गज़ल – डॉ मनोज श्रीवास्तव ‘मोक्षेंद्र’

१. भीड़ का हिस्सा रहा तब

भीड़ का हिस्सा रहा तब, भीड़ से अब कट गया हूँ
थी बरसने की ललक, पर बादलों-सा छंट गया हूँ

मसअलों से मुब्तिला हूँ कर्ब के कुहसार में
था कभी रफ़्तार में अब काफ़िले से हट गया हूँ

ज़ीस्त के इस आईने में मौत का परताँ लिए
ख़्वाब की गलियों में मैं हत ख़्वाहिशों से पट गया हूँ

कहकेशां में गिर पड़ा था रोशनी की चाह में
बिजलियों का था ज़खीरा बिजलियों से सट गया हूँ

था सियासत में कभी नामी-गिरामी आईकन
धूप में जलता हुआ हिमखंड-सा मैं घट गया हूँ

नागहाँ-सा था फ़िदा ज़न्नत की हूरों पर अरे
नींद से बाहर निकलते ही मैं ख़ुद से जट गया हूँ

२. बाजों की है आवाजाही

गोरैयों के घर में भइया बाजों की है आवाजाही
दुबक रहेंगे तहखाने में नहीं करेंगे हाथापाई

ठंडे ख़ून के रिश्तों में मर-मिटने की बात ही क्या
सिले-होठ चुक जाएंगे सब नहीं करेंगे चाचा-ताई

आंगन धूप ठिठुरती बैठी हवा जम गई छज्जे पर
मन में माड़ जम गया बाबू बाहर फैली काली स्याही

बाहर भीड़ उमड़ती है जो रूह दबोचे जूतों में
उसकी जेबों में साज़िश है क्या कर लेगा तेरा माही

 

- डा मनोज श्रीवास्तव ‘मोक्षेंद्र’

लेखकीय नाम: डॉ. मनोज मोक्षेंद्र  (वर्ष 2014 से इस नाम से लिख रहा हूँ। इसके   पूर्व ‘डॉ. मनोज श्रीवास्तव’ के नाम से लिखता रहा हूँ।)

वास्तविक नाम (जो अभिलेखों में है) : डॉ. मनोज श्रीवास्तव

जन्म-स्थान: वाराणसी, (उ.प्र.)

शिक्षा: जौनपुर, बलिया और वाराणसी से (कतिपय अपरिहार्य कारणों से प्रारम्भिक शिक्षा से वंचित रहे) १) मिडिल हाई स्कूल–जौनपुर से २) हाई स्कूल, इंटर मीडिएट और स्नातक बलिया से ३) स्नातकोत्तर और पीएच.डी. (अंग्रेज़ी साहित्य में) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से; अनुवाद में डिप्लोमा केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो से

पीएच.डी. का विषय: यूजीन ओ’ नील्स प्लेज: अ स्टडी इन दि ओरिएंटल स्ट्रेन

लिखी गईं पुस्तकें: 1-पगडंडियां (काव्य संग्रह), वर्ष 2000; नेशनल पब्लिशिंग हाउस, न.दि.; हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि; 2-अक्ल का फलसफा (व्यंग्य संग्रह), वर्ष 2004; साहित्य प्रकाशन, दिल्ली; 3-अपूर्णा, श्री सुरेंद्र अरोड़ा के संपादन में कहानी का संकलन, 2005; 4- युगकथा, श्री कालीचरण प्रेमी द्वारा संपादित संग्रह में कहानी का संकलन, 2006; चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह), विद्याश्री पब्लिकेशंस, वाराणसी, वर्ष 2010, न.दि.; हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि; 4-धर्मचक्र राजचक्र, (कहानी संग्रह), वर्ष 2008, नमन प्रकाशन, न.दि. ; 5-पगली का इन्कलाब (कहानी संग्रह), वर्ष 2009, पाण्डुलिपि प्रकाशन, न.दि.; 6. प्रेमदंश (कहानी संग्रह) नमन प्रकाशन, 2015; 7-तरल तथ्यों के दौर में (काव्य संग्रह), शीघ्र प्रकाश्य; 8-हिंदी साहित्य निकेतन द्वारा नाटकों का संग्रह प्रकाशनाधीन; 9-मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में राजभाषा (राजभाषा हिंदी पर केंद्रित), शीघ्र प्रकाश्य; 10-दूसरे अंग्रेज़ (उपन्यास), शीघ्र प्रकाश्य

