काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान (वर्ल्ड हेरिटेज) – वे जंगल जहाँ बरह मूथरी के पेड़ हैं और हैं एक सींग वाले गैंडे

असम के गर्व में से एक है काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान| यहाँ लुप्तप्राय भारतीय एक सींग वाले गैंडे का घर है और दुनिया में बाघों के सबसे अधिक घनत्व को समायोजित करते हुए, 2006 में इसे बाघ अभयारण्य के रूप में भी घोषित किया गया है। यह राष्ट्रीय उद्यान यूनेस्को द्वारा घोषित विश्व विरासत स्थल (वर्ल्ड हेरिटेज) भी है। यह पूरा जंगल क्षेत्र है जो लगभग ४२९.९३ कि.मी के वर्ग के क्षेत्र वाला एक बड़ा राष्ट्रीय उद्यान माना गया है। काजीरंगा असम के दो जिलों – गोलाघाट और नोआगाँव के अंतर्गत आता है| कहते हैं कि ईश्वर यदि इच्छाशक्ति देता है तो उसे पूरा करने के अवसर भी देता है मेरी घूमने की इच्छाशक्ति को ऐसा ही एक अवसर तब मिला जब हम दिल्ली में पोस्टेड थे| राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुझे असम जाना था| संगोष्ठी गुवाहाटी में थी रुकने की बढ़िया व्यवस्था थी फ्लाईट की टिकिट थी और सबसे बड़े आकर्षण दो थे एक तो कामख्या देवी का मंदिर और दूसरा काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान| असम उत्तर पूर्वी भारत में एक राज्य है जो अन्य उत्तर पूर्वी भारतीय राज्यों से घिरा हुआ है। भारत का एक सरहदी राज्य, जिसे मैंने अभी तक नहीं देखा था| राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने असम में राष्ट्रीय संगोष्ठी का गुवाहाटी विश्वविद्यालय के साथ आयोजन किया, मेरे लिए यह एक अच्छा अवसर था उत्तर पूर्वी राज्यों को देखने का| हमारा परिवार घुमक्कड़, सभी साथ चलने के लिए तैयार, फटाफट प्रोग्राम बना बच्चों ने कहा सभी चलते हैं मम्मी की कांफ्रेंस के बाद काजीरंगा, शिलांग, मेघालय घूम लेंगे, एक साथ बहुत कुछ तय हो गया| गोष्ठी मानव अधिकार आयोग के अनुरूप शानदार रही| गुवाहाटी घूमने के लिए कांफ्रेंस के तीन दिन पर्याप्त थे| गोष्ठी के बाद हम कार टैक्सी से निकले|

सबसे पहले हमें ब्रह्मपुत्र का पुल देखना था| ब्रह्मपुत्र को देख याद आया कि ब्रह्मपुत्र सिर्फ एक नदी नहीं है, पढ़ा था कहीं कि यह नद है अर्थात नदी का पुर्ल्लिंग अर्थात् पुरुष रूप है। उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि यह नद एक दर्शन है समन्वय का, इसके तटों पर कई सभ्यताओं और संस्कृतियों का मिलन हुआ है। आर्य-अनार्य, मंगोल-तिब्बती, बर्मी-द्रविड़, मुगल-आहोम संस्कृतियों की टकराहट और मिलन का गवाह ब्रह्मपुत्र रहा है। एक असमिया लोकगीत सुना था सांस्कृतिक कार्यक्रम  में आसामी स्वर और शब्द बेहद मीठे थे, जो कुछ कुछ बंगालियों जैसे हैं, जिसका मुखड़ा मुझे याद था -

