एक शाम भर बातें

व्यंगात्मक उपन्यास : प्रथम भाग -

 

‘हैलो-हैलो जी, आप यहाँ तन्हाँ कैसे बैठी हैं? आपके शरीके-हयात कहाँ हैं?’ अपने दोनों हाथ फ़ैलाए राजेश मलिक, जिसे उसके तथाकथित रिश्तेदार और मित्र पीठ-पीछे ‘गिरगिट’ के नाम से पुकारते थे, इला खजांची की ओर आंधी-पानी की तरह बढ़ा। किसी भी महिला को आलिंगन में लेने का मौका भला वह कैसे चूक सकता था? कन्नी काटने के लिए इला पहले से ही चौकन्नी थी हालांकि किसी अनजान व्यक्ति से मगज़ चटवाने से अच्छी थी गिरगिट की किटकिट; तिस पर इला वे सब रंग जानती थी जो वह पलट सकता था।

‘नमस्ते राजेश जी, राजीव यहीं कहीं होंगे,’ अपना सिर थोड़ा सा झुका कर इला ने दूर से ही हाथ जोड़ दिये ताकि गिरगिट को अंदाज़ा हो जाए कि आलिंगन और चुम्बन की प्रथा में वह विश्वास नहीं रखती थी किन्तु गिरगिट अपनी हरकतों से कब बाज़ आने वाला था? उसे आशा ही नहीं, अपितु पूर्ण विश्वास था कि इस वक्त न सही; सफलता उसके क़दम एक न एक दिन अवश्य चूमेगी। फिर, आज तो वह पूरी तैयारी के साथ आया था। आसमानी रंग की नई कमीज़ के साथ नेवी-ब्लू थ्री-पीस सूट पहने और सुर्ख़ गुलाबी टाई लगाए, वह अपनी गतिविधियों को सीमित रखने के प्रयत्न में था ताकि उसका नया सूट कहीं मुस-मुसा न जाए। इसके अतिरिक्त, वह दर्पण के सामने संवादों और शेरो-शायरी की अदायगी का बाक़ायदा पूर्वाभ्यास करके आया था।

‘ख़ाली है अभी जाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ?’ गिरगिट ने बड़े अंदाज़ से गुलाम अली की ग़ज़ल का मुखड़ा एक सवाल के लहज़े में पेश किया। इला के जुड़े हुए हाथ अपने हाथों में दबोचने के चक्कर में गिरगिट उसके बेहद क़रीब चला आया था।

‘धन्यवाद राजेश जी, मैंने अभी-अभी औरेंज-जूस पिया है,’

‘अरे इला जी, जूस-वूस पिएँ आपके दुश्मन! ख़ादिम को खिदमत का एक मौक़ा तो दीजिए। बताइए, क्या नोश फ़रमाएंगी आप?’ गिरगिट हाथ बांधे इला के सम्मुख सिर झुका कर खड़ा हो गया।

‘शुक्रिया, राजेश जी, मैं हार्ड-ड्रिंक्स नहीं लेती,’ कहते हुए इला बिजली की गति से पलटी तो पीछे रखी एक कुर्सी से टकरा कर उसका संतुलन बिगड़ गया। बिल्ली के भाग से छींका टूटा; गिरगिट ने झट आगे बढ़ कर इला के हाथ थाम लिए। अपने हाथ छुड़ा कर इला झटपट कुर्सी पर बैठ गयी। प्रसन्न-वदन गिरगिट ने खींसे निपोरते हुए इधर-उधर नज़र दौड़ाई, काश कि कुछ एक मेहमान यह मंज़र देखते और उससे रश्क करते!

‘इला जी, इस पार्टी का माहौल तो आशिकाना होना चाहिए पर यहाँ तो सब कुछ बड़ा फीका-फीका सा लग रहा है,’ इला के नज़दीक रखी एक दूसरी कुर्सी पर पसरते हुए गिरगिट बोला।

‘हम ही लोग समय से काफ़ी पहले पहुँच गए हैं, राजेश जी। मेहमानों को दो बजे का बुलावा है, इसलिए ज़्यादातर मेहमान ढाई बजे या उसके बाद ही पहुंचेंगे,’ अपनी कलाई-घड़ी की ओर इंगित करते हुए इला ने गिरगिट को जताना चाहा कि वह घंटा भर पहले आ धमका था।

‘आपने बजा फ़र्माया, इला जी, पर हम तो घर वाले ठहरे; देर से आते तो बड़े भाई और भाभी शिकायत करते। और फिर, इला जी, मेहमानों के आ जाने के बाद हमें अकेले में बात करने का ऐसा मौका फिर कहां मिलता?’ शम्मी कपूर की तरह आँखें नचाते हुए गिरगिट ने पैंतरा बदला।

गिरगिट का यह जुमला यह सुन कर इला के तन बदन में आग लग गयी हालांकि गिरगिट से कहीं अधिक इला को ग़ुस्सा आ रहा था अपने पति राजीव खजांची पर जो मेज़बान मैक (मकरंद) और मीता मलिक का हाथ बंटाने के बहाने काफ़ी जल्दी पहुंच गया था। वास्तव में तो वह मंजूषा को अपनी नई कार में लिफ़्ट देने के लिए बेताब था। यह अलग बात थी कि मंजूषा का पति कुलभूषण शर्मा एकाएक उनके साथ चलने को तैय्यार हो गया था। इस वक्त वह पत्नी को राजीव के भरोसे छोड़ कर अन्दर वाली बैठक के एक कोने में बीन-बैग पर बैठा जंबो-टेलिविज़न-सेट पर फ़ुटबाल का मैच देखने में तल्लीन था।

इला की बेरूख़ी के बावजूद, गिरगिट उसी के आसपास मंडरा रहा था कि अचानक उसे सायरा ख़ान दिखी, जो रेस्टरूम ढूंढती हुई उधर आ निकली थी। इला ने चैन की एक लम्बी सांस ली कि उसकी जान छुटी क्योंकि सायरा को देख कर अच्छे अच्छों की नीयत बिगड़ जाती थी।

गिरगिट के चेहरे पर गुलाल बरसने लगा। सायरा के साथ बात करने का मज़ा ही कुछ और था; विधवा थी, सुन्दर थी और शायद उपलब्ध भी। काश कि सायरा उसे भी अपने आलिंगन में लेकर उसका गाल चूमती जैसा कि वह रंजीत और राजीव से मिलने पर करती थी तो मेहमानों में उसका सम्मान बढ़ जाता। किंतु सायरा और इला जैसी नकचढ़ी औरतों से उसे ऐसी आशा कम ही थी। आलिंगन के नाम पर कहीं वह भी न बिदक जाए इसलिए उसने तय किया कि वह सायरा का केवल हाथ चूमने का ही प्रयत्न करेगा; यह सोच कर ही उसकी लार टपकने लगी।

‘मोहतरमा सायरा ख़ान को इस नाचीज़ का आदाब क़ुबूल हो,’ गिरगिट बड़ी हसरत से सायरा के सम्मुख एयर-इंडिया के प्रतीक, महाराजा की मुद्रा में सिर झुकाए और हाथ बांधे खड़ा हो गया।

‘वालेकुम सलाम,’ सायरा ने त्यौरियां चढ़ाए हुए गिरगिट का नाटकीय अभिवादन स्वीकार किया; इला की ओर घूम कर धीरे से ‘हेलो’ कहा और फिर बिना गिरगिट की ओर देखे अन्दर वाली बैठक की ओर चल दी।

‘मोहतरमा, आज तो आपका गुलाम आपकी ग़ज़ल सुने बग़ैर यहाँ से हिलने वाला नहीं है। ग़ज़ब का मिश्रण है आपकी आवाज़ में, मीठा, खट्टा, तल्ख…’ गिरगिट ‘कब लोगे खबर मोरे राम’ वाली मुद्रा में हाथ फैलाए सायरा के पीछे चल दिया। अभी नहीं तो कभी नहीं; कुछ ही देर में मेहमानों की भीड़ लग जाएगी, फिर भला उसे कौन पूछेगा?

‘माफ़ कीजिएगा, गि…जनाब,’ सायरा ने अपनी जीभ काट ली। इला को भी हमेशा यही डर लगा रहता था कि उसके मुंह से राजेश की जगह कहीं ‘गिरगिट’ ही न निकल जाए।

‘तहज़ीबे-इश्क है ये, वो हम पर करें सितम और उनसे हम कहें ये करम है; सितम नहीं। मोहतरमा, आप जिस भी नाम से पुकारें, हमें मंज़ूर है। वैसे इस नाचीज़ को राजेश, राजेश मलिक कहते हैं,’ एक हाथ अपने सीने पर रख और सिर को थोड़ा सा झुकाते हुए गिरगिट ने बड़े अदब से अपना परिचय दिया। उसकी ओर एक सायास मुस्कुराहट फेंकती हुई सायरा अन्दर की ओर लपक ली और वह मुंह बिसूरता अपनी बगलें झांकने लगा। हालांकि वह महा-बेशर्म था, फिर भी वापिस इला के पास बैठने में उसे कोई फ़ायदा नज़र नहीं आया। मन में ‘चरैवेती चरैवेती’ दोहराते हुए उसने अपनी नेक-टाई ठीक की, बाल सँवारे और मुख्य-द्वार के पास जाकर मेहमानों का इंतज़ार करने लगा।

हाँ, यह स्थान उसकी मंशा के बिलकुल अनुकूल था। जैसे ही मेहमान घर में कदम रखेंगे, मेज़बान का फर्स्ट-कज़िन होने के नाते वह मर्दों से हाथ मिलाएगा और नवयुवतियों को आलिंगन में लेकर अपना गाल उनके होंठों से सटा देगा। वह जानता था कि औपचारिकतावश मीता बिना ‘मैक डार्लिंग’ के मेहमानों का स्वागत करेगी नहीं और मोटापे एवं झेंप की वजह से मकरंद को लुढ़कते हुए द्वार तक पहुँचने में समय लगेगा। इस बीच, पतियों अथवा संरक्षकों की उपस्थिति में वह महिलाओं से अपने को चटवा चुका होगा।

इला ने कहीं पढ़ा था कि आम धारणा के विपरीत गिरगिट के रंग बदलने की प्रतिक्रिया का वातावरण से कोई सम्बन्ध नहीं होता; उसके स्नायूतंत्र उत्तेजना और भय इत्यादि से रंग बदलते हैं। इतने भयभीत व्यक्ति से कैसा डर किन्तु गिरगिट की नाटकीय चापलूसी भला कोई कब तक बर्दाश्त कर सकता था?

