कबीर के ध्वज वाहक परसाई : व्यंग बनाम बहू की सास द्वारा ली जाने वाली रेगिंग

पिछली अर्धशती में हास्य और व्यंग एक नयी साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित हुआ है . हास्य और व्यंग में एक सूक्ष्म अंतर है , जहां हास्य लोगो को गुदगुदाकर छोड़ देता है वहीं व्यंग हमें सोचने पर विवश करता है . व्यंग के कटाक्ष हमें तिलमिलाकर रख देते हैं . व्यंग्य लेखक के , संवेदनशील और करुण हृदय के असंतोष की प्रतिक्रिया के रूप में उत्पन्न होता है . शायद व्यंग , उन्ही तानो और कटाक्ष का साहित्यिक रचना स्वरूप है , जिसके प्रयोग से सदियो से सासें नई बहू को अपने घर परिवार के संस्कार और नियम कायदे सिखाती आई हैं और नई नवेली बहू को अपने परिवार में घुलमिल जाने के हित चिंतन के लिये तात्कालिक रूप से बहू की नजरो में स्वयं बुरी कहलाने के लिये भी तैयार रहती हैं . कालेज में होने वाले सकारात्मक मिलन समारोह जिनमें नये छात्रो का पुराने छात्रो द्वारा परिचय लिया जाता है , भी कुछ कुछ व्यंग , छींटाकशी , हास्य के पुट से जन्मी मिली जुली भावना से नये छात्रो की झिझक मिटाने की परिपाटी रही है और जिसका विकृत रूप अब रेगिंग बन गया है .

प्राचीन कवियो में कबीर की प्रायः रचनाओ में व्यंग्य है , पर उनका यह कटाक्ष किसी का मजाक उड़ाने या उपहास करने के लिए नहीं, बल्कि उसे सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने के लिए ही होता है . कबीर का व्यंग्य करुणा से उपजा है, अक्खड़ता तो केवल उसकी ढाल है.
बात उन दिनो की है जब मैं किशोरावस्था में था , शायद हाई स्कूल के प्रारंभिक दिनो में . हम मण्डला में रहते थे .घर पर कई सारे अखबार और पत्रिकायें खरीदी जाती थी . साप्ताहिक हिंदुस्तान , धर्मयुग , सारिका , नंदन आदि पढ़ना मेरा शौक बन चुका था . नवीन दुनिया अखबार के संपादकीय पृष्ठ का एक कालम सुनो भाई साधो और नवभारत टाइम्स का स्तंभ प्रतिदिन मैं रोज बड़े चाव से पढ़ता था . पहला परसाई जी का और दूसरा शरद जी का कालम था यह बात मुझे बहुत बाद में ध्यान में आई . छात्र जीवन में जब मैं इस तरह का साहित्य पढ़ रहा था और इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर का नाट्यरूपांतरण देख रहा था शायद तभी मेरे भीतर अवचेतन में एक व्यंगकार का भ्रूण आकार ले रहा था . बाद में संभवतः इसी प्रेरणा से मैने डा देवेन्द्र वर्मा जो मण्डला में पदस्थ एक अच्छे व्यंगकार थे व वहां संयुक्त कलेक्टर भी रहे , की व्यंग संग्रह का नाम “जीप पर सवार सुख” रखा जो स्कूल के दिनो में पढ़ी शरद जोशी की जीप पर सवार इल्लियां से अभिप्रेरित रहा होगा . मण्डला से छपने वाले साप्ताहिक समाचार पत्र मेकलवाणी में मैने ” दूरंदेशी चश्मा ” नाम से एक व्यंग कालम भी कई अंको में निरंतर लिखा . फिर मेरी किताबें रामभरोसे , कौआ कान ले गया तथा मेरे प्रिय व्यंग लेख पुस्तकें छपीं , तथा पुरस्कृत हुईं .

