काश अगर मैं साधू होता

 

चिंता न होती खुद की, न दुनिया मेरी चिंता करती
कुछ न दिखाना था किसी को, भस्म रमाता पहनता धोती
खा कर मोटे होकर पतले होने का बोझ न होता
जीवन में ये यहाँ – वहाँ, इनका – उनका लोच न होता ।

कौन पूछता मुझको आज का क्या प्लान है
दिन भर कैसे बीता, बितानी कहाँ शाम है
मन भी रहता शांत कोई भी शोर न होता
और सुख का पैमाना क्रेडिट स्कोर न होता
काश अगर मैं साधू होता ।।
चिंता न होती खुद की , न दुनिया मेरी चिंता करती
कुछ न दिखाना था किसी को, भस्म रमाता; पहनता धोती
यदि होता डायरेक्शन ठीक, वो एक दिन मिल ही जाता
फिर भाड़ में जाए दुनिया, स्वर्ग के मजे उठाता ।

नीचे थी आँखे बंद, सत्य उपर से दीखता
यदि याद रहे ये सत्य तो, नीचे आकर ये दुःख न होता
काश अगर मैं साधू होता ।।

 

- रोहित सिन्हा 

ये यूनिवर्सिटी ऑफ़ नेब्रास्का,लिंकन, अमेरिका में एक रिसर्च एसोसिएट हैं । इनकी रिसर्च बैक्टीरिया और ह्यूमन जीनोम के पारस्परिक सम्बन्ध के बारे में जानकारी से सम्बंधित है । 
तकनिकी से जुड़े होने के बावजूद इन्हें हिंदी साहित्य से प्रेम है और अपने इस प्रेम को ये अपनी रचनाओं के माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं ।

 

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