तभी सीढ़ियों के ऊपर अपने शयन-कक्ष से बाहर निकल कर गलियारे में मेज़बान अवतरित हुए। वे अपनी पूरी साज-सज्जा में थे। सुनहरी अचकन और चूड़ीदार पाजामें में मकरंद बेहद व्यथित दिखाई दे रहे थे, तिस पर उनके गले में मोतियों का एक लंबा हार था; जिसे पीछे पीठ पर फेंकते हुए वह बार-बार अपना गला खुजा रहे थे। मीता आँखें तरेरते हुए उन्हें संयम बरतने का आदेश दे रही थी। मीता ने गोटे-किनारी से लदी-फदी सुनहरी नेट की एक भारी भरकम साड़ी पहन रखी थी, गले में था हीरों का एक भारी जड़ाऊ सेट और दाएं कान के ऊपर बालों में फंसा था मोगरे के कृत्रिम फूलों का एक गुच्छा। विक्टोरिया और डेविड बैखम द्वारा प्रचारित परफ्यूम्स में वे सिर से पाँव तक नहाए हुए थे।  एक दूसरे का हाथ कस कर थामें, वे एक नवविवाहित जोड़े की तरह सीढ़ियाँ उतरते हुए नीचे बैठक में पहुंचे। उन पर नज़र पड़ते ही, खींसे निपोरता हुआ, गिरगिट उनकी ओर लपका।

गिरगिट को नज़रन्दाज़ करते हुए, मीता और मकरंद सीधे भीतरी बैठक में जा पहुंचे, जहां शेरा वाली माँ की एक बड़ी सी मूर्ति सुसज्जित थी; जिसके चारों ओर क्रिसमस-लाइट्स जगमगा रही थीं। अधखुले नेत्रों से मीता ने गिरगिट को ढूंढा और उसे अपना कैमरा थमा दिया। मरता क्या न करता, आकुल-व्याकुल गिरगिट फ़ोटोज़ लेने लगा। मैक और मीता ने मेज़ पर रखे ताज़ा फूलों का हार बड़े भक्ति-भाव से मूर्ति पर चढ़ाया और आँखें बंद कर कुछ देर तक प्रार्थना की।

‘बोल शेराँ वाली माता तेरी सदा ई जै, जग्दियाँ जोतां वाली माता तेरी सदा ही जय,’ मीता ने हुंकार लगाई तो मकरंद, गिरगिट और राजीव ने ज़ोर से ‘जय’ दोहराया। इसके बाद मकरंद ने अन्य भगवानों के नाम ले लेकर ‘जय’ के नारे लगवाए, जिसकी वजह से उनकी मोटी गर्दन को कई एक झटके झेलने पड़े। गिरगिट ने भाई-भाभी की एक दूसरे को बर्फी खाते-खिलाते हुए भी फ़ोटोज़ लीं। अंत में, मीता ने बड़े स्नेहपूर्वक बर्फ़ी और फलों का प्रसाद अपने गिने चुने मेहमानों में बांटा।

‘बड़े भाई, शादी की बीसवीं सालगिरह आप दोनों को बहुत-बहुत मुबारक हो, मैनी हैप्पी रिटरन्स औफ़ द डे,’ गिरगिट ने मकरंद का हाथ झिंझोड़ते हुए कहा; जो इस आकस्मिक हमले से हड़बड़ा उठे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि समय से पहले पहुंचे हुए इस ‘कज़िन’ से कैसे निबटा जाए; जिसे मीता बिलकुल पसंद नहीं करती थी। ऐसी अवस्था में मकरंद की झेंप अपनी चरम सीमा पर थी; उनकी गर्दन स्वभावतः झेंप का साथ देती थी। मीता ताड़ चुकी थी कि गिरगिट, हमेशा की तरह, आज भी ख़ाली हाथ आया था।

‘थैंक यू, राजेश। मैक डार्लिंग, दो बज गए क्या?’ मीता ने झुंझलाते हुए मकरंद से पूछा।

‘भाभी जी, फ़िकर नौट, दो बजने में अभी आधा घंटा बाक़ी है। मैं आप दोनों को सबसे पहले मुबारकबाद देना चाहता था पर देख रहा हूँ कि इला जी और राजीव-भाई ने मुझे यहाँ भी मात दे दी। एनीवे, शादी की बीसवीं सालगिरह आपको बहुत-बहुत मुबारक हो,’ दोहराते हुए उसने मीता को आलिंगन में लेकर उसे अच्छी तरह से चूमा। राजीव को, जिससे गिरगिट ने फ़ोटो खींचने की गुज़ारिश की थी, क्लिक का बटन ही नहीं मिला। कंजूसी के लिए मशहूर, मेज़बानों से भाड़े के एक फ़ोटोग्राफ़र की आशा रखना भी मूर्खता थी। मीता को आगोश में लिए-लिए गिरगिट ने इशारे से बटन की ओर इंगित किया और एक बार फिर अपना गाल मीता के होंठों से लगा दिया।

‘इनफ़ इज़ इनफ़, राजेश।’ मेज़ पर रखे रंग-बिरंगे टिशु-बौक्स में से एक टिशु निकालकर मीता ने झल्लाते हुए अपना गाल पोंछा तो उसे टिशु के खुरदरेपन का एहसास हुआ। उसका दिल बैठ गया; उसके ख़ास मेहमान क्या सोचेंगे? इस विशेष अवसर के लिए उसे अच्छे टिशुज़ खरीदने चाहिए थे लेकिन अब क्या किया जा सकता था?

‘मैक डार्लिंग, दीज़ टिशूज़ आर ए जोक। सुनो, ज़रा बेडरूम से वो डीसेंट वाला टिशु-बौक्स नीचे लाना और सुनो, कहीं उसे मेज़ पर नहीं रख देना। वो हम सिर्फ़ स्पेशल मेहमानों को ही ऑफ़र करेंगे,’ मीता की आज्ञानुसार मकरंद झेंपते हुए ऊपर से एक लाल-सुनहरी मखमली टिशु-बौक्स लेकर हाँफते हुए नीचे लौटे तो मीता ने अपनी आँखें मूँद कर शेराँ वाली माता को लाख-लाख धन्यवाद दिया; जिन्होंने अपनी भक्तन की लाज आज बस लुटते लुटते बचा ली थी।

‘मैक डार्लिंग, वायु और सुमित जागे कि अभी भी सो रहे हैं?’ मीता ने दूसरा प्रश्न दागा।

‘मीता डार्लिंग, उन्हें अ..अ..अभी स..स..सोने दो,’ मकरंद ने कुछ घबराते हुए कहा कि कहीं मीता उन्हें फिर से ऊपर न दौड़ा दे। मकरंद की छोटी बहन वायु और बहनोई सुमित वर्मा ओस्लो से कल रात ही लन्दन लौटे थे। वे मकरंद और मीता के लिए नोरवीजियन-क्रिस्टल का एक बड़ा सा कटोरा उपहार में लाए थे। मीता के हिसाब से उनकी शादी की बीसवीं सालगिरह के लिए यह एक हल्का उपहार था; विशेषतः सगे बहन-बहनोई की ओर से। यह उन्हें ओस्लो के फ़ुगलेन-बार से अवश्य सस्ते में मिल गया होगा।

इस खूबसूरत क्रिस्टल-बाउल को मेज़ पर रखा देख इला ने ही मीता को सुझाया था कि वह उसे पानी से आधा भर कर उसमें गुलाब की पंखुड़ियां और टी-लाइट्स छोड़ दें। अब वही कटोरा मेज़ की ही नहीं, पूरे डाइनिंग हौल की रौनक़ बढ़ा रहा था।

‘मैक डार्लिंग, मुझे आज सब कुछ परफ़ैक्ट चाहिए,’ मैक को सचेत करते समय भी मीता की नज़र गिरगिट पर ही टिकी थी जो काजू-पिस्ता-बादाम-अखरोट और किशमिश से सजाई गयी ट्रे के बिलकुल क़रीब खड़ा था। उसने एक क्षण के लिए आँखें बंद कीं और मन ही मन एक बार फिर शेराँ वाली माँ को याद दिया कि वह उसकी काजू-पिस्ता-बादाम-अखरोट और किशमिश से सजाई गयी ट्रे की रक्षा करें।

