कहानी में कशिश

 

उसे दुख की झुलसाने वाली लपट ने पकड़ लिया था। वह तेज धूप में सूखी लकड़ी की तरह जलती हुई चटख रही थी। उसने दीवारों से अपना सिर  टकराया। वह रोई, बिलखी और गला फाड़कर घिघियाई। वह अपने सिर के उलझे-गुलझे बालों को नचा-नचाकर छत की ओर मुँह करके चींखी–”आख़िर, मेरा ग़ुनाह क्या है? क्या मेरा अपने लिए या अपने एक अदद बच्चे के लिए कुछ भी सोचने-करने का हक़ नहीं बनता? क्या मैं ख़ुद कोई फ़ैसला नहीं कर सकती? अगर यही हक़ीक़त है तो मुझे फ़ाँसी लगाकर ख़ुदकुशी कर लेनी चाहिए। मेरी इस दुनिया को ज़रूरत ही क्या है?”

उसने आह भरी तो उसमें गुर्राहट थी जो परदानशीं औरत के लिए ज़ायज़ नहीं होती। बेशक! उसमें गदर पैदा करने वाली गुर्राहट थी। वह अपने ख़ानदान की ऐसी पहली औरत थी जिसने मर्दों के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने की गुश्ताख़ी की थी। मर्दों द्वारा किए गए सैकड़ों फ़ैसलों को उनके द्वारा लागू किए जाने के बाद, यानी कई सालों और कई पीढ़ियों बाद इस मौज़ूदा पीढ़ी में उस एक अदद औरत ने उनके एक फ़ैसले और सिर्फ़ एक फ़ैसले के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई थी।

ऐसी बात नहीं है कि वह स्वभाव से बग़ावती थी। वहü जनानाखाने की दूसरी तीन औरतों में, जिनमें दो बेऔलाद थीं, बेहद ज़हीन और होनहार थी। वह इंसान थी और इस बात को मानने को कतई तैयार नहीं थी कि उसकी रूह भी औरत है। ज़िस्मानी तौर पर औरत होना उसे इस बात के लिए मज़बूर नहीं कर सकता कि वह मर्दों के आगे भींगी बिल्ली-सी रेंग-रेंग कर दुम हिलाना अपनी नियति समझे।

वह यानी ताहिरा रोज़ बेनागा पाँच दफ़े ख़ुदा की बंदगी करती थी। क़ुअरान शरीफ़ की आयतों का सस्वर पाठ करती थी। इतना ही नहीं, बड़े-बुज़ुर्गों के साथ बड़े अदब से और बच्चों के साथ माकूल मोहब्बत से पेश आती थी। उसने कभी भी बुज़ुर्गों से ज़बानज़दगी तक नहीं की थी। बच्चों को किसी बात के लिए चांटा लगाना तो दूर, उन्हें कोई फ़टकार भी नहीं लगाई थी क्योंकि वह उन्हें ख़ुदा की कीमती नियामत मानती थी। उसने आज भी अपनी दिनचर्या में कोई फ़ेर-बदल नहीं किया है। घर-परिवार और पड़ोस के प्रति उसके ताल्लुकात आज भी वैसे ही हैं।

उसने कोई तीन दशकों तक अपने होठों पर ताला लगाए रखा था। उसके चार गोरे-चिट्टे बेटों में से तीन ने पश्चिम की तरफ़ रुख कर लिया था। वे लौटकर कभी घर नहीं आए। बताया जाता है कि अपनी जान की कुर्बानी देकर वे हूरों के साथ लुत्फ़ उठा रहे हैं। लिहाज़ा, उसे ऐसी बातों पर कभी विश्वास हुआ हो या नहीं। पर, वह अपने हर बेटे की ज़ुदाई पर ख़ामोश रही और उसके भीतर उमड़ रहे आँसुओं के समंदर को उसके कलेज़े ने पी लिया। दादूजान के मन-मुताबिक उन्हें बारी-बारी से परदेस के टेररिस्ट कैंपों में दाख़िल करा दिया गया। ज़ेहाद के नाम पर जब-जब मिलिटरी झड़पों में उनके ‘शहीद’ होने की ख़बर आती, वह बेहया आँसुओं को निर्ममतापूर्वक पलकों से बाहर नहीं झड़ने देती। क्योंकि वह अपनी ममता को बदनाम नहीं करना चाहती थी। उसने अपने होठों को बखूबी सीए रखा। बल्कि, जब-जब दादूजान यह बताते कि रहमान, मुज़ीब और रफ़ीक़ को ख़ुदा के सबसे अज़ीज़ फ़रिश्तों के रूप में ज़न्नत में सभी बेशकीमती सुख-सुविधाएं मुहैया हो रही होंगी जो इस दुनिया के किसी भी आदमजाद को नहीं हो सकती तो वह कुछ भी फ़रियाद नहीं करती! इसे यह भी समझा जा सकता है कि वह उनकी बातों पर पूरी तरह अमल और यक़ीन कर लिया करती थी।

