गिध्द

उस दिन डिस्कवरी चैनल में गिध्दो के झुण्ड को एक लाश को सफाचट करते हुए देखकर मुझे बचपन के दिन याद आ गये। हमारा शहर उन दिनों कस्बा जैसा ही हुआ करता था और हमारे मुहल्ले के बाद लोगो के खेत शुरू हो जाते थे। हम आसमान में मण्डराते हुए गिध्दों को स्पष्ट देखा करते थे। हमारे मोहल्लें में कुछ दूध व्यापारी के अलावा किसान भी रहते थे जो कि अपनी मरी हुई गायों को खेतों में पकड़ फेंक आते थे और गिध्द उन्हे चन्दु मिनटो में ही साफ कर दिया करते थे। उस समय गिध्दों की इतनी संख्या होती थी कि हम बच्चां का इनके आस-पास फटकने से भी डर लगता था। हमने कई कहारियां सुन रखी थी कि ये गिध्द मुर्दे जानवर खाने के अलावा कई कहानियां सुन रखी थी कि ये गिध्द मुर्दे जानवर खाने के अलावा कई जिन्दा बच्चों को भी उठाकर ले जाते है। गिध्दो की संख्या में हमें पता ही चल पाता था कि लाश किस जानवर की है। कभी-कभी हम यह सोचकर घबरा जाते कि कहीं इन गिध्दो ने जिन्दा आदमी पर तो हमला नही बोल दिया हैं। खैर हमें उन्हे दूर से देखना अच्छा लगता था कुछ तो मुर्दे में मांस के लोथडे़ दबाये अलग से खाते थे तो कुछ उससे छीनने की कोशिश करते नजर आतें हमें उनकों देखने की उत्सुकता रहती। बाद में हमने किताबो में पढा़ ि कवे प्रकृति के सफाई कर्मचारी होते है और सिर्फ मरे हुए जीवों को ही खाते है तो फिर हमारे मन से उनके प्रति डर कम हो गया और हम उन्हे नजदीक से देखने लगे। कॉलेज पहुंचते-पहुंचते किताबों में हम पढ़ने लगे कि मवेशियों के इलाज के लिये उपयोग किये जाने वाले एक रसायन के कारण गिध्दो की मौत होती जा रही है। और आखिरकार आज वे लगभग खत्म से हो गये है। मेरे एक मित्र की चौदह साल की बेटी सड़क पर अपने वाहन से जा रही कि अचानक उसकी गाडी़ को एक ऑटो वाजे ने ठोक दिया और वह सर के बल सड़क पर गिर पडी़ । कुछ लोग ऑटो वाले को मारने को दौडे़ ं उसमें कुछ हमारी कॉलोनी के ही आवारागर्दी करने वाले लड़के थे। इनके बाप कालोनी में घर खरीदने और बेचने के दलाल थें ये इस तरह के दलाल थे कि आवश्यकता पड़ने पर ये अपनी पत्नी की भी दलाली कर लेते थे। इनका बस चलता तो ये पूरी कॉलोनी, पूरा शहर पूरा राज्य पूरा देश ही दलाली लेकर बेच खाते। खैर तीन-चार लोगों ने ऑटो वाले को पकड़ लिया । उधर ऑटो वाले को दुर्घटना की नजा़कत समझ में आ चुकी थी सो उसने अपने जेब से सारा रूपया उन्हे दे दिया और हाथ जोड़कर कहने लगा कि भैया मुझे बचा लो पुलिस थाने कोर्ट कचहरी से। मैं कल आप लोगो को दस हजा़र रूपये और दे दूंगा। घटना स्थल पर लौटकर आये उन पीछा करने वालों ने बताया कि उन्होने उस ऑटो वाले का बहुत दूर तक पीछा किया लेकिन साला भाग निकला । कल साला इधर से गुजरेगा तो उसे जिन्दा नहीं छोड़ेंगे।मुझे इस घटना ने विचलित कर दिया। मुझे गिध्दों के झुण्ड में से मांस के लोथडे़ अलग से ले जाकर खाने वाले तीन गिध्दों की याद आ गई।

