदेशी हैं। खर्च के लिए रकम चाहिए ना। खुद व्‍यक्ति जीवन में अपनी उपलब्धियों के आधार पर हक के लिए बोलता है। औसत दर्जे की नौकरी पर जी रहे सुदर्शन ने लगभग बिना प्रतिवाद के उनकी बात स्‍वीकार कर ली। अपनी दबंग स्थिति को वे चिरस्‍थायी बनाने में लगे थे।‍ 

भतीजा जयकांत अपने पिता की तरह सीधा था। पढ़ाई में ठीक परंतु इतना कुशाग्र नहीं कि किसी ऊॅचे पद पर आसीन हो जाए। अपने बूते पर मोटी कमाई कर सता तो इधर क्‍यों आता ?

जयकांत दो दिन बाद आया। साथ में उसका एक मित्र भी था। वह उसका सहपाठी था। नाम रविप्रकाश था। जयकांत के चरणस्‍पर्श करने पर त्रिपुरारी जी ने घर का समाचार पूछा। विनम्र भतीजा सब सब कुशल है वाले भाव में खबर देने लगा। ”अच्‍छा चलो बढि़या है…।” उन्‍होंने टोका। वृतांत के दीर्घ होने पर वे ऊब अनुभव करने लगे थे। ”आपका परिचय ?” उन्‍होंने पास बैठे उसके मित्र के विषय में पूछा। 

”चाचाजी ये रविप्रकाश हैं। मेरे साथ पढ़े हैं। पढाई में अव्‍वल हैं।” मित्र ने पुन: सादर नमस्‍कार किया। ”बरखुरदार कहीं जॉब कर रहे हैं क्‍या…? वे अभी भी परोक्ष रुप से उसके बारे में बात कर रहे थे। ”ये बॉटिनी की पढ़ाई पूरी कर चुके हैं। नौकरी पक्‍की है।” जयकांत ने बताया।

”हॅू…।” उन्‍होंने एक दीर्घ निश्‍वास लिया। जब तक वे विचारमग्‍न रहे दोनों प्राणी भी खामोश रहे। फिर स्‍वयं मौन भंग करके बोले,”अच्‍छी बात है।” जयकांत ने हिचकिचाते हुए अपनी नौकरी की बात की। ”देखो तुम्‍हारे बाबूजी से मुझे पता चल चुका है। भई देखो हमसे जो बन पड़ेगा उससे पीछे नहीं हटूगॉ। लेकिन मेरी भी सीमाऍ हैं।” सहसा उनके मुख पर सात्विक तेज चमकने लगा था। ”किसी की जी हजूरी करना मेरे बस का नहीं। लोग कहेंगे कि अपने भतीजे के लिए यह जोड़ तोड़ करने पर आ गया।”

”जी हॉ…चाचाजी…जी।” जयकांत तेजी से सर हिलाता हुआ उनके नैतिक स्‍वरुप का अभिनंदन करने लगा।

पुन: वे जैसे विश्राम के लिए रुके। भतीजे की खातिर मानो रियायत करते हुए कहा,”फिर भी चलो देखते हैं। कुछ न कुछ जरुर करेंगे। देश में इतने डेवलपमेंट प्रोजेक्‍टस् चल रहे हैं। तुम्‍हारे जैसे होनहार नौजवान के खाली बैठने की गुंजाइश नहीं है।” आखिरी वाक्‍य सुनकर जयकांत को मानो नवजीवन प्राप्‍त हुआ वरना वह चाचाजी के सिद्धांतों से आतंकित हो गया था।

जियालाल को जिस जगह उन्‍होंने लगाया था वहॉ उसे जैसे के लिए ज्‍यादा संभावना तो न थी लेकिन फिर भी हाथ-पॉव फेंककर कुछ ऊपरी कमा सकता था। ऊपर के स्‍तर की छोडि़ए। वहॉ तो खैर बड़े पैमाने पर वारे-न्‍यारे हो रहे थे। सामरिक द्दष्टि से ऐसे महत्‍वपूर्ण विभाग में त्रिपुरारी जी के कुछ खास लोग भी थे। लेकिन कालांतर में उनकी विश्‍वसनीयता संदिग्‍ध हो गयी। अब जहॉ माल-पानी का प्रश्‍न होता है वहॉ निष्‍ठता व मित्रता जैसी बातें दीर्घकालिक नहीं होते। इसलिए वे किसी और को भी फिट करना चाहते थे। सुदर्शन इस बात से अवगत था। इसी आशा में उसने अपने पुत्र को भेजा था। कुछ दिनों पहले जियालाल को कस्‍बा भेजकर त्रिपुरारी जी ने अपना कोई काम करवाया था। उसी दौरान उसकी नयी रंगत देखकर अतृप्‍त आत्‍माओं की तबियत हरी हो गयी होगी। लेकिन इंसान कितना भी परोपकारी हो वह कितनों का कल्‍याण करेगा।

