घबराओ मत ऐनी

बाहर बॉलकनी में बैठी ऐनी एक के बाद एक सिगरेट सुलगाती जा रही थी। उसकी घबराहट से मैं वाकिफ थी। जानती थी जब भी उसे नई नौकरी पर या फिर नई जगह जाना होता है या फिर नए लोगों से मिलना होता है वह घबराहट से भर जाती है। और इसी तरह घर के किसी कोने में बैठ कर या फिर कॉफी हॉउस में जाकर वह खूब सिगरेट पीती है। धुंए के बीच से भी उसके चहरे की घबराहटें साफ़ देखी जा सकती थीं।

मैंने उसके कंधे दबा कर उसे आश्वस्त किया और अपने सीने से लगाते हुए प्यार से समझाया। “एन तुम इस नौकरी के लिए चुन ली गई हो। अब कोई इंटरव्यू नहीं देना है। जाकर ज्वाइन करना है, बस …….इसमें इतना घबराने जैसा क्या है? धीरे -धीरे तुम उस माहौल में ठीक मासूस करने लगोगी।”

“लरिसा मेरी दोस्त तुम मेरी घबराहटों को नहीं समझ पाओगी। तुम नहीं जानती हो क्यों हर नया काम और नए लोग मुझे कुछ वक्त तक भयभीत किए रहते है और घबराहटें दते है?” उसने रूआँसी होकर मेरी तरफ देखा और अपने मासूम से गुलाबी चेहरे पर छलके पसीने को टिश्यू से पोंछा और नई सिगरेट जला ली। कहते हैं न बचपन की ग्रंथियां आसानी से खुल नहीं पाती। उसका बचपन भी टूटे हुए आत्मविश्वास और घबराहटों से भरा हुआ था। उसने जैसा देखा और जो उसके साथ गुजरा। उससे उसे सिर्फ यही सब मिल सका था। हम दोनों पिछले दो वर्षों से दोस्त थे। एक ही कंपनी के लिए काम करते थे। उसने अपने बचपने के कुछ हिस्से मुझे टुकड़ों में बताए थे।

उसने अपनी माँ और पिता को कभी प्रेम से रहते नहीं देखा था। बचपन में जब से उसने होश सम्भाला तभी से उसने उन्हें झगड़ते हुए और अबोल होते हुए ही देखा। उसके पिता एक चुस्त, फुर्तीले, मिलनसार, खूब मेहनत मशक्कत करने वाले इंसान थे। माँ उतनी ही धीर-गम्भीर, धीमी गति से ज़िंदगी जीने वाली और बहुत कम बोलने वाली महिला थीं। उन्होंने अपनी ज़िंदगी को केवल मुस्कुराने तक ही सीमित कर रखा था। वह शायद ही कभी जोर से हंसी हो। माँ सुन्दर थी। गुलाबी आभा लिए सौम्य महिला।

एन गुजरे जीवन के कुछ हिस्से फिर बताने लगी। तनाव की वजह से माँ को अक्सर सिर दर्द बना रहता था। जिसके रहते वह सुबह जल्दि नहीं उठ पाती थी। इसलिए समय पर चाय -नाश्ता मिलने की संभावनाएं कम ही होतीं थीं। ऐसा भी नहीं होता था कि वह अपनी खुशनुमा बातों और हंसी से घर को आबाद रखती हो। माँ के भीतर कहीं कुछ था जो उन्हें खुशहाल जीवन नहीं जीने देता था। पिता उनकी इन्हीं बातों से दुखी होते थे। अक्सर उन्हें उस अव्यवस्थित घर -परिवार के लिए जिम्मेदार ठहराते थे और ‘क्या मनहूसियत फैला रखी है?’ कहते हुए उन पर हाथ भी उठा दिया करते थे। वह तब भी बिना किसी प्रतिवाद के चुप रह कर बेआवाज रोती थी और कुछ नहीं कहती थी। शायद उन्होंने मान लिया था कि रोना ही उनकी नियति है। रोती हुई माँ से उसे बेहद हमदर्दी थी।

ऐनी तब बारह वर्ष की थी। उसे माँ का ये ढीलापन पसंद नहीं आता था। वह माँ से कहती थी। “तुम जैसा पिता कहते हैं वैसा ही क्यों नहीं करती हो? क्यों उन्हें गुस्सा दिलवा देती हो?”