लेकिन उसकी मौज़ूदा प्रतिक्रियाओं को देखते हुए यह डंके की चोट पर कहा जा सकता है कि उसे दादूजान की बातों पर एकदम विश्वास नहीं रहा होगा। वह तो बस! अदब के कारण अपने बेटों के लिए उनके द्वारा किए गए फ़ैसलों के बाद उनकी मौतों पर कोई मातम नहीं मनाती थी। दूसरों को नहीं; पर, उसे तो बड़ा अज़ीब-सा लगता था जबकि उसके बेटों की तथाकथित ज़िहाद में शहादत पर घर में रंग-रेलियाँ और जश्न मनाए जाते थे।

बहरहाल, कब्र में पैर लटकाए बूढ़े दादूजान एक स्थानीय ज़ेहाद में शहीद हो गए। ऐसे में घर के हुक़ूमत की बागडोर अब्बूजान के हाथ में आ गई। ज़ाहिर है, दादूजान के सामने कठपुतली बनकर उनके हुक़्म की तामील करने वाले अब्बूजान को शाही फ़रमान ज़ारी करने का हक़ विरासत में मिला था। सो, उन्होंने दादूजान के बाद उनके फ़रमानों की धार को बरकरार रखा, बिल्कुल पुश्तैनी अंदाज़ में। दादूजान के आदेश पर अपने तीन-तीन बेटों को कुर्बान करके उनका सीना लगातार चौड़ा होता जा रहा था। जब भी मोहल्ले की मज़लिसों में उन्हें सार्वजनिक रूप से बोलने का अवसर मिलता, वह छाती चौड़ा करके ऐलॉन करते, “क्या बताऊँ, मुझे कितना फ़ख़्र है कि मेरे ज़ेहादी बच्चों ने हमारे कौम की अस्मिता की हिफ़ाज़त कितनी शिद्दत से की है और सोसायटी में मेरी इज़्ज़त रखी है? हम यह साबित करके रहेंगे कि हम हिंदुस्तानी काफ़िर, मोमिनों से कहीं ज़्यादा मज़हबपरस्त हैं। हम दुनिया में दार-उल-इस्लाम क़ायम करके रहेंगे, भले ही इसके लिए हमें सारी दुनिया में क़त्लेआम करना पड़े। हम दार-उल-हरब का नामों-निशां मिटाके रहेंगे क्योंकि ख़ुदा का यही हुक़्म है।”

एक ऐसी ही क़ौमी मज़लिस से लौटने के बाद अब्बूजान खुशी से बेलगाम हुए जा रहे थे। जनानाखाना में दस्तक देने से पहले ही वह ऐलॉन करते हुए दाख़िल हुए, “मुझे ताज़े ग़ुलाबजल वाली शर्बत पिलाओ। आज रात मेरे सभी रिश्तेदारों को बुलाओ और उन सभी को दावत दो। परदानशीं औरतों से कह दो कि वे बुरके उतारकर नाचे-गाएं और खुशियाँ मनाएं क्योंकि वाहिद मियां भी अपने भाइयों के नक्शे-क़दम पर चलते हुए अपने मज़हब की हिफ़ाज़त के लिए ज़ेहाद में शामिल होने पड़ोसी मुल्क़ों के टेररिस्ट कैंपों में ट्रेनिंग लेने जा रहे हैं…।”

अपने अब्बूजान के ऐलॉन का मतलब समझने के लिए सोलह वर्षीय वाहिद गुल्ली-डंडा का दिलचस्प खेल छोड़, भागता हुआ आया।

“अब्बा हुज़ूर! आप मुझे कहाँ भेजने का फ़रमान ज़ारी कर रहे हैं? इस साल तो मैं मिडिल क्लास में अव्वल आने की तैयारी में जुटा हुआ हूँ। मदरसे के ख़ास उस्ताद ने मुझसे बड़ी उम्मीदें लगा रखी हैं। कहते हैं कि अगर तुम्हारी अव्वल पोज़ीशन आती है तो तुम्हें आगे की तालीम के लिए वज़ीफ़ा मिल जाएगा और तुम्हारे लिए अच्छी तालीम का बंदोबस्त किया जा सकता है–बाक़ायदा बाहर के किसी क़ौमी मुल्क़ में रवाना करके…”

वाहिद की बात अब्बूजान के गले के नीचे नहीं उतर पाई। उनकी भौंहें तन गईं–बिल्कुल मरहूम दादूजान के अंदाज़ में। उनकी निग़ाह में वाहिद बेशक बड़ेÍêü बेअदब से पेश आया था। ज़न्नत में तशरीफ़ ले गए उसके भाइयों ने कभी इतनी ग़ैरत से बात नहीं की थी। आख़िर, वाहिद चाहता क्या है? वह गुस्से में तेजी से उसकी ओर बढ़े। तभी ताहिरा यानी उसकी अम्मीजान दीवार बन, उनके आगे आ-खड़ी हुई।

