कुण्डलियाँ – शशि पुरवार

 

पावन धरणी राम की, जिसपे सबको नाज
घूम रहे पापी कई, भेष बदलकर आज
भेष बदलकर आज, नार को छेड़ें सारे
श्वेत रंग पोशाक, कर्म करते हैं कारे
नाम भजो श्री राम, नाम है अति मनभावन
होगा सकल निदान, राम की धरणी पावन.

मानव सारे लीन हैं, राम लला की लूट
भक्ति भाव के प्रेम में, शबरी को भी छूट
शबरी को भी छूट, बेर भी झूठे खाये
दुख का किया विनाश, हृदय में राम समाये
रघुपति हैं आदर्श, भक्त हैं प्रभु को प्यारे
राम कथा, गुणगान, करें ये मानव सारे.

रघुपति जन्मे भूमि पे, खास यही त्यौहार
राम कथा को फिर मिला, वेदों में विस्तार
वेदों में विस्तार, राम की लीला न्यारी
कहते वेद पुरान, नदी की महिमा भारी
निर्गुण सगुन समान, प्रजा के प्यारे दलपति
श्री हरि के अवतार, भूमि पर जन्मे रघुपति.

सारे वैभव त्याग के, राम गए वनवास
सीता माता ने कहा, देव धर्म ही ख़ास
देव धर्म ही ख़ास, नहीं सीता सी नारी
मिला राम का साथ, सिया तो जनक दुलारी
कलयुग के तो राम, जनक को ठोकर मारे
होवे धन का मान, अधर्मी हो गए सारे.

आओ राजा राम फिर, दिल की यही पुकार
आज देश में बढ़ गयी, लिंग भेद की मार
लिंग भेद की मार, दिलों में रावण जागा
कलयुग में तो आज, नार को कहे अभागा
अनाचार की मार, राज्य फिर अपना लाओ
रावण जाए हार, राम फिर वापिस आओ.

चक्षु ज्ञान के खोलिए,जीवन है अनमोल.
शब्द बहुत ही कीमती, सोच-समझ कर बोल
सोच-समझ कर बोल, बिगड़ जाते हैं नाते
रहे सफलता दूर, मित्र भी पास न आते
मिटे सकल अज्ञान, ग्रन्थ की बात मान के
फैलेगा आलोक, खोल मन चक्षु ज्ञान के.

संगति का होता असर, वैसा होता नाम
सही रहगुजर यदि मिले, पूरे होते काम
पूरे होते काम, कभी अभिमान न करना
जीवन कर्म प्रधान, कर्म से कैसा डरना
मिले सहीयदि साथ, मार्जन होता मति का
जीवन बने महान, असर ऐसा संगति का.

समय -शिला पर बैठकर, शहर बनाते चित्र
सूख गयी जल की नहर, जंगल सिकुड़े मित्र
जंगल सिकुड़े मित्र, सिमटकर गाँव खड़े हैं
मिले गलत परिणाम, मानवी- कदम पड़े हैं
बढती जाती भूख, और बढ़ता जाता डर
लिखें शहर इतिहास, बैठकर समय-शिला पर.

नेकी अपनी छोड़ कर, बदल गया इंसान
मक्कारी का राज है, डोल गया ईमान
डोल गया ईमान, देखकर रूपया पैसा
रहा आत्मा बेच, आदमी है यह कैसा
दो पैसे के हेतु, अस्मिता उसने फेकी
चौराहे पर नग्न, आदमी भूला नेकी.

१०

गंगा जमुना भारती, सर्व गुणों की खान
मैला करते नीर को, ये पापी इंसान
ये पापी इंसान, नदी में कचरा डारे
धर्म कर्म के नाम, नीर ही सबको तारे
मिले गलत परिणाम, प्रकृति से करके पंगा
सूख गए खलियान, सिमटती जाये गंगा.

११

सीना चौड़ा कर रहे, वीर देश की शान
हर दिल चाहे वर्ग से, करिए इनका मान
करिए इनका मान, हमें धरती माँ प्यारी
वैरी जाये हार, यह जननी है हमारी
दिल में जोश उमंग, देश की खातिर जीना
युवा देश की शान, कर रहे चौड़ा सीना.

१२

थोडा हँस लो जिंदगी, थोडा कर लो प्यार
समय चक्र थमता नहीं, दिन जीवन के चार
दिन जीवन के चार, भरी काँटों से राहें

हिम्मत कभी न हार, मिलेंगी सुख की बाहें
संयम मन में घोल, प्रेम से नाता जोड़ा
खुशियाँ चारों ओर, भरे घट थोडा थोडा.

