चाहत

“तेरी एक झलक पाने को मेरी सुबह हुआ करती थी,
तेरी साथ की उम्मीदों में मेरी शाम ढला करती थी।
तेरी खुशबू के एहसास से मेरा दिन कट जाता था ,
तेरे आलिंगन के सपनों में मेरी रात गुजर जाती थी।

जो बातें मैंने होठों से कही थी वो तो तुमने सुन लिया,
उन बातों का क्या जो मैंने आँखों से कही थी ?
मेरा दिल आँखों से झाँक रहा था,
तेरे दिल का रास्ता ढूंढ़ रहा था।
तेरी आँखों में वो नमी नहीं थी
ये देख के मेरी आँखे नम थीं।
एक बार जो झाकते तुम मेरी आँखों में,
एक प्यार का सागर दीखता तुमको।

तुझको भी क्या दोष दूँ,
दोष तो मेरी किस्मत का है।
किस्मत को भी कैसे कोसूँ ,
इसने ही तुमसे मिलवाया है ,
इसने ही वो आँखे दी है,
जिन्हे खोले या बंद किये, दोनों ही सूरत में तुझे देखता हूँ।

बस इतनी चाहत थी अपनी,
की तुमको जीवन भर चाहें।
इस चाहत से जो दर्द मिला,
उस दर्द को भी चाहा हमने।

तेरी एक झलक पाने को मेरी सुबह हुआ करती थी,
तेरी साथ की उम्मीदों में मेरी शाम ढला करती थी।
तेरी खुशबू के एहसास से मेरा दिन कट जाता था ,
तेरे आलिंगन के सपनों में मेरी रात गुजर जाती थी। “

 

 

- अमित सिंह 

फ्रांस की कंपनी बेईसिप-फ्रंलेब के कुवैत ऑफिस में में सीनियर पेट्रोलियम जियोलॉजिस्ट के पद पे कार्यरत हैं।

हिंदी लेखन में रूचि रहने वाले अमित कुवैत में रहते हुए अपनी भाषा से जुड़े रहने और भारत के बाहर उसके प्रसार में तत्पर हैं।

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