कौन बताएगा इनका गुनाह क्या था?

प्रसंग – विश्व की सबसे बड़ी औद्द्योगिक त्रासदी भोपाल गैस कांड एवं स्त्री संघर्षगाथा।

 

सती प्रथा के संदर्भ में उल्लेख है कि 9वीं सदी के पूर्वार्ध के बंगाल में जो आंकड़े एकत्र किये गये उनमें एक निश्चित अनुपात में उन औरतों की संख्या अधिक थी जिन्होंने अपने पति की मृत्यु के वर्षों बाद आत्महत्या कर ली थी, ऐसा इसलिए हुआ होगा कि उनकी जिन्दगी असहाय हो गई होगी।

भोपाल में अगर आंकड़े एकत्र किए जाएं तो रोज तिल-तिल मरती उन स्त्रियों की संख्या इन आंकड़ों से कई गुना ज्यादा होगी। ये वे स्त्रियां हैं जो “”रात के कातिल” की शिकार हुर्इं। यूनियन कार्बाइड को रात का कातिल ही कहा जाता है, जिसके कारण भोपाल शहर में औरतें सती प्रथा के तहत नहीं पर अपनी पीड़ाओं की वजह से पिछले 26 सालों से रोज तिल-तिल मर रही हैं। ये वे बेसहारा स्त्रियां हैं जो यूनियन काबाईड के गैस रिसाव में बेवा हो गई थीं। भोपाल गैस त्रासदी के बाद विगत 26 वर्षो से ये औरतें कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में आज तक उपेक्षा और प्रताड़ना की शिकार बनी हुई हैं। घृणित विश्वासघात की कहानी कहती इन स्त्रियों का दर्द परिवार खोने, बीमार रहने, मुआवजे के लिए हाथ फैलाने, रोजगार के अभाव और अपने परिवार के पालन-पोषण में कमी रह जाने के अलावा यह भी है कि सरकारी तंत्र ने पुनर्वास के नाम पर आवासीय कॉलोनी तो दे दी पर वहां उन तमाम सुविधाओं का अता-पता नहीं था जो उसे आबाद कर सकें – न बाजार, न स्कूल, न रोजगार, न आवागमन, न ही अस्पताल।

कोई चार दीवारों पर एक छत मिल जाने पर वहां रहे भी तो कैसे? पर विडम्बना यह थी कि वे वहां  उसी स्थिति में रहने को मजबूर थीं और रह रही हैं – पीपली लाइव के नत्था को एक “लाल बहादुर” दिए जाने की तरह ही था यह पुनर्वास। यही हाल मुआवजे का था जो आज तक यानी 26 वर्षों तक चला आ रहा है। वे पूछती हैं हमारे न्याय के फैसले आदमी की उम्र से ज्यादा लंबे क्यूं होते हैं….? जो हक, जो अधिकार जिन्दा आदमी को मिलना चाहिए, वह उसके मरने के बाद भी उसके परिवार को पीढ़ियों तक क्यों नहीं मिल पाते, यही इन औरतों का पहला सवाल है।

दूसरी महत्वपूर्ण बात कार्बाइड के खिलाफ अब तक मैंने जितने भी पोस्टर देखे उनमें और न्यूज कवरेज में भी मुझे औरतों की संख्या ही ज्यादा दिखाई दी। इसने इस जिज्ञासा को आगे बढ़ाया कि उस भयानक त्रासदी का प्रभाव औरतों के जीवन पर कैसे पड़ा? यूं भी एक त्रासदी के बाद जाने कितनी त्रासदियां उपजती हैं। सदियों से होने वाली दुनिया की हर त्रासदी-हर युद्ध, हर महामारी को स्त्री ने ही भोगा है। हर बार… स्त्री ने उसके बीच से उजाले की किरण की तरह जीवन को बचाने की कोशिश की हैं, पर क्या जीवन इतना सस्ता होता है? क्या गरीबों के जीवन का कोई मोल नहीं? यही इन औरतों का दूसरा सवाल है। यूनियन कार्बाइड हादसे के बाद प्रारंभ में प्रदर्शनियों में स्त्रियों और पुरुषों का अनुपात क्रमश: 60 एवं 40 का होता था। फिर समय के साथ यह अनुपात बढ़कर 80:20 हो गया था और आगे चल कर यह 90:10 हो गया।

