कइसे खेले जइबू सावन में कजरिया,बदरिया…….

सावन के आहट मिलते ही गांव-गिरांव के सिवान में झुलुहा लाग जाला।मेहरारू
से लेके लइका भी एकर खूबे आनंद उठावेलन।साल भर में एक बार आवेवाला इ एगो
अइसन समय ह जवना के इंतजार सबका रहेला ,खासकर भौजाई लोग के त विशेष रूप
से।झूला झुलत कजरी गीत के रूप में ननद-भौजाई के संवाद मन मोह
लेवेला।भौजाई के ननद के ठिठोली गीत के रूप में जब ब्यक्त होला त फिर ओकरा
आगे सब आनंदात्मक संवाद फीका महशूस होला।
कजरी के गीतन में खाली प्रकृति के चित्रण, लौकिक सम्बन्ध, श्रृंगार आउर
विरह भाव के ही वर्णन ना होला बल्कि समकालीन सामाजिक, राजनीतिक घटना के
भी चित्रण प्रायः देखे आ सुने के मिलेला।
पूर्व से ही ब्रिटिश शासनकाल में राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत अनेकन कजरी
गीत के रचना भइल रहे।बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में पूरा देश में
ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जवन जन-चेतना के विस्तार भइल ओकरा से “कजरी”
शैली भी अछूता ना रहे।ओह समय के लोकगीतकारन ने अइसन अनेक राष्ट्रवादी
कजरी गीत के रचना कइले जवना से भयभीत हो तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ढेर सारा
लोक गीतन पर प्रतिबन्ध लगा दिहलस ।आ अंग्रेजन के अत्याचार के शिकार एह
लोकगीत के कलाकार भी बनलन। रचनाकारन आउर गायकन के ब्रिटिश सरकार द्वारा
काफी प्रताड़ित भी कइल गइल।लेकिन एह प्रतिबन्ध के बावजूद भी लोक परम्परा
जन-जन तक पहुँचत रहल।

एह विषयन पर रचल गइल अनेक गीतन में महात्मा गाँधी के सिद्धांत भी
रेखांकित कइल गइल बा।जइसे की -”चरखा कातो, मानो गाँधी जी की बतियाँ,
विपतिया कटि जइहें ननदी…”।
कुछ गीतन में अंग्रेजन के दमनकारी नीति पर भी भरपूर प्रहार भइल बा।
अइसनें एगो कजरी के मुखड़ा पर गौर करीं।एकर स्थायी पंक्ति बिल्कुल सामान्य
कजरी नियन ही बा, लेकिन एगो अन्तरा में लोकगीतकार अंग्रेजन के दमनात्मक
नीति के रेखांकित कइले बाड़न।मूल गीत के पंक्ति ह-”कैसे खेले जईबू सावन
में कजरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी…”।एह पंक्तियन में बादल के घिरल
गुलामी के प्रतीक रूप में देखावल गइल बा।

पारम्परिक कजरी के धुन आउर ओकर टेक लगभग निर्धारित रहेला।आमतौर पर इ
जैतसार, ढुनमुनियाँ, खेमटा, बनारसी आउर मीरजापुरी धुनन के नाम से पहचानल
जाला। कजरी के पहचान ओकरा टेक के शब्दन से भी होला।जइसे- ‘रामा’, ‘रे
हरि’, ‘बलमू’, ‘साँवर गोरिया’, ‘ललना’, ‘ननदी’ आदि।कजरी के लोकप्रियता
खाली छेत्रिय ही ना ह बल्कि एकर प्रभाव सिनेमा में भी खूब बा।1964 में
प्रदर्शित फिल्म “नैहर छुटल जाय” में गायक मन्ना डे भी एगो परम्परागत
बनारसी कजरी गीत गवले रहन।गीत के संगीतकार जयदेव भी ओह कजरी के परम्परागत
धुन में बिना कवनो काट-छाँट के प्रस्तुत कइले रहन।

 

 - आदर्श तिवारी


लेखक बिहार के रोहतास जिला अंतर्गत सावन डिहरी गाँव का रहने वाले हैं।वर्तमान में एक निजी कंपनी थर्मेक्स लिमिटेड में कार्यरत हैं ।पूर्व में सासाराम (बिहार) में दैनिक जागरण समाचार पत्र में संवाददाता के रूप में कार्यरत थे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>