चंद तस्वीर-ए-बुताँ

बड़े लोगों की जीवनी में अन्तर्निहित एक ख़ास विशेषता यह होती है कि भले ही ख़ुद उनका अपना समय कितना भी कष्टप्रद रहा हो, पर वे आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए बाद में कुछ अच्छा ज़रूर छोड़ जाते हैं। नतीजतन, आम क़िस्म के लेखक उनकी जीवनियाँ छाप छाप कर, चिन्तक लोग बाद में उनके और उनके कृतित्व का चिंतन कर कर के और समीक्षक लोग उनके काम की अपने ढंग से समीक्षा कर कर के अच्छा ख़ासा कमा डालते हैं। बाक़ी लोग जो बचे, सो वे उनकी जीवनी से ताज़िंदगी प्रेरणा प्राप्त करने का भला काम करते रहते हैं। वे उम्र भर थोड़ी सी शोहरत के लिए तरस जाते हैं, पर वह उनसे चार क़दम पीछे ही रहती है। यहूदी चैक लेखक काफ़्का, जो जर्मन भाषा में अस्तित्ववादी लेखन और लघुकथाओं के उत्कृष्ट लेखक के रूप में प्रसिद्ध हैं, बेचारे जीते जी गुमनामी के अंधेरे में अपने दिन गुज़ारते रहे। उनके इस दुनिया से चले जाने के बाद जब लोगों ने उनकी पांडुलिपियाँ और पत्र ट्रंक से निकाल कर पढ़े, तो उनकी ख्याति अचानक ही आसमानी बुलंदियां छूने लगीं और अब आलम यह है कि चैक रिपब्लिक के प्राग शहर में एक पूरा म्यूज़ियम उनके जीवन और कृतित्व को समर्पित है!

कविता का क्षेत्र ही ले लीजिये। जॉन कीट्स को अंग्रेजी रोमांटिक कविता के धरोहरों में एक माना जा सकता है, पर अपने जीवनकाल के दौरान उनकी कविताओं को बमुश्किल बहुत थोड़ी सी प्रशंसा ही मिली। वह भी मुख्यतः कवि शैली की बदौलत, जिन्होंने उनकी कृतियों की शैली और संवेदनशीलता के लिए उनका काम सराहा। पर यह सब भी हुआ 25 वर्ष की अल्पायु में ही उनकी मौत के बाद।

19वीं सदी के महान चित्रकार बेचारे विन्सेंट वॉन गॉग ने जब मिर्गी से पीड़ित होने के बाद डिप्रेशन की अवस्था में 1890 में अंतिम सांस लेने का दृढ़ और अपरिवर्तनीय निर्णय लिया, तब तक उनकी केवल एक पेंटिंग ही बिकी थी, वह भी क़रीब सौ डॉलर के आसपास। उनके निधन के बाद ट्रंक से उनके बनाए लगभग 2000 चित्र मिले, जो आज अत्यंत मूल्यवान हैं। पर ग़ौर करने वाली बात यह है कि उनकी कलात्मक प्रतिभा और विलक्षण कार्य को उनके इहलोक से प्रस्थान कर जाने के 20 वर्ष बाद ही लोकप्रियता और मान्यता प्राप्त हुई।

इस तरह साहित्य और कलाकृतियों में इस मायने में समानता स्थापित हुई कि जिस तरह चित्रकार लोगों के मरने के बाद उनके ट्रंक से निकले चित्र प्रसिद्ध हुए और करोड़ों में बिके, वैसे ही साहित्यकारों के मरने के बाद ट्रंक से निकला उनका रचा हुआ साहित्य प्रसिद्ध हुआ और अच्छा चल निकला। यह बयान दोनों क्षेत्रों में रुचि रखने वालों, यानी चित्रकारों और साहित्यकारों के लिए सामान रूप से प्रेरणादायक हो सकता है। अब यह ख़ुद उनके हाथ में है कि वे कब अपना अपना काम प्रसिद्ध करवाना चाहते हैं।

अपनी लेखकीय प्रसिद्धि के ग्राफ़ की धीमी गति देख कर पहले मुझे भी कई बार निराशा होती थी, पर जब से इन प्रसिद्ध लेखकों की जीवनी पढ़ी तब से आश्वस्ति हो गयी कि अगर मेरे जीते जी नहीं, तो बाद में तो निश्चित ही यह ग्राफ़ बहुत ऊंचा पहुँच जायेगा। उसी के मद्देनज़र मैं भी कई दिनों से एक पुराना ट्रंक ख़रीदने की फ़िराक़ में था, जिसमें अपनी पांडुलिपियाँ रख सकूं जो मेरे बाद खोलने पर प्रकाश में आएँगी और कम से कम तब तो उनका महत्त्व हो ही जायगा। मुझे यह सूचित करते हुए हर्ष होरहा है कि अब वह ट्रंक आगया है। इस दिशा में आगे बढ़ते हुए अब मैं शीघ्र ही लिख लिख कर अपनी पांडुलिपियाँ उस ट्रंक में डालनी शुरू करने वाला हूँ। फ़िलहाल तब तक मेरा यह लिखा सिर्फ़ बतौर सनद महफ़ूज़ रहे और वक़्त ज़रूरत काम आये।

