कोई हर्ज़ नहीं

 

जब आँखों को रंगों का ज़ायका न भाये,..
और जीभ पर स्वादों का धमाका सुनाई न दे,..
जब कानों को गीला करने के लिए संगीत न बचे,..
और मुंह में मीठी बातों की खुश्बू न हो,..
जब तारे, ज़मीन, आसमाँ, चाशनी सी मीठी हवा सभी…
जिस्म में गुदगुदी न भर दें,..
और रोमांच शब्द खुरच दिया गया हो,..
जबरन जीवन से,..
तो जिंदगी पर नयी जिल्द चढ़ा लेने में कोई हर्ज़ नहीं.

 

-डॉ अनुज कुमार


हिंदी ऑफिसर 
नागालैंड विश्वविद्यालय

 

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