कोई और भी रंग होते थे

वो बच्चा रूठा है सबसे
एक बच्चा सहमा सहमा सा है..
मुस्कुराता नहीं बात बात पर
बल्कि किसी भी बात पर….जाने क्यों?

सूखे तालाब की मिट्टी सा
दरक रहा है हृदय,
टीसता है रह रह कर…
सूखने लगा है जब से आँखों का पानी…

काश कोई वक़्त का निज़ाम
फरमान सुनादे सूरज को..
जब भी आना
बच्चों के होठों पर
मुस्कान लाना….

धुएँ के सियाह बादल
न हटते हैं, न बरसते हैं.
आजकल कोई सूरज
सहर नहीं लाता
धुएँ के आग़ोश में घिरी हैं घाटियाँ
न गुल मुस्कुराते हैं.
न आसमान की धानी मुस्कान से
तितलियाँ आती हैं जमीं पर..

बस एक ही रंग है हर तरफ..
राख जैसा….. राख़ सपनें …राख़ उम्मीदें..
राख़ मुस्कानें… राख़ कलियाँ..
ये किसने संस्कृति के मुँह पर
तमाचा मारा है।
सब रंग राख हो गए हैं जीवन के…!!
कैसे यकीं करायेंगे बच्चों को
कोई और भी रंग होते थे..!!

 

– अनिता मंडा

जन्म-जुलाई , नई दिल्ली
एम ए-हिन्दी व इतिहास, बीएड।
लेखन -स्वतंत्र लेखन।
अंतरजाल पर विभिन्न पत्रिकाओं में लेखन।
स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ,हाइकु, दोहे, मुक्तक व क्षणिकाएँ लेखन।

One thought on “कोई और भी रंग होते थे

  1. हार्दिक बधाई अनिता जी सुन्दर रचना के लिए

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