गाय को बचाने के लिए आज एक व्यापक आंदोलन की जरूरत है ?

क्या आप इस बात से सहमत हैं कि भारत में गाय को बचाने के लिए आज एक व्यापक आंदोलन की जरूरत है ? हिंदू धर्म में गाय को पवित्र और पूजनीय माना गया है। फिर हमारे देश में क्यों गाय सड़कों पर कूड़ा-करकट खाने को विवश है ? हम अपनी गाय माताओं की फिक्र करते हैं तो फिर गाय के चारे के लिए गोशालाओं को थोड़ा दान क्यों नहीं दे सकते ?

आज क्रिकेट के एक मैच को देखने के लिए रूपये खर्च कर दिए जाते हैं, अपने कपडों पर, मनोरंजन के साधनों के पर अनाप शनाप पैसा खर्च किया जाता है तो फिर क्यों न गाय माता की सेवा के लिए हम खुले मन से आगे आए।हमारा यह परम पुनीत कर्तव्य बनता है कि हम अपनी शक्ति से भी बढकर गौशालाओं (गाय के लिए गेहूं, घास आदि खिलाना भूसा/चरी का दान करे) मे दान दें। गौशालाएं रहेंगी तो गायें बचेगी और गायें बचेंगी तभी हम हमारा देश और हमारी संस्कृति बचेगी।

भारतीय संस्कृति, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, कृषि व पर्यावरण में गाय का विशेष महत्व है। भारतीय संस्कृति का आधार गाय, गीता, गंगा, गायत्री और गुरु है, जिसमें गाय को सबसे पहले माना गया है। इन पांच मूल आधारों में से एक को भी नष्ट करना भारतीय संस्कृति व हिंदू धर्म की हत्या होगी।

वर्ष 2009 में भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा मांस निर्यातक देश बन चुका था। हमारे नीति निर्माता उसे नम्बर एक मांस निर्यातक बनाना चाहते हैं। क्या एक भारतीय इस उपलब्धि पर गर्व कर सकता है? जिस देश में पत्थर को भी पूजने की परंपरा रही है, वह देश क्या पशुओं का मांस और खून बेचकर समृद्धि के सोपान चढ़ेगा।

भारत में प्राचीन काल से गाय को पवित्र और पूजनीय माता का दर्जा दिया गया है इसके पीछे धार्मिक मान्यता भी हैं, जिनमें समुद्र मंथन से निकली कामधेनु की महिमा हैं अर्थात् गाय को हिंदू धर्म में सर्वोच्च स्थान हैं |

गो पूजन, गो दान भोजन के पहले गाय के लिए पहली रोटी निकालना जैसी परंपराएं प्राचीनकाल से ही चली आ रही हैं | गाय में ऐसा क्या होता है जो उसे पूजनीय बनाता है। एसे कई कारण हैं जो गो माता को पूजनीय बनातें हैं | भारत में गाय को देवी का दर्जा प्राप्त है। ऐसी मान्यता है कि गाय के शरीर में 33 करोड़ देवी-देवताओं का निवास है। यही कारण है कि दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा के अवसर पर गायों की विशेष पूजा की जाती है और उनका मोर पंखों आदि से श्रृंगार किया जाता है। गाय हिंदु धर्म में पवित्र और पूजनीय मानी गई है। शास्त्रों के अनुसार गौसेवा के पुण्य का प्रभाव कई जन्मों तक बना रहता है। इसीलिए गाय की सेवा करने की बात कही जाती है।

गौसेवा भी धर्म का ही अंग है। इसी वजह से मात्र गाय की सेवा से ही भगवान प्रसन्न हो जाते हैं। भगवान श्रीकृष्ण के साथ ही गौमाता की भी पूजा की जाती है। इसी बात से स्पष्ट होता है कि गाय की सेवा कितना पुण्य का अर्जित करवाती है। गाय के धार्मिक महत्व को ध्यान में रखते हुए कई घरों में यह परंपरा होती है कि जब भी खाना बनता है पहली रोटी गाय को खिलाई जाती है। यह पुण्य कर्म बिल्कुल वैसा ही जैसे भगवान को भोग लगाना। गाय को पहली रोटी खिला देने से सभी देवी-देवताओं को भोग लग जाता है।

गाय का दूध बहुत ही पौष्टिक होता है। यह बीमारों और बच्चों के लिए बेहद उपयोगी आहार माना जाता है। गाय का घी और गोमूत्र अनेक आयुर्वेदिक औषधियां बनाने के काम भी काम आता है। गाय का गोबर फसलों के लिए सबसे उत्तम खाद है। अन्य पशुओं की तुलना में गाय का दूध बहुत उपयोगी होता है।