मेरे एक परिचित बुज़ुर्ग लेखक हैं। वे भी कई वर्षों से अपनी पांडुलिपियाँ लिख लिख कर अपने ट्रंक में डाल लेते हैं, छपवाते नहीं। ऊपरी तौर पर उनका कहना तो यह है कि अगर कोई उनकी पांडुलिपियाँ देख लेगा या अगर वे छप जाएँगी तो उनका शोध चुराया जा सकता है। लेकिन मेरे हिसाब से वे ऐसा इस अंदरूनी सद्विचार और आशा से करते होंगे कि शायद उन पांडुलिपियों को देखने के बाद कम से कम उनके इहलोक से पदार्पण कर लेने के बाद तो उनको मनचाही प्रसिद्धि मिल जाय (या शायद तब उनको उतनी गालियाँ नहीं पड़ें जितनी उनके जीते जी छपवाने या किसी को दिखाने पर पड़ सकती हैं)। एक बार मेरे बहुत आग्रह करने के बाद बड़ी मुश्किल से उन्होंने ट्रंक से निकाल कर मुझे अपना एक पुराना ‘शोधलेख’ दिखाया था। उसको पढ़ने के बाद मैं काफ़ी प्रभावित हुआ था। मुझे लगा, उसकी जीवाश्मनुमा सामग्री पुरातत्व विभाग वालों या इतिहासज्ञों के लिए सचमुच बहुत उपयोगी साबित हो सकती थी, क्योंकि उस विषय पर बहुत आगे तक शोध हो चुका था जिसका उन्हें भान ही नहीं था। खैर। वैसे आजकल उनकी तबियत कुछ नासाज़ सी रहती है, और मुझे लगता है, ईश्वर ने चाहा तो शायद जल्दी ही उनको प्रसिद्धि मिल सकती है।

वैसे ऐसा नहीं है कि हर लेखक को प्रसिद्धि एक नियम की तरह हमेशा उसके फ़ौत होजाने के बाद ही मिले। कुछ लेखक अपने जीवन काल में ही काफ़ी सफल होजाते हैं और उनकी पुस्तकें चल निकलती हैं। ऐसा क्यों और कैसे होता है, यह भी एक अच्छा शोध का विषय है। इस पर कुछ अनुसन्धान के बाद जब रहस्य से पर्दा उठा, तो कुछ ‘परा’ क़िस्म का या ‘भुतहा’ सा नतीजा निकला। दरअसल जिन पुस्तकों ने अपार धन और ख्याति अर्जित की, वे ज़्यादातर ‘भूत लेखक’ या ‘गोस्ट राइटर’ द्वारा लिखी गई थीं।

एलेक्ज़ेन्डर ड्युमास का ‘द थ्री मस्केटियर्स’ और ‘द काउंट ऑफ़ मोन्टे क्रिस्टो’ किसी ‘भूत’ ने लिखी थीं। माइकल क्रिक्टन की ‘लेटीट्यूड’ भी जो उनके मरणोपरांत पूरी हुई, गोस्ट राइटर का कमाल है। कहते हैं, इयान फ़्लेमिंग की जेम्स बॉन्ड सीरीज़ तो पूरी तरह किसी और की ही लिखी हुई है। वैसे साधारण आदमी को यह समझने में दिक्क़त हो सकती है कि सीरीज़ की एकाध किताब तो ठीक है, पर अगर पूरी सीरीज़ ही लिखनी थी तो वह ‘किसी और’ जो कोई भी था, अपने नाम से ही लिख सकता था। पर खैर, हो सकता है प्रकाशक के लिए ‘इयान फ़्लेमिंग’ नाम में कुछ जादू था, जो बाद में सिद्ध हो भी गया!