जियालाल ने त्‍वरित गति से अपने आराध्‍य का कार्य सम्‍पन्‍न किया और रिपोर्ट लेकर उन तक पहॅुचा। काम करने वालों का वे मान करते थे। उन्‍होंने ऑखों ही ऑखों में विभाग की चालू स्थिति का हाल पूछा। वह कूट भाषा में उन्‍हें बताने लगा। ऋषितुल्‍य स्थितप्रज्ञता से श्रवण करते त्रिपुरारी जी ने संक्षिप्‍त संवाद के पश्‍चात् यह भॉप लिया कि वहॉ सुपरवाइजर के एक पद पर अपना आदमी फिट करने की उज्‍जवल संभावना है। आपसी खींचतान के कारण कोई भी आसीन नहीं हो पाया था। प्रयत्‍न करने पर बात बन सकती थी। सो जियालाल से कहा,”भाई मैं तुम्‍हें अपना स्‍नेही मानता हॅू।” वह यह सुनकर तनिक पास खिसक गया। ”देखो…,” एकांत में भी अपने स्‍वर को यथासंभव धीमा करते हुए कहने लगे,”यह संसार ऐसा ही है। हमारे-तुम्‍हारे प्रयास से क्‍या होने वाला है। सबको प्रभु अपने भाग्‍य का देता है।” जियालाल मॅुह बंद करके सर हिलाता हुआ उनके कथन का पुरजोर समर्थन करने लगा।

”लेकिन अगर हमारे हाथों किसी का भला हो जाए तो इसे मैं अपना सौभाग्‍य मानूगॉ। मेरी नजर में एक योग्‍य उम्‍मीदवार है। पढ़ा-लिखा और ईमानदार जोकि वहॉ के बंदर-बॉट पर रोक लगा सकता है। तुम बस बोर्ड के मेम्‍बरों का मिजाज देखो और मुनासिब समझो तो मुझे सूचित करना।” ऐसा कहते हुए उनके मुख पर ऋजुता का अनुपात बढ़ गया था।

”अजी साहब क्‍या बात करते हैं। आपकी बात भला टाल सकता हॅू ?” जियालाल की वाणी में कृतज्ञता छलक रही थी। ”एक मुलाकात का इंतजाम करता हॅू।”

विभागाध्‍यक्ष घोरपड़े साहब अपनी तरफ के नहीं थे परंतु जैसा कि जियालाल ने संक्षिप्‍त परिचय में बताया था, बड़े सुलझे हुए व्‍यक्ति थे जो आवश्‍यतानुसार लचीलापन प्रदर्शित करते थे। शौक भी रखते थे। यह सब एडवांस में जानकर त्रिपुरारी जी को अच्‍छा लगा। ”सोचा कि बड़े लोगों के दर्शन कर लॅू।” वे विनय की प्रतिमूर्ति बने हाथ जोड़ कर उनके कमरे में पहुचे। इधर घोरपड़े जी के पी.ए. से जियालाल ने त्रिपुरारी जी का घनघोर महिमा मण्‍डन किया था। इसलिए वे भी मुस्‍कराए,”आइए जनाब बैठिए। आप भी एरिया के कम बड़े आदमी नहीं हैं।”

”भारत माता हम सबकी है। मेरा कौन सा एरिया है? ये एरिया-वेरिया मैं नही जानता। बस अच्‍छे विचारों वाले लोगों से परिचय करना चाहता हॅू।” काफी देर तक समान विचारों वाले समानधर्मा मनुष्‍य वार्तालाप करते रहे। बातचीत का विषय भारतीय संस्‍कृति के छिपपुट उल्‍लेखों से होता हुआ वर्तमान रानीतिक परिद्दश्‍य,प्रशासनिक सुस्‍ती से गुजरता समान हितों पर आ गया। घोरपड़े साहब ने सांकेतिक भाषा में इस तथ्‍य का जिक्र किया कि पहले से जमे लोग कष्‍ट दे रहे हैं। इस पर त्रिपुरारी जी सद्दश्‍य पुरुष का ह्दय नवनीत समान पिघल गया। ”सर हम इस लायक तो नहीं कि आपके लिए कुछ कर सके लेकिन फिर भी बंदा इतना रसूख तो रखता है कि बेजा हर‍कत करने वालों की नकेल कस सके।” उनके हाथ विनम्रतापूर्वक जुड़े हुए थे।

”अरे साहब ये क्‍या कर रहे हैं आप…,”विनम्रतापूर्ण आचरण भौतिकी के सामान्‍य नियमानुसार वैसे ही आचरण को आमंत्रित करता है। घोरपड़े साहब ने उनके हाथ पकड़ लिए। ”मुझे अच्‍छी तरह पता है कि सब कुद आपसे ही होने वाला है। आपकी तारिफ खूब सुन चुका हॅू।” फिर दोनों भद्र पुरुष भावविहृवल होकर हॅसने लगे। जिस प्रकार सही संगीत लहरियों व राग के द्वारा मेघों को आकृष्‍ट कर वर्षा की जाती है उसी प्रकार दोनों सज्‍जनों ने एक दूसरे को अपने अनुकूल कर लिया। यह निश्‍चय हुआ कि सुपरवाइजर के पद पर त्रिपुरारी जी अपने मनोनुकूल व्‍यक्ति को रखेंगे। बदले में घोरपड़े साहब के हाथ मजबूत करने में वे कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।

चलते वक्‍त त्रिपुरारी जी का चित्‍त प्रसन्‍न एवं हल्‍का था।

घर आकर उन्‍होंने तांबे के बड़े गिलास में पानी पिया। कुर्सी पर अधलेटी अवस्‍था में अपनी बेटी को आवाज दी। मध्‍यम कद की सांवली युवती ने कमरे में पर्दापण किया। ग्रेजुऐशन किए तीन साल व्‍यतीत हो चुके थे। एक साल खाली बैइने के बाद उन्‍होंने अपने कुछ शुभचिंतकों के कहने पर बी.ए.में एडमिशन करवा दिया कि आगे काम आएगा। पढ़ाई के साथ-साथ लगभग प्रत्‍येक क्षेत्र में औसत दर्जे की बेला के चेहरे पर अवसाद द्दष्टिगोचर हो रहा था। ”देख जरा अपनी मॉ को बुलाना। घर पर ही हैं?