‘राजेश, कैमरा बहुत एक्स्पेंसिव है। अपने नैक में लटका लो, कहीं हाथ से गिर कर टूट न जाए,’ कहते हुए मीता ने कैमरे की डोरी स्वयं गिरगिट के गले में पहना दी और मकरंद की ख़बर लेने चल दी।

‘मैक डार्लिंग, ऐसे अनकल्चर्ड लोगों को पार्टी में इनवाईट करने की क्या ज़रुरत थी?’ मीता ने फुसफुसा कर पति से पूछा तो जवाब में उन्होंने झेंपते हुए अपने कंधे उचका दिए; मेहमानों की फेहरिस्त बनाते समय मीता ने उसकी राय तक नहीं ली थी। वैसे भी, अपने समस्त ससुराल वालों से मीता को शिकायत थी।

‘सुनो राजीव, यह कॉर्नर कुछ एम्पटी-एम्पटी सा लग रहा है, प्लीज़ यहाँ ग़ुब्बारे या टिंसल्स लटका दीजिए न।’ कुछ ठुनकते हुए मीता ने राजीव से कहा और जल्दी से पैकेट में से कुछ ग़ुब्बारे निकाल कर उसने गिरगिट के हाथ में थमा दिए। उसे किसी न किसी काम में व्यस्त रखना बहुत आवश्यक था ताकि वह उसकी काजू-पिस्ता-बादाम-अखरोट और किशमिश से सजी हुई ट्रे का सत्यानास न कर दे।

‘भाभी जी, आपके घर में एक्स्ट्रा क्रिसमस-लाइट्स तो होंगी ही…’ एकाएक राजीव ने पूछा तो पीछे खड़ी सायरा और इला मुस्कुराने लगीं।

‘ब्रावो राजीव, वाट ऐ ब्रिलियैंट आइडिया! मैक डार्लिंग, ज़रा राजेश को ऐटिक में चढ़ा कर क्रिसमिस-लाइट्स वाला बौक्स उतरवा लाओ,’ मकरंद ने घूर कर राजीव को इस बेवकूफ़ी भरे सुझाव के लिए लताड़ा। एक ग़ुब्बारा मुंह में दबाए गिरगिट भी आनन-फ़ानन बाथरूम में जा घुसा; धूल-धूसरित कोलकी में चढ़ कर कौन अपना पार्टी-सूट बर्बाद करे?

‘एक मिडल-ऐजेड जोड़े की बीसवीं वेडिंग-ऐनिवर्सरी पर ग़ुब्बारे और क्रिसमिस-लाइट्स लगाने की भला क्या तुक है?’इला के मन की बात सायरा ने कह दी।

‘बिलकुल सही फ़रमाया आपने, ऐसे मौकों पर तो ताज़ा फूलों की सजावट होनी चाहिए थी,’इला की नज़र वापिस चौकन्ने से गिरगिट पर आ टिकी जो ग़ुब्बारे फुलाने की बजाय उस वक्त गरमा-गर्म चिकन-टिक्के गटकने में व्यस्त था; दैवयोग से इस वक्त मीता रसोई में काम-वालियों से झिक-झिक कर रही थी।

‘तुम्हारे ऐप्रन्स कहाँ हैं, गर्ल्स?’ पूछते हुए मीता ने प्रिया और लूसी के कपड़ों और जूतों का निरीक्षण किया। दोनों ने झटपट अपने सफ़ेद टॉपस और काली स्कर्ट्स के ऊपर मीता द्वारा खरीदे गए सफ़ेद ऐप्रन्स बाँध लिए जिनके ऊपर काले रंग से ‘गेस्ट इज़ गौड!’ छपा था।

‘चिन अप गर्ल्स एंड स्टैंड स्ट्रेट, आज बहुत इम्पोर्टेन्ट गेस्ट्स आने वाले हैं, बी वेरी पोलाइट टु दैम। ओके प्रिया, यू अंडरस्टैंड?’ मीता ने यह बात प्रिया को लक्ष्य करते हुए ऐसे कही थी कि जैसे वह मंदबुद्धि हो।

‘येस मैम,’ लूसी ने कहा तो प्रिया ने भी अपनी गर्दन भारतनाट्यम नृत्य की मुद्रा में हिला कर हामी भर दी। मीता ने एक बार फिर सिर से लेकर पाँव तक उन दोनों का निरीक्षण किया और फिर सन्तुष्ट होकर गैरेज में चली आई, जहां प्लास्टिक के बड़े-बड़े भगोनों में भोजन रखा था। स्टील की एक थाली में भोजन परोस कर वह एक बार फिर मंदिर में पहुँची और आँखें मूँद कर उनसे बरक्कत की मांग की, ‘माँ शेरां वाली, आज की पार्टी सक्सेस्फुल रही तो मैं फ़ाइव पौंड्स का प्रसाद चढ़ाऊँगी,’

मीता की ग़ैरहाजिरी गिरगिट के लिए वरदान साबित हुई हालांकि दूर कोने में खड़ी सायरा और इला की नज़रें उसी पर टिकी थीं।

बोझिल और लटके हुए पपोटों के नीचे दबी हुई गिरगिट की आंखें यूं तो एक ही समय में दो ओर देखतीं किन्तु जब वे भोजन पर टिकतीं तो उसकी दोनों पुतलियां न जाने कैसे एक ही स्थल पर केन्द्रित हो जातीं। एक बड़े से टिक्के को उसने अपनी मोटी और ठिगनी उंगलियों के बीच दबोचा ही था कि सायरा ने इला के कान में बड़ी कातर आवाज़ में ‘हैल्प, हैल्प’ कहा। इला को भी लगा कि तंदूरी मुर्गा उन्हें अपनी सहायता के लिए पुकार रहा था। जीभ को टिक्का सम्भलवा कर, गिरगिट की उंगलियां झट प्लेट पर वापिस लौट आईँ और एक दूसरे टिक्के को सहलाने लगीं। टिक्का जीभ समेत उसके चौड़े मुंह में यूं ग़ायब हो गया कि जैसे छिपकली के मुंह में मच्छर। क़ोफ़्त के मारे इला और सायरा ने अपने चेहरे फेर लिए।

‘इन्हें गिरगिट जैसा तख़ल्लुस देने वाले अज़ीज़ से मैं ज़रूर तवारुफ़ करना चाहूंगी,’

‘ज़रूर कोई भुक्त-भोगी होगा,’ इला जान-बूझ कर राजीव का नाम छिपा गयी कि बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी।

इस पार्टी में शामिल न होने के लिए इला ने न जाने कितने बहाने बनाए थे किन्तु राजीव के सामने उसकी एक नहीं चली थी; मंजूषा के साथ अकेले आता तो लोग सौ बातें बनाते। हालांकि इला ने उसे पूरी छूट दे रखी थी; जहां जी में जाए और अपने साथ जिसे चाहे ले जाए क्योंकि वह आश्वस्त थी कि राजीव को नवयुवतियों से बतियाने भर का शौक़ था। विवाह के पिछले सात वर्षों के दौरान, उसने किसी भी युवति को गम्भीरता से नहीं लिया था। वह बस इसी में ख़ुश था कि मर्दों के बीच उसकी साख़ बनी रहे कि शादी-शुदा होने के बावजूद वह युवतियां पटाने में सक्षम था। फिर क्या यह ज़रूरी था कि वह इला की तरह असमय प्रौढ़ हो जाता?

मकरंद से आँखें चार होते ही गिरगिट ने प्लेट को बड़ी मुस्तैदी से मेज़ पर वापिस रख दिया और टिक्कों के मसाले से रंगे हाथों को उसने अपनी पीठ के पीछे ले जाकर ऐसे बाँध लिया कि जैसे वह वहाँ बस टहलते हुए ही पहुँच गया था। गिरगिट को चिकन-टिक्कों के क़रीब खड़ा देख, मीता अपने इक्का-दुक्का मेहमानों को चीरती हुई उसकी ओर लपकी; वह जानती थी कि गिरगिट को क़ाबू में रखना मकरंद के बस की बात नहीं थी।

‘मैक डार्लिंग, ज़रा गैस्टों को लुक आफ़्टर करो न! और देखो कहीं चिकन-टिक्का कम न पड़ जाए,’ मीता ने झल्लाते हुए कहा किन्तु मैक डार्लिंग से झेंपने के अलावा कुछ न हो पाया; वैसे भी मेहमान अभी पहुंचे ही कहाँ थे? उन दोनों को अपने समक्ष देख, गिरगिट एक ग़ुब्बारा ऐसे ज़ोर-शोर से फुलाने लगा कि जैसे वह मीता द्वारा सौंपे गए काम में अत्यधिक व्यस्त था।

‘राजेश, ग़ुब्बारे अब बहुत हो गए। ज़रा जल्दी से टैस्कोज़ सुपर-स्टोर से आइस-क्यूब्स के कुछ बैग्स ले आओ प्लीज़?’ मीता के तथा-कथित स्टैण्डर्ड को क़ायम रखने के लिए गिरगिट का कहीं व्यस्त रहना बहुत ज़रूरी था, विशेषतः जब तक उनके सारे मेहमान नहीं पहुँच जाते।

‘श्योर श्योर, भाभी जी। मैं तो ट्रेन से आया हूं पर, वरी नौट, अपना राजीव है न, जिंदाबाद। इसी बहाने बड़े भाई की नई कार में बैठने का मुझे भी मौक़ा मिल जाएगा,’

‘राजीव को अभी बहुत सारे काम निपटाने हैं, राजेश। पांच ही मिनट का तो रस्ता है, जस्ट रन एलौंग प्लीज़,’ अपनी आवाज़ में शहद घोलते हुए मीता ने गिरगिट को बाहर की ओर धकेलते कहा। ख़ुद को मीता का देवर बताता फिरता है, ज़रा अपना फ़र्ज़ भी तो निभा कर दिखाए!