इस शोध से हालिया ‘बड़े बड़े’ लोगों की प्रसिद्ध क़िताबों पर से भी धुन्ध की परत कुछ कुछ उठती नज़र आई। अब देखिये, ईमानदारी से कहें तो हिलेरी क्लिंटन की क़िताब ‘लिविंग हिस्ट्री’ का श्रेय उनको ख़ुद को नहीं, बल्कि मरियान वोलर्स को जाना चाहिए, सारा पॉलिन की ‘गोइंग रोग’ का लिन विन्सेंट को, रिचर्ड ब्रॉन्सन की ‘लूज़िंग माई वर्जिनिटी’ का एडवर्ड व्हिटली को और डोनाल्ड ट्रंप की ‘द आर्ट ऑफ़ द डील’ का टोनी श्वार्ट्ज़ को। अमरीका के भू.पू. राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन की आत्मकथा ‘अॅन अमेरिकन लाइफ़’ भी किसी ‘भूत’ का ही कारनामा निकला।

हालाँकि कुछ लोग नहीं मानते, पर सुनते हैं शेक्सपियर ने भी अपनी प्रतिभा, प्रसिद्धि, और नाम को बरक़रार रखने के लिए कभी भी ख़ुद लिखने का लालच नहीं किया। अगर वे ऐसा करते, तो कह नहीं सकते हश्र क्या होता। देखा जाय तो शुरू में मोज़ार्ट ने भी कुछ कम्पोज़र्स के लिए संगीत ‘लिखा’ था, पर बाद में वे ख़ुद के नाम से लिखने के बाद भी नामी होगये, यह बात दीगर है।

मैं अब हर सफल साहित्यकार और हर सफल क़िताब को थोड़े शक़ की निगाह से देखने लगा हूँ। लेकिन एक शुभचिंतक मित्र का कहना है, मेरे शोध को एक सीमा के बाद बंद होजाना चाहिए, वर्ना यही कभी मुक़दमेबाज़ी का सबब बन सकता है, या निशाने पर लिया गया साहित्यकार ‘अपने पर’ उतर सकता है। किसी से दुश्मनी बढ़ने पर मेरी जीवनरेखा पर भी इसका सीधा प्रभाव पड़ने की सम्भावना बन सकती है। इसीलिए मैंने शोध में भारतीय लेखकों को फ़िलहाल छोड़ रखा है।

हाँ, गुप्त रूप से मैं यह कह सकता हूँ कि अगर कोई सफलता की गारंटी दे तो मुझे ख़ुद किसी भुतहा लेखक की तलाश शुरू करने में कोई गुरेज़ नहीं है।

 

- कमलानाथ

साहित्यकार और विज्ञानवेत्ता कमलानाथ की रचना-धर्मिता का दायरा साठ के दशक से हिंदी में व्यंग्य और कहानी लेखन और सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहने से लेकर अंग्रेज़ी में गूढ़ तकनीकी विषयों से होता हुआ भारतीय वैदिक वाङ्मय में जल, पर्यावरण, पारिस्थितिकी आदि पर शोध लेखों तक फैला है। उनके कई लेख विश्वकोशों में संकलित हैं। अंग्रेज़ी भाषा में अपने व्यावसायिक क्षेत्र में तकनीकी पुस्तकों और विपुल लेखन के अतिरिक्त उनके प्रकाशनों में हिंदी में प्रकाशित व्यंग्य संग्रह “साहित्य का ध्वनि-तत्त्व उर्फ़ साहित्यिक बिग बैंग”, “मूरख तो एकहि भलो”, “एक शाम हरी घास पर”, कहानी संग्रह “भौंर्या मो” और कथोपन्यास “लापता चेहरों का भूगोल” प्रमुख हैं। व्यंग्य संग्रह “साहित्य का ध्वनि-तत्त्व उर्फ़ साहित्यिक बिग बैंग” के लिए उन्हें राजस्थान साहित्य अकादमी के “कन्हैयालाल सहल पुरस्कार” 2018-19 से सम्मानित किया गया है।

कमलानाथ जल-विज्ञान, जल-विद्युत अभियांत्रिकी आदि के विशेषज्ञ हैं तथा आपने प्रतिष्ठित भारतीय तथा अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों में उच्च पदों पर कार्य किया है। वे कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय, डेविस (अमरीका) में 1976-77 में फ़ोर्ड फ़ाउन्डेशन फ़ैलो रह चुके हैं। विश्व खाद्य सुरक्षा और जलविज्ञान में उनके योगदान के लिए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय सम्मान भी मिले हैं। विश्व के लगभग सभी देशों की यात्रा के दौरान उन्होंने अनेक सम्मेलनों में व्याख्यान दिए हैं तथा संयुक्त राष्ट्र संघ सहित अनेक वैश्विक संस्थाओं से संबद्ध रहे हैं। सम्प्रति ये ‘एक्वाविज़्डम’ नामक संस्था के चेयरमैन हैं।

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