विश्लेषण करने पर जो बात सामने आई उसके अनुसार इस त्रासदी में बड़ी संख्या में औरतें विधवा हुई थीं, जिनके सामने अपने परिवार की रोटी की जिम्मेदारी थी, सो उन्हें ही लड़ना पड़ रहा था। दूसरा, आदमी काम की तलाश में चले जाते हैं, औरतों के पास, खास कर गृहिणियों के पास पर्याप्त समय था। तीसरा तर्क ये कि ज्यादातर गैस पीड़ित महिलाएं स्वयं श्रमिक थीं, जिन पर गैस त्रासदी के बाद अपने परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी आ गई तो अधिकार, न्याय और मुआवजे की हर लड़ाई में उन्हें ही ज्यादा लड़ना पड़ा। आगे चलकर इन्हीं महिलाओं ने मशालें अपने हाथ में ले लीं और गैस पीड़ितों के संगठन बने।

सन् 1986 के बाद के आन्दोलन के मुख्य सूत्रधार ये संगठन ही रहे। एक संगठन उन महिलाओं का था जो यहाँ सरकारी पुनर्वासीय प्रशिक्षण केन्द्र में सिलाई केन्द्रों में कार्यरत थीं। ये केन्द्र सरकार ने 1985 में आरंभ किए थे, जिनमें दो से ढाई हजार महिलाएं प्रशिक्षण ले रही थीं। एक वर्ष बाद सरकार ने घोषणा की कि वह इन केन्द्रों को बंद करने जा रही है। इसके विरोध में स्त्रियों ने इन केन्द्रों पर कब्जा कर लिया….. और उसी के बाद भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन की स्थापना हुई। स्टेशनरी महिला कर्मचारी संस्था में भी बड़ी संख्या में ये महिलाएं जुटी हुई हैं। यूनियन कार्बाइड के प्रभाव से बड़ी संख्या में महिलाओं के प्रजनन तंत्र प्रभावित हुए थे, जबकि व्यवस्था ने यूनियन काबाईड के वैज्ञानिकों के हवाले से यह ज्ञान दिया था कि गैस का लंबा असर नहीं होगा। तब तीन सौ महिलाओं ने पेशाब भरी बोतलें हाथ में लेकर प्रदर्शन किया। बोतलों पर लिखा – इसकी जांच करके बताओ कितना थायोसाइनेट है?

तब यूनियन कार्बाइड के खाली मैदान पर टेंटों में एक जन स्वास्थ्य केन्द्र खोल दिया गया, जो एक साल चला और रसायनों की जांच हुई। इन जांच रिपोर्टस को हर हफ्ते मीडिया के सामने पेश किया जाता था। तब सरकार घबराई हुई थी। 25 जून, 86 की आधी रात को पुलिस ने केन्द्र पर धावा बोला। डॉक्टरों को गिरफ्तार कर लिया। मरीजों के रिकार्ड और उपकरण जब्त कर लिए गए। ये औरतें जो यह कहती हैं कि गैस त्रासदी के बाद से उन्हें माहवारी नहीं आई। उनका अगला प्रण यही है कि क्या हमें बाँझ बनाने में ऐसे ही रिकार्ड जब्ती की कार्रवाई का भी हाथ है? अगर हमें तब उचित इलाज मिल जाता तो शायद उम्मीद की किरणें हमारे आंचल में खेलतीं।