”नहीं। पास में कीर्तन में गई हैं।”

”अच्‍छा कोई बात नहीं। आए तो कहना कि जरुरी बात करनी है।”

”ठीक है।” संक्षिप्‍त उत्‍तर के बाद बेला जाने का उपक्रम करने लगी। तनिक पेशोपेश में रहने के बाद वे बोले,”तेरी पढ़ाई कैसी चल रही है ?” शायद उसे रोकने का कोई और कारण नजर नहीं आया।

”अच्‍छी चल रही है बाबूजी।”

”चल जरा ध्‍यान से पढ़ना। अब जमाना पढ़ाई का ही है। और जरा अपनी सूरत पर गौर फरमाना। रोनी शक्‍ल क्‍यों बना रखी है? भगवान जो करेगा अच्‍छा करेगा। हम लोग आखिर किस लिए हैं ?

धर्मपत्‍नी ने कीर्तन से निवृत्‍त होने पर दोनों प्राणियों की अपनी पुत्री के भविष्‍य के बारे में गहन चर्चा हुई। त्रिपुरारी जी ने विभागाध्‍यक्ष घोरपड़े साहब से अपनी मुलाकात का सार प्रस्‍तुत करने के बाद बताया कि सरलतापूर्वक वहन कर सकता है। इस वर्णन से धर्मपत्‍नी यह समझ गयीं कि इसमें ऊपरी आमदनी की पर्याप्‍त गुंजाइश है। कल्‍पना का आनन्‍द लेते हुए उन्‍होंने इसकी वास्‍तविकता पूछी,”…लेकिन इस पोस्‍ट पर कौन है ?

”अरे है कोई नहीं।” वे हॅसने लगे।

”हॅू,” वह शीघ्रकोपी नहीं थीं परंतु कितना भी समझदार मनुष्‍य हो वह हवा में लठ्ठ मारने में यकीन नहीं करेगा। ”फिर यह पैंतरा क्‍यों पढ़ रहे हैं ? जब ऐसा घर-वर दिखेगा तो बात करना।”

”अरी अक्‍लमंद मैं जो करता हॅू उसका मतलब होता है। यॅू ही कवायद नहीं करता।” वे अपने मुखडे पर बिना शिकन डाले पूर्ववत प्रसन्‍न थे।‍

जयकांत को एक दिन अपने पास बुलाकर उनहोंने उसके बारे मे बातें की। ”तुम्‍हारी क्‍वालिफिकेशन तो मुझे पता है पर आगे किस फील्‍ड में रुचि है ?” वह उत्‍स’ह से बताने लगा। जरा लम्‍बा संवाद हुआ तो हस्‍तक्षेप करते हुए बोले,”अच्‍छा वो तुम्‍हारा दोस्‍त,क्‍या नाम है उसका…।”

”जी रविप्रकाश।”

                ”हॉ-हॉ वही। आजकल कहॉ है ?

                ”कहॉ जाएगा चाचाजी। यहीं है। वह भी जॉब ढूढ़ रहा है।”

               ”देखो जरा उसके घर-परिवार का पता देना।” जयकांत ने उसके विषय में तमाम उपलब्‍ध्‍ण जानकारी वैसे ही निष्‍ठापूर्वक उद्घाटित कर दी जैसे पक्षी घोंसलों में जाकर अपने चूजों के लिए अनाज के दाने उगलते हैं। उसकी इस भावना पर हर्षित होकर त्रिपुरारी  जी के चेहरे पर जो आत्‍मीयता के लक्षण उभरे उससे जयकांत का विश्‍वास बलवती हो गया कि चाचाजी के हाथों ही विधाता ने उसका उद्धार लिखा है। इस खु शी में वह उनसे इन सब बातों का हेतु पूछना विस्‍मृत कर गया।

फिर वो दिन आया जब वे रविप्रकाश को अपने घर बुलाकर वे बात कर रहे थे। बात का सिरा सदैव अपने हाथ में रखने वाले त्रिपुरारी जी ने शुरुआत की। ”तुम योग्‍य और जहीन हो। तुम्‍हारे लिए अवसर की कमी नहीं है।…वैसे नौकरी मिल जाने के बाद आगे क्‍या करने का इरादा है ?” ऐसे प्रश्‍न का क्‍या उत्‍तर हो सकता है ? ”जी…।” रविप्रकाश कुछ न समझ पाने के कारण चाय का कप नीचे रखकर सोचने लगा। शायद यह कहता कि मैं कुछ समझा नहीं। उसकी दुविधा को ताड़कर वे मदद करने वाले अंदाज में बोले,”भई मेरा मतलब है कि शादी-वादी तो करोगे ही। मैं तुम्‍हारे पिताजी के बारे में जानता हू। हम सब शरीफ लोग हैं। जात-बिरादरी भी अलग नहीं है। हम पुराने लोग ठहरे। हें..हें..बिरादरी से बाहर कैसे जाए ?” बात समझकर वह एक वि‍नीत युवक की भॉति धीमे से बोला,”सर यह तो घर के लोग डिसाइड करेंगे।” 