सितम्बर का महीना था और ऐसी कोई ख़ास ठण्ड भी नहीं थी कि गिरगिट को जैकेट पहननी पड़ती लेकिन उसने खूंटी से अपनी जैकेट उतारने और पहनने में दस मिनट लगा दिए। बड़े बेमन से वह अभी दरवाज़े तक पहुंचा ही था कि मेज़बान के परम मित्र मोहन और उनकी पत्नी मोहनी टयाल आ पहुंचे। गिरगिट के तो भाग ही खुल गए; असली मज़ा तो मोहिनी की गुदगुदी छातियों को सीने से लगाए रखने में था। उसने अपने को शाबाशी दी क्योंकि ऐसा केवल उसकी टालमटोल से ही सम्भव हुआ था; वह सुपर-मार्केट के लिए निकल गया होता तो इस अभूतपूर्व आनंद से वंचित रह जाता।

मोहिनी भी किसी को एक बार अपने से चिपका लेती तो उसे अच्छी तरह झिंझोड़े बगैर नहीं छोड़ती थी। उसने शामों-साटन की एक सतरंगी साड़ी पहन रखी थी और उसका ब्लाउज़, जो एक ज़माने में मैचिंग रहा होगा, अपने प्राचीनत्व को रो रहा था। गले में सोने की भारी चेन में लटके बड़े से लौकेट में लक्ष्मी जी सुशोभित थीं, जो मोहिनी की भारी-भरकम छातियों के मध्य फंसी थीं।

‘जय सिया राम, जय भरत-शत्रुघन…’ कहते हुए गिरगिट ने मोहिनी का स्वागत किया।

‘जय लक्ष्मण, जय जय हनुमान,’ मोहिनी ने दूसरी पंक्ति गाई; फिर दोनों ने मिलकर सम्पुट को दो बार बड़े ज़ोर-शोर से दोहराया।

‘मोहिनी भाभी, दरवाज़े पर ही खड़ी रहोगी कि अन्दर भी आओगी?’ मीता ने अपनी बाईं आँख दबाते हुए मोहिनी को जता दिया कि गिरगिट को लिपटाए वह कब से दरवाज़े में ही अटकी थी। मोहिनी को छोड़ा तो गिरगिट ने मोहन का हाथ थामते हुए सम्पुट की वही पंक्ति दोहराई। उनका हाथ छोड़ता तो उसे आइस-क्यूब्स लेने जाना पड़ता। भारी-भरकम मोहन ने भी, जो सांस लेने के लिए द्वार पर ठहर गए से लगते थे, सम्पुट की पंक्ति पूरी की और फिर मोहन, मोहिनी और गिरगिट तीनों ने मिलकर सम्पुट को दोहराया।

‘मैक डार्लिंग, ज़रा राजेश से कहो न कि जल्दी से आइस-क्यूब्स ले आए, मेरी तो वह एक नहीं सुनता,’ गिरगिट को मोहिनी और मोहन के साथ व्यस्त हुआ देख मीता चिढ़ उठी।

‘मीता डा..डा..डार्लिंग, ग..ग..गैरेज वाले फ़…फ़..फ़्रीज़र में ब..ब..बहुत सारी आ..आ..आइस रखी…’ झेंपते हुए मकरंद ने कहा।

‘शुश डार्लिंग, उसे मैंने इंटेंशनली बाहर जाने को कहा था। जब तक हमारे स्पेशल गेस्टस पहुंचेगे, वह सारे टिक्के उड़ा चुका होगा,’ मीता ने अपनी बाईं आँख दबाते हुए कहा।

‘ड..ड..डार्लिंग, यू आर स..स..सो र..र..राईट,’ पत्नी के समर्थन में मकरंद को जैसे एक बार फिर झेंपने का मौक़ा मिला; गर्दन भी मटकने से नहीं चूकी।

‘अरी मीता, हम अन्दर नहीं आएँगे तो क्या मरे बाहर ही खड़े रहेंगे? मरी तुम्हारी पार्टी में ही तो आएं हैं। शादी की मरी सालगिरह तुमें भौत-भौत मुबारक हो,’ मोहिनी ने मीता और मकरंद दोनों को एक साथ अपने से चिपटाते हुए कहा।

‘थैंक यू, मोहिनी भाभी। आरती और दीपक को कहाँ छोड़ आईं? मीता ने पूछा।

‘बच्चों को तो हम मरा जान बूझ कर नहीं लाए, मीता, हम लोगों के बीच वे मरा बोर ही होते। वैसे भी उनके इम्तिहान सिर पर हैं। हैरी और कैमिला के भी तो मरे इम्तहान चल रहे होंगे?’

‘हाउ थॉटफुल ऑफ़ यू, मोहिनी,’ मीता ने सोचा कि ज़रूर दाल में कुछ काला था, नहीं तो मोहिनी और मोहन बच्चों को घर छोड़ कर आने वालों में से नहीं थे।

‘हम जल्दी आ गए क्या?’ मोहन ने कमरे के अन्दर झांकते हुए पूछा। उन्होंने मीता और मकरंद को बधाई तक नहीं दी क्योंकि वह औपचारिकता में विश्वास नहीं रखते। वैसे भी, मकरंद के स्व-नियुक्त बड़े भाई जो ठहरे। मोहिनी से कहीं अधिक मोटे, मोहन थोड़ा सा लंगड़ा कर भी चलते थे। उनका थुलथुल बदन उनकी पैंट और कमीज़ संभाल नहीं पा रही थीं। कमीज़ में से उनकी फ़ुटबाल जैसी तोंद के नयनाभिराम दर्शन किए जा सकते थे और उनकी पैंट कमर पर भगवान ही जाने कि कैसे टिकी थी।

‘अरे नहीं मिक भाई साहब, कम इन, कम इन। इला-राजीव, राजेश, कुलभूषण-मंजूषा, दे ऑल आर इनसाइड।’ मीता ने बताया।

हांफते हुए मोहन के हाथ से गत्ते के दो डिब्बे झपट कर मोहिनी ने मकरंद और मीता को थमाते हुए जैसे अपना कर्तव्य निभा दिया। मीता ने झट अनुमान लगा लिया कि उन डिब्बों में क्या होगा। एक में सस्ती सी साड़ी और दूसरे में एक कमीज़, जो साउथहौल में दस पाउंड की तीन मिलती हैं, जिन्हें मीता को भी आगे किसी को भिड़ाना होगा। इंडिया जाओ तो दर्जनों रिश्तेदारों को कुछ न कुछ देना ही पड़ता है, इसमें देवर-देवरानी निपट जाएंगे, ‘जय माता दी।’

‘सायरा को भी बुलाया है मरा तुमने?’ तिरछी नज़र से मोहिनी ने सायरा को देख लिया था। एकाएक मीता घबरा उठी कि गिरगिट, घड़ियाल और सायरा जैसे मेहमान उसकी पार्टी का कहीं कूड़ा ही न कर दें। उन्हें न्योता देकर वह अब पछता रही थी किन्तु गिरगिट और घड़ियाल मैक के ‘फर्स्ट-कज़िन्स’ थे; न चाहते हुए भी उसे उन्हें न्योता देना पड़ा था। हालांकि उसके स्टैण्डर्ड के तो नहीं हैं किन्तु पड़ौसियों में से भी किसे बुलाती, किसे छोड़ देती?

‘मैक डार्लिंग, अच्छा होगा कि हम इन्हें भी इसी पार्टी में निपटा दें, नहीं तो हमें एक अलग से पार्टी देनी पड़ेगी,’ कहते हुए मीता ने लगभग सौ लोगों को विशेष निमंत्रण-पत्र भिजवाए थे; जिनमें से लगभग तीस भारत, यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के निवासी थे और उसे पूरी उम्मीद थी कि वे नहीं आ पाएंगे। ये निमंत्रण-पत्र, जिन पर गुलाबी और नीले रंग के गुब्बारे उड़ रहे थे, उसकी बेटी कैमिला ने अपने लैपटॉप पर बनाए थे। बेटे हैरी के अनुसार ये ‘ग्रोटैस्क’ यानि कि भयावने थे। जिन खुशनसीबों को ये निमंत्रण-पत्र मिले, वे सिवा मुस्कुराने के और क्या कर सकते थे? हालांकि मीता की एक पड़ौसन को तो यह निमंत्रण-पत्र इतना पसंद आया कि उसने उसे फ्रेम में जड़वा कर अपनी बैठक में सजा लिया था।

‘डार्लिंग, यह सायरा क्या कर रही है यहां? डिड यू इन्वाईट हर?’ मीता ने पति से सफ़ाई मांगी, कम से कम सायरा को उसने तो क़तई नहीं बुलाया था।

