घर मेरा चहकाओ गोरैया

 

हुर्इ भोर तुम आ जाओ गोरैया
कानों में रस घोल जाओ गोरैया
अब तुम कभी कहीं न जाओ
घर मेरा चहकाओ गोरैया।

तुम हो इक छोटी -सी चिडि़या
पर हो नील गगन की गुडि़या
तितली-सी चंचलता तुझमें
भंवरों का गुंजन है तुम में,
मधुर तान में तुम भी गाओ
घर मेरा गुनगुनाओ गोरैया।

हरे-भरे पेड़ हैं तुमको भाते
पतझड़ तुमको भी हैं रूलाते,
फूलों को तुम करती प्यार
न्यौछावर करतीं अपना दुलार,
मेरे घर का कोना अपनाओ
घर मेरा सजाओ गोरैया।

 

- कीर्ति श्रीवास्तव

जन्म :- 06 जुलार्इ, भोपाल (म.प्र.)

शिक्षा :- एम.काम., डी.सी.पी.ए.

लेखन विधाएं :- कहानी कविता गजल आलेख बाल साहित्य 

प्रकाशन :- राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय प्रतिषिठत पत्र- पत्रिकाओं में कविता, गजल,गीत, कहानी , आलेख एवं बाल साहित्य प्रकाशित।

प्रसारण :- अकाषवाणी , भोपाल 

पुरस्कार और सम्मान:- अनेक राष्ट्रीय एवं प्रादेषिक सम्मान

संप्रति :- सम्पादक साहित्य समीर दस्तक (मासिक पत्रिका) संचालक विभोर ग्राफिक्स एवं प्रकाशन
सह संपादक राष्ट्र समर्पण (मासिक अखबार, नीमच)

अन्य :- भोपाल से प्रकाशित शिक्षा और साहित्य से जुड़े साप्ताहिक हिन्दी अखबार प्रेसमेन में 8 वर्ष तक प्रबंध संपादक। अनेक कार्यक्रमों में पत्र-वाचन

प्रकाषनाधीन :- बाल कविता संग्रह 
मेहनत का फल होता मीठा
गीतिका संग्रह मन की बात

स्थायी पता:-  कोलार रोड, भेपाल

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