“वाहिद ठीक ही तो कहता है। वह एक ज़हीन बच्चा है और उसका पूरा ध्यान अपनी पढ़ाई पर है। एक बात और, मैं अपने कलेज़े के आख़िरी टुकड़े को ख़ूंख़ार दहशतगर्दों के गिरोह में शामिल होकर मरने-खपने नहीं दूंगी। भले ही इसके लिए मुझे कब्र में ज़िंदा गाड़ दिया जाए…”

ताहिरा के बाकी लफ़्ज़ उसके मुँह से रिहा नहीं हो पाए क्योंकि अब्बू ने  गुस्से में बेकाबू होते हुएü उसके गाल पर तीन जोरदार तमाचे जड़े थे जिनकी सनसनाती गूँज़ से घर की दीवारें भी झनझना उठीं। उनकी तीन और बीवियाँ कोठरियों में दुबक गई थीं–ख़ूंखार नेवले के निशाने पर बिल में दुबकी निरीह गिलहरियों के माफ़िक।

वह यानी ज़ब्बार अपने बेटे वाहिद की गरदन को जकड़कर घसीटते हुए दालान में ले गए और उसके ऊपर सबकों का तूफ़ान चला दिया, “अगरचे तूं अल्लाह का नेक बंदा है और मज़हब से तौबा नहीं करना चाहता तो उसकी फ़ौज़ में शामिल हो जा, वर्ना मैं तेरी बोटी-बोटी काटकर आवारा कुत्तों को खिला दूंगा। मेरे लिए मज़हब से बढ़कर तूं नहीं है। जब मैंने अपने तीन बच्चों के लिए आँसू का एक क़तरा भी नहीं बहाया तो तेरी क्या अहमियत है…।”

वाहिद अब्बू के बेहद गुस्सैल तेवर देख, मुश्किल से अपने लफ़्ज़ ज़बान पर ला सका, “अब्बा हुज़ूर, मैंने तो बस! जांबाज़ सिपाहियों वाले हिंदुस्तानी फ़ौज़ के बारे में सुन रखा है और मैंने क़सम खाई है कि आवाम में अमन-चैन कायम रखने के लिए बड़ा होकर मैं भी इस फ़ौज़ का एक बहादुर सिपाही बनूंगा–बिल्कुल अब्दुल हमीद के तर्ज़ पर क्योंकि वतन की हिफ़ाज़त हमेशा मज़हब की अस्मिता से अहम होती है। फ़िर, आप किस फ़ौज़ की बात कर रहे हैं? क्या इबादतख़ानों में अल्लाह की इबादत करने वाले मौलवियों के फ़ौज़ की बात कर  रहे हैं? बहरहाल, अगर आप उन बंदों में मुझे शामिल करके किसी इबादतख़ाने का मौलवी बनाना चाहते हैं तो थोड़ा और सब्र-इंतज़ार कर लें। मुझे क़ुरान, गीता और बाइबिल के ढेरों इंसानी सबक अपनी ज़ेहन में पूरी तरह ज़ज़्ब करने हैं…।”

तभी उसकी गरदन पर अब्बू की जकड़ इतनी ज़बरदस्त हो गई कि वह दर्द से बिलबिला उठा। लेकिन, अब्बू पर उसकी कराह का तनिक भी असर होने वाला नहीं था। वह अपनी रौ में बोलते चले गए, “अल्लाह की फ़ौज़ का मतलब इबादतग़ारों और पुजारियों से कतई नहीं है। इसका मतलब हिंदुस्तानी फ़ौज़ से भी नहीं है। इसका मतलब उन आदमियों से है जो मज़हब के नाम पर और इसकी अस्मिता को बरकरार रखने के लिए ग़ैर-मज़हबदारों का नामों-निशान मिटाने के लिए ख़ुद को कुर्बान कर देते हैं। ये अल्लाह का फ़रमान है कि इस ज़मीं पर बस एक ही मज़हब के लोगों को रहने का हक़ है। ईसाई, यहूदी, बौद्ध, हिंदू, जैन वग़ैरह न जाने कितने मज़हबदार हैं जिन्हें अपने मज़हब से तौबा कर लेना चाहिए और हमारे मज़हब में शामिल हो जाना चाहिए। वर्ना, इन मुशरिक़ों पर ख़ुदा का कहर आसमान से बिज़ली की माफ़िक़ बरप पड़ेगा। जो जलजला आएगा उसमें बस, सच्चे मुसलमां ही बच पाएंगे।”