‘मी..मी..मीता डार्लिंग, मैं क..क..क्यों इ…इ.इन्वाइट करने लगा? ग..ग..गैस्टों की लिस्ट तो तुम्हीं ने ब-ब-ब-बनाई थी,’ मकरंद के इस झेंप-म्रिश्रित स्पष्टीकरण ने मीता को और भी शक में डाल दिया।

‘तो डार्लिंग, हाऊ कम शी इज़ हियर?’ मीता ने पति का ऊपर से नीचे तक का निरीक्षण कर डाला कि कहीं वह उससे कुछ छिपा तो नहीं रहा था।

‘यू नो डार्लिंग, वेरी वेल, रंजीत ज..ज..जहां भी जाता है, सा-सा-सायरा वहां प..पहुंच ही ज..ज..जाती है,’ मैक की क्रोधभरी झेंप ने उनकी गर्दन को कई झटके दिए।

‘बट मैक डार्लिंग, आई कान्ट सी मिस्टर रंजीत नो-वेयर,’ मीता की चील जैसी आंखें एक बार फिर गिरगिट पर जा टिकीं जो वापिस अन्दर आकर अपना कोट खूंटी पर टांग रहा था।

‘मोहिनी भाभी, अपने रंजीत भाई बादशाह आदमी हैं, वो तो अपने हिसाब से ही आएँगे,’ गिरगिट बोला, जो ख़ाली हाथ लौट आया था। मीता उसे आंखें फाड़े यूं देख रही थी कि जैसे उसे कच्चा ही चबा जाएगी।

‘राजेश, आइस क्या हुआ?’ उसी वक्त ट्रे में गर्म गर्म चिकन-टिक्के लिए एक पतली दुबली पोलिश लड़की, लूसी, विदेशियों के बीच घबराई हुई सी आ खड़ी हुई।

‘वरी नौट भाभी जी, आपकी आइस भी बस आती ही होगी। बुलबुल पूछ रही थी कि मामा-मामी को कुछ चाहिए तो नहीं, मैंने उससे कह दिया कि आइस-क्यूब्स और दो चार टिशू-बौक्सेज़ लेती आए, वह टैस्कोज़ के पास ही से गुज़र रही थी। ठीक कहा न?’ कहते हुए गिरगिट एक बार फिर टिक्कों की ओर लपका। मीता जब तक गिरगिट से प्लेट को दूर हटाती, टिक्कों की ही तलाश में मोहन भी लंगड़ाते हुए उधर आ निकले।

‘लूसी, दीज़ टिक्काज़ आर कोल्ड, प्रिया से कहो कि इन्हें थोड़ी देर के लिए अवन में रख दे,’ मीता ने अभिचकित लूसी को टिक्कों की प्लेट सहित रसोई की ओर धकेल दिया; गिरगिट और मोहन टापते ही रह गए। मीता सोच-सोच कर झल्ला रही थी कि लोगों को खाने की ऐसी भी क्या जल्दी पड़ी थी? मेज़ पर रखे हुए स्टार्टर्स को कुछ देर तो सजा रहने देते।

‘मिक भाई साहब, आप तो प्लीज़ गरम-गरम समोसा खाइए, हरी चटनी के साथ, टोमेटो कैच-अप तो जी, इज़ ओनली फ़ौर गोराज़,’ यह सोच कर कि उसके टिक्के हटा लेने पर कहीं मोहन बुरा न मान गए हों, मीता ने बड़े सम्मान से समोसों की ट्रे उनके आगे कर दी।

‘थैंक यू भाभी जी, समोसों में कैलोरीज़ बहुत ज़्यादा होती हैं न, इसलिए…,’ कहते हुए मोहन टयाल ने अपना हाथ खींच लिया।

‘मिक भैय्या, ये कोई आर्डिनरी समोसाज़ नहीं हैं; अव्नेबल समोसाज़ हैं, नो फ्राइंग इन्वौल्वड,’ मीता ने एक समोसा मोहन की प्लेट में ज़बरदस्ती रख दिया।

‘तुम क्या मरा समोसा खाने में लगे हो, मिक? टिक्का लो मरा टिक्का, क्या ख़ूब बना है; मरा मज़ा आ गया,’ मोहिनी घबराई हुई लूसी को रास्ते से ही लौटा लाई थी।

मीता की नाराज़गी को भांपते हुए लूसी ने रसोई की ओर कदम बढ़ाया ही था कि गिरगिट उसका रास्ता रोक कर खड़ा हो गया।

‘मोहिनी जी इतनी तारीफ़ कर रहीं हैं तो, भाभी, हम भी अब टिक्का ही चखेंगे,’ मोहन और मोहिनी की आड़ में गिरगिट चार पांच टिक्के और चटनी अपनी प्लेट में रखने में फिर कामयाब हो गया। मीता का मन हुआ कि अपने बाल नोच ले।

‘मैक डार्लिंग, ज़रा टिक्के गरम करवाओ न,’ मीता की नुकीली कोहनी मैक डार्लिंग की पसलियों को घायल कर गई किन्तु झेंप के अत्यधिक बढ़ जाने के कारण मकरंद की टाँगे जवाब दे गईं।

‘अरे छोड़िए न भाभी जी, पार्टी में गर्म-ठंडा सब चलता है। गिव मी दी प्लेट, लूसी, यू गो बैक टू दी किचेन। मैं सर्व करता हूं मेहमानों को,’ बौखलाई हुई लूसी मुंह खोले सकपकाई हुई मीता के चेहरे को ताकती रह गयी; टिक्के और गिरगिट दोनों ग़ायब हो चुके थे। झेंपते हुए मकरंद पीछे रखे टू-सीटर सोफ़े में जा धंसे जहां इला इत्मिनान से बैठी हुई इस बेहतरीन नाटक का आनन्द ले रही थी। टिक्कों की ग़ैरहाज़िरी में मोहन भी हाँफते हुए उसकी बगल में आ धरे; इला का सांस लेना अब मोहन और मकरंद के रहमों-करम पर था।

‘लूसी, लूसी, वेयर इज़ लूसी?’ मीता के चिंघाड़ते ही बौखलाई हुई लूसी आधे रास्ते से ही लौट आई।

‘लूसी, यू स्टे विद मी, ओ के? प्रिया विल मैनेज द किचन,’ मेहमानों को भी तो पता लगे कि मीता के घर में एक इन्डियन नौकरानी के अलावा एक गोरी मेड भी थी।

‘येस मैडम,’ लूसी को यह समझ नहीं आ रहा था कि मीता केवल उसे ही क्यों दौड़ा रही थी? प्रिया भी तो थी, जो रसोई में एक स्टूल पर बैठी अपने बेटे मुरली के लाड़ किए जा रही थी, ‘पसी इर्क्क दा?’ ‘दाग मा इर्क्क दा?’ (तुम्हें भूख तो नहीं लग रही? प्यास तो नहीं लग रही?)

कोई मीता से पूछे, गोरी चमड़ी से चाकरी करवाने में जो इज्ज़त है, उसका मज़ा ही कुछ और है।

प्रिया की सिफ़ारिश इला ने ही की थी कि मीता उससे घर या स्कूल के छोटे-मोटे काम करवा लिया करे; प्रिया को पैसों की सख्त ज़रुरत थी। मीता भी झटपट मान गयी थी क्योंकि गोरों के मुकाबले एशियन नौकरों से आधे पैसों में दुगुना काम करवाया जा सकता है हालांकि इंडियंस का काम, जैसा कि प्रिंस फिलिप के मुंह से एक बार निकल गया था; ‘प्रोफ़ेशनल’ नहीं होता किन्तु मीता को कौन सी छत डलवानी थी?

स्टार्टर्स पर नज़र रखते हुए मीता सोच रही थी कि प्रिया और लूसी के होते हुए, उसे राजीव और इला की कोई ज़रुरत नहीं थी। चार मेहमान फ़ालतू के हो गए थे किन्तु उसे क्या मालूम था कि वे अपने साथ कुलभूषण और मंजूषा को भी ले आएंगे। यह अच्छा था कि उन चारों को खाने-पीने में कोई रूचि नहीं थी। इला अजीबो-ग़रीब थी, कहीं अपने पति पर ही तो शोध नहीं कर रही? वरना कौन अपने पति को दूसरी औरत के साथ खुल्लम खुल्ला बतियाने देता है? मीता के अक्ल के घोड़े चारों दिशाओं में सरपट दौड़ रहे थे। विशेष अतिथि बस पहुंचने ही वाले होंगे। कहीं चिकन-टिक्के कम न पड़ जाएं; लोगों को तो बातें बनाने का बस एक मौक़ा चाहिए। मंजूषा और राजीव को बातों से फुर्सत मिले तो वे मेहमानों की फ़िक्र करें। उसे ही कोई तिकड़म भिड़ानी होगी, अपने पल्लू को कमर में खोंसती हुई मीता एक बार फिर कमर कस कर तैयार हो गयी, ‘जय माता दी’।

‘इला डार्लिंग, टेक वन समोसा, अब घरवालों से भी कहना पड़ेगा क्या?’ मीता ने इला को एक बार फिर अपने समोसे भिड़ाने की कोशिश की। उसे विश्वास था कि यदि किसी एक मेहमान ने समोसे की तारीफ़ कर दी तो लोगों की लाइन लग     जाएगी ‘अवनेबल समोसों’ के लिए, जो मीता ने होल-सेल में ख़रीद रखे थे।

