कली श्रृंगार: ब्रज का अद्भभुत देवालयी शिल्प

वृन्दावन रसिकों की भूमि है।यहां स्यामा-स्याम के युगल स्वरूप उपासकों ने अपने इष्ट की सेवा अनेक प्रकार के लाड़-लड़ा कर की है। ठाकुरजी का फूल श्रंगार भी उसी भावमयी सेवा का एक रूप है।अनेकों वर्ष पूर्व जब वृन्दावन अपने वन-वैभव से सबको मोहित करता था,तब रसिकोपासक अपने आराध्य देव विग्रह को निकुंजों में बैठाकर विभिन्न प्रकार के फूलों से उनका श्रंगार करते थे। फूलों में विराजमान युगल सरकार की छवि को निहार कर साधक अपने समस्त सुखों को उन पर निछावर कर केवल एक निष्काम भक्ति की चाहना रखते थे। इस भावना हम
स्वामी हरिदास जी के इस पंक्ति से समझ सकते है -
 ’ऐसे ही देखत रहो जनम सुफल कर मानौ’
श्रीधाम वृन्दावन में प्रिया-प्रियतम (श्रीराधा-कृष्ण) नित्य विहार करते हैं और यहां स्थित निकुंज वनों में अपनी नित्य लीलाओं के दर्शन देते हैं। ग्रीष्म ऋतु में ताप से शीतलता प्रदान करने के उद्देश्य से ब्रज के देवालयों में फूल बंगलों का निर्माण प्रारम्भ हुआ। इन फूल बंगलों को कुंज-निकुंजों का ही स्वरूप माना जाता है। फूल बंगला कला ब्रज की स्वतंत्र शिल्प कला है, जो देवालयों में विकसित हुई है ।
आरम्भ में इस कला के साधक रसिक भक्त ही थे जो जैसा भाव मन में आता वैसे ही अपने आराध्य को फूल बंगले में विराजमान करा देते।समय के साथ इस कला में तकनीकी और अभिनव विचारों का भी प्रवेश हुआ। केले के पत्तों, फलों, फूलों के नए प्रयोगों से फूल बंगले बनने लगे।
इस फूल बंगले कला के साथ ही एक नवीन कला भी विकसित हुई जिसे आज हम कली श्रंगार के नाम से जानते हैं। भक्तों ने अपने आराध्य देव विग्रह को पूर्ण रूप से फूलों से सजाने का निश्चय किया और जिससे जन्म हुआ एक नई कला ‘कली श्रृंगार’ का। फूल कली श्रंगार में बड़ के पत्तों को आधार बनाकर टगर, रायबेल, कनेर, मोगरा आदि की कोमल कलियों से प्रिया-प्रियतम के विभिन्न आभूषणों की तरह-तरह की आकृतियां उकेरी जाती हैं।