वाहिद से अब्बू की बातें बरदाश्त नहीं हुई। वह जोश में आ गया, “अब्बूजान, आप ये कैसी बातें कर रहे हैं? मदरसे के मौलवी सा’ब और ज़्यादातर उस्ताद बताते हैं कि इंसानियत सबसे बड़ा मज़हब है। जब इंसान पैदा होता है तो उसके माथे पर किसी ख़ास मज़हब का नाम नहीं लिखा होता। किसी मुसलमां के बच्चे को किसी ईसाईन के गोद में डाल दीजिए, वह बड़ा होकर ईसाई ही बनेगा या एक हिंदू के बच्चे के लालन-पालन की ज़िम्मेदारी  किसी मुसलमां औरत को दे दीजिए, बड़ा होकर वह मुसलमां ही बनेगा, हिंदू नहीं। ये सारे धर्म-मज़हब तो इंसानियत को क़ैदख़ाने में डालने के लिए बनाए गए हैं।”

ज़ब्बार मियाँ दहाड़ उठे, “अरे पिल्ले! तेरे मदरसे में क्या ऐसी ही अनर्गल बातें सिखाई जाती हैं? अपने कान अच्छी तरह खोलकर सुन ले–ख़ुदा सिर्फ़ मुसलमां का  होता है; हिंदू या ईसाई का कोई ख़ुदा नहीं होता। और हाँ, तेरे मदरसे में जो पैसा पाकिस्तान और अरब मुल्क़ों से आता है, उसका इस्तेमाल मुसलमां बच्चों को ज़ेहादी बनाने में ही होना चाहिए। लेकिन, तेरी बातें सुनकर तो ऐसा लगता है कि उस पैसे का इस्तेमाल हिंदुस्तान की अमनपरस्ती के लिए हो रहा है। तुझे मालूम होना चाहिए कि इस्लाम की तूती बुलवाने के लिए हम सभी मुसलमानों को मुल्को-अमन के फ़िज़ूल ज़ज़्बात से ऊपर उठना होगा। आइंदा तेरे मदरसे को किसी भी प्रकार का कोई बाहरी इमदाद नहीं दिया जाएगा। मैं अभी पाकिस्तान और अरब मुल्क़ों को यह पयाम भेजता हूँ कि वे ऐसे हिंदुस्तानी मदरसों को इमदाद देना बंद करें जहाँ मुस्लिम बच्चों को हिंदुस्तान का वतनपरस्त बनाने का बेजा धंधा धड़ल्ले से चल रहा है।”

ज़ब्बार मियाँ का असली रूप सामने आ गया था। ज़नानेख़ाने में दुबकी ताहिरा तैश में आते हुए बाहर आ गई और अपने गाल पर तमाचों से पड़े लाल चकत्तों को सहलाते हुए अपने शौहर के सामने फिर आ-खड़ी हुई। इस बार उसके चेहरे पर दहशत की कोई शिकन नहीं थी। उसने जबरन वाहिद की गरदन उनकी पकड़ से छुड़ाई और बिंदास बोल उठी–”अब मेरी समझ में आ गया; इस मुल्क़ में जिन दहशतगर्दों ने तबाही और ख़ून-खराबा का तबाहकुन आलम बना रखा है, उनके सरगने आप जैसे ख़ुदगर्ज़ हिंदुस्तानी ही हैं जो सिर्फ़ अपनी अस्मिता को कायम रखने के लिए ग़ैर-इंसानी हथकंडे अपनाते हैं और यहाँ की पाक जमीन को लाशों से पाटने का नाज़ायज़ धंधा करते हैं। आप इस मुल्क़ में हजारों-लाखों यतीमों, बेवाओं और अपाहिजों के ग़ुनहग़ार हैं। आप इंसान नहीं, इंसानियत का ख़ून बहा रहे हैं–परवरदिग़ार आपको कभी माफ़ नहीं करेगा। क़यामत के दिन उसके कटघरे में खड़े होकर आप क्या ज़वाब देंगे?”

ज़बानज़दगी पर उतारू अपनी बीवी के तीखे तेवर देख, ज़ब्बार का ख़ून उबल उठा। उन्होंने पहले ताहिरा को धक्का देकर दीवार से उसका सिर टकराया; फिर, बड़ाबड़ा उठे, “बदतमीज़ औरत! तेरी ये मज़ाल कि तूं अपने शौहर से ज़बान लड़ाए? अरे, हमारे मज़हब में ऐसी औरत को ज़िंदा दफ़्न करने का हुक़्म है। तुझे इस बात का बिल्कुल इल्म नहीं है कि मैं तेरे साथ कैसा सलूक कर सकता हूँ। बहरहाल, मैं यह जानना चाहता हूँ कि किस शख़्स की शह पर तूं ऐसी हरकतें कर रही है। क्या बुतपरस्तों से तेरा याराना हो गया है या कि शैतान की औलाद पंडितों-पादरी के साथ तूं मुंह काला करने लगी है? तूं मुझसे हलाल होने से पहले सारी बातें सच-सच उगल दे वर्ना…”