इस बीच एक जागरूक प्रत्यक्षदर्शी ने फ्री टोल नं. वाली एंबुलेंस को 108 पर कॉल कर बुलवा लिया और उस बच्ची को एम्बुलेंस में डालकर रवाना कर दिया गया। उधर एम्बुलेंस ड्राइव्हर और वहां मौजूद नर्स और डॉक्टर ने कमीशन खारी के चक्कर में बडे़ सरकारी अस्पताल न ले जाकर एक प्राइवेट अस्पताल पंहुचा दिया। लड़की के फोन पर उन्होने पाप लिखे हुए नंबर पर कॉल कर दिया और हाथ लगे यह भी जानकारी हासिल कर ली कि सामने वाली पार्टी कितनी दमदार हैं। जब यह पता चल गया कि मरीज का बाप तो सरकारी विभाग में अफसर है तो उनकी बांछे खुल गई और फिर वे उसे निजी अस्पताल में भर्ती करा गये। अब तक लड़की कोमा में जा चुकी थी। मेरा मित्र उस समय चार सौ कि.मी.अपनी पत्नी के साथ रहता था। उसके यहां वाले घर में उसकी दोनो बेटिंयां ही रहती थी। दुर्घटना के वक्त उसकी बडी़ बेटी कॉलेज गई हुई थी। हम सभी अपने अपने काम पर गये थे। मुझे अगले दिन पता चला और मैं अपने मित्र को सान्त्वना देने रोज ही अस्पताल जाने लगा। बेटी कोमा में होने के बावजूद डॉक्टरों द्वारा लगभग रोज बीस हजार रूपये की दवाइयों लिखी जाती और मेरे मित्र को थमा दी जाती। वह नर्सिंग होम के मेडिकल स्टोर्स से ही दवाइयां खरीदता और पूरा पैकेट वार्ड बॉय को सौंप देता । हमें अन्दर जाने की मनाही थी । मुझे यह बात बडी़ खटकती थी कि इन दवाइयों में कई सारी टेबलेट्स और कैप्सूल्स भी होती। मैं सोचता कि कोमा में जा चुकी बच्ची को ये किस तरह से टेबलेट्स और कैप्सूल खिलाते होगें। भई इंजेक्शन की बात समझ में आती थी कि सलाइन के माध्यम से पहुंचा दी जाती होगी। तीसरे दिन मेरे दोस्त ने जब दवाइयों का कैरीबैग वार्ड ब्यॉय को देकर वापस लौट आया। मैं भी साथ में ही था। तभी मुझे टॉयलेट जाने की आवश्यकता महसूस हुई । टॉयलेट के पास मैंने देखा कि वह वार्ड ब्यॉय उन्ही दवाइयों का पूरा का पूरा कैरी बैग मेडिकल स्टोर्स के एक कर्मचारी को वापस लौटा रहा है। यह देखकर मेरा खून खौल उठा । पर चूंकि मामला संवेदनशील था सो मैनें अपने मित्र को बताना उचित समझा । मेरे मित्र को मैंने यह बताया इस पर उसका कहना था कि ये लोग चाहे जितनी बदमाशियों करें बस मेरी बेटी ठीक हो जाये । डॉक्टर उसे लगातार आश्वसान दे रहे थे जबकि मेरा मन कहने लगा था कि अब कुछ नही हो सकता । चौथे दिन उस अस्पताल में काम करने वाले मेरे एक परिचित ने मुझे बताया भैया वह लड़की तो ब्रेन डेड हो चुकी है और अब ये लोग उसे वेंटीलेटर पर रखकर सिर्फ बेड का प्रतिदिन बीस हजार किराया वसूलने के चक्कर में बॉडी को रखे रहेंगे और हो सकता है कि ऑपरेशन की नौटंकी भी कर सकते है और हुआ भी यही। डॉक्टर ने ऑपरेशन करना है कहकर मित्र से दो लाख रूपये जमा करा लिये। मैं जबकुछ जानकर भी बेबस था उधर लूट पाट खरोस जारी थी। मैने अपने मित्र से कहा कि एक बार बच्ची को देख आते है । अब तक इन्फेक्शन हो जायेगा कहकर हमें अन्दर जाने ही नहीं दिया जाता था लेकिन मैं चाहता था कि मेरा मित्र बच्ची को एक बार देखकर सारी बातें समझ जाये पर उम्मीदें जो कराये कम है। खैर दोस्त ने डाक्टर से कहा कि उसे अपनी बच्ची को देखना है। इस पर डॉक्टर ने फिर इन्फेक्शन की बात से उसे डरा दिया। मैंने कहा हम हम थोडी़ दूर से देख लेंगे। आखिर -डॉक्टर तैयार हो गया और उसने शाम को 6 बजे हमें बच्ची को दूर से देखने की अनुमति दे दी। हमें निर्धारित समय पर अन्दर पहुुंचे तो देखा कि लगभग आठ-दस डॉक्टरों ने उसे घेर रखा है और हमें बच्ची को घेरे हुए वो डॉक्टर्स मुझे झुण्ड में मांस नोचते गिध्द से प्रतीत हुए। हमें ऐसे ही लौटना पडा़ अब मुझे उस अस्पताल से नफरत सी होने लगी थी। मैं देखते-सुनते जानते समझते मक्खी निगल रहा था । मेरे पास कोई उपाय नही था। मैने अगले दिन से जाना बंद कर दिया । तीन दिनों बाद बच्ची मृत घोषित कर दी गई। मैं तुरंत अस्पताल पहुंचा । अस्पताल वालों ने दो लाख रूपये का बिल बनाया था। और उसे जमा किये जाने के बाद ही बॉडी ले जाने की अनुमति देने की बात कह रहे थे। मेरा मित्र उनसे हुज्जत कर रहा था। उसके रिश्तेदार समझा रहे थे कि ये हुज्जत करने का समय नहीं है। आखिरकार बॉडी गिध्दो से छुडा़ ली गई लेकिन डॉक्टरों ने थाने में फोन कर दिया था। मतलब गिध्दों ने अपने दूसरे भाईयों को बुला लिया था और फिर बॉडी पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया। पुलिस ने पंचनामा बनाने के लिए लड़की के बाप से पैसे वसूल लिये। पोस्टमार्टम के लिये पहले से पांच बॉडी इंतजार में थी। एक किशोर लड़की की मृत्यु से दुःखी पिता को कुछ समझ नही आ रहा था। पोस्टमार्टम में शराब पीने बॉडी को लपेटनेके लिये पन्नी खरीदने और न जाने किस-किस नाम से पैसे वसूल लिए। उस बच्ची को कंधा देते हुए अचानक हमें महसूस हुआ कि व तो एकदम हल्की है। हमने इतने सारे गिध्दों से छुडा़ई गयी पूरी तरह बची हुई लाश को न ढोकर लाश के छोटे से हिस्से को ढो रहे है। सड़ी-गली व्यवस्था को ढो रहे है।

