कूड़ा

 

तेज रफ्तार से चलता हुआ वह गरीब, दफ्तर में दाखिल हुआ—तीन बज चुके थे। हॉल में घुसने से पहले उसने अपनी लाठी को बगल में दबाया। फिर टाँग उठाकर धोती के पल्लू को चेहरे तक पहुँचाकर पसीना पोंछा। इसके बाद उसने पगड़ी को ठीक किया और अन्त में चिक को हटाकर हॉल में झाँका। उसने देखा कि दफ्तर के सारे बाबू एक बड़ी-सी मेज़ के चारों ओर डटे खड़े हैं। कुछ के हाथों में ताश हैं और कुछ के में नहीं। उसने गौर किया कि उसके काम से सम्बन्धित बाबू भी उन लोगों के बीच मौजूद था। उसकी बाँछें खिल गयीं। चलो, आना अकारथ नहीं गया—उसने सोचा और चिक हटाकर हॉल में दाखिल हो गया।

“राम-राम बाबूजी।” उन लोगों के निकट पहुँचकर उसने हाथ जोड़े और सम्बन्धित बाबू से मुखातिब हो गया,“आप ना मिलते तो मेरा दिल बैठ जाता आज।”

उनमें-से किसी ने उसकी किसी भी बात पर ध्यान नहीं दिया। सब-के-सब जैसे पहले खड़े-बैठे थे, अब भी खड़े-बैठे रहे।

“मेरी एक अरज सुनिंगे बाबूजी? भौत परेसान हूँ।” इस बार उसने अपेक्षाकृत गिड़गिड़ाकर कहा।

“ये ले ग्यारह पे ग्यारह…” पत्ते खेल रहे चारों में से एक बोला,“कितना भी जोर लगा ले बेटे, बेगम तो तेरी गयी!”

“बेगम का तो एक बाल भी तुम नहीं लेजा सकते।” अगला आदमी रौबदार आवाज़ में बोला,“देख, यह उठाया ग्यारह! लगा स्वीप!!”

“लगा बे लगा।” पहला चीखा, पर उसके साथी के हाथों में कुछ खास-अच्छे पत्ते नहीं थे। वह बेचारा ढीला-ढाला बैठा रह गया।

“बेगम को भूलो। अब तुम खुद को सूखा रह जाने से बचाओ।” इस हालत से उत्साहित होकर दूसरे पक्ष का एक हिमायती बोला।

“बेटे, पचास से कम नम्बर नहीं उठायेंगे हम।” पहला उसके जवाब में बोला। फिर अपने साथी से कहा,“चल बे चल, अब, कुछ तो डाल।”

साथी ने मायूसी के साथ एक पत्ता फेंक दिया। खेल फिर आगे बढ़ गया।

“बाबूजी!” वे चुप हो गये तो ग्रामीण ने पुन: गुहार लगायी। चुप हो जाने से उसने अन्दाजा लगाया था कि खेल की तरफ से वे अब फारिग हो गये हैं। उस बेचारे को क्या पता कि ताश, वह भी स्वीप, का खेल जुबान का नहीं दिमाग का खेल है। इसमें पत्ते थामे रखने वालों से कहीं-ज्यादा व्यस्त उनके गिर्द खड़े लोग होते हैं।

