कविता ऐसी नहीं होती है

 

लिखता हूँ मैं जो भी रचना
घटना, वो आँखों देखी होती है
फिर भी कहते मुझसे लोग
कविता ऐसी नहीं होती है…

वो कहते हैं पायल लिख
घुंघरू की झंकार सुना
झांझर के संग गोरी लिख
गोरी माथे बिंदिया लिख..

मैं लिखता हूँ बिखरी पायल
जैसे वन में हिरणी घायल
झर नैनों में प्यास लिए
कातरता की आस लिए
मैं दर्पण का मुख लिखता हूँ
फिर भी …..

बालों में तू गजरा गुंथ
उन आँखों में कजरा लिख
चौली-चूनर, नथनी-बाली
मेंहदी-चंदन-सुरमा लिख…

तार-तार है अंगिया चूनर
नथनी- बाली से रिसे लहू
सूनी आँखें नीर बहाती
काजल की बस कोर बची है..
मैं लिखता हूँ आँख का पानी…
फिर भी —-
गेसू को तू घटा बनाकर
जुल्फों को गालों से हटा
अधरों को तू कलियाँ कह दे
फिर अलि का आलिंगन लिख…

मैं लिखता लट उलझी-उलझी
कुमकुम माथे पुंछी- पुंछी
भ्रमर नजर है श्रृंगारी
गजरे की बस डोर बची है…
मैं आँखों देखी दिखलाता हूँ
फिर भी कहते….

गरदन को तू लिख सुराही
भंवर रूप के हों पैमाने
आँखों को मयखाना लिख
कविता ऐसी मदवाली लिख…

झीना लहंगा, झीनी चूनर
उघडा यौवन लुका-छुपा
ध्युतक्रीडा में लुटी पिटी सी
भीतर-भीतर घुटी सी…
मैं हर युग की ही कहता हूँ
फिर भी कहते……….
लाऊँ कहाँ से ऐसी सोच
नहीं हो जिसमें जरा भी लौच
शब्द मेरे हों भरे-भरे
गज-गामी के पग सधे-सधे

बे-खौफ हो घूमे अल्हड जवानी
घुटने-घुटने दरिया का पानी
ना लुटे कहीं न डूब का डर
हो डगर-डगर उसकी ही कहानी
मैं सारे जग की कहता हूँ
फिर भी कहते…..

 

- वीरन्द्र सिंह ‘वीर’

प्रकाशन- सफरनामा ( काव्य संग्रह ) माला मनकों की ( प्रकाशनार्थ ) हेतु. सम्पादन- चार अखिल भारतीय काव्य संकलन 

संप्रति- परमाणु ऊर्जा विभाग ( वडोदरा ) में कार्यरत 

मूल निवास- रावतभाटा ( चितौड़गढ़ ) राजस्थान

पता-  निजामपुरा, वडोदरा-गुजरात

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