ब्रह्मपुत्र कानो ते, बरहमूखरी जूपी, आमी खरा लोरा जाई

ऊटूबाई नीनीबा, ब्रह्मपुत्र देवता, तामोल दी मनोता नाई।

इस लोक गीत में नायिका कहती है कि ब्रह्मपुत्र के किनारे बरहमूथरी के पेड़ हैं, जहाँ हम जलावन लाने जाते हैं। इसे निगल मत लेना, ब्रह्मपुत्र देव! हमारी क्षमता तो तुम्हें कच्ची सुपारी अर्पण करने तक की भी नहीं है| स्त्री के कितने विनम्र भाव हैं प्रकृति के प्रति वह जानती है कि ब्रह्मपुत्र एक विशाल नद है जिसका रौद्र रूप सब कुछ हरण कर सकता है, चूल्हे की आग तक| हम सबको पता है कि इसी ब्रह्मपुत्र का उद्गम तिब्बत स्थित पवित्र मानसरोवर झील से हुआ है| झील से निकलने वाली सांग्पो नदी जब पश्चिमी कैलास पर्वत के ढाल से नीचे उतरती है तो ब्रह्मपुत्र कहलाती है। तिब्बत के मानसरोवर से निकलकर बांग्लादेश में गंगा को अपने सीने से लगाती है यहाँ एक नया नाम पद्मा धारण करती है फिर आगे चलकर मेघना कहलाती है और सागर में समा जाने तक की २९०६ किलोमीटर लंबी यात्रा करते हुए बगैर थके निरंतर प्रवाहित होती है| संपूर्ण ब्रह्मपुत्र का किनारा लोहित किनारा कहलाता है|

हम ब्रह्मपुत्र के किनारे गीली रेत पर कुछ देर चलते रहे अपने ही पैरों के निशानों को देखते हुए| लेकिन कब तक चलते क्योंकि ब्रह्मपुत्र भारत की ही नहीं बल्कि एशिया की सबसे लंबी नदी है और उसके किनारे निरंतर चलना किसी के बस में नहीं| यदि इसे देशों के आधार पर विभाजित करें तो तिब्बत में इसकी लंबाई सोलह सौ पच्चीस किलोमीटर है, भारत में यह नौ सौ अठारह किलोमीटर और बांग्लादेश में तीन सौ तिरसठ किलोमीटर लंबी है यानी बंगाल की खाड़ी में समाने के पहले यह करीब तीन हजार किलोमीटर का लंबा सफर तय कर चुकी होती है। इस दौरान अनेक नदियाँ और उनकी उप-नदियाँ आकर इसमें समा जाती हैं। ब्रह्मपुत्र नदी के पश्चिमी किनारे पर  मिकरी पर्वत की तहलटी पर बसा यह उद्यान  ब्रह्मपुत्र की बाढ़ से बने समतली क्षेत्र में बसा हुआ है| यहाँ लंबे घने घास के मैदानों के साथ खुले जंगलों में परस्पर जुड़े जल प्रवाह और अनेक छोटी-छोटी झीलों की अनुकूलता है| यही वह वजह है जो आदिम जैव विविधता को भी अपने में आज तक जिन्दा रखे हुए है| यह भी आश्चर्य की बात है कि इस उद्यान का तीन चौथाई से ज्यादा भाग हर साल ब्रह्मपुत्र की बाढ़ में डूब जाता है लेकिन जैव वनस्पतियों को नष्ट करने के बजाय बाढ़ में लाई गई मिट्टी नया जीवन प्रदान करती है जिसके परिणामस्वरूप काजीरंगा में तीन प्रकार की मुख्य वनस्पतियाँ पाई जाती हैं जैसे- जलप्लावित घास का मैदान, उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन और उष्णकटिबंधीय अर्ध-सदाबहार वन, जो जंगली जीव जगत को आवास प्रदान करते हैं| जिनमें इसके पश्चिमी क्षेत्र में घास के जो मैदान हैं जहाँ ऊँचाई पर लंबी-लंबी ‘एलिफेंट’ घास लगी होती है वही गैंडो के छुपने के लिए सुरक्षा प्रदान करती है|

