और पब्लिक हँसी

मेरी हमेशा से आदत रही है ट्रेन छूटने से कम से कम आधा घंटा पहले स्टेशन
पहुँचने की।  इसका अक्सर फायदा यह रहता है कि  आप खिड़की के साथ वाली सीट
हथिया सकते हैं , फिर भले ही आपकी बर्थ या सीट संख्या कोई भी  क्यों न हो
? इस बार भी मैंने ऐसा ही किया था।  खिड़की वाली सीट पर जम कर एक पत्रिका
निकाल कर ऐसे पढ़ने लगा जैसे किसी गहन शोध में लगा हूँ।  धीरे धीरे
सहयात्री आते गए और मुझ पर एक उड़ती सी नज़र डाल कर अपने लिए जगह बना कर
बैठते चले गए। द्वितीय श्रेणी के स्लीपर कोच में आमने सामने की  सीटों पर
आरक्षण वाले हम छह यात्री विराजमान हो गए।
जैसाकि लम्बी रेल यात्राओं के प्रारम्भ में होता है कि सब चुपचाप बैठे
किसी एक के बात शुरू करने की राह तकते हैं। उसी  तरह से हम छह के बीच भी
सन्नाटा कथा बाँचने के लिए तैयार पंडित की भाँति पालथी मार कर बैठा था।
मैं पत्रिका में से सिर उठा कर अपने आस पास वालों पर एक सरसरी निगाह
फिराता व फिर अनमने ढंग से पत्रिका में नज़रें गड़ाने की चेष्टा करता।  कुछ
ऐसा हो गया था कि कोई बात करने की पहल करने को उत्सुक नहीं दिखता  था।
ट्रेन के चलने के कुछ देर बाद ही दो लोग आँखें मूँद कर ऊँघने लगे थे।
सामने की खिड़की पर बैठा यात्री खिड़की के बाहर निरंतर ऐसे घूरे जा रहा था
जैसे कोई बच्चा टीवी पर कार्टून फिल्म देख रहा हो। एक की आँखें छ्त पर
जमीं थीं तो शेष बचा मुसाफिर खामख्वाह इधर उधर नज़रें फिरा रहा था।
हम सब अपनी अपनी तरह से अपने को उलझाए रखने की चेष्टा कर रहे थे। कुछ समय
बाद अचानक एक अनुनय भरा स्वर सुनाई पड़ा , ” ज़रा सी जगह देंगे साहब।  ”
देखा कि चालीस वर्ष के करीब का एक व्यक्ति खड़ा हुआ यह बात मेरे सामने की
बर्थ के कोने वाले मुसाफिर से कह रहा था।  जब तक मेरा सहयात्री कुछ समझ
पाता तब तक तो आगंतुक व्यक्ति सीट के ज़रा से खाली खाली पड़े त्रिभुज में
अपनी देहयष्टि को जमा चुका  था। उसके दवाब से मजबूर होकर सीट पर बैठे
यात्री को थोड़ा और खिसक कर जगह बनांनी पड़ी।  मैंने देखा कि मेरे सहयात्री
के चेहरे पर गुस्से और झल्लाहट की रेखाएं स्पष्ट थीं।  ऊँघ रहे यात्रियों
ने भी इस अप्रत्याशित हमले से चौंक कर ऑंखें खोलीं और आगंतुक के ऊपर टिका
दीं।  शेष दो की आँखें भी इधर उधर भटकना छोड़ कर उसी आगंतुक पर टिक गयीं।
दरअसल हम सबने इस अवांछित प्राणी का आगमन अपनी स्वतंत्रता पर हमला  समझा
, सभी की आँखों में बेचैनी व गुस्सा था। एक ही प्रश्न था ” ये किस हक़ से
यहाँ आकर बैठा है ?’  आगंतुक हमलावर ने दबी निगाहों से सबको देखा और फिर
बेफिक्री दिखाते हुए अपने सामने साइड वाली सीट की खिड़की से बाहर देखने
लगा।
अनेक रेल यात्राओं में घिसे हुए मेरे व्यक्तित्व की नाक ने ‘ बिना आरक्षण
मुसाफिर ‘ की गंध सूंघ ली थी और मैं खुद भी चौकन्ना हो गया था।  मैंने
अपनी बर्थ के कोने में बैठे सहयात्री  को चेताया , ” भइया ज़रा फ़ैल कर