वह जैसे ही हाथ में गड़ांसा ताने हुए झपटे, वाहिद अपने दोनों हाथों से उनके वार को रोकते हुए के उनके बीच दीवार की तरह खड़ा हो गया। पर, यह क्या? वाहिद ने तो सारी हदें ही पार कर दीं। जवान हो रहे वाहिद ने अपनी ताकतवर बाजुओं से उनके हाथों को जोर से जकड़ दिया।

“ख़बरदार, अब्बाजान! मुझे सारी बातें समझ में आ रही हैं। आप मेरी नेकदिल अम्मी पर ऐसी तोहमत कैसे लगा सकते हैं? अम्मी मुनासिब फ़रमा रही हैं। मैं ख़ुद अल्लाह की क़सम खाता हूँ कि मैं अपने भाइयों के नक्शे-क़दम पर कतई नहीं चलूंगा। आज मैं अपने भाइयों के बग़ैर अकेला महसूस करता हूँ। मेरे साथ प्यार-मोहब्बत से पेश आने वाले मेरे भाई भगवान को प्यारे हो चुके हैं। बेशक, उन्हें न तो मौज़-मस्ती के लिए हूरें मिली होंगी न ही ऐशो-आराम के सामान मिले होंगे। दरअसल, ज़न्नत है कहां? किसे पता है, उन्हें आख़िरी वक़्त जबकि उनकी कमर में बंधा बम फ़टा होगा तो वे कितना पछताए होंग़े!”

पर, ज़ब्बार मियां गुस्से में और अधिक बेकाबू हो गए। वह वाहिद को एक धक्के से हटाते हुए फिर ताहिरा की ओर झपटे। तभी वह घर के बाहर कुछ लोगों की चहलकदमी की आहट सुनकर सहमते हुए रुक-से गए। पर, उनकी तैश में कमी नहीं आई थी। वह ग़ुर्रा उठे, “अबे कौन है, बाहर जो हमारे अंदरूनी मामलों में दख़लंदाज़ी करने के लिए अंदर घुस आया है?”

तभी पुलिसवर्दी में कुछ शख़्स तेजी से अंदर घुसते चले आए। ज़ब्बार घबड़ा-से गए; पर, अगले ही पल ताहिरा उन पुलिसवालों से मुख़ातिब होते हुए ज़ब्बार मियां की ओर इशारा किया, “दीवान जी! यही है वो हिंदुस्तानी आवाम का दुश्मन जो इस वतन के साथ गद्दारी कर रहा है। बदक़ीस्मती से यह मेरा शौहर है; चुनांचे, मेरे लिए वतन से बढ़कर ये कैसे हो सकता है? तभी तो मैंने आपको यहाँ फ़ोन करके तलब किया है।”

पुलिसवालों ने ज़ब्बार के दोनों बाजुओं को जकड़कर उनके हाथों में हथकड़ी डाल दी और उनके हाथ से गड़ांसा छीनते हुए उनके पैरों को जंजीर से बाँध दिया। उस पल वाहिद ने अपनी अम्मी की ओर देखा; फ़िर अब्बू की ओर पीठ करके वह मुस्करा उठा, “अब्बूजान, मौत के बाद इंसान का सब कुछ ख़त्म हो जाता है। जब ज़िस्म ही नहीं तो रूह क्या मौज़-मस्ती कर पाएगी? रूह और आत्मा तो सब दिमाग़ी फ़ितूर है। साइंसदानों ने साबित कर दिया है कि ज़िंदगी सिर्फ़ इसी ज़मीं पर है। आसमां भी बेजान है। मंगल ग्रह तो वीरान है ही; इंसान चांद पर जाकर देख चुका है कि वहाँ ज़िंदगी के पनपने के लिए माक़ूल आबोहवा है ही नहीं। बृहस्पति गैस का गोला है और शनि ग्रह पर तेज़ाब बरसता है। प्लूटो और यूरेनस पर धूप ही नहीं पहुंच पाती। शुक्र और बुध पर या तो आग के गोले बरसते हैं या भयानक बर्फ़पात होता है। ऐसे में बताइए कि मेरे भाईजान कहाँ गए होंगे। मैं सच कहता हूँ, आपके पाकिस्तानी, ईरानी और अरबी आका हम हिंदुस्तानी मुसलमानों का यूज़ कर रहे हैं। वे ख़ुद क्यों छिपे बैठे रहते हैं? वे ज़िंदे आदमियों के पेट से बम बाँधकर उनकी और लाखों बेग़ुनाहों की ज़िंदगियों से क्यों खेलते हैं? फ़र्ज़ कीजिए, सारी दुनिया के इंसान दार-उल-इस्लाम के तहत मुसलमान बन जाते हैं; पर, इस दुनिया के कीट-पतंगों और बेशुमार जानवरों को दार-उल-इस्लाम के तहत कैसे लाएंगे? क्या ये मस्ज़िदों में जाकर इबादत कर सकेंगे या कि नमाज़ अता कर पाएंग़े? इन पेड़-पौधों का मज़हब कैसे बदल पाएंगे? इनका तो कोई मज़हब ही नहीं है? इनके यहाँ कोई पैगंबर, अवतारी देवता या देवदूत तो होता ही नहीं। इसीलिए, मैं आपसे अर्ज़ करता हूँ कि मतलब साधने के लिए लिक्खी गई उन किताबों से तौबा कर लीजिए जिन पर दुनिया-भर के मोमिनों को नाज़ है।”

