कितने अलग अलग रंग दिखाती है ये ज़िंदगी

कितने अलग अलग रंग दिखाती है ये ज़िंदगी
सुबह कुछ तो शाम और हो जाती है ये ज़िंदगी
कभी धूप की गर्मी तो कभी शाम की छाँव है
कभी प्यार की नरमी तो कभी बिछुड़ने का घाव है
हर पल एक नया अहसास है ये ज़िंदगी
हर लम्हा एक नयी प्यास है ये ज़िंदगी
कहीं किसी के प्यार भरे साथ का अहसास है
कहीं फिर किसी पुराने साथी से मिलने की प्यास है
कभी ख़ुशियों भरा गागर है ज़िंदगी
कभी ग़म के थपेड़ों का सागर है ज़िंदगी
ख़ुशियाँ जो हर इंसान यहीं पाता है
उसके बाद ग़म का अँधेरा भी यहीं आता है
बच्चों की हँसी की किलकारियाँ भी है ये ज़िंदगी
अपनों के जाने की सिसकियाँ भी है ये ज़िंदगी
मासूम से चेहरे को देख कैसे होठों पर मुस्कान आती है
दर्द में देख किसी अपने को दिल में कसक सी उठ जाती है
किसी रोज़ और किसी जगह नहीं है ज़िंदगी
हर पल जी लो, देखो सारा जहाँ ही है ज़िंदगी
सुबह कुछ तो शाम और हो जाती है ये ज़िंदगी
कितने अलग अलग रंग दिखाती है ये ज़िंदगी

-विक्रम प्रताप सिंह

वर्तमान : सहायक प्रोफेसर, सेंट जेवियर्स कॉलेज, मुंबई विश्वविद्यालय, मुंबई

पेशेवर प्रशिक्षण से ये एक भूविज्ञानी हैं 

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