बैठो।  कहीं कोई दूसरा न आ जाये ! आजकल बड़ी मुश्किल है।  ” यह सुनते ही
कोने वाला यात्री फ़ौरन जुगाली के लिए बैठी भैंस के अंदाज़ में फ़ैल कर टेढ़ा
होकर बैठ गया।
आगंतुक के बोझ से दबा हुआ सहयात्री बोला , ” आजकल तो रिज़र्वेशन के बाद भी
आराम से यात्रा करना मुश्किल है। ” उसकी बात इशारा बिलकुल साफ़ था।  जिसको
समझना  था वह भी समझ गया था। उसने तुरंत इस बात को लपक लिया।  वह बोला
,”आप सच कह रहे हैं भाई साहब। अब ये ही देखिये न एजेंट को पैसे दिए।
उसने कन्फर्म टिकट भी लेकर दी पर जब गाडी पाकर आकर चार्ट देखा तो मेरा
नाम नदारद था। अब जनाब अपने तो पैसे भी गए और रिजर्वेशन भी।  ”
उसकी इस सफाई का कोई ख़ास असर नहीं दिखा।  मेरे साथ बैठे यात्री ने
उपेक्षा से कहा , ” ऐसा भी होता  है कहीं इस टेक्नोलॉजी युग में ?’
आगंतुक ने उसकी ओर बड़े सहज भाव से देखते हुए कहा , ” लगता है भाई साहब आप
कम यात्राएं करते हैं ?  अपना  तो रोज़ आना जाना लगा रहता है। अजी  ये
रेलवे वाले एक नम्बर के चालबाज़ होते हैं।  जो करिश्मा न दिखा दें वह
थोड़ा।  ऐसा एक के साथ नहीं कई कई लोगों के साथ होता है।  चोर साले , पैसे
खा जाते हैं।  अब पब्लिक भुगते। ”
ऐसा लगा कि ‘ पब्लिक भुगते ‘वाले वाक्यांश ने मेरे साथ बैठे हुए यात्री
को बहुत प्रभावित कर दिया था। उसने भी सुर मिलाया , ” ठीक कह रहे हैं आप।
सिवाय पब्लिक के और भुगतता ही कौन है इस देश में ? हर चीज़ में बस पब्लिक
पर ही मार।क्या करे  कोई ? ”
इसी के साथ बातों का रुका हुआ पानी बाँध तोड़ कर बह  निकला। इस बीच वह
आगंतुक कब फ़ैल कर बैठ गया व उस बर्थ के तीनों यात्री कब सिकुड़ गए कुछ पता
ही नहीं चला। कुछ देर पहले जिसके आगमन से हम छहों दुखी थे अब वही हमें
खेल , राजनीति तथा गुंडागर्दी के तालाबों में गोते लगवा  रहा था। हम सब
उसका साथ दे रहे थे क्योंकि अब ‘ हम और वह ‘ पब्लिक ‘थे और इस सड़े हुए
तंत्र के खिलाफ ‘पब्लिक को पब्लिक  का साथ देना ही था।
अगले स्टेशन पर गाड़ी  रुकी तो उसने हम सबको चाय पीने का आमंत्रण दिया और
हम सातों जन प्लेटफार्म पर उतर पड़े। चाय के पैसे उसी ने दिए। इस तरह हम
कुछ और करीब आ  गए।
तृण चली तो पहला टिकट चेकर आ गया।  उसने हम सबके टिकट चेक किये।  उस  नए
साथी ने  अपना बिना आरक्षण का टिकट दिखाया तो भी उसने कुछ नहीं कहा।
हमारे नए साथी ने खुद ही बड़े अनुनय से से पूछा , ” साहब जी , कोई खाली
बर्थ है क्या ? ” ” जयपुर से [पता चलेगा ", टिकट चेकर ने कहा. नए साथी ने
फिर कहा , " हमारा  ख्याल रखियेगा मालिक। "  टिकट चेकर ने कहा , " जयपुर
में नया टीसी आएगा उसी से बात कीजियेगा।  " और वह आगे चला गया।
उसके जाते ही नए साथ का स्वर बदल गया , " साले , पता नहीं अपने आपको क्या
समझते हैं ? अभी रुपये देने की बात करता तो तुरंत सीट मिल जाती।  सालों
के मुँह को खून लगा हुआ है। तो किसी पर क्यों दया करेंगे ?"