”हॉ..हॉ सो तो है।” वे स्मित मुस्‍कान चेहरे पर लिए हुए थे। ”मैं कुछ छिपाने में विश्‍वास नहीं करता हॅू। मेरी बेटी सुशील और सुघड़ है। एक अच्‍छे घराने की पढ़ी-लिखी लड़की है। मैं इससे ज्‍यादा योग्‍यता उचित नहीं समझता हॅू।” यहॉ आकर वे तनिक ठहरे। अपने श्रोता को वे विचार व मनन करने का पर्याप्‍त अवसर देते थे परंतु बोलने का नहीं। पुन: कहने लगे,”अगर काबिलियत फैमिली वैल्‍यूज के खिलाफ जाती है तो माफ करना मैं इसे ठीक नहीं मानता। तुम्‍हारे लिए मैंने अच्‍छी जगह सोच रखी है। बिल्‍कुल सही रहेगी।” रविप्रकाश के हृदय में आशंका,लाभ की लालसा,भविष्‍य की योजना जैसी कई चीजें भॅवर में चक्‍कर काटती लहरों की भॉति उमड़-घूमड़ रही थीं।

अन्‍त में उन्‍होंने उसे खाना खाकर जाने का आत्‍मीयतापूर्ण अनुरोध किया। हिचक दिखाने पर स्‍नेह भरी वाणी में बोले,”तुम नए जमाने के हो पर हमारे समय में कहा जाता था कि मिलकर खाना गंगा नहाने का पुण्‍य देता है। तुम्‍हारे साथ मैं भी दो कौर खा लॅूगा।”

जियालाल के साथ अपने एक रुटिन किस्‍म की मुलाकात में कुछ सोचते हुए त्रिपुरारी जी ने अच्‍छे मूड में पूछा,”हमारे अभिन्‍न मित्र रामाश्रय बाबू का क्‍या समाचार है ?” वह भेदभरी मुस्‍कान के साथ कहने लगा,”सरकार ये आपकी खासियत है जो दोस्‍त-दुश्‍मन सबके ऊपर समान भाव रखते हैं। कौंसिल के इलेक्‍शन में आपको कड़ी टक्‍कर दे रहे थे। जब दाल नहीं गली तो अपने पुराने यारों-प्‍यारों के पास फिर लौट गए। उन्‍हीं के पास…जिनसे पहले जूतम पैजार हुआ था। अब क्‍या बताए…। इधर तबियत थोड़ी बिगड़ी चल रही है।” बात यह थी कि जिस गुट से उन्‍होंने हाथ मिलाया था उसी से उनका वर्जित शब्‍दों का आदान-प्रदान तक हो चुका था। थोड़े शब्‍दों में जियालाल के मुख से उनके बहुवर्णी आख्‍यान का श्रवण करके त्रिपुरारी जी के कर्ण भी तृप्‍त हुए एवं नवीनतम जानकारी भी उपलब्‍ध हुई। 

”किसी के बारे में ऐसा नहीं बोलते।” समस्‍त सूचनाऍ प्राप्‍त करने तथा क्षण भर में आकलन करने के पश्‍चात् वे स्थितप्रज्ञता से बोले,”रामाश्रय बाबू समझदार मनुष्‍य हैं मेरे मन में आज भी उनके लिए उतना ही आदर है। वे किसी भी कार्य को जिम्‍मेवारी से पूरा करने में सक्षम हैं।” उनका ऐसा मानना था कि राजनीति में स्‍थायित्‍व की आशा करना अपरिपक्‍वता है। अन्‍त में कहा,”मैं उनसे मुलाकात करना चाहता हॅू।” जियालाल अवाक रह गया। वह तो यह तय कर चुका था कि रामाश्रय बाबू के विषय में देशी-विदेशी अपशब्‍दों का प्रचुर संख्‍या में प्रयोग करके अपनी भाषिक वैभव का परिचय देगा ताकि स्‍वामी प्रसन्‍न हो। पर जहॉ जिस विचारमग्‍न अवस्‍था में उन्‍होंने अपना मन्‍तव्‍य जाहिर किया उसके पश्‍चात् विषयान्‍तर की संभावना निर्मूल हो गयी। 

दीवान पर लेटे रामाश्रय बाबू ने उन्‍हें साक्षात आते देखा तो उठने का उपक्रम किया। हृदय के भाव छिपाने का भी। ”अरे-अरे उठिए नहीं सरकार।” त्रिपुरारी जी ने तत्‍परता से उनका हाथ अपनी हथेलियों में भर लिया। ”कैसे हैं ? बड़े दुबले हो गए हैं।”