१३

गंगा को पावन करे, प्रथम यही अभियान
जीवन जल निर्मल बहे, करें सदा सम्मान
करे सदा सम्मान, जिंदगी देती माता
माता पालनहार, सफल जीवन हो जाता
करके जल में स्नान, मन हो जाय चंगा
अतुल गुणों की खान, गौरवमयी है गंगा .

१४

फैला है अब हर तरफ, धोखे का बाजार
अपनों ने भी खींच ली, नफरत की दीवार
नफरत की दीवार, झुके है बूढ़े काँधे
टेडी मेढ़ी चाल, दुःख की गठरी बांधे
अहंकार का बीज, करे मन को मटमैला
खोल ह्रदय के द्वार, प्रेम जीवन में फैला

 

- शशि पुरवार

जन्म स्थान:  इंदौर ( म. प्र.)
शिक्षा: स्नातक उपाधि —- बी. एस. सी.( विज्ञानं ) , स्नातकोत्तर उपाधि – एम . ए ( राजनीती शास्त्र )
(देविअहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर ) , तीन वर्ष का हानर्स डिप्लोमा इन कंप्यूटर साफ्टवेयर

भाषा ज्ञान:

हिंदी अंग्रेजी, मराठी

प्रकाशन:  
कई प्रतिष्ठित समाचार पत्र और पत्रिकाओ व साहित्यिक पत्रिकाओ में रचनाए, गीत, लेख, लघुकथा, कविता का प्रकाशन होता रहता है. दैनिक भास्कर, बाबूजी का भारत मित्र, समाज कल्याण पत्रिका, हिमप्रस्थ, साहित्य दस्तक, लोकमत, नारी, गीत गागर, जाग्रति, वीणा, अविराम, हाइकु लोक, अभिनव इमरोज, दैनिक जागरण, निर्झर टाइम्स, दरभंगा टाइम्स, रूबरू दुनियां, उदंती, उत्तर प्रदेश सरकार – लखनऊ, हरिगंधा, हिंदी चेतना, युग गरिमा, उत्कर्ष प्रकाशन, मधुरिमा, विधान केसरी, ……..आदि .अनगिनत पत्र व पत्रिकाओ में प्रकाशन .
अंतर्जाल पर कई पत्रिकाओ में नियमित प्रकाशन होता है . हिंदी हाइकु , अनुभूति , त्रिवेणी , कविमन ,परिकल्पना,प्रयास पत्रिका, सहज साहित्य, साहित्य शिप्ली, गद्य कोष पर भी रचनाएँ पढ़ी जा सकती है. .

पुस्तक प्रकाशन:  साझा संकलन

१) “नारी विमर्श के अर्थ “– साझ संकलन , संपादन रश्मि प्रभा

२ ) उजास साथ रखना – साझा चोखा संकलन, संपादन – रामेश्वर काम्बोज हिमांशु 

३ ) त्रिसुगंधी — साझा गीत -गजल संकलन, संपादन
४ आधी आबादी — साझा हाइकु संकलन, संपादन – डा. अनीता कपूर

पुरस्कार: 
हिंदी विश्व संस्थान और कनाडा से प्रकाशित होने वाली प्रयास पत्रिका के सयुंक्त तत्वाधान में आयोजित देशभक्ति प्रतियोगिता में २०१३ की विजेता.

कार्येक्षेत्र:

बचपन से ही साहित्य के प्रति रुझान रहा है. पहली रचना 13 वर्ष की उम्र में लिखी. बचपन से ही मन की संवेदनाओ को पन्नो पर उकेरना पसंद रहा है. धीरे धीरे कागज़- कलम जीवन के अभिन्न अंग बन गए। साहित्यिक विरासत माँ से मिली . जीवन भर विद्यार्थी रहना ही पसंद है . रचनात्मकता और कार्य शीलता ही पहचान है .

कहानी, कविता, लघुकथा, काव्य की अलग अलग विधाए – गीत, नवगीत, दोहे, कुण्डलियाँ, गजल, छन्दमुक्त, तांका, चोका, माहिया, हाइकु और लेखों के माध्यम से जीवन के बिभिन्न रंगों को उकेरना पसंद है. सपने नाम से एक ब्लॉग भी लिखती हूँ.

One thought on “कुण्डलियाँ – शशि पुरवार

  1. प्रिय शशि जी आपके द्वारा रचित सभी कुंडलियाँ उच्च स्तर की हैं | भगवान् राम और अपने देश की पावन भूमि पर गर्व पर लिखी पंक्तियाँ बहुत मन भावन हैं आपको बधाई और शुभकामनाएं |

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