काश वो एक पुष्प

काश एक पुष्प मै भी, बनता
शहीदो की चिताओं की शोभा बढाता।
वो अदम्य साहस खुद में भरता
वो तिरँगा , शोभाये मान होता
माँ का रूदन, ममता बिखेरती
वो पत्नी प्रलय सिँचित अश्रु बहाती ।
काश वो एक पुष्प मै,भी होता
वो बँधु मुझ से आकर लिपटता।
बहना की राखी का धागा, छुता
उस चिता के साथ मे भी जलता।
अमर मेरा भी अँश होता
धरा की रज मुझ मे समाती ।
तम मेँ दैदीत्यमान, एक दीपक जलता
काश वो एक पुष्प मै भी बनता।
नभ का प्रकाश मुझ पर गिरता
पुष्पाँजली का पुष्प कहलाता ।
वो कुटूम्ब के करोँ से अर्पित होता
तब गहरा कोई बंधन होता।
काश वो एक पुष्प मै भी होता

 
- शशि राठौड.

मैं शशि राठौड. हिन्दी साहित्य से एम.ए। हिन्दी
लेखन मे गहरी रूचि रखती हुं . एन जी ओ भारत विकास परिषद से जुड़ी हुई हूँ। मन के भावों को अपनी कविताओ के माध्यम से वयक्त करती हूँ।

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