हरिशंकर परसाई और शरद जोशी दो सुस्थापित लगभग समानान्तर व्यंगकार हुये .दोनो ही मूलतः मध्यप्रदेश के थे . जहां जबलपुर को परसाई जी ने अपनी कर्मभूमि बनाया वही शरद जी मुम्बई चले गये . उनके समय तक साहित्य में व्यंग को विधा के रूप में स्वीकार करने का संघर्ष था . व्यंग्य संवेदनशील एवं सत्यनिष्ठ मन द्वारा विसंगतियों पर की गई प्रतिक्रिया है, एक ऐसी प्रतिक्रिया जिसमें ऊपर से कटुता और हास्य की झलक मिलती है, पर उसके मूल में करुणा और मित्रता का भाव होता है। व्यंग्य यथार्थ के अनुभव से ही पैदा होता है, यदि कल्पनाशीलता से जबरदस्ती व्यंग्य पैदा करने की कोशिश की जावे तो रचना खुद ही हास्यास्पद हो जाती है .इशारे से गलती करने वाले को उसकी गलती का अहसास दिलाकर सच को सच कहने का साहस ही व्यंगकार की ताकत है . व्यंगकार बोलता है तो लोग कहते हैं “बहुत बोलता है ” , पर यदि उसके बोलने पर चिंतन करें तो हम समझ सकते हैं कि वह तो हमारे ही दीर्घकालिक हित के लिये बोल रहा था .

हरिशंकर परसाई (२२ अगस्त, १९२४ – १० अगस्त, १९९५) का जन्म जमानी, होशंगाबाद, मध्य प्रदेश में हुआ था। उन्होंने 18 वर्ष की उम्र में जंगल विभाग में नौकरीशुरू की . खंडवा में ६ महीने अध्यापन का कार्य किया . दो वर्ष (१९४१-४३) जबलपुर में स्पेंस ट्रेनिंग कालिज में शिक्षण की उपाधि ली, 1942 से वहीं माडल हाई स्कूल में अध्यापन भी किया . तब के समय में अभिव्यक्ति की वैचारिक स्वतंत्रता का वह स्तर नही रहा होगा शायद तभी १९५२ में उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ी। १९५३ से १९५७ तक प्राइवेट स्कूलों में नौकरी की .१९५७ में नौकरी छोड़कर स्वतन्त्र लेखन की शुरूआत उन्होने की , तत्कालीन परिस्थितियों में साहित्य को जीवकोपार्जन के लिये चुनना एक दुस्साहसिक कदम ही था . जबलपुर से ‘वसुधा’ नाम की साहित्यिक मासिक पत्रिका निकाली, नई दुनिया में ‘सुनो भइ साधो’, नयी कहानियों में ‘पाँचवाँ कालम’ और ‘उलझी-उलझी’ तथा कल्पना में ‘और अन्त में’ इत्यादि कहानियाँ, उपन्यास एवं निबन्ध-लेखन के बावजूद वे मुख्यत: व्यंग्यकार के रूप में विख्यात हुये . उन्होंने अपने व्यंग के द्वारा बार-बार पाठको का ध्यान व्यक्ति और समाज की कमजोरियों और विसंगतियो की ओर आकृष्ट किया . परसाई जी जबलपुर व रायपुर से प्रकाशित अखबार देशबंधु में पाठकों के प्रश्नों के उत्तर देते थे। स्तम्भ का नाम था-पूछिये परसाई से। पहले पहल हल्के, इश्किया और फिल्मी सवाल पूछे जाते थे। धीरे-धीरे परसाई जी ने लोगों को गम्भीर सामाजिक-राजनैतिक प्रश्नों की ओर प्रवृत्त किया , दायरा अंतर्राष्ट्रीय हो गया मेरे जैसे लोग उनके सवाल-जवाब पढ़ने के लिये अखबार का इंतजार करते थे .
सरकारे और साहित्य अकादमीयां उनके नाम पर पुरस्कार स्थापित किये हुये हैं पर स्वयं अपने जीवन काल में उन्होने संघर्ष किया जीवन यापन के लिये भी और वैचारिक स्तर पर भी . उन पर प्रहार हुये , विकलांग श्रद्धा का दौर तो इसी से जन्मी कृति है .उन पर अनेकानेक शोधार्थी विभिन्न विश्वविद्यालयो में डाक्टरेट कर रहे हैं . आज भी परसाई जी की कृतियो के नाट्य रूपांतरण मंचित हो रहे हैं , उन पर चित्रांकन , पोस्टर प्रदर्शनियां , लगाई जाती हैं , और इस तरह साहित्य जगत उन्हें जीवंत बनाये हुये है . वे अपने साहित्य के जरिये और व्यंग को साहित्य में विधा के रूप मे स्वीकार करवाने के लिये सदा जाने जाते रहेंगे .