पुलिस इंस्पेक्टर अफ़ज़ल खाँ ने वाहिद की पीठ थपथपाई, “अरे, मुझे तो यक़ीन ही नहीं होता कि ये बच्चा इस शख़्स का हो सकता है। बेटा देश की हिफ़ाज़त करने पर उतारू है और बाप देश को नीलाम करने पर आमादा है। मैं इस बच्चे की दलीलों से पूरा इत्तफ़ाक़ रखता हूँ कि हमारे लिए पहले हमारा देश और आवाम है, उसके बाद कोई मज़हब या धर्म, कोई धर्मग्रंथ या इबादतख़ाना। यूं भी भगवान या ख़ुदा को किसने देखा है? हमें तो हर जगह इंसान और अपना आवाम ही दिखाई देता है। हमारे लिए आवाम के लिए अदा किए जाने वाले फ़र्ज़ ही अहम हैं…”

पलभर के लिए वाहिद मुस्कराया; फ़िर संज़ीदा हो गया, “इंस्पेक्टर अंकल! मेरे वाहिद को मालूम ही नहीं है कि वह क्या कर रहे हैं। हमें ये कैसे गवारा हो सकता है कि जिस बगीचे में तमाम किस्म के ख़ुशबूदार और ख़ूबसूरत फूल-पौधे लहलहा रहे हैं, वहाँ हम उन्हें उजाड़कर कैक्टस उगाएं? जिस मुल्क़ में क़ायनात की सारी खूबियाँ समाई हुई हैं, हम उन्हें मिटाकर इसे बियांबा में तबदील क्यों करें? जहाँ डाली-डाली पर हंस, मोर और तोते किलकारियाँ मारते हैं, वहाँ उन डालियों पर उल्लुओं को मातम बरपाने के लिए क्यों बैठाएं? पड़ोसी मुल्क़ तो हमारी खुशियों से डाह करते हैं और हमारे मुल्क़ में आँसुओं और आहों की सुनामी लाने के लिए क्या-क्या हथकंडे नहीं अपनाते? हथियारों और जानलेवा नशीली चीज़ों की तिज़ारत करके उन्होंने हमारे मुल्क़ को तबाह कर डाला है। मेरा ऐलॉन है कि आइंदा इस चमन में ज़ेहाद, जक़ात और इस्लाम न कबूले जाने पर क़त्लेआम के वाक़यात फ़िर नहीं दोहराए जाएंगे।”

वाहिद के लफ़्ज़ सुनकर इंस्पेक्टर अफ़ज़ल और हवलदार क़साब तथा दाऊद दोनों बारी-बारी से वाहिद की पीठ थपथपाए जा रहे थे जबकि हथकड़ी और जंजीर में बंधा ज़ब्बार आँख तरेरने से बाज नहीं आ रहा था।

बहरहाल, ताहिरा और वाहिद की गवाही पर मुल्क़भर में कई संगीन ख़ून-खराबों के वारदात को अंज़ाम देने के ज़ुर्म में ज़ब्बार को फ़ाँसी की सज़ा तो सुनाई गई; पर, अमन-परस्त माँ-बेटे की रहम की दर्ख़्वास्त किए जाने के बाद फ़ाँसी की सज़ा को उम्र-क़ैद में तब्दील कर दिया गया। पर, हिंदुस्तानी जेल में उन्हें जान से मारने के लिए उनके दहशतगर्द आकाओं द्वारा कई बार कोशिशें की गईं। ऐसे तीन-तीन हमलों में बाल-बाल बचने के बाद वह गहरे सोच में डूब गए–”क्या मैं इन ख़ुदगर्ज़ हैवानों के हाथ की बस, कठपुतली-भर था? अरे, मैंने तो उन डॉनों के इशारे पर अपना घर-बार सब कुर्बान कर दिया। उन सबके एवज़ में क्या यही ईनाम मुझे मिलना था?”

