कबाड़ी

आज मोहल्ले में मैने एक अजीब गरीब कुछ देखा।
दूर कूड़ाघर में मैंने एक कबाड़ी देखा।।
वो मैला और कुचैला था।
उसके कमजोर कन्धों पे एक गन्दा सा थैला था।।
कोई उसे न देख रहा बस मेरी नजरे उस पर थी
क्योंकि अपना विषय खोजती
मैं एक कवयित्री थी।
मैने उसकी भूखी आँखों को जैसे रोटी खोजते देखा।।
मैंने एक……

मैं मन में विचारती की ये कितना क्या कामाता होगा।
इस कबाड़ के बदले ये कितने पैसे पता होगा।
अचानक एक कुत्ता उसे जानवर समझ उसपे भौकते देखा।
मैंने एक कबाड़ी देखा।।

टूटे कांच के टुकड़ो को वो ऐसे था निहार रहा ।
मानो अपने शीश महल के सपने हो सवार रहा।।
लोगो के फेकें भूतकाल में मैंने
उसके भविष्य को पनपते देखा।
मैंने एक कबाड़ी देखा।।

लक्ष्मी पूजा के अवसर पर वो थोडा मुस्काता होगा।
और बस दीवाली का शायद वो त्यौहर मनाता होगा।।
नरक चुतुर्दशी के नरक में मैंने उसे लक्ष्मी पाते देखा।
आज मोहल्ले में मैंने अजीब गरीब कुछ देखा।
दूर कूड़ाघर में मैंने एक कबाड़ी देखा।।

 

-पूर्ति खरे

निज निवास- सागर म.प्र।
कविता , कहानी, लेखन में विशेष रूचि।

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