मध्य असम में बसा काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान पूर्वी भारत के अंतिम छोर का ऐसा उद्यान है जिसके लिए कहा जाता है जहाँ इंसान नहीं रहते परंतु भिन्न प्रकार की जीवन की विविधताएँ आसानी से देखी जा सकती हैं| सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि ४३० वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला यह उद्यान एक सींग वाले गैंडे का दुनिया का सबसे बड़ा आवास है क्योंकि काजीरंगा का प्राकृतिक परिवेश हरे-भरे जंगलों से भरा हुआ है जिसमें बड़ी-बड़ी एलिफेंट ग्रास, दलदली स्थान और उथले तालाब हैं इसीलिए यह एक सींग वाले गैंडे के साथ-साथ कई अन्य स्तनपाई जीवों जैसे- बाघ, हाथी, चीते, भालू, लंगूर, जीवों जंगली बिल्ली, भेड़िया और अजगर के अलावा सैकड़ों चिड़ियों का आवास हैं| पक्षी प्रेमियों के लिए भी यहाँ पर आमतौर पर पेलिकन, बत्तख, कलहंस, आइबिस, जलका, बगुला, लेसर एडजुलेंट और ईगल बड़ी संख्या में आसानी से देखे जा सकते हैं|

गुवाहाटी से काजीरंगा तक की लंबी सड़क यात्रा करते हुए जब हम काजीरंगा पहुँचे तो शाम होने को थी चाय के लिए मशहूर असम की चाय की खुशबू ने चाय की तलब पैदा की| चाय की स्पेशल गुमटी रास्ते में पड़ी जिस पर अलग-अलग फ्लेवर की चाय पीने को मिली| हम पहुँच चुके थे काजीरंगा के प्रवेश द्वार पर जहाँ हम रुके थे असम चाय बागानों में बनी अशोका ग्रुप की कोटेज में| रातें अँधेरी थी और चारों  तरफ चाय के बागान, दूर-दूर तक कोई आबादी नहीं पर कुछ दूर था एक रेस्टॉरेंट जो देशी स्टाइल का ही था खपरैल वाला, सर्दी इस कदर थी कि कमरे से बाहर निकलना कठिन था| साथ में पूरा परिवार था, लगा गलती हो गई चाय बागान और अशोका ग्रुप के चक्कर में हम बेहद निर्जन स्थान पर रुके हैं जहाँ यदि रात को कोई जंगली जानवर आ जाए तो कोई बचाने वाला भी नहीं| चाय और वेजिटेबल पकोड़े  के साथ शाम का धुँधला सा अँधियारा कुछ अच्छा भी लग रहा था और दो बेटियों के साथ यात्रा कर रही माँ को डरा भी रहा था| मोबाइल का कोई टावर वहाँ काम शायद नहीं कर रहा था, हम देर तक रेस्टॉरेंट में ही बैठे रहे अन्ताक्षरी खेलते हुए| फिर पता चला, सारे कॉटेज, डोरमेट्री सभी बुक हैं आई आई टी गुवाहाटी के फर्स्ट ईयर के छात्र आने वाले हैं, कुछ ही देर में १६ सीट वाली बस रुकी और वीराने निर्जन बागानों का वीराना जो हटा कि रात भर हंगामा होता रहा| अलाव जला कर रेस्टॉरेंट वाला उस आग में कभी आलू भुन देता रहा, हम शाकाहारी थे पर शायद देर रात असम के लड़कों के लिए उसमें कुछ और भी भुना होगा| दो ग्रुप में अलाव जल रहे थे कोई एक परिवार और था| रात चाँदनी थी जिसे दिल्ली में रहते हुए लम्बे समय से यूँ किसी मैदान में बैठ कर नहीं निहारा था, दामाद आनंद महाराष्ट्रियन है और गाते बहुत अच्छा हैं चाँद को लेकर सभी ने कुछ पुराने गीत गए—–आजा सनम मधुर चाँदनी में हम तुम मिले तो वीराने में भी आ जायेगी बहार——–