अपनी जगह से हिल भी पाती तो इला मरगिल्ला सा एक समोसा ज़रूर उठा लेती। झुंझलाई और हांफती हुई मीता को जगह देने के बहाने इला किसी तरह से उठ कर अन्दर वाली बैठक की ओर चल दी। बैठ सकती तो मीता भी बैठ जाती किंतु उस टू-सीटर पर ढाई लोग पहले से ही बैठे थे।

‘मैक डार्लिंग, आप तो मेहमानों की तरह बैठ गए हो, गैस्टों में सर्कुलेट करो न,’ मीता ने पति की चिरौरी की।

‘मीता जी, कोई काम वाम हो तो आप मुझे या मोहिनी को बता दीजिएगा,’ मोहन ने हाँफते हुए कहा किन्तु वह अपनी जगह से टस से मस तक नहीं हुए।

‘मी-मी-मीता डार्लिंग, यू आ-आ-आल्सो सिट, ये हमारी म-म-म-मैरिज-एनिवरसरी है आ..आ..आफ्टर आ..आ..ऑल,’ झेंपते हुए मकरंद ने भी उठने से साफ़ इंकार कर दिया।

‘मैक डार्लिंग, कैसी बातें कर रहे हो? हम ही मेहमान बनकर बैठ जाएंगे तो गैस्टों का वेल्कम कौन करेगा? ज़रा अपने राजेश को देखो, वह सेंटर-टेबल पर ड्राई-फ्रूट से सजा हुआ थाल बिगाड़ने पर तुला है। उसे एक प्लेट में थोड़े से काजू अलग से दे दो न, मैक डार्लिंग, प्लीज़ डार्लिंग। आपा-हसन, रंजीत, नैन्सी-नरेश, शमीम-आयशा, सुरभि-सुरेन्द्र अभी कोई भी तो नहीं पहुंचा है और…’ तनाव की वजह से मीता के सिर में हल्का सा दर्द शुरू हो चुका था। उसका बस चलता तो वह गिरगिट को घर से बाहर धकेल देती और सायरा से पूछती कि इस जश्न में घुसपैठ करने की उसकी हिम्मत कैसे हुई? ऐसे ही ख़ैरातियों की वजह से उसकी मुफ्त में बदनामी होगी।

‘वरी नौट, भाभी जी, मैं हूँ न यहाँ। लूसी, ब्रिंग सम फ्रेश औरेंज जूस विद ऐ लौट औफ़ आइस, प्लीज़,’ गिरगिट ने लूसी को आज्ञा दी और वह खुद भी उसके पीछे पीछे रसोई की ओर चल दिया। अपने सामने उसने लूसी से ताज़ा संतरों का रस निकलवाया। चखने के बहाने वह आधे से अधिक रस पी चुका था और ढेर सारी बर्फ़ डाल कर उसने दूसरा गिलास मीता को भिजवा दिया।

मीता ने रस पीकर कुछ लम्बी-लम्बी साँसें लीं, तब कहीं जाकर उसका दिमाग़ कुछ ठंडा हुआ। उसे तो नकचढ़ी सायरा का शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि वह बिन बुलाए आ पहुँची थी; पार्टी में खूबसूरत युवतियों से रौनक बनी रहती है और सायरा तो गाती भी अच्छा है। एक दो गज़लें गा देगी तो मेहमानों का अच्छा ख़ासा मनोरंजन हो जाएगा, वो भी मुफ़्त में। डीजे-वीजे तो इतने महंगे हैं आजकल कि पूछो नहीं। तिस पर लोग घर जाने का नाम ही नहीं लेते; औरतें देर तक नाचती रहेंगी और मर्द पीते रहेंगे। न भई न, मीता में इतना सब्र कहाँ?

‘मैंने तो मीता जी, आपसे पहले ही कहा था कि ड्रिंक्स सर्व करने के बाद ही स्टार्टर्स निकालिएगा। अब देखिए न, मेहमान अभी पहुंचे भी नहीं हैं और आपकी मेज़ें ऑलरेडी मैस्सी हो चुकी हैं। स्टार्टर्स तो अब शायद आधे भी नहीं बचे होंगे,’ मंजूषा ने, जो रेस्टरूम की ओर जा रही थी, रुककर मीता को चेतावनी दी।

‘आई हैव ओनली टू हैंड्स, यू नो, और राजीव कहाँ है?’ मीता ग़ुस्सा पीकर बोली। कल की छोकरी चली है उन्हें सिखाने कि पार्टी कैसे दी जाती है। वह एक बार फिर भन्ना उठी क्योंकि वह जानती थी कि मंजूषा कुछ ग़लत नहीं कह रही थी पर राजीव को भी तो उसी ने व्यस्त कर रखा था।

‘मीता जी, आप क्यों परेशान हो रही हैं? ड्रिंक्स तो आप हम दोनों पर छोड़ दीजिए। डिनर की भी फ़िक्र करने की आपको ज़रुरत नहीं क्योंकि आजकल लोग स्टार्टर्स से ही अपने पेट भर लेते हैं,’ राजीव ने, जो मंजूषा की दुम से चिपका हुआ वहाँ चला आया था, मीता से निश्चिन्त रहने का आग्रह किया।

‘फिर भी, आप स्टार्टर्स तो थोड़ी देर के लिए रुकवा ही दीजिए,’ मीता के कान में फुसफुसाते हुए मंजूषा रेस्टरूम में घुस गई।

‘राजीव, तुम्हारे कहने पर मैंने इसे इनवाइट कर लिया था पर यह तो ऐसे बिहेव कर रही है कि जैसे रेप्यूटेड वेडिंग-प्लैनर हो। कुलभूषण को देखो, जब से आया है, क्रिकेट मैच देख रहा है, तभी तो इसकी वाइफ़ इधर उधर मुंह मारती फिरती है,’ मीता ने अपना सारा गुस्सा राजीव पर उतार दिया।

‘सौरी भाभी जी, मैंने तो इसे वाइन-बार पर हेल्प के लिए बुलाया था, मुझे अंदाज़ा नहीं था कि कुलभूषण भी चल पड़ेगा, आइ एम रियली वेरी सौरी,’ राजीव ने मन ही मन तय किया कि वह अब दोबारा मीता के घर नहीं आएगा।

‘सौरी राजीव, मैंने अपनी फ्रसट्रेशन तुम पर उतार दी। प्लीज़ डोंट टैल हर वाट आई जस्ट सैड। मंजूषा इज़ राईट, यू नो।’

‘इट्स ऑल राईट, भाभी जी, आप फ़िक्र न करें, सब ठीक हो जाएगा,’

राजीव ने अपने साथ मंजूषा की ड्यूटी यही कह कर लगवाई थी कि वह ‘बार’ यानि कि ‘मधुशाला’ की शोभा बढ़ाएगी, जिसका इंतजाम बड़ी बैठक के एक कोने में किया गया था। ‘बार’ पर कई तरह के फलों के रस, बियर्स और साइडर्स के अलावा ब्लैक-लेबल व्हिस्की, रम, जिन, बकार्डी, मैलिबू और पोर्ट की बोतलें भी सजी हुई थीं। बर्फ़ पीसने की मशीन और तरह-तरह के सुन्दर बिल्लौरी पैमाने देख कर सभी मेहमानों का मन कुछ न कुछ पीने को ललचा रहा था। मर्दों पर दो दो नशे एक साथ तारी थे – शराब और मंजूषा, जो एक पारदर्शी साड़ी और सुनहरी तनियों पर टिके आधी बालिश्त भर ब्लाउज़ में लज़ीज़ लग रही थी।

मंजूषा को लगा कि कुलभूषण उसे तनिक रोष से देख रहा था कि जैसे कह रहा हो कि उसे लोगों की कुछ तो परवाह करनी चाहिए। अपनी बड़ी-बड़ी आंखें घुमा कर मंजूषा ने बड़ी मासूमियत से राजीव की ओर इशारा कर दिया कि वह तो केवल राजीव की सहायता कर रही थी।

काश कि कुलभूषण और इला भी एक दूसरे में रूचि ले पाते तो शायद बात बन जाती परंतु कहां इला अपंग बच्चों की विशेषज्ञा एवं शोधकर्ता और कहां कुलभूषण, मैट्रिक पास एक नुक्कड़-दुकानदार। देखा जाए तो वे दोनों ही इस भरे कमरे में तन्हा थे। ज़ाहिर था कि कुलभूषण का मंजूषा पर कोई ज़ोर न था और न ही इला का कोई इरादा था राजीव से झिकझिक करने का। ऐसा नहीं था कि इला कुलभूषण से बात नहीं करना चाहती थी किंतु आटे-दाल के भाव और‘नैशलन मिनिमम वेजस’ के अलावा उसे किसी और चीज़ में दिलचस्पी नहीं थी।

‘एक तो जी ये गोरे बैसे ही इतने स्लो हैं, ऊपर से इनसे हमें दबके अलग रैना पड़ता है। जाने कब अपने ग़ुंडे दोस्तों से चाकू-छुरा चलबा दें। लुधियाने से बर्कर्स को बुला सकता न जी तो काम कितना ईजी हो जाता; बो काम दुगना करते और बेजस दस गुना कम लेते। सरकार ने इतनी सख़्ती कर रखी है कि बर्कर्स को मिनिमम बेजेस तो देने ही पड़ते हैं न जी,’ कुलभूषण शुरु हो गया।

‘भूषण भाई, बेचारे वर्कर्स भी क्या करें? महंगाई ही इतनी बढ़ गई है, मॉर्गेज, काउंसिल-टैक्स, बिजली-पानी-गैस के बिल्स और बस-ट्रेन के किराए बढ़ कर दुगने-तिगुने हो गए हैं। लोग दो-दो नौकरियां कर रहे हैं और फिर भी उनका पूरा नहीं पड़ रहा।’ इला क्रोधित हो उठी; मालिक अपने कर्मचारियों को पूरा वेतन देने में क्यों हिचकिचाते हैं? वे उनके साथ अपना मुनाफ़ा क्यों नहीं बांटते?