दोनों के रोज़ की लड़ाई -झगड़ों से घर, घर जैसा नहीं लगता था। घबरा कर कई बार उसका छोटा भाई शाशा और वह रोने लगते थे। सुबह जल्दी उठ कर शाशा और वह स्कूल जाने की तैयारी करने लगते थे। पिता तब बागवानी करते अपने द्वारा उगाए सब्जियों और फलों की देखभाल करते। वह सब के लिए कॉफी बनाती, सैंडविच देती। सभी मिल कर नाश्ता करते। पिता फिर से बगीचे में चले जाते और माँ कॉफी पीकर थोडा स्वस्थ महसूस करती और घर के अन्य कामों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार करने लगती थी। उनकी मानसिक कमजोरी ही उन्हें शारीरिक रूप से भी कमजोर बनाती थीं। ऐसा लगता था मानो उनके पास जीने की कोई वाज़िब वजह नहीं है। शाशा और वह फिर एक ही सायकिल पर स्कूल चले जाते थे।

एन ने कई बार उनकी बहिनों को बातें करते हुए सुना था। वे दोनों उन्हें समझाती हुईं कहती थीं। “वेरॉनिका तुम हिम्मत से काम लो। अपने बच्चों की तरफ ध्यान दो और उनके लिए जियो। इस तरह दुखी रह कर मन और इच्छाओं को मारते रहने से तुम जल्द ही बीमार हो जाओगी। फिर तुम्हारे बच्चों का क्या होगा?”

“माँ इतने बेमेल होते हुए भी तुम्हारी और पिता की शादी कैसे हो गई?” एक बार उसने माँ से पूछ था। तब उदास होकर माँ ने उसे बताया था कि वह गरीब घर में जन्मी तीन बहिनों में सबसे छोटी थी। उसके पिता उनकी खूबसूरती पर फ़िदा हो गए थे। तब चर्च में येशु के सामने सिर्फ अंगूठी बदल कर उन्होंने माँ को अपना लिया था। माँ के पास खास दो गुण थे जिनकी वजह से लोग उन्हें पसंद करते थे। उनकी अपार गुलाबी सुंदरता और कभी गुस्सा न करते हुए, शांत भाव और धैर्य से सब के साथ प्रेम से बोलना और उनकी यथासम्भव मदद करना।

एन नम आँखों से लरीसा की तरफ देख कर बोली। “जानती हो लैरी जब में छोटी थी न मुझे माँ से हमदर्दी होती थी परन्तु तब कई बार वह मुझे अच्छी नहीं लगती थी। सारे घर के काम जो उन्हें करने चाहिए थे वो सब मुझे करने पड़ते थे। वह शायद बीमार रहती थीं, परन्तु केवल मानसिक बीमारी। क्योंकि मैंने उन्हें डॉक्टर के पास जाते और दवाइयाँ खाते विरले ही देखा। कमजोरी और दुःख की वजह से वे सोती ज्यादा थी। जीने का उनमें कोई उत्साह नहीं था। पिता की डांट और मार का डर मुझे हमेशा भयमारा सा बनाये रखता था। इसलिए मैं सब काम करती थी।”

पिता अक्सर सबसे पहले उठ जाया करते थे। अपने बगीजे के अलावा घर -बाहर का जो भी काम उनसे बन पड़ता था वह करते थे। जब वह फैक्ट्री चले जाते और वे दोनों स्कूल तब माँ उठकर धीरे -धीर अपना घर -गृहस्थी का काम शुरू करती थी। काम से थक कर फिर देर शाम तक लेटी रहती थी। पिता जब शाम को घर आते तब बेवजह इस तरह माँ के सोए रहने पर खूब गुस्सा करते। शराब पीकर उन्हें अपना घर -परिवार खराब करने के एवज में गालियाँ देते। मार खाना तो जैसे माँ का रोज़ का तय था। माँ देर रात तक सुबकती और दर्द से कराहती रहती थी।