अलाव मीटिंग समाप्त हुई इस घोषणा के साथ कि सुबह पाँच बजे उठना है नहीं तो हाथी खाली नहीं मिलेंगे और सूर्योदय से पहले ही निकलना होगा| वो रात बेहद सर्द थी और कॉटेज में हीटर नहीं था रजाई में दुबक कर भी नींद का नाम नहीं था| देर रात जब बाहर लड़कों की हुडदंग कम हुई तो शांत वातावरण में नींद ने घेरा| अल सुबह चाय की केतली लिए लड़का दरवाजे पर था, जल्दी करो दीदी गाड़ी तैयार है| हम सब चाय पीकर स्वेटर, जर्किन शॉल सब ले चल दिए, सभी हाथी वाले महावत लाइन से खड़े थे हाथी भी सजे धजे पालकी वाले हमारे लिए फॉरेस्ट की तरफ से पहले ही हाथी की बुकिंग थी| रात का अँधेरा छँट रहा था और सूरज की पहली किरणें चमकने लगी थीं| सर्द रात का कोहरा अभी बाकी था उस धुँधलके में हमें हाथियों का एक झुण्ड दिखा जिनके साथ एक बहुत ही छोटा बच्चा भी था, यह देखने लायक दृश्य था बच्चा पीछे रह जाता तो माँ रूकती फिर उसे आगे लेती बच्चा हरी घास के लालच में रुक जाता, माँ शायद उसकी मंशा समझ गई थी उसने एक साफ़ सुथरी जगह से घास का बीड़ा अपनी सुंड में लपेटा और उखाड़ लिया फिर बच्चे की सुंड में रख दिया| थोड़ा ही आगे बढ़े थे कोहरा पूरी तरह हटा भी नहीं था यहाँ पानी के किनारे दलदली जमीन थी जहाँ घास हाथी छुप जाए इतनी बड़ी थी| कोहरे के अन्दर महावत ने इशारा किया———ओह! लुप्तप्राय भारतीय एक सींग वाले गैंडे को उसके बच्चे के साथ हम सामने देख रहे थे, याद आया एम एस सी ज्यूलोजी का चौथा पेपर जिसके लिए मैंने अपना ट्यूटोरियल राइनोसोर्स, यूनिकोर्निस और डायनोसोर्स पर तैयार किया था, कहाँ सोचा था कभी कि इस विलुप्त प्राय जीवन को इतने पास से कभी देख पाऊँगी| नहीं सोचा था कभी असम मुझे बुलाएगा और मैं दुर्लभ स्थान देख सकूँगी| मेरे सामने सूरज की रोशनी फ़ैल चुकी थी और जैसे हरा भरा ये जंगल मेरा स्वागत गीत गा रहा था| हम थोड़ा सा और आगे बढ़े, तालाब जैसा कोई क्षेत्र था जहाँ दलदल में दो-तीन रायनासोर्स एक साथ दिखे| एक अजूबा ही है इस प्राणी को देखना, काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान न केवल भारत में वरन् पूरे विश्व में एक सींग वाले गैंडे (राइनोसोर्स, यूनिकोर्निस) के लिए प्रसिद्ध है। यह राष्ट्रीय उद्यान असम का एकमात्र राष्ट्रीय उद्यान है जो केंद्रीय असम में स्थित है। उद्यान उबड़-खाबड़ मैदानों, लंबी-ऊँची घास और भयंकर दलदलों से पूर्ण कुल ४३० वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है।

महावत फॉरेस्ट के गाइड भी साथ रखते हैं उसी ने बताया एक सींग वाले ग्रेटर राइनोसोर्स  (राइनोसोर्स यूनिकॉर्निस) आईयूसीएन की संकटग्रस्त प्रजातियों की सूची में शामिल है| पिछले कुछ दशकों में इनकी संख्या में आश्चर्यजनक रूप से कमी आई है और ये विलुप्त होने के कगार पर पहुँच चुके हैं| विश्व में इनकी कुल जनसंख्या का करीब ८५ फीसदी भारत में है और असम में इनकी कुल ७५ फीसदी आबादी रहती है| उसने यह भी बताया कि ज्यादा हल्ला होने पर ये दो तरह से प्रतिक्रिया देते हैं या तो दलदल में छुप जाते हैं या गैंडा बड़ी ही आक्रामक मुद्रा में आपकी ओर दौड़ सकता है, बच्चे के साथ हो तो खतरा ज्यादा रहता है|