किसी ने कुछ नहीं सुना।

“नैकु म्हारी भी सुन ल्यो बाबूजी।” वह पुन: गिड़गिड़ाया।

कुछ नहीं। पत्ते फिकते रहे, उठते रहे। खेल चलता रहा।

लाठी बगल में दबाकर उस गरीब ने फिर टाँग उठायी और धोती के पल्लू को एक बार फिर ऊँचा कर चेहरे के पसीने को पोंछा। उसने दीवार-घड़ी की ओर देखा—साढ़े तीन बज गये थे। पिछली बार वह चार बजे के करीब यहाँ पहुँच गया था। उसे याद आया—उस समय यह बाबू सीट पर बैठा था। वहा आकर इसके सामने खड़ा हो गया था। बाबू काम में और सामने बैठी महिला-सहकर्मी से मजाक में मग्न रहा; लेकिन इसने उसकी ओर नहीं देखा था। संकोचवश वह चुपचाप खड़ा रहा था। किसी को बातों या काम के दौरान टोकना उसने सीखा नहीं था। एक घंटे के करीब वह यों ही खड़ा रहा। उसे बताया गया था कि दफ्तर साढ़े पाँच बजे बंद होता है। काम कुछ खास नहीं, किसी फाइल से एक कागज़ की नकल निकलवानी थी, बस। इस काम के लिए वह सिफारिशी खत भी साथ लाया था। जैसे ही पाँच बजे, इसने रजिस्टर और फाइलें बन्द कीं, दराज़ को ताला दिया और चल दिया। इसे जाते देख उसने पीछे से टोका। काम बताया तो यह बुरी तरह बिगड़ गया। बोला,“घण्टेभर से खड़े-खड़े मेरा मुँह ताक रहे थे। अब उठ चला हूँ तो…”

“जी, आप काम में लगे थे इसलिए…” वह गिड़गिड़ाया था।

“अब तो छुट्टी हो गयी।” बाबू ने घड़ी की ओर इशारा करके कहा था,“दस दिन के लिए अपने घर जा रहा हूँ। उसके बाद आना।”

…और आज वह दस नहीं, पन्द्रह दिनों के बाद आया है।

“ये मारी बेगम!” अचानक एक जोरदार हल्ला हुआ,“साला सूखी करने चला था!! बेटे, वो तो गुप्ता पर ढंग के पत्ते नहीं थे, वरना सूखी उल्टे तुम्हीं पर हो जाती।”

“चलो भई चलो, चार बज गये।” कोई-एक बोला,“अब कुछ काम हो जाये।”

सब तितर-बितर हो गये और अपनी-अपनी सीटों पर जा जमे। उसके काम से सम्बन्धित बाबू बाहर की ओर चला गया। पिसाब-उसाब से निबटने गया होयेगा—उसने सोचा और उसकी सीट के पास जा जमा।

साढ़े चार बजे और-फिर पाँच। लोग अपनी-अपनी दराजें बन्द करके बाहर निकलने लगे। वह बैठा रहा। उसके भीतर हताशा भी थी और आक्रोश भी। तभी, स्वीपर आया और हॉल में झाड़ू लगाने लगा। दफ्तर में अब वह और स्वीपर ही बचे थे। कूड़े को बुहारता स्वीपर लगातार उसी की ओर बढ़ता आ रहा था—बिना चेतावनी। डूबी हुई नजरों से उसने दीवार पर मुस्कराते गाँधीजी को देखा। फिर सिफारिशी खत वाली, कुर्ते की जेब को टटोला। चेहरा फिर-से पसीना-पसीना हो आया था। इस बार उसने टाँग नहीं उठायी, पसीने को बाँह से ही पोंछ डाला। कूड़े की किरचें अब उसके पैरों से टकराने लगी थीं। उसने अपने काम में लीन स्वीपर को एक-नजर देखा और हॉल से बाहर निकल आया। बुहारता हुआ, स्वीपर भी बाहर आ पहुँचा था। कूड़े को उसके पैरों के पास इकट्ठा करके वह झाड़ू को भीतर रख आया और हॉल को ताला लगाकर चला गया। वह जहाँ का तहाँ खड़ा रहा—कूड़े-सा।

- बलराम अग्रवाल

 

पुस्तकें : कथा-संग्रह—सरसों के फूल (1994), ज़ुबैदा (2004), चन्ना चरनदास (2004); बाल-कथा संग्रह—दूसरा भीम’(1997), ‘ग्यारह अभिनेय बाल एकांकी’(2012); समग्र अध्ययन—उत्तराखण्ड(2011); खलील जिब्रान(2012)।