 

- आलोक कुमार सातपुते

शिक्षा- एम.कॉम.

प्रकाशित रचनायें - हिन्दी और उर्दू में समान रूप से लेखन। देश के अधिकांश हिन्दी-उर्दू पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन। पाकिस्तान के अंग्रेजी अख़बार डान की उर्दू वेबसाईट में धारावाहिक रूप से लघुकथाओं का प्रकाशन।

संग्रह का प्रकाशन- १ शिल्पायन प्रकाशन समूह दिल्ली के नवचेतन प्रकाशन,से लघुकथा संग्रह अपने-अपने तालिबान का प्रकाशन।

२ सामयिक प्रकाशन समूह दिल्ली के कल्याणी शिक्षा परिषद से एक लघुकथा संग्रह वेताल फिर डाल पर प्रकाशित।

३ डायमंड पाकेट बुक्स, दिल्ली से कहानियों का संग्रह मोहरा प्रकाशित ।

४ डायमंड पाकेट बुक्स, दिल्ली से किस्से-कहानियों का संग्रह बच्चा लोग ताली बजायेगा प्रकाशित ।

५ उर्दू में एक किताब का प्रकाशन।

अनुवाद – अंग्रेजी उड़िया ,उर्दू एवम् मराठी भाषा में रचनाओं का अनुवाद एवं प्रकाशन ।

सम्पर्क - हाउसिंग बोर्ड कालोनी, सडडू, रायपुर

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