एक दिन जेल में मुलाक़ात के लिए आई अपनी बीवी के सामने वह बिलख-बिलख कर बड़बड़ाने लगे, “बेग़म, मुझे ज़िंदगी का असली राज पता चल गया है जो यह है कि दुनिया का सबसे बड़ा ग़ुनाह बेकुसूर इंसानों का ख़ून बहाना है। अगर कोई धर्म या मज़हब यह बताता है कि धर्म के नाम पर हुक़ूमत का दायरा बढ़ाया जाए तो वह धर्म, धर्म नहीं, शैतानी क़वायद है।”

ताहिरा शौहर में आए इस बदलाव से हैरत में थी। घर आकर वह अफ़सोस के समंदर में गोते लगाते हुए ख़ुद को कोसने लगी। उसने वाहिद से कहा, “आज तुम्हारे अब्बा जेल में चक्की पीस रहे हैं जिसके लिए मैं ही ज़िम्मेदार हूँ। मेरे ही इत्तला करने पर पुलिस की गिरफ़्त में वो आए और मेरे ही द्वारा कोर्ट में उनके ख़िलाफ़ सारे सबूत जमा किए जाने पर उन्हें सज़ा हुई…”

वाहिद कुछ मायूस होकर अम्मी के गले में हाथ डालकर बमुश्किल मुस्कराया और बोल उठा, “पर अम्मी, आप ये क्यों भूल कर रही हैं कि भले ही वो आपके शौहर और हमारे अब्बा हैं; पर, आपने एक बड़े खूंख़ार हैवान को इंसान बनाने का नेक काम भी किया है? अल्लाह आपको इस उम्दा कारनामे के लिए ज़न्नत भले ही न बख़्शे; पर, एक बात बताइए कि अगर अब्बाजान जेल न जाकर आज इस मुल्क़ में तमाम ख़ून-ख़राबे को अंज़ाम दे रहे होते तो क्या आपको खुशी होती? मुझे तो उनके जेल जाकर उनके हृदय-परिवर्तन होने पर ही बेहद खुशी हो रही है। लिहाज़ा, उन्हें भी अपनी गलती का अहसास हो गया है। आपने उन्हें बुद्ध, ईसा, अक़बर, कबीर, तुलसी, गांधी जैसी मानवतावादी शख़्सियतों के साहित्य पढ़ाकर उन्हें संत बना दिया है। अब वो मेरे भाइयों रहमान, मुज़ीब और रफ़ीक़ को यादकर फ़फ़क-फ़फ़क कर रो उठते हैं। जब उन्हें पता चला कि पाकिस्तान और इस्लामी मुल्क़ों में बैठे उनके आका उन्हें जेल में ही मरवाने की साज़िश सिर्फ़ इसलिए रच रहे थे कि कहीं वो उनकी साज़िशों और ख़ुफ़िया बातों का पर्दाफ़ाश न कर दें, तब जाकर उन्हें अहसास हुआ कि वह उनके हाथ के सिर्फ़ कठपुतली थे। अब तो वह ख़ुद ही कहते हैं कि इस दुनिया से बाहर न तो कोई ज़न्नत है न ही कोई ज़हन्नुम; फिर उनके अज़ीज़ बेटे रहमान, मुज़ीब और रफ़ीक़ कहाँ गए होंगे?”

 

- डॉमनोज मोक्षेंद्र

लेखकीय नाम: डॉ. मनोज मोक्षेंद्र  {वर्ष २०१४ (अक्तूबर) से इस नाम से लिख रहा हूँ। इसके   पूर्व ‘डॉ. मनोज श्रीवास्तव’ के नाम से लिखता रहा हूँ।}

वास्तविक नाम (जो अभिलेखों में है) : डॉ. मनोज श्रीवास्तव

जन्म-स्थान: वाराणसी, (उ.प्र.)

शिक्षा: जौनपुर, बलिया और वाराणसी से (कतिपय अपरिहार्य कारणों से प्रारम्भिक शिक्षा से वंचित रहे) १) मिडिल हाई स्कूल–जौनपुर से २) हाई स्कूल, इंटर मीडिएट और स्नातक बलिया से ३) स्नातकोत्तर और पीएच.डी. (अंग्रेज़ी साहित्य में) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से; अनुवाद में डिप्लोमा केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो से

पीएच.डी. का विषय: यूजीन ओ’ नील्स प्लेज: अ स्टडी इन दि ओरिएंटल स्ट्रेन

लिखी गईं पुस्तकें: 1-पगडंडियां (काव्य संग्रह), वर्ष 2000, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, न.दि., (हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि); 2-अक्ल का फलसफा (व्यंग्य संग्रह), वर्ष 2004, साहित्य प्रकाशन, दिल्ली; 3-अपूर्णा, श्री सुरेंद्र अरोड़ा के संपादन में कहानी का संकलन, 2005; 4- युगकथा, श्री कालीचरण प्रेमी द्वारा संपादित संग्रह में कहानी का संकलन, 2006; चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह), विद्याश्री पब्लिकेशंस, वाराणसी, वर्ष 2010, न.दि., (हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि); 4-धर्मचक्र राजचक्र, (कहानी संग्रह), वर्ष 2008, नमन प्रकाशन, न.दि. ; 5-पगली का इन्कलाब (कहानी संग्रह), वर्ष 2009, पाण्डुलिपि प्रकाशन, न.दि.; 6.एकांत में भीड़ से मुठभेड़ (काव्य संग्रह–प्रतिलिपि कॉम), 2014; 7-प्रेमदंश, (कहानी संग्रह), वर्ष 2016, नमन प्रकाशन, न.दि. ; 8. अदमहा (नाटकों का संग्रह–ऑनलाइन गाथा, 2014); 9–मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में राजभाषा (राजभाषा हिंदी पर केंद्रित), शीघ्र प्रकाश्य; 10.-दूसरे अंग्रेज़ (उपन्यास), शीघ्र प्रकाश्य