वैज्ञानिक जांचों में यह तथ्य उभर कर सामने आया कि गैस के असर से कैंसर की आशंकाएं और भ्रूणों पर दुष्प्रभाव हुए थे। किसी भी स्त्री को उसके प्रजनन प्रभाव और उसकी कोख के बगैर कैसे देख सकते हैं…. सवाल यह भी है कि उन गर्भवती औरतों  के गर्भस्थ भ्रूण फिर जन्म नहीं ले पाए। वे पूछती हैं हजारों औरतों के भ्रूण की हत्या का अपराध क्या अपराध नहीं था? मातृत्व मानवाधिकार है। अनजाने ही सही इस हादसे ने औरतों से उनका यह अधिकार निर्ममता से छीन लिया।

एक पीड़ित के बारे में बताया गया कि वह गर्भवती थी। उसकी कोख में बच्चे ने अपनी मासूम उपस्थिति की दस्तक देना  शुरू कर दी थी। पहला गर्भ था, जो अनजाने भय के बावजूद एक सुखद अनुभव था। रात की लम्बी क्रूर घड़ी की सुई बारह बजकर पांच मिनट पर अटकी थी। करवट लेने में मुश्किल होती थी। वह सीधे ही लेटी बच्चे के ऊर्जा भरे अहसास के साथ जीवन का सबसे सुंदर सपना बुन रही थी…… पास रखी थीं सलाइयां, जिनमें अभी-अभी उसने बच्चे के लिए गर्म मोजे बुनने के फंदे डाले थे।

गुलाबी रंग का स्वेटर बनाकर वह अब मोजे और टोपी बनाने वाली थी। वह मातृत्व के गौरव से भरी हुई थी जिसकी चमक उसके चेहरे पर देखी जा सकती थी। पर वक्त का पहिया चला और न वो गर्भ बचा और न वह स्त्री। वह गुलाबी स्वेटर एक पैकेट में संग्रहालय में रखा देखा जा सकता है। और एक मूक प्रण करता है यह ऊनी स्वेटर – मेरा क्या दोष था कि मैं किसी भी बच्चे की मुलायम देह को सर्द रातों से बचाने में काम न आ सका? ऐसे कितने सपने होंगे जिन्हें उस रात का कातिल निर्दयता से कुचलता चला गया।

यह संघर्षरत स्त्रियाँ यहाँ केवल चंद प्रण खड़े करती है, उन कार्पोरेट घरानों और व्यवस्थाओं से जिनकी चमचमाती बहुमूल्य गाड़ियों की चमक में कितने गरीब श्रमिकों का पसीना लगा होता है और वे ही कीड़े-मकोड़ों की तरह व्यवस्था और विकास के नाम पर खदेड़े जाते हैं – रौंद दिए जाते हैं। यह गैस पीड़ित स्त्रियों के वे फुटकर सवाल हैं जिनका जीवन नरक में बदल गया, वह भी त्रासदी के बाद शेष बची किसी भी सभ्यता के अवशेष के रूप में। जिन्दा औरतें सदियों से सामाजिक उपेक्षा, आर्थिक विपन्नता और कई बार दैहिक शोषण को अपनी नियति मानकर सहती रहती हैं। ये वे औरतें हैं जो प्रगति की मुख्यधारा से परे हैं। गरीब पीड़ित परिवारों की स्त्रियों की दिनचर्या पर प्रकाश डालें तो यह स्पष्ट होता है कि उनका कितना समय, राशनपानी के इंतजाम, लकड़ी-कण्डे-कोयले के इंतजाम और बच्चों के इलाज के लिए डॉक्टर और दवाखानों की लंबी कतार में खड़े रहने पर खर्च हो जाता है।