" सच्ची बात है ," हममें से एक बोलै , " इसी कारण तो आर ए सी वाले बैठे
रह जाते हैं और दो नम्बरी लोग बर्थों पर सोते हैं। "
बातें फिर से सामजिक जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार की परिधि पर घूमने
लगीं। ऐसा लगता था जैसे आकाश में फैली कालिमा पर सप्तऋषि मंडल विचार कर
रहा हो। रात के खाने  का समय हुआ और वह छोटा सा केबिन डाइनिंग रूम में
बदल गया।  हर कोई अपना डिब्बा खोले एक दूसरे से खाने की मनुहार कर रहा
था।  हमारा नया साथी उठकर जाने लगा तो मैंने टोका, " अरे साहब चले कहाँ ?
खाने में साथ तो दीजिये।  " उसने उत्तर दिया , " माफ़ कीजियेगा।  मैं अगले
स्टेशन पर खाना मँगा लूँगा।  जल्दी में घर से खाना लाना भूल गया।  "
" अजी  तो क्या हुआ ? बैठिये बैठिये।  ये सब इतना खाना कौन खायेगा ? " यह
कहते हुए उस नए साथी के साथ बैठे यात्री ने उसका हाथ पकड़ कर लगभग खींच
कर  उसे बैठा लिया था।
खाना  खत्म होते  होते रात के 9 बज गए थे।  हाथ धोकर आराम से बैठने के
कुछ समय बाद ही सबको लेटने का मोह सताने लगा।  बातों की अभी तक दौड़ती
रेलगाड़ी के पहिये थमने लगे  थे।  एक बोझिल सा वातावरण बन गया था।  अनुभवी
नया यात्री ताड़ गया कि ' उसकी उपस्थिति एक बार फिर से सबको खटकने लगी है।
यह चुप्पी भी इसी  बात का संकेत है। ' बात सँभालने की गरज से वह बोला , "
जयपुर आने ही वाला है।  नया टिकट चेकर आये तो कुछ दे दिला कर बर्थ ले
लुँगा।   बस थोड़ी तकलीफ और। "
अब इतनी देर से दोस्ताना सम्बन्ध निभाने के बाद एकाएक रूखा कैसे हुआ जा
सकता था , सो मैंने बुझे स्वर में कहा , :" कोई बात नहीं।  आप आराम से
बैठिये।  कुछ देर और सही।  " मेरा स्वर भले ही ठंडा रहा हो पर उस नए
यात्री को अपना अस्तित्व टिकाये रखने का सहारा मिल गया।
जयपुर स्टेशन आया और चला गया। उसी के कुछ देर बाद जयपुर वाला टिकट चेकर
आया।  उसने हम छः आरक्षित लोगों के साथ उस सातवें यात्री को बैठे देखा तो
पूछा ," जनाब आपकी सीट कौन सी है ?" नए यात्री ने झिझकते हुए कहा , " सीट
तो नहीं है। " टिकट चेकर ने कहा , :" नहीं है ? तो फिर बिना रिजर्वेशन
वाले डिब्बे में जाकर बैठिये। यहां नहीं।  " नया यात्री खींसें निपोरने
लगा। हम सब चुपचाप देख रहे थे कि अब क्या होता है ?