”हॉ…बस शरीर है। चलता है।” वे मुस्‍कराने का प्रयास करने लगे।

”आपका साथ हमें सदैव मिलता रहे।” उन्‍होंने उनका हाथ छोड़े बिना हाथ जोड़ने में सफलता प्राप्‍त की। इस अदा पर आखिरकार रामाश्रय बाबू भी रीझ गए। कुछ बोल नहीं पाए बस सजल नेत्रों से देखते रहे। ”भाभी जी कहॉ हैं ?” त्रिपुरारी जी ने कमरे में इधर-उधर ऐसे देखा मानो यहीं किसी कोने में दिख जाएगीं। ”कहॉ होगीं। यहीं पर हैं। हमारी सेवा-टहल में। ऐसे में सेवा करने वाला और करवाने वाला दोनों परेशान हो जाते हैं।”

”ऐसा मत कीजिए,”त्रिपुरारी जी के मुखारविन्‍द से नेह में भीगे शब्‍द पुन: तरकस से तीर की भॉति निकलने लगे। ”बस इस शहर के बाशिंदों को आपकी छत्रछाया उपलब्‍ध रहे। मैं अपनी श्रीमतीजी को कहूगॉ कि भाभी जी के दर्शन करे। उनसे कुछ अच्‍छी चीजें सीखे।” इस पर दोनों महापुरुष हें-हें करके हॅसने लगे।

सायंकाल रामाश्रय बाबू के कतिपय अभिन्‍न सहयोगी माने जाने वाले लोग त्रिपुरारी जी के पास गहन मंत्रणा कर रहे थे। सर्वसम्‍मति से यह तय हुआ कि कौंसिल की भावी व्‍यवस्‍था में रामाश्रय बाबू का अवदान न रहे तो अच्‍छा क्‍योंकि उनकी भूमिका ज्‍यादातर नकारात्‍मक रहती है। आप ही लोग सॅभालिए,मुझे तो बस मुक्‍त कीजिए। कहकर त्रिपुरारी जी ने निष्‍काम सहायता का प्रस्‍ताव किया। अजी हम आपको इतनी जल्‍दी कैसे छोड़ देगें। लोगों के अभिमत का सम्‍मान करते हुए वे कौंसिल में प्रभावी भूमिका निभाने को राजी हो गए।

अगले दिन जियालाल ने उनसे रामाश्रय बाबू के भड़कने की चर्चा की। ”समझिए कि अपना मेनटल बैलेन्‍स खो चुके हैं। कह रहे थे कि मैं खानदानी आदमी हू। कोई बरसाती नाला नहीं जो उमड़ कर सूख जाएगा। शहर के सबसे पुराने रईसों में हमारे खानदान की गिनती होती है। समय आने दो सबको देख लूगा।”

वे चाय पी रहे थे। प्‍लेट में रखे काजू की बरफी को बड़ी नफासत से उठाकर मुह में डाला। उसे भी लेने को कहा। ”देखो भई, रहीम कह गए हैं कि क्‍वार के बादलों के गरजने का मतलब है कि निर्धन इंसान अपनी अमीरी के पुराने दिनों का बखान करके लोगों को इम्‍प्रेस करना चाहता है। हमें ऐसे लोगों से सहानुभूति होनी चाहिए।” जियालाल रुपी प्रशिक्षु यह समझ गया कि इस क्षेत्र में कथनी और करनी के मध्‍य का अन्‍तर ही लाभांश कहलाता है।

घनश्‍याम के विरुद्व शिकायत दर्ज कराने वाले कॉलेज के एक शिक्षक पुलिस थाने में उपस्थित थे। थानाध्‍यक्ष ने शुरुआती मिनटों में उनके अस्तित्‍व की घोर उपेक्षा की। पहले बाहर बेंच पर बैठने को मिला। आखिरकार जब अन्‍दर बुलाए गए तो उस समय थानाध्‍यक्ष महोदय किसी ‘महत्‍वपूर्ण’ से गुफ्तगू कर रहे थे। बीच में बोलने पर समीप खड़े सिपाही ने चढ़ते सूरज के धूप की तरह तीखे स्‍वर में डॉटा। ”देखते नहीं साहब अभी बात कर रहे हैं।” इस पर खिसियानी हॅसी के साथ वे कई मिनटों के लिए स्‍वत: चुप हो गए। यहॉ आकर इतना अपमान तो स्‍वाभाविक एवं अपेक्षित ही था। अन्‍त में जब थानाध्‍यक्ष ने उनकी तरफ मुखातिब होकर पूछा कि हॉ जी क्‍या कहना है तो वे शिकायत दर्ज करने की बजाए आत्‍मरक्षा की मुद्रा में ज्‍यादा थे। ”सर मुझे जबरदस्‍ती कुछ एंटी सोशल एलिमेंटस् ने कॉलेज कैम्‍पस में रोके रखा। वे लोग…।”

”एंटी सोशल एलिमेंटस्..?” थानाध्‍यक्ष ने इन शब्‍दों के प्रयोग पर आश्‍चर्यमिश्रित प्रतिक्रिया दी। उनके चौड़े जबड़े के ऊपर तथा उससे भी अधिक अन्‍दर झॉकते दॉंतों के भाव ने पर्याप्‍त पढ़े-लिखे शिक्षक को अपने शब्‍दों के सही चयन पर संशय में डाल दिया। उन्‍हें इस नाजुक स्थिति से उबारते हुए पुलिस के देवता ने पूछा,”फिर क्‍या हुआ?…कितनी देर तक रोका ?