काजीरंगा की भी एक कहानी है जो गाइड के अनुसार कुछ इस तरह है जिसके अनुसार काजीरंगा और यहाँ का गैंडा बहुत उपयुक्त समय पर संरक्षण में ले लिए गए थे। यदि ऐसा न हुआ होता तो शायद इस प्राकृतिक धरोहर को आज हम न देख पाते। भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के वाइसराय लॉर्ड कर्जन की पत्नी ने चाय बागान के मालिक एक मित्र से असम के जंगलों में गैंडे के पाए जाने की बात सुनी तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ। सन् १९०४ में वह स्वयं गैंडे को देखने काजीरंगा गई। उस समय उन्हें गैंडा तो कहीं नहीं दिखा, पर उन्होंने उसके भारी-भरकम पाँवों के निशान देखे। इस आधार पर उन्होंने माना कि ऐसा जानवर काजीरंगा में है। यह जानवर कहीं लुप्त न हो जाए इस दृष्टि से लेडी कर्जन ने अपने पति को मनाया और वायसरॉय ने हुक्म जारी किया कि काजीरंगा में शिकार न किया जाए तथा उसे सुरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया। सन् १९१३ में काजीरंगा सुरक्षित वन को सेंचुरी का दर्जा दिया गया। गैंडे के अतिरिक्त सभी जानवरों की खाल व अन्य अंगों के गैरकानूनी व्यापार को बंद करवा दिया गया तथा जंगल को पर्यटकों के लिए खोल दिया गया। सन् १९७४ में काजीरंगा को राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा मिला। यूनेस्को द्वारा घोषित विश्‍व धरोहरों में से एक काज़ीरंगा राष्‍ट्रीय उद्यान साल २००५ में १०० वर्ष का हो चुका है| लगभग पाँच गैंडे हमें दो दिनों में दिखे दो बार बच्चे के साथ, इसके साथ ही एक सींग वाले राइनो के अलावा, काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में हमें हिमालयी वनस्पतियों और जीव के कई अन्य प्रजातियों के रूप में जैव विविधता दिखाई दी| ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे यह राष्ट्रीय उद्यान भारतीय हाथियों का भी प्राकृतिक निवास स्थान है, हिरण, बारहसिंघा, आलस भालू, बाघ, तेंदुए, जंगली भैंस, अजगर और पक्षियों की एक विस्तृत विविधता यहाँ देखी|

रंगपारा, जोरहट, दीमापुर जंगल के रास्ते के गाँव भी देखे| चाय जोरहट से खरीदी और चल दिए वापस यहाँ से हम क्योंकि हमें आगे सबसे बड़ा नदी द्वीप देखना था जो ब्रह्मपुत्र के मध्य में है| विश्व का सबसे बड़ा नदी द्वीप माजुली जिसे सँवारने के लिए स्वयं प्रकृति ने अपनी तमाम कलाएं उड़ेल दी हैं। कई तरह के विदेशी पक्षी प्रतिवर्ष आकर इस द्वीप पर बसेरा डालते हैं। यह कहा जा सकता है कि यह प्रवासी पक्षियों का स्वर्ग है| पता चला कि भूमि कटाव व अन्य प्राकृतिक कारणों से माजुली का क्षेत्रफल घट रहा है जो अब ८८० वर्ग किलोमीटर ही रह गया है। यहाँ से सुदूर हिमालय व अन्य पहाड़ियों का मनोहारी दृश्य साफ दिखता है। आत्मिक शांति और आध्यात्मिक चिंतन के लिए श्रेष्ठ माने जाने वाले इस द्वीप पर ही पंद्रहवीं शताब्दी में वैष्णव संत शंकर देव जी और उनके शिष्य माधवदेव जी का मेल हुआ था। माजुली के पश्चिम स्थित बेलगुड़ी में हुए इस मणिकांचन संयोग के बाद यहाँ पहले सत्र की स्थापना हुई। माजुली द्वीप पर पहुँचने वाला व्यक्ति एक आध्यात्मिक सम्मोहन से घिरने लगता है| माजुली द्वीप को देखकर पता चलता है कि प्रकृति हमें जीवन का दर्शन कितनी सहजता से सिखाती है| इसीलिए यहाँ वैष्णव धर्म के मूल्यों और सिद्धांतों के प्रचार के लिए ६५ अन्य सत्र बने, जिनमें से कई प्राकृतिक आपदाओं के कारण बह और ढह गए हैं, जिनमें जीवन का एक अलग दर्शन दिखाई देता है। सृजन और संहार प्रकृति में साथ चलते हैं|