फूलों के बंगले में कलियों के श्रंगार से सुशोभित प्रिया-प्रियतम की युगल छवि को निहार कर भक्तजन अपने को धन्य करते हैं।
फूलों के श्रंगार से युक्त श्रीकृष्ण की छवि को निहारिये-
“फूलन कौ मुकुट बन्यौ,फूलन कौ पिछौरा तन्यौ
सोहत अतिप्यारी बर फूलन कौ सिंगार।।
कंठ फूल-बागौ, फैंटा फूल,फूल गादी गेंदुआ फूल
हँसि बैठे हैं स्यामा-स्याम सोभा कौ नहि पार।।
इसी प्रकार कलियों के श्रंगार में सजी राधारानी के दर्शन कीजिये-
फूलन सों बैनी गुही,फूलन की अँगिया,
फूलन की सारी,मानों फूली फुलवारी।
कली श्रंगार एक श्रमसाध्य शिल्प है। इस कार्य में 5 से 6 घण्टे का समय लगता है। विभिन्न मंदिरों की अपनी-अपनी परम्पराएं है। विश्व प्रसिद्ध ठाकुर बांके बिहारी मंदिर, राधाबल्लभ मन्दिर तथा राधारमण मन्दिर में ग्रीष्मकाल में प्रतिदिन ही देव विग्रहों के लिए कली श्रृंगार निर्मित किया जाता है। सांयकाल ही ठाकुर जी को फूल बंगले में विराजमान कराने की परंपरा रही है।(विगत वर्ष भर से बांकेबिहारी मन्दिर में प्रातःकाल भी यह सेवा शुरू हुई है) कली श्रंगार के विशेषज्ञ कारीगरों द्वारा श्रीराधा-कृष्ण का श्रंगार किया जाता है। इस श्रंगार में मुकुट, चन्द्रिका,माला,काछनी,वेणी,कुंडल,कतारे, टिपारा,उपरना,पटुका,अँगिया,साड़ी, कंगन, बाजूबन्द आदि वस्त्राभूषण शामिल होते हैं।
कारीगर बड़े मनोयोग से इस श्रंगार को तैयार करते हैं। फूलों से निर्मित इस श्रंगार को बनाने में जहाँ शारीरिक श्रम तो लगता है,वरन् मानसिक श्रम भी कम नहीं होता। नई प्रकार की डिजाइन सोचना, कलियों को नवीन प्रकार से प्रयोग कर नित्य श्रंगार को एक नया रूप प्रदान करना इन विशेषज्ञों के लिए कोई आसान काम नहीं है।
अगर इस शिल्प के तकनीकी पक्ष की बात करें तो आसान सा दिखने वाला यह कार्य वास्तव में बड़ा जटिल है। इस कला के कारीगर प्रातः काल से ही तैयारियों में जुट जाते हैं। सर्वप्रथम टगर की कलियों को मिट्टी के एक गीले सकोरे में रखा जाता है तथा उनमें से खराब या खिली हुई कलियों को चुनकर अलग किया जाता है। इसके बाद काले रंग के कपड़े को आधार को एक विशेष प्रकार के अड्डे पर कस दिया जाता है,फिर शुरू होता है श्रंगार की तैयारी का काम।सुई धागे की सहायता से कलियों को सावधानी से पिरोकर ठाकुरजी का जामा और ठकुरानीजी की साड़ी बनाई जाती है। कलियों की डिजाइज के लिए इसमें तिकुलिया, चुकुलिया, पचकुलिया,छठकुलिया बनाई जाती हैं। कलियों जाल का भी प्रयोग किया जाता है। श्रंगार को सुंदर रूप देने के लिए गुलाबी कलियों के साथ- साथ सलमा- सितारे का भी प्रयोग किया जाता है। इसी प्रकार बड़ के पत्ते पर अन्य आभूषणों की कटिंग कर उन्हें कलियों से सजाया जाता है।
फूल बंगले के मध्य कली श्रंगार से सुशोभित अपने इष्ट के दर्शनार्थ सुदूर क्षेत्रों से श्रद्धालु गण दर्शन करने वृन्दावन आते हैं। कलियों के श्रंगार में युगल छवि इस लिए मनमोहक लगती है क्योंकि उनका श्रंगार बनाने वाले कारीगर जो स्त्री-पुरुष दोनों होते हैं ,पूर्ण भक्ति और समर्पण भाव से उस श्रंगार को बनाते है।
रसिकाचार्यों ने अपनी वाणियों में फूलों में विराजमान अपने आराध्य की मनमोहिनी छवि को निहारकर उस का वर्णन किया है।
स्वामी बिहारिनि देव जी कहते है-
फूल फब्यौ  सिरमौर सिंगार कौ।
सेवत कोटिक काम कला अंचला चल चौंर मनौ छत्र ढार कौ।
नासिका नैन सुबैन श्रवन सभा कुच उच्च सुभाव उदार कौ।।
उरगे हरि यों ढरि आपुहि आई रहे गहि पाँइ अहार बिहार कौ।
श्रीकुंजबिहारिनि राज बिराजत फूल फब्यौ सिरमौर सिंगार कौ।।
दरअसल यह शिल्प विशुद्घ रूप से ब्रज की देवालयी परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। ब्रज में ही पल्लवित और पुष्पित हुई इस कला का प्रथम बार फोटोग्राफिक अभिलेखीकरण और चित्रांकन ब्रज संस्कृति शोध संस्थान,वृन्दावन के द्वारा कराया गया।  संस्थान ब्रज की देवालयी संस्कृति एवं अल्पज्ञात कलाओं के संरक्षण के लिए संकल्पित है। इस कला का अभिलेखीकरण उसी दिशा में किया गया एक महत्वपूर्ण कार्य है।
ब्रज के देवालयों का यह अनूठा शिल्प भारतीय कला की अनुपम देन है। यह शिल्प निकुंजोपासना के भाव को मूर्त रूप प्रदान करती एवं प्रकृति के संरक्षण का संदेश देती है।
- गोपाल शरण शर्मा
गोपाल शरण शर्मा
ब्रज संस्कृति शोध संस्थान
शोध एवं प्रकाशन अधिकारी

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