‘तो जी हम कौर्नर-शौप्स बाले क्या करें? जे सुपरस्टोर्स बाले हमें बन्द करने पर तुले हैं। और तो और, सरकार बी इनका साथ दे रई है। पटरोल के दाम बढ़ जाने से सबी चीजों के दाम दुगने हो गए हैं; मैंगाई तो जी हमारे लिए बी बढ़ी है न, हम तो दोनों तरफ से ई पिस रहे हैं न जी?’ मंजूषा के चक्कर में कुलभूषण पार्टी में तो आ गया था किन्तु उसका दिलो-दिमाग़ अब भी दुकान में ही अटका था।

‘तुम्हें मीता की पार्टी में नहीं चलना तो डोंट वरी, मैं राजीव के साथ चली जाऊंगी,’ मंजूषा ने कल रात जब पति से मैक और मीता की पार्टी में जाने का ज़िक्र किया था तो कुलभूषण के कान खड़े हो गए थे। उसके दिमाग़ में एकाएक माँ की बात कौंध गयी थी, ‘आजकल की बउओं को घुमाया-फिराया न जाए तो बे घर छोड़ कर जाने में एक मिनट नहीं लगातीं। मैंने तेरा ब्याह सुन्दर और पढ़ी-लिखी लड़की से करबा दिया है, इसे संभालना अब तेरा काम है,’ कह कर उसकी बेबे लुधियाना लौट गयी थी। अतिसक्रिय मंजूषा और सीधे-सादे कुलभूषण में ज़मीन आसमान का फ़र्क था। कुलभूषण कभी लन्दन के बाहर नहीं निकला था; मंजूषा अमेरिका, कैनेडा और ऑस्ट्रेलिया घूमने के लिए बेक़रार थी।

‘दख्लन्दाज़ी के लिए हमें माफ़ कीजिएगा, इला जी। हमारे खयाल से तो ये जनाब बजा ही फ़रमा रहे हैं। टेस्को, ऐसडा, लिडल और सेन्सबरीज़ जैसे सुपर-स्टोर्स शहर के छोटे-मोटे दुकानदारों का गला घोंटे दे रहे हैं।’ पास में बैठते हुए सायरा बोली।

‘मैं बी तो बई कै रा हूँ, सैरा जी, स्पेशली जे टेस्को और सेन्सबरी बाले तो छै बाई छै फुट के कमरे में बी ‘टेस्को-एक्सप्रेस’ खोल देते हैं, जिसकी बजह से आसपास की कई दुकानें बंद हो जातीं हैं,’

‘आप सही फरमा रहे हैं, मल्टी-नैशनल कम्पनीज़ को छोटे-बड़े स्टोर्स खोलने की इजाज़त न जाने कैसे मिल जाती है? इनके खिलाफ़ कोई आवाज़ भी तो नहीं उठाता,’ सायरा ने हमदर्दी जताई।

‘चोर-चोर मौसेरे भाई, पौलिटिशियंस और बिलियनेयर्स का चोली दामन का साथ होता है, इनसे अपना सिर फोड़ने में कोई फ़ायदा नहीं है।’ इला ने कहा।

‘पैले तो जी इन्डियन सामान के लिए लोग हमारी शॉप्स में ही आते थे पर अब जे सुपर-स्टोर बाले इन्डियन सामान सस्ते से सस्ते में बेच रहे हैं, इतने में तो हमारी खरीद बी नईं होती जी,’

‘आप कोई और बिज़नैस क्यों नहीं खोल लेते? मंजूषा का एम.बी.ए भी काम आ जाएगा, बेचारी घर में बैठी बोर होती होगी,’ इसके पहले कि कुलभूषण चीनी-दाल-चावल के दाम बताने लगता, इला ने उसे सलाह दी।

‘जी आजकल यहाँ बिजनैस खोलना कौन सा आसान है? बैसे, मैं तो जी मंजूषा से कैता रैता हूं कि बापिस इंडिया चलते हैं पर बो तो छुट्टियों में बी इंडिया जाने को राजी नई है,’ मंजूषा को रोष से देखता हुआ कुलभूषण बुदबुदाया, जो सबसे बेखबर मज़े में ‘बार’ पर खड़ी मेहमानों से गप्पें मार रही थी।

इला ने अपने मन में झाँकने की कोशिश कि क्या वह सचमुच राजीव और मंजूषा के घनिष्ट होते हुए संबंधों की परवाह नहीं करती? वह पति की नाक में नकेल डाल कर रखने में विश्वास नहीं रखती, न ही राजीव उसे कहीं आने जाने से टोकता है किन्तु पति-पत्नी के भी तो कुछ फ़र्ज़ होते हैं। बाल की खाल निकालने वाले मेहमानों से बेखबर, राजीव और मंजूषा एक दूसरे से चिपके हुए खड़े थे; अपने जीवन-साथियों से बेख़बर।

‘हैप्पी एनीवर्सरी,’ ‘मैनी हैप्पी रिटरन्स औफ़ द डे,’ ‘शादी की सालगिरह आप दोनों को बहुत बहुत मुबारक हो, ‘ओए, मुबारकाँ, मुबारकाँ,’ जैसी शुभकामनाएँ अर्पित करते हुए मेहमानों की रफ़्तार ढाई बजे के आसपास यकायक बढ़ गई। मकरंद और मीता के हाथों में शराब की बोतलें और फूलों के ग़ुलदस्ते देते-लेते जब तब ‘हाय हाय’ और ‘पुच पुच’ का शोर मचता और शुरु हो जाता उपहारों, मेहमानों और मेज़बानों का तिया-पांचा।

‘थैंक यू सो मच, ‘हमारे ग़रीबख़ाने पर तशरीफ़ लाने के लिए शुक्रिया’, ‘अरे भई, इस फ़ौर्मैलिटी की क्या ज़रूरत थी?’, ‘हाउ ब्यूटीफ़ुल, थैंक यू’, ‘अब घर वाले ही इतनी देर में आएँगे तो…,’इत्यादि कहते हुए मीता उपहार, शराब अथवा फूल-गुच्छ के स्तर का झट अंदाजा लगा लेती और फिर मन ही मन कलपने लगती, ‘यह फूल तो कुछ घंटों ही में मुरझा जाएंगे’, ‘सेंस्बरीज़ वालों ने तो शराब पर ‘बाई-वन-गेट-वन-फ़्री’ की सेल लगा रखी है, जिसे देखो वहीं से चला आ रहा है’, ‘मेरा रिकार्ड है कि मैं लोगों के लिए हमेशा मार्क्स ऐण्ड स्पैंसर के ही बूकेज़ लेकर जाती हूं’, ‘ऐसी दो टके की गिफ्ट्स से संडे-मार्केट भरा रहता है’, ‘हमारी शादी की बीसवीं ऐनिवर्सरी है, कोई छोटी-मोटी पार्टी तो है नहीं कि मेहमान सस्ती शराब और मुरझाए हुए फूल लिए चले आ रहे हैं?’ इत्यादि इत्यादि।

‘मीता डार्लिंग, हमारे प..प..पास क..क..क्या क..क..कमी है…,’

‘मैक डार्लिंग, बात कमी की नहीं है, स्टैण्डर्ड की है।’ उपहारों के मामूली स्टैण्डर्ड को देख कर मीता वास्तव में विचलित हो उठी थी। एक ओर वह बड़ी-बड़ी उम्मीदें लगाए बैठी थी तो दूसरी ओर, मेहमान उसी के स्टैण्डर्ड का मज़ाक उड़ा रहे थे।

‘ये पहन क्या रखा है दोनों ने? दूल्हा-दुल्हन बने खड़े हैं, बस एक वरमाला की कमी है,’

‘अपनी उम्र और कमर का तो लिहाज़ किया होता, नमूने लग रहे हैं,’

‘लगता है कि हम रामलीला देखने आए हैं;’

‘बस झंडियों की कमी है या फिर हनुमान की जी की,’

‘गिरगिट जो है, इधर से उधर हनुमान की तरह कूदता फिर रहा है,’

‘मिश्रा जी को गुरु वशिष्ट का रोल दिया गया है, उन्हीं के प्रवचनों द्वारा आज हमारा मनोरंजन होगा,’

‘हे भगवान, हमने ऐसे क्या बुरे कर्म किए थे?’

‘तुम्हें पता है कि वेडिंग एनिवर्सरी पर मैक ने मीता डार्लिंग को डायमंड-रिंग दिलवाई है?’

‘अरे, सारी दुनिया जानती है, मीता ने महीना भर पहले ही फेस-बुक पर रिंग की पिक्चर जो लगा दी थी,’

‘फ़ोटो में अंगूठी इतनी बड़ी दिखाई दे रही थी कि मैंने सोचा के हीरा कम से कम चार कैरेट का तो होगा ही पर यह तो इत्ता छोटा है…,’

‘ज़रा देखो तो सही, कैसी चमक रही है!’