वे जीवन की प्रगति से बहुत पीछे रह जाती हैं। करोड़ों रुपए की योजनाओं के बावजूद हमारे शहर में स्लम एरिया बढ़ते ही जा रहे हैं, झुग्गियां खत्म ही नहीं होतीं। षडयंत्रों के तमाम खेलों में यह भी राजनीतिज्ञों का मनपसंद सौदा बना हुआ है और दरिद्रता का फैलाव बढ़ता ही जाता है। दरिद्रता के सूत्र व्यवस्थाओं से ही जुड़े होते हैं। पर संघर्ष जारी है। भोपाल गैस पीड़ित निराश्रित पेंशनभोगी संघर्ष मोर्चा हो चाहे स्टेशनरी कर्मचारी संघ, चिंगारी ट्रस्ट हो या संभावना ट्रस्ट सबके उद्देश्य पीड़ितों के प्रति न्याय की मांग पर आधारित हैं।

हादसे में प्रभावित मुस्लिम औरतों की मुश्किलें तो और ज्यादा हैं। वहां कुपोषण है, कार्यभार ज्यादा, पर्दाप्रथा, बीमारियों का इलाज नहीं और शिक्षा का दूर-दूर तक अता-पता नहीं। ऊपर से परिवार नियोजन की भी उपेक्षा, वहां त्रासदी से उपजी हर तरह की पीड़ाएं। वे अपने हक के लिए लड़ना भी नहीं जानतीं। उनका प्रण यह है कि भले ही मुआवजा दिलवाने में भ्रष्टाचार हो, दलाली हो पर दलालों के बगैर मुआवजा मिलना आसमान से तारे तोड़ने जैसा था। अगर राहत कर्मचारी एवं अधिकारियों में ईमानदारी और नैतिकता होती तो दलालों की जरूरत ही क्यों पड़ती? हमें हमारे हक न मिलने का कारण भी यही लोग तो हैं, वरना यहां दलाल क्यों टपक पड़े? सच यही है कि किस तरह सूचियों में पीड़ितों की लाइन में हजारों ऐसे नाम जोड़े गए जो हादसे वाले दिन या तो भोपाल में थे ही नहीं और अगर थे भी तो गैस से अछूते थे। पर विदेशी मुआवजा लोगों में आकर्षण बन गया। मुआवजे की बंदरबाट, दलालों, वकीलों की फौजी कड़ियों को सरकार रोक न सकी, क्योंकि रोकने की इच्छाशक्ति नहीं थी।

दिसम्बर का पहला काला इतवार काली रात लेकर आया और देखते-देखते काली परेड ग्राउण्ड पर काल ने तांडव कर डाला। ऐसा विकराल, विकट तांडव जिसकी कल्पना भी रूह में कंपकंपी पैदा कर देती है। सोलह लोगों के मरने की खबर से शुरू हुआ सिलसिला तो हजारों के आंकड़ों को पार करता गया।

2-3 दिसम्बर के दरमियानी इतवार की वह रात खासी ठण्डी थी और राजधानी के लोग रजाइयों में दुबके थे……. बस घड़ी की सुईयां बारह बजकर पांच मिनट पर गर्इं और एक जिन्दा शहर देखते-देखते मुर्दों का ढेर हो गया। शहर में लाशों को ढकने के लिए “कफन’ के कपड़े का टोटा हो गया। कब्रिस्तानो में जगह कम पड़ गई। एक फतवा जारी करना पड़ा कि पुराने मकबरे तोड़-तोड़कर जगह बनाई जाए। हरी-भरी पहाड़ियों के खूबसूरत झीलों वाले इस शहर को देखते-देखते क्या हो गया। महीनों, सालों और सदियों तक जिसकी सड़कों और गलियों में मौत के किस्से कहे और सुने जाते रहेंगे। मानवीय त्रासदी की ये कहानियां आगे सुनते रहेंगे कि विश्व की यह भीषणतम औद्योगिक त्रासदी एक शहर भोपाल ने झेली थी। जहां हाहाकार यूनियन कार्बाइड के भोपाल स्थित कीटनाशक कारखाने से निकली जहरीली गैस से मचा था।

