क्षणिकाएँ-ज्योत्स्ना प्रदीप

 

वो बुज़ुर्ग है !

नहीं……,

उसकी छत्र-छाया में

बैठो तो सही

आज के तूफानों से बचाने वाला

वो ही तो

मज़बूत दुर्ग है ।

कुछ !रिश्ते

कितने आम हो गए !

बस हस्ताक्षर से ही.…

तमाम हो गए !

महानगर की

वो छोटी- सी लड़की

पता भी न चला.…

जाने कब

बड़ी हो गई ?

किसी विरोध में

भीड़ के साथ

वो भी खड़ी हो गई !

 

- ज्योत्स्ना प्रदीप

शिक्षा : एम.ए (अंग्रेज़ी),बी.एड.
लेखन विधाएँ : कविता, गीत, ग़ज़ल, बालगीत, क्षणिकाएँ, हाइकु, तांका, सेदोका, चोका, माहिया और लेख।
सहयोगी संकलन : आखर-आखर गंध (काव्य संकलन)
उर्वरा (हाइकु संकलन)
पंचपर्णा-3 (काव्य संकलन)
हिन्दी हाइकु प्रकृति-काव्यकोश

प्रकाशन : विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन जैसे कादम्बिनी, अभिनव-इमरोज, उदंती, अविराम साहित्यिकी, सुखी-समृद्ध परिवार, हिन्दी चेतना ,साहित्यकलश आदि।

प्रसारण : जालंधर दूरदर्शन से कविता पाठ।
संप्रति : साहित्य-साधना मे रत।

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