पक्षी प्रेमी हूँ खूब सारे पंछी यहाँ देखे जो बारदोव, बारपेट, माधुपुर इत्यादि क्षेत्रों में भी दिख जाते हैं| माजुली पहुँचने का मुख्य रास्ता जोरहट से जोरहट निमति घाट होकर जाता है| यहाँ से हमें शिलांग जाना था, हम सबेरे नाश्ते के बाद निकल गए, रास्ते भर देखती रही मैं उन घरों को जो अपने घरों के साथ एक छोटा तालाब बना लेते हैं जिसमें मछली उगाई जाती है, यह निर्माण आँगन में बगीचे जैसा है पर इसमें फूल नहीं मछली उगाई जाती है|

 

- डा. स्वाति तिवारी

जन्म : धार (मध्यप्रदेश)

शिक्षा : एम.एस.सी., एल.एल.बी., एम.फिल, पी.एच.डी

शोध कार्य :

Ÿ महिलाओं पर पारिवारिक अत्याचार एवं परामार्श केन्द्रों की भूमिका

Ÿप्राथमिक शिक्षा के लोकव्यापीकरण में राजीव गांधी शिक्षा मिशन की भूमिका

Ÿअकेले होते लोग – वृद्धावस्था पर मनोवैज्ञानिक दस्तावेज

Ÿसवाल आज भी जिन्दा हैं : भोपाल गैस त्रासदी एवं स्त्रियों की सामाजिक समस्याएं (प्रकाशनाधीन)

रचनाकर्म :

Ÿमध्यप्रदेश और देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कहानी, व्यंग्य, समीक्षा, रिपोर्ताज, यात्रा-संस्मरण, कविताओं आदि का नियमित प्रकाशन

Ÿ आकाशवाणी, दूरदर्शन और निजी टी.वी. चैनलों पर रचनाओं का प्रसारण-पटकथा लेखन

विशेष :

मध्यप्रदेश की कलाजगत हस्ती कलागुरू विष्णु चिंचालकर पर निर्मित फिल्म की पटकथा-लेखन, सम्पादन और सूत्रधार

फिल्म निर्माण: इन्दौर स्थित परिवार परामर्श केन्द्रों पर आधारित लघु फिल्म “घरौंदा ना टूटे’ (निर्माण, सम्पादन और स्वर)

प्रकाशित कृतियॉ :-

कहानी-संग्रह :

Ÿ “क्या मैंने गुनाह किया’, Ÿ”विशवास टूटा तो टूटा’, Ÿ “हथेली पर उकेरी कहानियां’ Ÿ “छ जमा तीन”, Ÿ “मुडती है यूं जिन्दगी, Ÿ”मैं हारी नहीं’, Ÿ “जमीन अपनी-अपनी’, Ÿ “बैगनी फूलों वाला पेड”, Ÿस्वाति तिवारी की चुनिंदा कहानियां

अन्य महत्वपूर्ण प्रकाशन :

Ÿ वृद्धावस्था के मनोवैज्ञानिक वि¶लेषण पर केन्द्रित दस्तावेज – “अकेले होते लोग’

Ÿ”महिलाओं के कानून से संबंधित महत्वपूर्ण पुस्तक “मैं औरत हूं मेरी कौन सुनेगा’,

Ÿव्यक्तित्व विकास पर केन्द्रित पुस्तक “सफलता के लिए’

Ÿदेश के जाने-माने पत्रकार स्व.प्रभाष जोशी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित पुस्तक “शब्दों का दरवेश” (महामहिम उप राष्ट्रपति श्री हामिद अंसारी द्वारा 16 जुलाई 2011 को विमोचित)

प्रकाशनाधीन :

Ÿ सवाल आज भी जिन्दा है (भोपाल गैस त्रासदी और स्त्री विमर्श)

Ÿ लोक परम्पराओं में विज्ञान (माधवराव सप्रे संग्रहालय द्वारा प्रदत्त प्रोजेक्ट)

Ÿ ब्राहृ कमल एक प्रेमकथा (उपन्यास)

सम्पादन (1996 से 2004 तक) :

Ÿ सुरभि (दैनिक चौथा संसार),

Ÿ घरबार (दैनिक चेतना)

चर्चित स्तंभ लेखन (वर्ष 96 से 2006 तक) :

