कविता – लकड़बग्घा

रिपोर्ट आ गयी
वाकई बच्चों को उठा ले गया
वही लकड़बग्घा
जो कभी रात के अंधेरे में
मुख्य बस्ती के बाहर
बने कुछ छप्पर छानी के अंदर
या किसी टूटे कच्चे मकान के भीतर
वंचितों व सुविधा हीनों
के घरों में झांक कर
दबे पाँव
माँ के स्तनो से छुटाकर
उठा ले जाते रहे
दुध मुहे छोटे बच्चे कोकोई फर्क नहीं पड़ा, पहले
हुंह आं / हुंह आं / हुंह आं करते
लकड़बग्घा जंगल से
बस्ती की ओर मुह अंधेरे
या घनी काली रात को आते रहे
अब वही शहर की कोठियों से
अपनी पहचान व शक्ल बदल
आक्सीजन की कमी का मुखौटा लगा
हमला करता है चुपचाप दबे पाँव
मौका मिलते ही धावा बोलता है
बच्चों पर हीकोई फर्क नहीं पड़ा
पहले भी वंचित और निर्धन विपन्न
घरों के चिराग बुझते रहे
और अब भी होता है वही
इन्ही घरों में है
बच्चा खो जाने का
रुदन का शोर – मृत्यु का कोहराम

किस दिशा में हल्ला बोलें
लकड्बग्घों से बचने का
कैसे हाँका दें लकड्बग्घों को
जंगल में खदेड़ने का

बड़ा फर्क है अब
शहर में आदमजात नहीं रहता
निवास करता है
एक सिस्टम
एक दिनचर्या खोखली
एक अबूझी जीवन शैली

कंक्रीट के इन जंगलों में
रोशनी में नहाई
बदहवास रात है
और उद्दीग्नता से सजा संवरा दिन
ऊँघती मानवता
अखवार के पन्ने में
मुंह छिपा लड़ रही है
अपने वजूद की अंतिम लड़ाई
और वंचितों की झोपड़ी में
निशिद्दों की गली में
रोज हो रहा है
कुछ न कुछ खोने के मातम

- अवधेश सिंह 

 

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