नए यात्री ने घिघियाते हुए कहा ," साहब आपकी मेहरबानी होगी तो कहीं भी
एडजस्ट हो जाऊँगा।  " " पर कैसे ?" टिकट चेकर ने कहा ," ऐसा नहीं हो सकता
है।  आपकी वजह से दूसरे यात्रियों को परेशानी होगी। "
मैंने अपने साथी की तरफ से अनुरोध किया , " कोई एकाध बर्थ खाली होगी।
इन्हें दे दीजिये न।  " " आप क्या समझते हैं कि हमें बर्थ खाली रखने का
शौक है ? अगर जगह होती तो मैं खुद ही कह देता।  नहीं है तभी तो इनसे कह
रहा हूँ जाने को।  " टिकट चेकर ने अपनी समस्या बतायी। अब  नए यात्री ने
अपने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया , " कैसे भी करके एक बर्थ दे दीजिये
साहब , जो भी खर्चा पानी कहेंगे दे दूँगा। आप चिंता न करें। "
यह सुन कर टिकट चेकर हल्का सा मुस्कराया।  उसने कहा , " पैसे जैसी कोई
बात नहीं है।  मैंने आपको सच्ची बात बता दी है कि कोई बर्थ खाली नहीं है।
आप प्लीज यहाँ से चले जाइये।  "
टिकट चेकर ने अंतिम वाक्य इस सख्ती से कहा कि नया यात्री सकपका गया।
उसकी चिंता देख कर मैंने एक बार पुनः अनुरोध किया , " अच्छा इन्हें यहीं
नीचे सोने दीजिये।  "
" जी नहीं ', टिकट चेकर के स्वर में हलकी सी उग्रता थी ," कल को अगर आप
में से किसी का कुछ सामान चोरी हो गया तो आप लोग मुझे ही दोषी ठहराएंगे
कि मैं बिना आरक्षण वाले लोगों को डिब्बे में रहने देता हूँ।  मुझे नहीं
चाहिए ये सब झंझट।  चलिए साहब आप यहाँ से निकलिए।  "
" अच्छा।  अच्छा चला जाऊँगा। " हमारे नए साथी ने दबे स्वर से कहा। " चले
जाइएगा ज़रूर। " यह कह कर टिकट चेकर आगे के केबिन में चला गया था।
इधर हमारा नया साथी अपने सभी दाँव पेंच खाली  जाते देख कर बिखरने लगा ,"
साले , बदमाश कहीं के।  बड़े हरिश्चंद्र की औलाद बनते हैं।  सबके बीच में
पैसे लेने को कह दिया तो लगा उपदेश झाड़ने।  अभी अकेले में जाकर 500 का
नोट थमा देता तो अपनी गोद में लिटाने को तैयार हो जाता।  सालों ने पब्लिक
को परेशान कर रखा है।  "
अपने  नए साथी की विपदा से हम एक बार फिर से परेशान हो गए थे। आखिर हम भी
तो पब्लिक थे। उसके साथ सहानुभूति के स्वर स्फुरित होने लगे थे।  सबको
अपने मन का गुबार निकालने का मौका भी मिल गया था। हमें मालूम था कि टिकट
चेकर अभी अगले केबिन में है इसलिए जानबूझ कर ज़ोर ज़ोर से बोल रहे थे।  एक
साथी बोला , " अजी  ये सब तो ज़्यादा से ज़्यादा पैसे उमेठने के नखरे हैं।
पता है कि अगले की ऊँगली दबी है , खुद पीछे पीछे दौड़ेगा , पर्स उठाये। "
दूसरे ने सुर में सुर मिलाया ," इनके हरामीपन ने सबकी नाक में दम कर रखा
है।  शरीफ आदमी रेल में हिंदी का सफर नहीं अंग्रेजी का सफर करता है। "
मैंने हँसते हुए कहा ," और क्या भला सिर्फ तनख्वाह के पैसों में कोई इतनी
जगमगाती सफेद कमीज पहन सकता है ? कैसे सूटेड बूटेड साहब बने हुए हैं। "
मेरी बात पर सब ठहाका मार कर हँस  पड़े थे।  अचानक अगले केबिन से टिकट
चेकर तेज़ी से निकल  कर हमारे सामने आ खड़ा  हुआ। वह गुस्से से काँप रहा
था।  " इलज़ाम लगाते हो ? शर्म नहीं आती।  सबको एक सा समझते हो ? मेरी
ईमानदारी को कालिख लगाते हो ? क्या समझते हो , दूसरे लेते हैं तो क्या
हरेक लेता होगा ?"
