ओमप्रकाश तिवारी की पुस्तक ‘खिड़कियां खोलो’ के लोकार्पण के बहाने नवगीत पर चर्चा

गीतकार क्षणभंगुर पलों को चिरस्थायी कर देता है। यही कारण है कि ब्रह्मा के रचे राम कबके जलसमाधि ले चुके, जबकि वाल्मीकि और तुलसी के राम आज भी हमारे साथ चल रहे हैं। लब्धप्रतिष्ठ गीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र के ये विचार उस समारोह में सामने आए, जो यूँ तो एक पुस्तक के लोकार्पण मात्र के लिए आयोजित किया गया था, लेकिन बन गया नवगीत पर चर्चा का एक सार्थक मंच।

अवसर था ओमप्रकाश तिवारी के नवगीत संग्रह ‘खिड़कियां खोलो’ के लोकार्पण का। बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा कि नवगीत तपस्या मांगता है। नवगीत बिना तपस्या के लफ्फाजी से नहीं लिखा जा सकता। इसके लिए शब्द को साधना पड़ता है, स्वर को साधना पड़ता है, और उसके पीछे जो ध्वनि है, उसे बड़ी बारीकी से देखना पड़ता है। नवगीत को लेकर अपने अनुभवों को साझा करते हुए डॉ. मिश्र कहते हैं पिछली सदी के 60 के दशक में नवगीत लेखन में आई तेजी पर तब विराम सा लगता दिखाई देने लगा था, जब तत्कालीन नवगीतकार एक-दूसरे पर ही अविश्वास सा जताने लगे थे। लेकिन 1990 के बाद आई रचनाकारों की नई पीढ़ी यदि सचमुच गंभीरता से कोई बात कहना चाहती है, तो वह नवगीत का सहारा लेती है। इसी श्रृंखला में ओमप्रकाश तिवारी के नए काव्यसंग्रह ‘खिड़कियाँ खोलो’ को मैं नवगीत विधा के जीवित होने का प्रमाण मानता हूँ। ओमप्रकाश तिवारी की कविताओं पर बोलते हुए मिश्र कहते हैं कि पत्रकार होने के कारण उन्हें जीवन को बारीकी से देखने की दृष्टि मिली है और रचनाकार होने के कारण उन्हें वह सामर्थ्य मिला है कि जिसे केवल खबर मात्र समझा जाता हो, उसे वह कालजयी रचना में बदल सकते हैं। इस खूबी को ही समस्त रचनाकारों से जोड़ते हुए बुद्धिनाथ मिश्र कहते हैं कि गीतकार क्षणभंगुर पलों को चिरस्थायी करने की क्षमता रखता है।

नवगीत पर चर्चा को आगे बढ़ाते हुए मुंबई विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष एवं लेखक-समीक्षक डॉ. रामजी तिवारी ने कहा कि जीवन की जटिलताओं को स्वर बनाकर गेयता प्रदान करना ही नवगीत है। नवगीत ने जिंदगी को करीब से देखने, समझने और व्यक्त करने का संकल्प लिया है। ओमप्रकाश तिवारी का पहला नवगीत संग्रह भी इसी जिम्मेदारी को आगे बढ़ाता प्रतीत होता है। डॉ.रामजी तिवारी के अनुसार नवगीत एक रिक्तता की पूर्ति है। एक वक्त आया कि कविता की सारी प्रजातियों ने मिलकर यह घोषित कर दिया कि गीत आज की कविता के अनुकूल नहीं है। जिस जटिल मानसिकता को हम व्यक्त करना चाहते हैं, वह गीत में संभव नहीं है। लेकिन उसी दौरान ऐसा भी लगा कि गीतों के बिना काम नहीं चल सकता। तो कुछ समर्थ गीतकारों ने जीवन की जटिलता को गीत में उतारने का संकल्प लिया।