संपादनमहेंद्रभटनागर की कविता: अन्तर्वस्तु और अभिव्यक्ति

–अंग्रेज़ी नाटक The Ripples of Ganga, ऑनलाइन गाथा, लखनऊ द्वारा प्रकाशित

–Poetry Along the Footpath अंग्रेज़ी कविता संग्रह शीघ्र प्रकाश्य

–इन्टरनेट पर ‘कविता कोश’ में कविताओं और ‘गद्य कोश’ में कहानियों का प्रकाशन

–महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्याल, वर्धा, गुजरात की वेबसाइट ‘हिंदी समय’ में रचनाओं का संकलन

सम्मान: ‘भगवतप्रसाद कथा सम्मान–2002′ (प्रथम स्थान); ‘रंग-अभियान रजत जयंती सम्मान–2012′; ब्लिट्ज़ द्वारा कई बार ‘बेस्ट पोएट आफ़ दि वीक’ घोषित; ‘गगन स्वर’ संस्था द्वारा ‘ऋतुराज सम्मान-2014′ राजभाषा संस्थान सम्मान; कर्नाटक हिंदी संस्था, बेलगाम-कर्णाटक  द्वारा ‘साहित्य-भूषण सम्मान’; भारतीय वांग्मय पीठ, कोलकाता द्वारा साहित्यशिरोमणि सारस्वत सम्मान (मानद उपाधि)

“नूतन प्रतिबिंब”, राज्य सभा (भारतीय संसद) की पत्रिका के पूर्व संपादक

लोकप्रिय पत्रिका वी-विटनेस” (वाराणसी) के विशेष परामर्शक, समूह संपादक और दिग्दर्शक

‘मृगमरीचिका’ नामक लघुकथा पर केंद्रित पत्रिका के सहायक संपादक

हिंदी चेतना, वागर्थ, वर्तमान साहित्य, समकालीन भारतीय साहित्य, भाषा, व्यंग्य यात्रा, उत्तर प्रदेश, आजकल, साहित्य अमृत, हिमप्रस्थ, लमही, विपाशा, गगनांचल, शोध दिशा, दि इंडियन लिटरेचर, अभिव्यंजना, मुहिम, कथा संसार, कुरुक्षेत्र, नंदन, बाल हंस, समाज कल्याण, दि इंडियन होराइजन्स, साप्ताहिक पॉयनियर, सहित्य समीक्षा, सरिता, मुक्ता, रचना संवाद, डेमिक्रेटिक वर्ल्ड, वी-विटनेस, जाह्नवी, जागृति, रंग अभियान, सहकार संचय, मृग मरीचिका, प्राइमरी शिक्षक, साहित्य जनमंच, अनुभूति-अभिव्यक्ति, अपनी माटी, सृजनगाथा, शब्द व्यंजना, अम्स्टेल-गंगा, शब्दव्यंजना, अनहदकृति, ब्लिट्ज़, राष्ट्रीय सहारा, आज, जनसत्ता, अमर उजाला, हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, दैनिक भास्कर, कुबेर टाइम्स आदि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं, वेब-पत्रिकाओं आदि मेंप्रचुरता से  प्रकाशित

आवासीय पता: विद्या विहार, नई पंचवटी, जी.टी. रोड, (पवन सिनेमा के सामने), जिला: गाज़ियाबाद, उ०प्र०, भारत.

सम्प्रति: भारतीय संसद में प्रथम श्रेणी के अधिकारी के पद पर कार्यरत

4 thoughts on “कहानी में कशिश

  1. कहानी का प्लॉट अच्छा है। विषय का निरूपण आकर्षक है और भाषा माशाल्लाह! बधाई!

  2. समयानुसार बोल्ड कहानी है। ऐसी थीम पर कोई लेखक लिखने की हिम्मत नहीं करता। पर, इसी थीम पर कहानियाँ लिखी जानी चाहिए ताकि विश्व के जंगल राज से छुटकारा मिल सके।

  3. इस कहानी के बारे में क्या कहूँ? उन्हें नंगा करने का प्रयास किया गया है जिन्होंने पूरी दुनिया को ख़ौफ़ के सायों में जीने के लिए मज़बूर कर दिया है। एक कट्टर सोच को बदलना होगा; दुनिया में अमन-चैन लाने के लिए ऐसा ही करना होगा। इतनी अच्छी कहानी के लिए साधुवाद!

  4. इसी तरह आईना दिखाने का काम कहानीकारों को करनी चाहिए। कथाकार मोक्षेंद्र जी को साधुवाद!

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