”जी मैं पढ़ाकर घर जा रहा था। बस मैंनहैंडलिंग शुरु कर दी। परसों इनके लीडर को मैंने अपने क्‍लास में इनडिसेंट बिहेवियर करने से मना किया था। बस…।” थानाध्‍यक्ष ने माचिस की तीली से कान खुजलाना शुरु कर दिया था। ऑंखे उनकी मेज के किसी और दिशा में लगी थीं। फिर भी शिक्षक को आशा थी कि वे उनकी बातें सुन रहे होगें।

”घर में खाना-वाना मिला कि पहॅुचे तो पता लगा कि खत्‍म हो गया है?” थानाध्‍यक्ष अचानक बोले। वे कुछ समझ नहीं पाए। जब उपस्थित दो-एक पुलिसकर्मी हो-हो करके हॅसे तो वे जाकर समझे कि उनके साथ कोई अच्‍छा सा सामयिक मजाक किया गया है। ”सर…।” 

”अरे भाई क्‍या हो गया? इतनी देर हो गयी कि घरवालों ने तुम्‍हें मरा हुआ समझकर आत्‍मा की शांति के लिए प्रार्थना कर डाली ?” थानाध्‍यक्ष का स्‍वर तीव्र हो गया। ”क्‍या समझते हो कि हम खाली बैठे हैं ? और कोई काम नहीं है ? अपनी प्रॉब्‍लम्‍स् लेकर कोई आएगा तो तुम उसे एंटी सोशल बता दोगे?

शिक्षक की बोलती बन्‍द थी।

छात्र संघ के अध्‍यक्ष पद के चुनाव में घनश्‍याम की जीत त्रिपुरारी जी के लिए मंदिर की घंटियों की तरह मधुर थी। मिष्‍ठान वितरित करते हुए वे अतिशय विनम्रता से कह रहे थे,”हमारा उद्देश्‍य युवा शक्ति को सही दिशा देना है। जमाना उनका है।” कौंसिल के सदस्‍यों से उन्‍होंने घनश्‍याम को मिलवाया। कुछ पुराने सदस्‍यों ने कहा कि इन्‍हें पहले कभी नहीं देखा। इसपर जियाला ने त्‍वरित टिप्‍पणी की। ” ये नई भर्ती वाले हैं। सुखोई हैं। मिग नहीं। इंडियन एअर फोर्स में अभी-अभी शामिल किए गए हैं।” 

            रविप्रकाश से बेला की शादी के समय ज्ञात हुआ कि त्रिपुरारी जी की शक्ति वस्‍तुत: संपूर्ण शहर में व्‍याप्‍त थी। एक तरह से सारे हूज हू आमंत्रित एवं अधिकांश उपस्थित भी थे। इस भव्‍य आयोजन के उपरांत शांति में धर्मपत्‍नी ने उनसे पूछा,”जयकांत को कुछ नहीं मिला। लोग कहेगें कि अपने दामाद को बढि़या जगह दिला दी और सगे भतीजे को पूछा तक नहीं तो क्‍या कहोगे ?” स्थितप्रज्ञ मुद्रा में वे बोले,”यह तो वही बात हुई कि किसी ने अपने कान कटा लिए और कोई अपने कान बचा लिया। भई मैं बोलने वालों को दोष नहीं देता। वे स्‍वतन्‍त्र हैं लेकिन मेरा मानना है कि हर चीज योग्‍य हाथों को मिलनी चाहिए। चीज एक है उसे सॅभाल कर इस्‍तेमाल करना है। यज्ञ के लिए रखा कलश कोई शौच के लोटे की तरह कैसे प्रयोग कर सकता है?” सुदर्शन का अपने ज्‍येष्‍ठ भ्राता के सम्‍बन्‍ध में कहना था कि वे हमारे लिए मॉ-बाप सब कुछ हैं। अगर गिरेगें तो उन्‍हीं की गोद में। वे सब सॅभाल लेगें। जैसे आकाश से गिरने पर हर चीज को पृ‍थ्‍वी अपनी गुरुत्‍वाकर्षण शक्ति से खींच लेती है कुछ उसी तरह। उस समय किसे पता था कि त्रिशंकु बनना भी एक अवस्‍था होती है। धरती और आसमान के मध्‍य खजूर पर लटकने की संभावना भी होती है। सभी का कल्‍याण कभी-कभी चाहकर भी सम्‍भव नहीं होता है। कुछ लोग पूर्व जन्‍म के अश्‍वत्‍थामा सद्दश्‍य होते हैं जिनकी हस्‍तरेखाओं में भटकना लिखा है। वे इसमें क्‍या कर सकते हैं।