Ÿ हमारे आस पास (दैनिक भास्कर),

Ÿ महिलाएं और कानून (दैनिक फ्रीप्रेस, अंग्रेजी),

Ÿ आखिरी बात (चौथा संसार),

Ÿ आठवां कॉलम एवं अपनी बात (चेतना),

सम्मान और पुरस्कार :

Ÿ “अकेले होते लोग’ पुस्तक (वर्ष 2008-09) के मौलिक लेखन पर राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग नई दिल्ली द्वारा 80 हजार रुपये का राष्ट्रीय पुरस्कार

Ÿ “स्वाति तिवारी की चुनिन्दा कहानियाँ’ पर मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा 22/01/12 को वागेशरी सम्मान 2010 (छत्तीसगढ़ के महामहिम राज्यपाल के कर कमलों द्वारा)

Ÿ “बैंगनी फूलोंवाला पेड़’ कहानी संग्रह पर 02 अक्टूबर, 11 को प्रकाश कुमारी हरकावत महिला लेखन पुरस्कार (मध्यप्रदेश के महामहिम राज्यपाल के कर कमलों द्वारा)

Ÿ देश की शिशार्स्थ पत्रिका “द संडे इंडियन’ द्वारा देश की चयनित 21वीं सदी की 111 लेखिकाओं में प्रमुखता से शामिल

Ÿ “अभिनव शब्द शिल्पी अलंकरण”, 2012 सांस्कृतिक संस्था अभिनव कला परिषद, भोपाल द्वारा

Ÿ लब्ध प्रतिष्ठित पत्रकार पं. रामनारायण शास्त्री स्मृति कथा पुरस्कार

Ÿ जाने-माने रिपोर्टर स्व. गोपीकृष्ण गुप्ता स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार (श्रेष्ठ रिपोर्टिंग के लिए)

Ÿ शब्द साधिका सम्मान (पत्रकारिता पुरस्कार) Ÿ निर्मलादेवी स्मृति साहित्य सम्मान, गाजियाबाद (उत्तरप्रदेश)

Ÿ पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में अनुपम उपलब्धियों के लिए “स्व. माधवराव सिंधिया प्रतिष्ठा” सम्मान

Ÿ हिन्दी प्रचार समिति, जहीराबाद (आन्ध्रप्रदेश) द्वारा सेवारत्न की मानद उपाधि

Ÿ पं. आशा कुमार त्रिवेदी स्मृति मालवा-भूषण सम्मान

Ÿ मध्यप्रदेश लेखक संघ द्वारा स्थापित देवकीनंदन साहित्य सम्मान

Ÿ अंबिकाप्रसाद दिव्य रजत सम्मान

Ÿ भारतीय दलित साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश का सावित्रीबाई फूले साहित्य रत्न सम्मान

विशेष :

कुरुक्षेत्र वि.वि. हिमाचल प्रदेश और देवी अहिल्या वि.वि. इन्दौर, वि.वि.चैन्नई, जवाहरलाल नेहरू वि.वि. नई दिल्ली में कहानियों पर शोध कार्य।

मैसूर में 02 से 04 अक्टूबर, 2011 तक राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग एवं मैसूर विश्वविद्यालय द्वारा

“सुशासन और मानव अधिकार” पर आयोजित तीन दिवसीय सेमीनार में शोध पत्र का वाचन।

माण्डव में 5 से 7 नवम्बर, 2011 को देश के शिरसस्थ कथाकारों के संगमन 17 में भागीदारी।

संस्थापक-अध्यक्ष, इन्दौर लेखिका संघ, इन्दौर।

वुमन राइटर्स गिल्ड आफ इंडिया (दिल्ली लेखिका संघ) की सचिव (वर्ष 07 से 09)

इंडिया वुमन प्रेस कार्प, नई दिल्ली की आजीवन सदस्य

सम्प्रति : मध्यप्रदेश शासन में जनसम्पर्क विभाग में अधिकारी (राज्य शासन के मुखपत्र मध्यप्रदेश संदेश में सहयोगी सम्पादक)

सम्पर्क - चार इमली, भोपाल – 462016 (मध्यप्रदेश – भारत)

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