जब वह स्कूल से घर आकर देखती कि थोड़ा बहुत काम निबटा कर माँ लेटी हुई है। उन्हें सर दर्द की दवाई देकर फिर वह दिन के बर्तन साफ़ करती, धुले कपड़ों को मशीन से निकाल कर उनकी नमी निकलने के लिए बाहर स्टेण्ड पर सुखाने डालती। शाशा को खाना देना और शाम की कॉफी तैयार करना, सभी काम उसे ही करने होते थे। कभी जब माँ ठीक महसूस करती थीं तब शाम के खाने की तैयारी वे करती थीं अन्यथा वह भी उसे ही देखना पड़ता था। शाशा उससे दो वर्ष छोटा था इसलिए शाम के खाने के लिए बगीचे से आलू और बीन्स लाता, गोश्त साफ़ करता और पोल्ट्री से अंडे उठा कर भीतर स्टोर में रखता।

नया साल आए या क्रिसमस माँ उसी तरह ऊर्जाविहीन होकर केक, पुडिंग, कस्टर्ड और गोश्त आदि बनाती थी। उस दिन वे दोनों भाई -बहिन पिता के साथ मिलकर सारा घर सजाते थे। मोमबत्तियों से सारा घर जगमगाता और फूलों से पूरा घर महकता। आँगन में बड़ा सा क्रिसमस ट्री सजाते और प्रसन्नता से इधर -उधर दौड़ते भागते रहते थे। कार्निश पर रखे ग्रामोफोन पर क्रिसमस कैरोल की मधुर ध्वनियाँ बजती रहतीं थीं। इस एक दिन उसे अपना घर बहुत अच्छा लगता था। खूब रौनकें होती थी। उस दिन कोई झगड़ता भी नहीं करता था। तब वह सोचती थी ‘प्रभु येशु हमारे घर में रोज़ ऐसा ही क्यों नही करते?’

इसी बीच लारिसा कॉफी और डोनट्स उठा लाती है। दोनों कुछ देर तक चुपचाप कॉफी पीते और डोनट्स खाने लगते। कुछ देर तक बाहर होती रिमझिम फुहारों को देखते रहे। ऐनी फिर एक घटना याद करके सुबक उठी, और बोली।

उस बार क्रिसमस के दिन सुबह से ही बर्फ गिरनी शुरू हो गई थी। लोगों में क्रिसमस का उत्साह दोगुना हो गया था। माँ की दोनों बहिने और उनके बच्चे आ चुके थे। सवेरे दिन शुरू होने से पहले ही माँ की बहिने और पिता की तरफ के भी कुछ रिश्तेदार आ गए थे। उपहार और दुआओं का आदान -प्रदान हुआ। खाना -पीना, डांस और हँसी कहकहो से पूरा घर आबाद रहा। माँ भी सबसे गले मिलती हुई खाना, वाइन और कॉफी सर्व करती रही। वह थोडा बहुत मुस्कुरा रही थी परन्तु रह -रह कर काले बादल सी उदासी उनके चेहरे पर आती -जाती रहती थी। घर में उत्साह था और खुशियाँ बिखरी हुई थी। हम सभी बच्चे गर्म नए कपडे, कोट, स्कार्फ़, दस्ताने और बूट पहन कर बाहर बर्फ में खेल रहे थे। कुछ ही घंटों में बर्फ से लॉन सफ़ेद हो गया था। सभी बच्चे उस बर्फ के कालीन पर लोट लगाते हुए हँस -खिलखिला रहे थे। बहुत बर्फ इकठ्ठा हो जाने पर सब ने मिलकर एक बड़ा सा स्नोमैन भी बनाया। उसे फिर अलग -अलग रंगों से रंगा था। हमने अपने कारनामे दिखाने के लिए भीतर जाकर माँ और मासियों को आवाज दी और बहुत खुश हो कर उनसे अपना स्नो -मैन देखने के लिए कहा।

अपनी बातचीत को बीच में छोड़ कर कोई नहीं आया। हम सब मायूस हो गए थे। थोड़ी देर में एमिला माॅसी बाहर आईं और प्यार से सबको डाँटती हुई हमे भीतर ले गईं। “चलो बच्चों अब बहुत हुड़दंग हो गया है। ठण्ड भी बढ़ चली है। चलो सब भीतर चलकर गर्म चॉकलेट पियो और अलाव सेको। ठण्ड भीतर शरीर में बस गई तो ठीक नहीं रहेगा।”

हम सभी अंदर चल कर खाने -पीने में लग गए। उसी दिन मैंने उन्हें माँ को समझाते हुए फिर से सुना था। वे कह रहीं थीं। “देखो वेरॉनिका अब तुम्हें अपना और अपने बच्चों का ध्यान रखना चाहिए। यदि जॉन कुछ गलत कर रहा है तो उसकी सजा खुद को और बच्चों को क्यों दे रही हो?”