ऐसे ही दौर में 1948 में वीरेंद्र मिश्र ने लिखा था – दूर होती जा रही है कल्पना / पास आती जा रही है जिंदगी । अर्थात, जिंदगी को करीब करते हुए उसे देखने, समझने और व्यक्त करने का संकल्प नवगीत ने लिया। लेकिन काव्य की इस शैली को ‘नवगीत’ नाम बहुत बाद में दिया गया। वीरेंद्र मिश्र का एक वाक्य उद्धृत करते हुए डॉ. तिवारी कहते हैं कि जहां मनुष्यता और कविता एररस हो जाती है, वही नवगीत सार्थक होता है। डॉ. तिवारी के अनुसार वास्तव में इसकी शुरुआत निराला से होती है, जब 1934 में वह अपने काव्य संग्रह ‘गीतिका’ की पहली कविता सरस्वती वंदना में लिखते हैं – नव गति नव लय ताल छंद नव / नवल कंठ नव जलद मंद्र रव / नव नभ के नव विहग वृंद को / नव पर नव स्वर दे । इन पंक्तियों में निराला परिवेश के अनुकूल होने का आग्रह सा करते दिखाई देते हैं। क्योंकि जो कविता परिवेश के साथ नहीं चलेगी, वह पीछे छूट जाएगी और स्वीकार नहीं की जाएगी।

डॉ. तिवारी नवगीतकार की रचना प्रक्रिया पर बोलते हुए कहते हैं कि वह स्वर सज्जा के प्रति सावधान नहीं होता, बल्कि अभिव्यक्ति की आकुलता के प्रति ईमानदार होता है। नवगीतों की लय वास्तव में मनोलय होती है। यदि भीतर मनोलय दुरुस्त है, तो शब्दों में बराबर उतर जाएगी। यदि मनोलय बराबर नहीं है, तो गीत नहीं बनेगा। अर्थात उसका निर्माण भीतर होता है। इसीलिए ये गीत बोधिप्रधान होता है। जैसे- नवगीत संग्रह ‘खिड़कियाँ खोलो’ के एक गीत- चौदह रुपए वड़ा-पाव के / चाय हो गई दस में / कहाँ जिंदगी वश में ; इन पंक्तियों में – कहाँ जिंदगी वश में – एक विवशता है, जिसे हम गाकर भी व्यक्त कर सकते हैं। यही नवगीत की सुंदरता है। यह कवि की सामर्थ्य पर निर्भर करता है कि जटिलता कितनी भी हो, वह उसे गाकर प्रस्तुत कर सके। ऐसी जटिल स्थितियों को व्यक्त करने के लिए हमें नई भाषा और नया सलीका चाहिए। जो नवगीत ही दे सकता है।

समारोह की अध्यक्षता कर रहे नवनीत के संपादक एवं कवि विश्वनाथ सचदेव कहते हैं कि गीत की तरह की नवगीत भी गीतकार का ही होता है। सिर्फ आमजन की बात करने के कारण वह जनता का नहीं हो जाता। कविता जब भी लिखी जाएगी, जिस भी स्वरूप में लिखी जाएगी, वह कवि की अनुभूतियों को उजागर करने का माध्यम ही होगी। व्यक्ति के भीतर जो कुछ भी होता है, वह जब उफन कर बाहर आ जाता है, वही कविता होती है। इसलिए जब कोई कवि रचता है तो उसके अंदर की सारी भावनाएं उसमें समाहित हो जाती हैं। नवगीत संग्रह ‘खिड़कियाँ खोलो’ पढ़कर लगता है कि ओमप्रकाश तिवारी एक अरसे से कविता को जी रहे हैं। एक नवगीत संग्रह के लोकार्पण मंच पर करीब दो घंटे नवगीतों पर चली चर्चा ने इस विषय पर और विस्तृत चर्चा की भूख पैदा कर दी। फलस्वरूप डॉ.रामजी तिवारी एवं डॉ. वागीश सारस्वत ने मंच पर उपस्थित हिंदी विद्या प्रचार समिति के सचिव डॉ.राजेंद्र सिंह के समक्ष नवगीत पर विस्तृत चर्चा कराने का प्रस्ताव रखा, जिस पर डॉ. सिंह ने सहर्ष सहमति जताई।

लोकार्पण समारोह का कुशल संचालन डॉ. अशोक तिवारी ने एवं अतिथियों का स्वागत हिंदी विद्या प्रचार समिति द्वारा संचालित रामनिरंजन झुनझुनवाला कॉलेज की प्राचार्या डॉ. उषा मुकुंदन ने किया। आभार ज्ञापन का दायित्व कॉलेज की हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. मिथिलेश शर्मा ने निभाया।

 

प्रस्तुति – डॉ सुमन सास्वत 
साभार: ओम प्रकाश तिवारी

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