 

–अंग्रेज़ी नाटक  The Ripples of Ganga लंदन के एक प्रतिष्ठित प्रकाशन केंद्र द्वारा प्रकाशनाधीन,

–Poetry Along the Footpath (अंग्रेज़ी कविता संग्रह लंदन के एक प्रतिष्ठित प्रकाशन केंद्र द्वाराप्रकाशनाधीन,

–इन्टरनेट पर ‘कविता कोश‘ में कविताओं और ‘गद्य कोश‘ में कहानियों का प्रकाशन

-महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्याल, वर्धा, गुजरात की वेबसाइट ‘हिंदी समय’ में रचनाओं का संकलन

राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं, तथा वेब पत्रिकाओं में प्रकाशित

सम्मान: ‘भगवतप्रसाद कथा सम्मान–2002′ (प्रथम स्थान); ‘रंग-अभियान रजत जयंती सम्मान–2012′; ब्लिट्ज़ द्वारा कई बार ‘बेस्ट पोएट आफ़ दि वीक’ घोषित; ‘गगन स्वर’ संस्था द्वारा ‘ऋतुराज सम्मान-2014′ राजभाषा संस्थान; कर्नाटक हिंदी संस्था, बेलगाम-कर्णाटक  द्वारा ‘साहित्य-भूषण सम्मान’ से सम्मानित

“नूतन प्रतिबिंब”, राज्य सभा (भारतीय संसद) की पत्रिका के पूर्व संपादक

लोकप्रिय पत्रिका वी-विटनेस” (वाराणसी) के विशेष परामर्शक और दिग्दर्शक

हिंदी चेतना, वागर्थ, वर्तमान साहित्य, समकालीन भारतीय साहित्य, भाषा, व्यंग्य यात्रा, उत्तर प्रदेश, आजकल, साहित्य अमृत, हिमप्रस्थ, लमही, विपाशा, गगनांचल, शोध दिशा, अभिव्यंजना, मुहिम, कथा संसार, कुरुक्षेत्र, नंदन, बाल हंस, समाज कल्याण, दि इंडियन होराइजन्स, साप्ताहिक पॉयनियर, सहित्य समीक्षा, सरिता, मुक्ता, रचना संवाद, डेमिक्रेटिक वर्ल्ड, वी-विटनेस, जाह्नवी, जागृति, रंग अभियान, सहकार संचय, प्राइमरी शिक्षक, साहित्य जनमंच, अनुभूति-अभिव्यक्ति, अपनी माटी, सृजनगाथा, अम्स्टेल-गंगा, ब्लिट्ज़, राष्ट्रीय सहारा, आज, जनसत्ता, अमर उजाला, हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, दैनिक भास्कर, कुबेर टाइम्स आदि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं, वेब-पत्रिकाओं आदि में 2000 से अधिक बार प्रकाशित

आवासीय पता: जिला: गाज़ियाबाद, उ०प्र०, भारत.

सम्प्रति: केंद्रीय सरकार प्रथम श्रेणी के अधिकारी के पद पर कार्यरत

2 thoughts on “गज़ल – डॉ मनोज श्रीवास्तव ‘मोक्षेंद्र’

  1. ” भीड़ का हिस्सा ही था मैं , भीड़ से अब हट गया हुँ ” Although The Lines :गहरा अर्थ है इनके पास have been changed but the theme is same & have touched me . गहरा अर्थ है इनके पास

  2. ” भीड़ का हिस्सा ही था मैं , भीड़ से अब हट गया हुँ ” Although The Lines have been changed but the theme is same & have touched me . गहरा अर्थ है इनके पास

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