मुझे समझ नहीं आ रहा था आखिर माँ को ऐसा कौन सा बड़ा दुःख है जो वह कभी खुश नहीं दिखती थीं। हमारे पिता क्या गलत कर रहे थे? परेशान रहती वह हमारा ध्यान भी ठीक से नहीं रख पाती थी। उस दिन माँ ने एमिला और दानिका मॉसी दोनों का हाथ थामा और नम आँखे करते हुई उनसे कहा था। “एमी और दानिका तुम दोनों के अलावा दुनिया में मेरा और कोई नहीं है। इसलिए ऐनी को तुम्हारे सहारे छोड़ कर मुझे जाना होगा। अब जॉन उसे इस घर में ले आना चाहता है। मुझे खुशी है कि ऐनी एक समझदार बच्ची है। अब उसका ध्यान तुम दोनों को ही रखना होगा।”

माँ और उनकी बहिने आपस में गले लग कर बिलख कर रो पडी थी। अपनी बहिनो से वह क्या कहना चाहती थी, और मेरा ध्यान अब वे क्यों रखेंगी? मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। मुझे माँ को रोते देख कर अच्छा नहीं लगता था। इसलिए मैं बाहर अपने अन्य भाई -बहिनों के पास आ गई। माँ और दोनों मासियाँ देर तक रसोई में बैठी वाइन और कॉफी पीती रहीं और बातें करती रहीं। बीच – बीच में वे दुखी होती टिश्यू से अपनी आँखें और नाक साफ़ कर लेती थीं। मैं सोचती थी ‘आखिर ये औरतें इतना क्यों रोती रहतीं हैं? अभी पिता ने इनसे कुछ नहीं कहा है। ये हम बच्चों की तरह खुश होकर उछल -कूद क्यों नहीं करती?’ दोपहर में पिता अपने दो मित्रों और रोमी ऑन्टी के साथ आए। रोमी ऑन्टी ही एकमात्र महिला थीं जिनसे मेरे पिता थोड़ा डरते थे। पिता ने माँ को घुड़कते हुए कहा। “ऑन्टी से कुछ कहा तो ठीक नहीं होगा।”

माँ ने सबको गले लगा कर क्रिसमस की शुभकामनाएँ दीं और कुकीज़, कॉफी वगैरह से उनका स्वागत किया। रोमी ऑन्टी मेरी माँ को बहुत प्यार करती थीं। उन्होंने माँ के सिर पर हाथ रख कर उन्हें सहलाते हुए पूछा। “वेरॉनिका माय डिअर। क्या हुआ? तुम इतनी कमजोर कैसे हो गई हो? आर यु ओके माय चाइल्ड? लगता है इस नालायक ने तुम्हे ठीक से नहीं रखा?” माँ अपनी बहिनों और पिता का मुँह देख कर चुप ही रही। कुछ देर बाद दोनों मसियों ने सभी से क्रिसमस की दुआओं का आदान -प्रदान किया। माँ को गले लगाया और हम बच्चों को पुचकारती हुई चली गईं। शाम तक सभी लोग विदा हो गए और हँसी – खुशी वो दिन बीत गया था।

फिर उसे वह मनहूस रात याद आई जब वह नवीं कक्षा में पढ़ती थी और शाशा छठी में। उस रात माँ को बुरी तरह पीटने के बाद जब पिता नशे में धुत्त होकर सो गए थे। माँ मेरे पास आई और स्नेह से मेरे माथे को सहलाने लगी। मैंने असमंजस में माँ की तरफ देखा। उनकी आँखों में दर्द और चेहरे पर विषाद छाया हुआ था। वह मेरे माथे को चूमती हुई बोली। “ऐन तुम एक बहुत प्यारी लड़की हो, और अब समझदार भी हो गई हो। इसलिए तुम मेरी बात ध्यान से सुनो। तुम अपना ख़याल रखना और खूब मन लगा कर पढ़ना।”