इसके मूत्र में रोगों से लड़ने की शक्ति होती है, केंसर जैसे रोग का इलाज भी गोमूत्र से करने के दावे किए जाते रहे हैं। इसका गोबर भी एक तरह का एंटीसेप्टिक या एंटी बायोटिक है। यह कीटाणुओं को मारता है। बीमारी के विषाणुओं को भी खत्म करता है। इसीलिए पुराने जमाने में गाय के गोबर से ही घर लीपे और पोते जाते थे। इसलिए गाय को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। प्राचीन भारत में गाय समृद्धि का प्रतीक मानी जाती थी।

इंग्लैंड के विज्ञानियों का यह मानना है कि गाय को अगर अच्छा संगीत सुनने को मिले तो वह ज्यादा दूध देती है। इंग्लैंड में कुछ कलाकारों ने सोचा कि देखें गाय के आगे शेक्सपियर का नाटक खेला जाए तो क्या होगा। उन्होंने एक गाय के सामने शेक्सपियर का हास्य नाटक ‘द मेरी वाइव्ज ऑफ विंडसर’ प्रस्तुत किया।

इसको देखकर शायद गाय खुश हुई, क्योंकि उस दिन दूध का उत्पादन ज्यादा हुआ। इसके बाद नाटक के कलाकारों ने अंदाजा लगाया कि गाय भी इंसान की तरह ही है, जो खुश होने पर अच्छा काम करती है। पर इन कलाकारों का कहना है कि हम गाय के सामने ‘हेमलेट’ नहीं प्रस्तुत करेंगे, क्योंकि क्या पता दुखी होने पर वह दूध ही न दे।

युरोपीयन्स वैज्ञानिकों देश जैसे जर्मन, फ्रांस, रूस, इटली आदि अनेक देशों के वैज्ञानिकों ने एक रिसर्च के दोरान यह पाया है कि भारतीय गाय के गोबर को जलाने से हैजा, प्लेग, टाईफाईड, डायरिया, टी.बी. तक के रोगाणु मर जाते हैं। अगर गोबर के उपले के साथ थोडी सी दाख, मुनक्का, किशमिश या गुड जला दिया जाये तो असर और भी अधिक होता है। केवल आधे घण्टे में नब्बे प्रतिशत से अधिक रोगाणु-कीटाणु मर जाते हैं। गाय के हमारे आसपास रहने से वातावरण शुद्ध रहता है।

गाय हमारी सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक है और इसकी सेवा करना हम सभी की नैतिक जिम्मेवारी है। जागो भारतीय जागो !!

 

 

 - युद्धवीर सिंह लांबा ” भारतीय “ 

 

व्यवसाय:

मै युद्धवीर सिंह लांबा ” भारतीय “  वर्तमान में हरियाणा इंस्टिटयूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, दिल्ली रोहतक रोड (एनएच -10) बहादुरगढ़, जिला. झज्जर, हरियाणा राज्य, भारत में प्रशासनिक अधिकारी के रूप में 23 मई 2012 से काम कर रहा हूँ। हरियाणा इंस्टिटयूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक से संबद्ध, तकनीकी शिक्षा निदेशालय हरियाणा और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद ,नई दिल्ली द्वारा अनुमोदित हैं।

मैने एस.डी. प्रौद्योगिकी एवं प्रबंधन संस्थान, इसराना, पानीपत ( हरियाणा ) (एनसी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग  टेक्निकल कैंपस की सहयोगी संस्था) में 3 मई 2007 से 22 मई 2012 तक कार्यालय अधीक्षक के रूप में कार्य किया। मैने 27अगस्त, 2011 को रामलीला मैदान, दिल्ली में सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के जनलोकपाल बिल पारित की मांग लेकर  अनिश्चितकालीन अनशन में भाग लिया था ।

शिक्षा:

मैने राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय , झज्जर ( हरियाणा ) से बी.ए.  और महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय (ए-ग्रेड), रोहतक (हरियाणा )  से एमए (राजनीति विज्ञान )  पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी, जालंधर ( पंजाब ) से पीजीडीसीए किया है

शौक: मुझे फेसबुक में भारतीय संस्कृति  और हिन्दी भाषा के लिए लिखना बहुत पसंद है । 

2 thoughts on “गाय को बचाने के लिए आज एक व्यापक आंदोलन की जरूरत है ?

  1. हॉलैंड से प्रकाशित होने वाली पहली हिंदी पत्रिका ‘अम्स्टेल गंगा’ पर मेरे लेख (गाय को बचाने के लिए आज एक व्यापक आंदोलन की जरूरत है ? प्रकाशित करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

    युद्धवीर सिंह लांबा “भारतीय”
    प्रशासनिक अधिकारी
    हरियाणा इंस्टिटयूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, दिल्ली रोहतक रोड (एनएच -10) बहादुरगढ़, जिला. झज्जर, हरियाणा राज्य, भारत

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