 

- डा. स्वाति तिवारी

 

जन्म : धार (मध्यप्रदेश)

शिक्षा : एम.एस.सी., एल.एल.बी., एम.फिल, पी.एच.डी

शोध कार्य :

Ÿ महिलाओं पर पारिवारिक अत्याचार एवं परामार्श केन्द्रों की भूमिका

Ÿप्राथमिक शिक्षा के लोकव्यापीकरण में राजीव गांधी शिक्षा मिशन की भूमिका

Ÿअकेले होते लोग – वृद्धावस्था पर मनोवैज्ञानिक दस्तावेज

Ÿसवाल आज भी जिन्दा हैं : भोपाल गैस त्रासदी एवं स्त्रियों की सामाजिक समस्याएं (प्रकाशनाधीन)

रचनाकर्म :

Ÿमध्यप्रदेश और देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कहानी, व्यंग्य, समीक्षा, रिपोर्ताज, यात्रा-संस्मरण, कविताओं आदि का नियमित प्रकाशन

Ÿ आकाशवाणी, दूरदर्शन और निजी टी.वी. चैनलों पर रचनाओं का प्रसारण-पटकथा लेखन

विशेष :

मध्यप्रदेश की कलाजगत हस्ती कलागुरू विष्णु चिंचालकर पर निर्मित फिल्म की पटकथा-लेखन, सम्पादन और सूत्रधार

फिल्म निर्माण: इन्दौर स्थित परिवार परामर्श केन्द्रों पर आधारित लघु फिल्म “घरौंदा ना टूटे’ (निर्माण, सम्पादन और स्वर)

प्रकाशित कृतियॉ :-

कहानी-संग्रह :

Ÿ “क्या मैंने गुनाह किया’, Ÿ”विशवास टूटा तो टूटा’, Ÿ “हथेली पर उकेरी कहानियां’ Ÿ “छ जमा तीन”, Ÿ “मुडती है यूं जिन्दगी, Ÿ”मैं हारी नहीं’, Ÿ “जमीन अपनी-अपनी’, Ÿ “बैगनी फूलों वाला पेड”, Ÿस्वाति तिवारी की चुनिंदा कहानियां

अन्य महत्वपूर्ण प्रकाशन :

Ÿ वृद्धावस्था के मनोवैज्ञानिक वि¶लेषण पर केन्द्रित दस्तावेज – “अकेले होते लोग’

Ÿ”महिलाओं के कानून से संबंधित महत्वपूर्ण पुस्तक “मैं औरत हूं मेरी कौन सुनेगा’,

Ÿव्यक्तित्व विकास पर केन्द्रित पुस्तक “सफलता के लिए’

Ÿदेश के जाने-माने पत्रकार स्व.प्रभाष जोशी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित पुस्तक “शब्दों का दरवेश” (महामहिम उप राष्ट्रपति श्री हामिद अंसारी द्वारा 16 जुलाई 2011 को विमोचित)

प्रकाशनाधीन :

Ÿ सवाल आज भी जिन्दा है (भोपाल गैस त्रासदी और स्त्री विमर्श)

Ÿ लोक परम्पराओं में विज्ञान (माधवराव सप्रे संग्रहालय द्वारा प्रदत्त प्रोजेक्ट)

Ÿ ब्राहृ कमल एक प्रेमकथा (उपन्यास)

सम्पादन (1996 से 2004 तक) :

Ÿ सुरभि (दैनिक चौथा संसार),

Ÿ घरबार (दैनिक चेतना)

चर्चित स्तंभ लेखन (वर्ष 96 से 2006 तक) :

Ÿ हमारे आस पास (दैनिक भास्कर),

Ÿ महिलाएं और कानून (दैनिक फ्रीप्रेस, अंग्रेजी),

Ÿ आखिरी बात (चौथा संसार),

Ÿ आठवां कॉलम एवं अपनी बात (चेतना),

सम्मान और पुरस्कार :