बेला के घर हालचाल लेने त्रिपुरारी जी गए। वह उन्‍हें देखकर खुश हुई। रविप्रकाश मौजूद नहीं था। पूछने पर बताया कि बेहद व्‍यस्‍त रहते हैं। खाने पीने की सुध नहीं रहती। साथ ही छिपी मुस्‍कान के साथ यह भी कहा कि इस पैसे का क्‍या होगा जब इंसान घर को भूल जाए। पानी पीकर वे बोले,”दामाद जी से मिलने की बड़ी इच्‍छा थी। अपने अनुभव बॉटना चाहता था।” अपने जीवनानुभव एवं कार्यानुभव से वे भॉप गए कि लक्ष्‍मी यहॉ अत्‍यधिक मेहरबान है। बिना मुलाकात के लौटना पड़ा। कई दिनों बाद फोन पर रविप्रकाश से वार्ता हुई। शुभाशीष देने के मूड में उन्‍होंने कहा,”समय के अनुसार काम करना चाहिए। जहॉ सड़क खाली दिखे गाड़ी की स्‍पीड बढ़ा दो। बीच में रुकावट मिले तो उसी हिसाब से गति धीमी कर लेनी चाहिए।” वह संभवत: जल्‍दी में था। मैं बाद में बात करुगॉ कहकर लाइन काट दी। दुबारा फोन नहीं किया। वे थोड़े परेशान हो गए। सोचा कि चलो व्‍यस्‍त होगा। आखिर बगुला पानी में नहाने के लिए बल्कि आहार ढूढ़ने जाता है। 

      एक दिन बेला के ससुराल वालों के बारे में सुनने को मिला कि वे लोग अपने बेटे को त्रिपुरारी जी से दूर रखने में भलाई समझते थे। कहीं उनके सीधे-सादे सुपुत्र को गलत पट्टी ने पढ़ा दे। लोगों से ऐसा ही फीडबैंक मिला होगा।

कृतघ्‍न ! काम निकल जाने के बाद ऑंखें फेर ली। हम तो कुछ देने का भाव रखेगें। लड़की-दामाद से कोई क्‍या लेगा !

सुदर्शन का एक दिन फोन आया। उन्‍होंने सहज भाव से बात की। ‍जिसकी उम्‍मीद थी वह बात नहीं हुई। उसने जयकांत की नौकरी के बारे में कुछ नहीं पूछा और कहा। वे स्‍नेहलेप लेकर तैयार थे लेकिन उपयोग की नौबत नहीं आयी। जब उसने कहा कि भाभी जी को मेरा नमस्‍कार कहिएगा तो आमतौर पर बात स्‍वयं आरम्‍भ व अन्‍त करने के आदी त्रिपुरारी जी की धाराप्रवाह वाणी पर विराम लग गया।

इधर कुछ दिनों से घनश्‍याम के दर्शन नहीं हुए थे। अपनी स्थिति को सुद्दढ़ करने में उसके परिश्रम को देखकर वे उस किसान की तरह हर्षित हो रहे थे जो अपने लहलहाते फसलों को देख रहा हो। वे तनिक ऊचे स्‍वर में धर्मपत्‍नी से बोले,”घनश्‍याम में मुझे बेहद संभावनाऍ दिख रही हैं। देखना प्रांत की राजनीति में वह एक सशक्‍त हस्‍तक्षेप साबित होगा।” उनकी वाणी मन की असीम खुशी की पोल खोल रही थी। धर्मपत्‍नी धार्मिक थीं अत: उन्‍होंने भगवान को याद करके हाथ जोड़ दिए।

उने एक पुराने परिचित ने धीरे से कान में बताया कि एक लड़की को लेकर घनश्‍याम बाबू का बवाल हो गया। उनके कान खड़े हो गए। उस परिचित को तनिक दूर ले जाकर तफसिल से माजरा पूछा। उसने हाल के श्रुत इतिहास को प्रामाणिक तथ्‍यों का ब्‍योरा देते हुए सुनाया। बात चिंताजनक थी। अभी घनश्‍याम का राजनीतिक कैरियर शुरु हुआ था। पहले तो कॉलेज के टीचर से दुर्व्‍यवहार किया बाद में उसकी लड़की से छेड़खानी। घरवाले प्रेस में जाने को तैयार थे। इस बहुमान्‍य अभियोग की खुर्दबीनी जॉच का औचित्‍य नहीं था। विरोधियों का दमन करना चाहिए। वे इस नीति को जानते थे लेकिन हर चीज की सीमा निर्धारित है। इस पुत्र के राजनीतिक जीवन के गति अवरोधकों को चिन्ह्ति करके उन्‍हें यथाशीघ्र पार करने की महत्‍वाकांक्षी परियोजना बनाने में वे अपने दिमाग को टायर की भॉति घिसा रहे थे। और एक यह है…। वे द्दष्‍टव्‍य जगत के यथार्थ का ही अवलोकन मात्र से सन्‍तुष्‍ट नहीं होते थे अपितु अद्दश्‍य का आकलन करने में भी विश्‍वास था। मामले का समापन सरकारी विज्ञापन की तरह सुखान्‍त होजने के प्रति आश्‍वस्‍त थे। आखिर हमारी क्‍यों नहीं सुनेगा। उन्‍होंने खोजबीन की तो अगले सुबह घनश्‍याम से मुलाकात हो पायी। ”तुम पर सारे परिवार की उम्‍मीद टिकी है।” वे अपनी धीरगंभीर आवाज में कहने लगे। ”अपने धर्म को पहचानो। तभी सफलता…।”