अपने कमजोर और पीले पड़ चुके शरीर पर पिता की यातना के नीले धब्बे दिखाती हुई फिर बोली। “मेरी बच्ची मैं ये सब तुम्हें कभी बताना नहीं चाहती थी। इसको समझने के लिए अभी तुम बहुत छोटी हो। तुम्हारे पिता ने मुझे कभी प्यार नहीं किया। वह अन्य औरत के लिए मुझे अपमानित करते हैं और मारते हैं। अब ये घर हमेशा के लिए छोड़ कर मुझे यहाँ से जाना होगा। शाशा अभी बहुत छोटा है। मेरे सहारे के बगैर जी नहीं सकेगा। इसलिए उसे अपने साथ ले जा रही हूँ। तुम अपना ध्यान रखना। जल्द ही रहने -खाने का बंदोबस्त करके फिर मैं तुम्हें लेने आ जाउंगी।” उस रात माँ, शाशा और वह गले लग कर खूब देर रोते रहे। फिर माँ चली गई और वह इस दुनिया में अनाथ होकर अकेली रह गई थी।

“लैरी उस दिन से घबराहट मेरी ज़िंदगी का हिस्सा बन गई। मैं हमेशा डरी और घबराई हुई रहने लगी थी। मैं नहीं जानती थी मुझे कैसे जीना है? क्या करना है? मुझे अपने चारों तरफ अन्धेरा दिखने लगा था। अक्सर मैं घबरा कर रो पड़ती थी। पिता की मार का डर भी बराबर बना रहता था। परेशान होने पर मैं अपना सिर कहाँ छुपाती? मेरे आँसू कौन देखता?”

“एन तुमने कभी अपने माँ और पिता को समझाने की कोशिश क्यों नहीं की? तुम माँ के साथ जाने की ज़िद कर सकती थीं।”

“हाँ लैरी तब मैं कुछ नहीं कर सकी। तब मुझे बहुत बुरा लगा था कि माँ चाहती तो मुझे भी अपने साथ ले जा सकती थी। परन्तु आज समझ पा रही हूँ। मेरी मात्र दसवीं तक पढ़ी माँ ठीक से घर से बाहर कभी नहीं निकली थी। जिसे शहरी जर्मन भाषा का केवल टूटा -फूटा ज्ञान था। कैसे उन्होंने अपनी लिए काम ढूंढा होगा? उन्होंने कैसे रहने खाने का इंतजाम किया होगा? कैसे भाई को पाला और पढ़ाया होगा? मेरी खूबसूरत माँ के लिए उस चीज़ फैक्ट्री में काम करना क्या आसान रहा होगा?”

परन्तु माँ के सौम्य स्वभाव के रहते वहाँ उनसे सभी प्यार करने लगे थे। उन्हें सम्मान करते थे। कई वर्ष तक वह उसी चीज़ फैक्ट्री में काम करती रहीं थीं। जहाँ बाद में मैंने भी कुछ वर्ष काम किया। जब हम वहाँ से काम छोड़कर दूसरे शहर गए तब सभी ने माँ को रो कर विदा किया था। उनके चले जाने का दुःख सभी को था। वह बेहद नेक इंसान थी। सभी से स्नेह करती थीं और उनके दुख -सुख में बराबर बनी रहतीं थीं। यह सब मुझे वहाँ पर काम करने के बाद ही मालूम हुआ था।

उस रात माँ के घर छोड़ कर चले जाने के बाद से पिता बहुत खुश रहने लगे थे। अब उनका अपनी नई पत्नी को इस घर में लाने का रास्ता साफ़ हो गया था। परन्तु जब से मेरी माँ इस घर से गईं थीं, मैंने भी मन बना लिया था कि जिस दिन मेरे पिता इस घर मैं अपनी नई पत्नी को लाएँगे मैं भी उसी दिन ये घर छोड़ दूँगी। उन्ही की तरह मैं चुस्ती से काम करती थी। उन्हें काम और पढ़ाई किसी भी बात के लिए शिकायत का कोई मौक़ा नहीं देती थी। इसलिए वे मुझे धमकाते नहीं थे।

देखते ही देखते दो वर्ष बीत गए। माँ कई बार गाँव में एमिला मॉसी की पास तक आती थी। मैं स्कूल से सीधे उनसे मिलने वहीं चली जाती थी। वह मुझे खूब प्यार करती और गले लगा कर रोती। विदा लेते समय मुझे उपहार और पैसे दे जाती और जल्द ही मुझे भी अपनी साथ ले जाने की बात कहती। पिता इन सब बातों को नहीं जानते थे। एक दिन पिता मुझसे बोले। “ऐन मेरी प्यारी पुत्री सुनो, तुम्हारी माँ का मैंने लगभग दो वर्ष इन्तजार किया है। परन्तु लगता है अब वह वापस नहीं आएगी। इसलिए अब हम दोनों की देख भाल के लिए मुझे तुम्हारी नई माँ को इस घर में लाना होगा। तुम एक समझदार लड़की हो इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम उनके साथ ठेक से पेश आना। मेरी पुत्री तुम समझ रही हो न मैं क्या कह रहा हूँ?”