Ÿ “अकेले होते लोग’ पुस्तक (वर्ष 2008-09) के मौलिक लेखन पर राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग नई दिल्ली द्वारा 80 हजार रुपये का राष्ट्रीय पुरस्कार

Ÿ “स्वाति तिवारी की चुनिन्दा कहानियाँ’ पर मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा 22/01/12 को वागेशरी सम्मान 2010 (छत्तीसगढ़ के महामहिम राज्यपाल के कर कमलों द्वारा)

Ÿ “बैंगनी फूलोंवाला पेड़’ कहानी संग्रह पर 02 अक्टूबर, 11 को प्रकाश कुमारी हरकावत महिला लेखन पुरस्कार (मध्यप्रदेश के महामहिम राज्यपाल के कर कमलों द्वारा)

Ÿ देश की शिशार्स्थ पत्रिका “द संडे इंडियन’ द्वारा देश की चयनित 21वीं सदी की 111 लेखिकाओं में प्रमुखता से शामिल

Ÿ “अभिनव शब्द शिल्पी अलंकरण”, 2012 सांस्कृतिक संस्था अभिनव कला परिषद, भोपाल द्वारा

Ÿ लब्ध प्रतिष्ठित पत्रकार पं. रामनारायण शास्त्री स्मृति कथा पुरस्कार

Ÿ जाने-माने रिपोर्टर स्व. गोपीकृष्ण गुप्ता स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार (श्रेष्ठ रिपोर्टिंग के लिए)

Ÿ शब्द साधिका सम्मान (पत्रकारिता पुरस्कार) Ÿ निर्मलादेवी स्मृति साहित्य सम्मान, गाजियाबाद (उत्तरप्रदेश)

Ÿ पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में अनुपम उपलब्धियों के लिए “स्व. माधवराव सिंधिया प्रतिष्ठा” सम्मान

Ÿ हिन्दी प्रचार समिति, जहीराबाद (आन्ध्रप्रदेश) द्वारा सेवारत्न की मानद उपाधि

Ÿ पं. आशा कुमार त्रिवेदी स्मृति मालवा-भूषण सम्मान

Ÿ मध्यप्रदेश लेखक संघ द्वारा स्थापित देवकीनंदन साहित्य सम्मान

Ÿ अंबिकाप्रसाद दिव्य रजत सम्मान

Ÿ भारतीय दलित साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश का सावित्रीबाई फूले साहित्य रत्न सम्मान

विशेष :

कुरुक्षेत्र वि.वि. हिमाचल प्रदेश और देवी अहिल्या वि.वि. इन्दौर, वि.वि.चैन्नई, जवाहरलाल नेहरू वि.वि. नई दिल्ली में कहानियों पर शोध कार्य।

मैसूर में 02 से 04 अक्टूबर, 2011 तक राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग एवं मैसूर विश्वविद्यालय द्वारा

“सुशासन और मानव अधिकार” पर आयोजित तीन दिवसीय सेमीनार में शोध पत्र का वाचन।

माण्डव में 5 से 7 नवम्बर, 2011 को देश के शिरसस्थ कथाकारों के संगमन 17 में भागीदारी।

संस्थापक-अध्यक्ष, इन्दौर लेखिका संघ, इन्दौर।

वुमन राइटर्स गिल्ड आफ इंडिया (दिल्ली लेखिका संघ) की सचिव (वर्ष 07 से 09)

इंडिया वुमन प्रेस कार्प, नई दिल्ली की आजीवन सदस्य

सम्प्रति : मध्यप्रदेश शासन में जनसम्पर्क विभाग में अधिकारी (राज्य शासन के मुखपत्र मध्यप्रदेश संदेश में सहयोगी सम्पादक)

सम्पर्क -  चार इमली, भोपाल – 462016 (मध्यप्रदेश – भारत)

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