अंग्रेजी से अनुवाद : अंग्रेजी पुस्तक ‘फोक टेल्स ऑव अण्डमान एंड निकोबार’ का ‘अण्डमान व निकोबार की लोककथाएँ’ शीर्षक से हिन्दी में अनुवाद व पुनर्लेखन; ऑस्कर वाइल्ड की पुस्तक ‘लॉर्ड आर्थर सेविले’ज़ क्राइम एंड अदर स्टोरीज़’ का हिन्दी में अनुवाद तथा अनेक विदेशी कहानियों का अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद व प्रकाशन।

सम्पादन : मलयालम की चर्चित लघुकथाएँ (1997), तेलुगु की मानक लघुकथाएँ (2010), ‘समकालीन लघुकथा और प्रेमचंद’(आलोचना:2012), ‘जय हो!’(राष्ट्रप्रेम के गीतों का संचयन:2012)। प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, रवीन्द्रनाथ टैगोर, बालशौरि रेड्डी आदि वरिष्ठ कथाकारों की चर्चित कहानियों के 12 संकलन। 12 खंडों में प्रकाशित ‘प्रेमचंद की सम्पूर्ण कहानियाँ’(2011) में संपादन सहयोग। 1993 से 1996 तक साहित्यिक पत्रिका ‘वर्तमान जनगाथा’ का प्रकाशन/संपादन। ‘सहकार संचय’(जुलाई, 1997), ‘द्वीप लहरी’(अगस्त 2002, जनवरी 2003 व अगस्त 2007), ‘आलेख संवाद’ (जुलाई,2008) तथा ‘अविराम साहित्यिकी’(अक्टूबर-दिसम्बर 2012) का संपादन। हिन्दी साहित्य कला परिषद, पोर्टब्लेयर की हिन्दी पत्रिका ‘द्वीप लहरी’ को 1997 से अद्यतन संपादन सहयोग।

अन्य : अनेक वर्ष तक हिन्दी-रंगमंच से जुड़ाव। कुछेक रंगमंचीय नाटकों हेतु गीत-लेखन भी। हिन्दी फीचर फिल्म ‘कोख’(1990) के लिए सह-संवाद लेखन। आकाशवाणी दिल्ली के ‘वार्ता’ कार्यक्रम से तथा दूरदर्शन के ‘पत्रिका’ कार्यक्रम से लेख एवं वार्ताएँ प्रसारित। लघुकथा संग्रह ‘सरसों के फूल’ की अनेक लघुकथाओं का मराठी, तेलुगु, पंजाबी, सिन्धी, निमाड़ी, डोगरी आदि हिन्दीतर भारतीय भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित।

विशेष : सुश्री गायत्री सैनी ने लघुकथा संग्रह ‘ज़ुबैदा’ पर वर्ष 2005 में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से एम॰फिल॰ किया। संपादित लघुकथा संकलन ‘मलयालम की चर्चित लघुकथाएँ’ को आधार बनाकर तिरुवनंतपुरम में अध्यापनरत श्री रतीश कुमार आर॰ ने केरल विश्वविश्वविद्यालय से ‘हिन्दी व मलयालम की लघुकथाओं का तुलनात्मक अध्ययन’ विषय पर पीएच॰डी॰ उपाधि हेतु शोध किया है।
सम्मान :पंजाब की साहित्यिक संस्था ‘मिन्नी’ द्वारा माता ‘शरबती देवी पुरस्कार’(1997), प्रगतिशील लेखक संघ, करनाल(हरियाणा) द्वारा सम्मानित 2003, हिन्दी साहित्य कला परिषद, पोर्ट ब्लेयर द्वारा सम्मानित 2008, इंडियन नेचुरोपैथी ऑर्गेनाइज़ेशन, नई दिल्ली द्वारा सम्मानित 2011, माता महादेवी कौशिक स्मृति सम्मान, बनीखेत(हि॰प्र॰) 2012
संप्रति : लघुकथा-साहित्य पर केन्द्रित ब्लॉग्स

संपर्क :नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032

 

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