कुर्सी

पलाश और मीनू की शादी को काफी दिन बीत चुके थे लेकिन मीनू अकसर उदास-सी रहती थी।

उसकी उदासी को भांपते हुए आज बेटे पलाश ने यकायक मुझसे एक बेतुका-सा सवाल किया, “माँ, किसी भी कुर्सी के चार पैर होते हैं न?”

“हें…. ये कैसा सवाल हुआ?” मैंने आश्चर्य से पूछा।

“बताओ न माँ।”

“और नही तो क्या! चार पैर तो आवश्यक हैं। एक भी पैर अलग हो गया तो कुर्सी गिर न पडेगी।” मैंने अपनी समझदारी दिखाते हुए कहा।

वह मुस्कुराया, “…..सब तो जानती हो माँ। फिर क्यों आये दिन मीनू के माता- पिता को बुरा-भला….”

“……..”

“माँ…आप, पापा और मीनू के माता-पिता ही तो मेरी गृहस्थी की कुर्सी के चार मज़बूत पैर हैं। इनमें संतुलन बनाये रखना जरूरी  है। है न? नही तो…..”

“….कुर्सी गिर न पड़ेगी।” मैं अपने-आप से ही बोल पड़ी।

 

 

- अनघा जोगलेकर

मैं, अनघा जोगलेकर, व्यवसाय से इंजीनियर होने के साथ ही एक उपन्यासकार व लघुकथाकार भी हूँ।
मेरे 3 लघुउपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं और तीनों ही amazon पर उपलब्ध हैं।
मैंने 1 वर्ष पूर्व ही लघुकथा लिखना आरम्भ किया है। मेरी लघुकथाएँ प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में छपने लगी हैं। जिसमें से एक सेतु पत्रिका भी है जो पिट्सबर्ग अमेरिका से छपती है।
मेरी अन्य रुचियों में चित्रकारी भी शामिल है।

 

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