ग़ज़ल – आलोक यादव

 

भरे जो ज़ख़्म तो दागों से क्यों उलझें?

गई जो बीत उन बातों से क्यों उलझें ?

 

उठाकर ताक़ पे रख दीं सभी यादें,

नहीं जो तू तेरी यादों से क्यों उलझें ?

 

ख़ुदा मौजूद है जो हर जगह तो फिर,

अक़ीदत केश बुतख़ानो से क्यों उलझें ?

 

ये माना थी बड़ी काली शबे फ़ुरक़त,

सहर जब हो गयी रातों से क्यों उलझें ?

 

हवाएँ जो गुलों से खेलती थीं कल,

मेरे महबूब की ज़ुल्फ़ों से क्यों उलझें ?

 

इसी कारण नहीं रोया तेरे आगे,

मेरे आँसू तेरी पलकों से क्यों उलझें ?

 

नदी ये सोच कर चुपचाप बहती है,

सदायें उसकी वीरानों से क्यों उलझें ?

 

उन्हें क्या वास्ता आलोक जी ग़म से,

गुलों के आशना ख़ारों से क्यों उलझें ?

 

 - आलोक यादव

जन्म :                    30 जुलाई कायमगंज, फ़र्रूख़ाबाद (उत्तर प्रदेश)

शिक्षा :                   बी0 एससी0 (लखनऊ विश्वविद्यालय) एम0बी0ए0 (इलाहबाद विश्विद्यालय)

सम्प्रति :              वर्ष 1998  में संघ लोक सेवा आयोग से सहायक भविष्य निधि आयुक्त पद पर चयन

वर्तमान में क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त पद पर बरेली में तैनात

उपलब्धियां :        1 इंटरनैशनल इंटल इंटेलेक्चुअल पीस एकेडमी द्वारा डॉ इकबाल उर्दू अवार्ड 2014

2 डॉ आसिफ बरेलवी अवार्ड 2014 से सम्मानित

प्रकाशन:       1. ‘सरिता’, ‘मुक्ता’, ‘धर्मयुग’, ‘मनोरमा’, ‘फेमिना’, ‘गृह शोभा’, ‘आधार शिला’,  ’दैनिक जागरण’, ‘अमर उजाला’  आदि पत्र पत्रिकाओं में लेख, कवितायेँ, ग़ज़ल आदि प्रकाशित I

  1. आकाशवाणी और दूरदर्शन से प्रसारण I
  2. उर्दू दैनिक “इंक़िलाब”, “पैग़ाम-ए-मादरे वतन” एवं उत्तर प्रदेश सरकार के उर्दू मासिक “नया दौर” में गज़लें प्रकाशित I
  3. अयन प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित प्रशासनिक अधिकारियों के ग़ज़ल संग्रह ‘इज़्तिराब’ का संपादन
  4. सदा आर्ट सोसाइटी, नई दिल्ली के नाटक “ए सोल सागा” में गीत लेखन

वर्तमान पता :     पीलीभीत बाईपास रोड, बरेली – 243006

 

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