हम सब इस अचानक प्रहार से सकपका कर चुप थे और उसका बोलना जारी था ,"
ईमानदारी से नौकरी करते हैं ,फिर क्यों किसी की गाली खाएँ ? साहब क्या
समझते हैं ? फटे कपड़े पहन कर नौकरी करता हूँ। "
उसने पतलून में खुसी अपनी कमीज झटके से बाहर निकाल कर ऊपर उठा दी।  नीचे
उसका जगह जगह से फटा बनियान झलक रहा था।  अभी तक हम सब चुप थे पर सफ़ेद
पैंट , सफ़ेद कमीज़ और हरी टाई के नीचे छिपा वह फटा नज़ारा देख कर हम सबकी
हँसी  छूट गयी। वह अभी भी उस फ़टे बनियान को हाथों में खींचे खड़ा था।
अपमान का गुस्सा गर्म भाप बन कर उसकी आँखों से बूंदों सा पिघलने लगा था
और पब्लिक थी कि हँसे जा रही थी।

 

 

- संजीव निगम 

जन्मतिथि : १६ अक्तूबर

हर परिस्थिति या घटना को एक अलग नज़र से देखने वाले हिंदी के चर्चित रचनाकार.संजीव निगम कविता, कहानी,व्यंग्य लेख , नाटक आदि विधाओं में सक्रिय रूप से लेखन कर रहे हैं. अनेक पत्रिकाओं-पत्रों में रचनाओं का लगातार प्रकाशन हो रहा है. मंचों , आकाशवाणी और दूरदर्शन से रचनाओं का नियमित प्रसारण. रचनाएं कई संकलनों में प्रकाशित हैं जैसे कि : ‘नहीं अब और नहीं’, ‘काव्यांचल’,’ अंधेरों के खिलाफ’,'मुंबई के चर्चित कवि’ आदि . कई सम्मान प्राप्त जिनमे कथाबिम्ब कहानी पुरस्कार, व्यंग्य लेखन पर रायटर्स एंड जर्नलिस्ट्स असोसिअशन सम्मान, प्रभात पुंज पत्रिका सम्मान,अभियान संस्था सम्मान आदि शामिल हैं. 
एक अत्यंत प्रभावी वक्ता और कुशल मंच संचालक भी. 
कुछ टीवी धारावाहिकों का लेखन भी किया है. इसके अतिरिक्त 18 कॉर्पोरेट फिल्मों का लेखन भी.स्वाधीनता संग्राम और कांग्रेस के इतिहास पर ‘ एक लक्ष्य एक अभियान ‘ नाम से अभिनय-गीत- नाटक मय स्टेज शो का लेखन जिसका मुंबई में कई बार मंचन हुआ.
गीतों का एक एल्बम प्रेम रस नाम से जारी हुआ है.
आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से 16 नाटकों का प्रसारण.

पता : फिल्म सिटी रोड, मलाड [पूर्व], मुंबई- 400097 .

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