”बाबूजी,” वह उनकी बात को बेलिहाज काटकर बोला,”जो कुछ भी अभी तक हासिल किया है सब अपनी बदौलत। आगे भी इतना दम रखता हू कि स्‍टेट लेबल पर कोई भी कुर्सी कब्‍जा कर सकॅू। रहा सवाल अच्‍छे-बुरे का तो मैं अपना भला-बुरा समझता हॅू।” उसकी बेधड़क बात और अंदाज ने उन्‍हें विस्‍मय में डाल दिया। यह गरजमन्‍द जयकांत या पेशोपेश में पड़े रविप्रकाश की बात नहीं थी। शहर का स्‍टूडेन्‍ट लीडर सामने था। वह घाट-घाट का जल ग्रहण करके सबका स्‍वाद रख रहा था। सभी का पानी नाप रहा था। उसके लिए पीछे छूटा समय एक बेमतलब का अतीत था जिसे धूल की तरह झटकना उसे आता था।

आगे दोनों में से किसी ने कुछ नहीं कहा। शायद त्रिपुरारी जी कहने की स्थिति में नहीं रहे। उन्‍हें पदच्‍युत किया गया था। उनके दीर्घ अनुभव को न केवल खारिज करने की हठधर्मिता दिखायी थी वरन् बाप-बेटे के अविच्छिन्‍नता के अन्‍योन्‍याश्रित सूत्र को भी बड़ी अभद्रता से नकारा गया था। घनश्‍याम ने कुछ कहा तो नहीं लेकिन वह आगे कुछ सुनना पसंद नहीं करेगा ऐसा अपने पुरजोर अंदाज से आभास दे दिया था। तुम मेरे पिता मात्र होने के कारण भाग्‍य-विधाता के आसन पर मत विराजो। क्‍या हो गया त्रिपुरारी जी की भाव-समृद्ध पंक्तियों को जो विज्ञ तथा अविज्ञ दोनों को समान रुप से विमुग्‍ध कर देती थी।  

कुर्सी पर वे कब तक थकेहाल गिरे रहे यह स्‍वयं मालूम नहीं था। किसी की पदचाप से भी तन्‍द्रा भंग नहीं हुई। ”चाचाजी नमस्‍कार।” आवाज जानी पहचानी थी। सामने जयकांत खड़ा था। हाथ में एक डिब्‍बा था। ”मुझे नौकरी मिल गयी है। बाबूजी ने कहा कि सबसे पहले अपने चाचाजी को मिठाई खिलाना। वे कुटुम्‍ब में सबसे बड़े हैं।” उनके चेहरे पर अनायास कहीं से मुस्‍कराहट की चन्‍द किरणें आ गयीं। ”अरे अच्‍छी खबर सुनाई भाई! कहॉ पर… ?” 

”बस इंटर कॉलेज में पढ़ाने का काम है। शुरु में टेम्‍पोरेरी रहूगॉ। कहते हैं कि बाद में परमानेंट कर देंगे।” वह उल्‍लास के साथ-साथ भविष्‍य की अनिश्चितता व आशा दोनों से युक्‍त था। ”नहीं…नहीं। बड़ा अच्‍छा है।” वे अपनी लय में बोलने लगे। ”आजकल कहॉ किसी को इज्‍जत की नौकरी ऐसे मिलती है।” जयकांत के बढ़े हाथों से उन्‍होंने डिब्‍बे से एक लड़डू लिया। ”जाओ अपनी चाची को भी सुना दो। घर के संस्‍कार धन-दौलत से ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण होते हैं।…हॉ..।” जयकांत उनके कथन का संदर्भ नहीं समझ पाया। ”बस चाचाजी अभी जाता हॅू।” कहकर चला गया। वे अकेले रह गए। अपने आज तक के किए-धरे पर चिन्‍तन-मनन करने के लिए। जिस अग्निकुण्‍ड की अटूट आस्‍था से वे बारम्‍बार प्रदक्षिणा कर रहे थे वह भग्‍न हो गयी थी। ऑंखों में फॅसी ऑंसू की बूद टपकने की बजाए आकाश की सुदूरियों में टॅगे तारक की भॉति चमक रही थी। इस बार सब कुछ असली था। कुछ भी बनावटी नहीं।  

- मनीष कुमार सिंह

जन्‍म 16 अगस्‍त को पटना के निकट खगौल (बिहार) में हुआ। प्राइमरी के बाद की शिक्षा इलाहाबाद में।

मेरा एक परिचय यह है कि मैं भारत सरकार, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय में प्रथम श्रेणी अधिकारी हॅू। परंतु यह परिचय अधूरा रहेगा यदि यह न बताया जाए कि हर मुमकिन समय में अपना ध्‍यान साहित्यिक पत्रिकाओं और पुस्‍तकों को पढ़ने में लगाता हॅू।  दुनिया-समाज का हाल देखना और उन पर कलम चलाए बिना कोई भी दिन पूरा नहीं होता है। विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं यथा-हंस,कथादेश,समकालीन भारतीय साहित्‍य,साक्षात्‍कार,पाखी,दैनिक भास्‍कर, नयी दुनिया, नवनीत, शुभ तारिका, अक्षरपर्व,लमही, कथाक्रम, परिकथा, शब्‍दयोग, ‍इत्‍यादि में कहानियॉ प्रकाशित। पॉच कहानी-संग्रह ‘आखिरकार’(2009),’धर्मसंकट’(2009), ‘अतीतजीवी’(2011), ‘वामन अवतार’(2013) और ‘आत्‍मविश्‍वास’ (2014) प्रकाशित।

 

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