 

- विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र

जन्म: २८.०७.१९५९ , मंडला म.प्र.

शिक्षा : सिविल इंजीनियरिंग में रायपुर से स्नातक, फाउंडेशन इंजीनियरिंग में भोपाल से स्नातकोत्तर

उपाधियां : इग्नउ से मैनेजमेंट मे डिप्लोमा , सर्टीफाइड इनर्जी मैनेजर .

संप्रति: अधीक्षण इंजीनियर म.प्र.राज्य विद्युत मंडल, जबलपुर

प्रकाशित किताबें: आक्रोश कविता संग्रह
रामभरोसे व्यंग संग्रह
हिंदोस्ता हमारा नाटक संग्रह
जादू शिक्षा का नाटक
कौआ कान ले गया व्यंग संग्रह
जल जंगल और जमीन
बिजली का बदलता परिदृश्य

फोल्डर रानी दुर्गावती , व मण्डला परिचय

प्रकाशनाधीन किताबें:
कान्हा अभयारण्य परिचायिका
कविता , लेख , गजल , व्यंग , नाटक संग्रह आदि

आकाशवाणी व दूरदर्शन से अनेक प्रसारण , रेडियो रूपक लेखन

विभिन्न सामूहिक संग्रहों में रचनायें प्रकाशित
खटीमा उत्तरांचल स्थित बाल कल्याण संस्थान द्वारा विशेष रूप से बाल रचना हेतु सम्मानित
पत्र पत्रिकाओ में नियमित लेखन

उपलब्धियाँ:
हिंदोस्तां हमारा नाटक संग्रह को ३१००० रु का साहित्य अकादमी हरिकृष्ण प्रेमी पुरस्कार
रेड एण्ड व्हाइट १५००० रु का राष्टीय पुरुस्कार सामाजिक लेखन हेतु
रामभरोसे व्यंग संग्रह को राष्टीय पुरुस्कार दिव्य अलंकरण
कौआ कान ले गया व्यंग संग्रह को कैलाश गौतम राष्ट्रीय सम्मान
जादू शिक्षा का नाटक को ५००० रु कासेठ गोविंद दास कादम्बरी राष्ट्रीय सम्मान
म. प्र. शासन का ५००० रु का प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार जादू शिक्षा का नाटक को
सुरभि टीवी सीरियल में मण्डला के जीवाश्मो पर फिल्म का प्रसारण , युवा फिल्मकार सम्मान
ब्लागिंग २००५ से हिन्दी ब्लागिंग

संपर्क:  रामपुर , जबलपुर

 

One thought on “कबीर के ध्वज वाहक परसाई : व्यंग बनाम बहू की सास द्वारा ली जाने वाली रेगिंग

  1. विवेक रंजन जी , यो तो आपका आलेख बहुत सुन्दर है किन्तु इतना संक्षिप्त है की पाठक की जिज्ञासा को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पाता | पर जो भी लिखा है बड़ा सटीक और अधिक जानने की उत्सुकता बढाता है | बधाई |
    सुरेन्द्र वर्मा

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