उस दिन फिर से मैं घबराहट से भर कर बेहद परेशान हुई थी। सोचने लगी अब आगे क्या होने वाला है? अकेले में बैठ कर फिर मैं खूब देर रोई। जब मन हल्का हो गया तब मैंने उसी दिन माँ के पास जवाब भिजवा दिया था कि अब मैं उन्ही के पास रह कर नौकरी करना कहती हूँ। मैं दसवीं पास हो चुकी थी और मानसिक रूप से मज़बूत भी। पिता की नई पत्नी के साथ रहना मुझे एक दिन को भी मंज़ूर नहीं था।

अगले दिन पिता नई पत्नी को घर ले आए थे। बड़ी -बड़ी स्नेहरहित हैरान सी आँखें, चौड़ी कद -काठी वाली और चटक मेकअप थोपी हुई वह फूहड़ सी घटिया औरत थी। मुझे हिकारत भरी नज़रों से घूरती हुई बोली। “ऐ लड़की ! मैं तुम्हारी नई माँ हूँ। अब तुम्हें मेरी भी सेवा करनी होगी।”

जब मैंने किसी उम्मीद से पिता की तरफ देखा तो उन्होंने कहा। “क्यों नहीं डार्लिंग, ऐन मेरी प्यारी और समझदार बच्ची है। वह तुम्हें नाराज़ नहीं करेगी। और उन्होंने खुश होते हुए उस घटिया औरत को चूम लिया था। मुझे इतना घृणित लगा था ये सब कि उस माहौल से उबकाई सी होने लगी थी। तब मुझे अपनी सौम्य, सीधी माँ की बहुत याद आई थी।

“लरिसा मेरी दोस्त जानती हो उस दिन फिर मैं कितना घबरा रही थी। तकलीफ से भर कर बहुत देर तक रोती रही थी। मुझे एक नई ज़िंदगी जीनी थी। नई औरत के आने के तीसरे ही दिन मेरी माँ मुझे लेने एमिला मॉसी के घर आ गई थी। मैंने एक बैग में अपने कपडे और बचपन की सारी यादगार वस्तुएँ संभाली और हमेशा के लिए पिता का वह घर छोड़ दिया। मुख्य दरवाजे पर लगी डाक पेटी के ताले की चाभी पिता के पास ही रहती थी। डाक हमेशा पिता ही निकाला करते थे इसलिए मैंने उनके नाम एक पत्र लिख कर उसमें डाल दिया।

‘मैं नई ज़िंदगी की तलाश में अपनी माँ और भाई के पास जा रही हूँ। आप अपनी दुनिया में खुश रहना और अपना ध्यान रखना। अभी आप कुछ नहीं समझ पाएंगे परन्तु जब आपकी आँखों से दूसरी औरत की वासना का पर्दा हट जाएगा तब यदि ज़िंदगी आपको तकलीफ दे और आपको हमारी जरुरत पड़े तो मैं अपना पुत्री धर्म जरूर निभाउंगी। परम पिता मेरे इस पिता की रक्षा करे।‘

आपकी प्यारी पुत्री

‘ऐन ‘

 

- रिया शर्मा


जन्म - रानीखेत (उत्तराखंड) अब दिल्ली में स्थायी निवास
शिक्षा - बी एस सी, बी एड, एल एल बी
लेखन - कलरव, दृष्टिपात, आधारशिला, कथाबिंब, मानव समाज कल्याण पत्रिका, जनसत्ता वार्षिक
अंक २०१४, मधुमती, कथादेश, इंद्रप्रस्थ भारती आदि पत्रिकाओं में प्रकाशन
कहानी संग्रह - उम्र से लंबी सड़कें ( २०१५ )
संप्रति - प्रबंधक, स्वतंत्र लेखन
संपर्क - दिल्ली

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