‘आर्टिफिशियल चीज़े ही ज़्यादा चमकती हैं,’

‘एनी-वेज़, बीसवीं सालगिरह पर मीता ने मैक डार्लिंग को क्या दिया?’

‘शायद ये सुनहरी अचकन या फिर मैक के गले में पड़ी वो आर्टिफिशियल मोतियों की माला!’ भानुमती का कुनबा मेज़बानों का मज़ाक उड़ा-उड़ा कर अपना मनोरंजन कर ही रहा था कि आपा और हसन पधारे; एक ज़माना हुआ जब मीता और मकरंद इन्हीं के पड़ोस में रहा करते थे।

‘मोस्ट वेलकम, आदाब अर्ज़ है, आपा, अब घर वाले ही इतनी देर से आएंगे तो भला मेहमानों को कोई क्या दोष दे?’

लोमड़ी की पूंछ जैसी गुच्छेदार पोनी-टेल उचक-उचक कर आपा के कदमों का एलान कर रही थी और सोने के भारी झुमके, जो उनके कंधों तक लटक आये थे, हर जगह उनसे आगे पहुँच कर बाज़ी मार लेते थे। आपा के कानों के छेदों की लौ एक ऐसी हद पर थी कि दर्शकों को दहशत होने लगती थी कि आपा के कान अब कटे के तब। उनकी थूथन की झुर्रियों के दरीचों में पीक की पैनी लकीरें ऐसी दिखती थीं कि जैसे किसी कारीगर ने अपने पैने औज़ार से बनाई हों, जो बहुत सा पाउडर पुता होने के बावजूद साफ़ दिखाई देतीं थीं।

आपा के हाथ में एक बड़ा सा रंग-बिरंगा पार्सल देख कर मीता के कलेजे में कुछ ठंडक पड़ी; उसे लगा कि इस पार्सल के अन्दर अवश्य कोई अच्छा और महंगा उपहार होगा।

‘भई, हमारी तरफ़ से मियाँ-बीवी को शादी की बीसवीं सालगिरह बहुत-बहुत मुबारक हो। दावत उड़ाने का ऐसा मौक़ा, इंशा अल्लाह, हमें बार बार नसीब हो,’ कहते हुए आपा ने पार्सल मीता को थमा दिया, किंतु यह क्या? उसमें तो कुछ वज़न ही नहीं था। मीता को हौल पड़ने लगे; वह जान गई कि उस गुदगुदे पुलिंदे में क्या होगा; दस-दस पाउंड वाले वही कंबल, जिनसे ईलिंग-रोड भरा पड़ा था। सभ्याचार के विरुद्ध मीता ने पार्सल मकरंद की तरफ़ उछाल दिया।

‘लाहौलविलाकुव्वत, अरे मियां, आप कहां रह गए? मैक और उनकी दुलहन को मुबारकबाद तो दीजिए,’ खिसियाई हुई आपा ने अपने छोटे भाई हसन को मीता की ओर खदेड़ते हुए कहा। हसन के एक हाथ में मिठाई का डिब्बा था और दूसरे में चांदी का चमचमाता हुआ पानदान; जिसे देख कर मीता का दिल बल्लियों उछलने लगा। क्या हसन उनके लिए उपहारस्वरुप पानदान लाया था? कम्बल के लिए आपा को झट माफ़ी दे दी गयी किन्तु जब हसन ने उन्हें सिर्फ़ जलेबी का ही डिब्बा थमाते हुए मुबारकबाद दी तो मीता की ख्वाहिशों पर मानों किसी ने घड़ों पानी उड़ेल दिया।

‘अल्हम्दुलिल्लाह, साउथहौल से जलेबियां हम अपने सामने छनवा कर लाए हैं दुल्हन, मेहमानों को गर्मा-गर्म खिला दीजिए,’ आपा ने ज़ोर से कहा ताकि उनकी बात दूर-दराज़ खड़े मेहमानों तक पहुँच जाए। कहीं मीता को दिल का दौरा न पड़ जाए! कुछ लाना ही था तो पेड़े लाते, बर्फ़ी या गुलाब-जामुन लाते, पर नहीं, लन्दन में जलेबी से सस्ती मिठाई आपा को और क्या मिलती?

‘डेज़र्ट के साथ सर्व कर देंगे, आपा, अभी तो ड्रिंक्स चल रही हैं,’ मीता के स्वर में निराशा छलक आई; काश कि उसकी बैठक में चांदी का न सही, ताम्बे का ही एक पानदान रखा होता।

‘ए मैं तो से कऊं, बऊ, ला हमें दे जलेबियन का डब्बा। हम तो तुमारे टिक्के-शिक्के खाएंगे नईं, नेक एक जलेबी खाएं तो कछु मूं खुले,’ दूर बैठी मकरंद की माँ, जिया ने हांक लगाई तो मीता के हाथ से जलेबी का डिब्बा झपट कर आपा उन्हीं की ओर लपक लीं। कोई मज़ाक था क्या? दो दो सौग़ातें लेकर आई थीं आपा और मीता के सूजे हुए मुंह से एक शुक्रिया तक न फूटा!

‘अरे मियाँ, आते ही कहाँ ग़ायब हो गए? ज़रा हमारा पानदान तो दीजिए,’ जिया के नज़दीक बैठते हुए आपा ने हांक लगाई तो हसन ने उनका पानदान लाकर एक तिपाई पर रख दिया। आपा ने बड़े जतन से पान की एक गिलौरी बना कर जिया की ओर बढ़ाई।

‘ए मैं तोसे कऊं, आपा, तुमने तो म्हारे लिए घनी पिराबलम खड़ी कर दी, इब हम जलेबी खावें के पान?’

‘जिया, हमारी दिलजोई तो अब आप रहने ही दीजिए। पहले जलेबी नोश फ़रमाइए। इंशा अल्लाह, ये गिलौरी कहाँ भागी जा रही है; बाद में ले लीजिएगा,’ कहते हुए आपा ने एक गिलौरी अपने मुंह में भी ठूंस ली।

‘ए मैं तोसे कऊं, आपा, जाने कित्ते साल बाद आज हम पान खावेंगे,’ जिया ने गिलौरी लेकर अपने बाएँ हाथ के अंगूठे और तर्जनी के बीच दबा ली और फिर दाएं हाथ से जलेबी खाने लगीं। उनके चेहरे की दमक बता रही थी कि इस वक्त उनके दोनों हाथों में लड्डू थे।

‘ये इस्पेशल पान, जिया, हमने लखनऊ से ताज़ा-ताज़ा मंगवाएं हैं। हसन कहते हैं के हम बहुत फ़िज़ूलखर्च हैं, पान के पत्तों पर इत्ते पैसे ख़राब करते हैं। अल्हम्दुल्लिल्लाह, एक ही शौक़ तो पाला है हमने…,’

‘ए मैं तोसे कऊं, आपा, तुम आए गईं तो हमें बी पान खावै को मिल गयो, नईं तो तुम जानो इस कंट्री में…अरे, दरवज्जे पे का घनसाम खड़ो है, म्हारी ननदिया का बेटा?’ काले चश्मे के बावजूद जिया ने घनश्याम उर्फ़ घड़ियाल को झट पहचान लिया था, जो दरवाज़े पर खड़ा अन्दर झाँक रहा था कि जैसे उसे ऐसी किसी पार्टी का अंदाजा न था।

मीता और मैक की ओर एक मुबारकबाद फेंकता हुआ घनश्याम सीधा जिया की ओर लपक लिया, जहां जलेबियाँ बंट रही थीं। इसके पहले कि घनश्याम को न्यौतने के लिए मीता उसे दोष देती, मकरंद ने झेंपते हुऐ उसी से प्रश्न किया।

‘ये लो, ए-ए-एक और मु..मुसीबत, घ..घ..घनश्याम को बु..बु..बुलाने की क-क-क्या ज़रूरत थी, मीता डार्लिंग?’ मकरंद की यह झेंप निराली थी इसलिए उनकी गर्दन भी बड़े दुलार से झटकी।

‘डार्लिंग, घड़ियाल…घनश्याम इज़ योर फर्स्ट कज़िन, उसे नहीं बुलाती तो तुम्हारी बुआ मेरा गला न घोंट देतीं,’

‘इ..इ..इसको ब..ब..बुलाने से तो वही अ..अ..अच्छा रहता,’ मैक की हिमाकत भरी झेंप मीता से चाहते हुए भी नज़रंदाज़ नहीं की गयी।

‘मैक डार्लिंग, यू नो, मैं अपने इन-लौज़ से कुछ एक्सपेक्ट नहीं करती, बट घनश्याम हमें गुड-विशेस तो दे ही सकता था न? पर नहीं, सीधा जिया….’

इसके पहले कि मीता की अखंड रामायण शुरू होती, ‘अ..अ..आया, जिया,’ कहते हुए मकरंद अपनी माँ की ओर लपक लिए। जब भी उन्हें मीता से जल्दी में छुटकारा पाना होता, वह यही तरीक़ा अपनाते थे।

मकरंद की बहत्तर वर्षीय मां उर्फ़ जिया अपनी सहेलियों के साथ अन्दर वाली बैठक के एक कोने में रखे पुराने भूरे सोफ़े पर विराजमान थीं। उन्होंने पीले रंग के ब्लाउज़ के साथ सीधे पल्ले की नारंगी रंग की धोती पहन रखी थी, जिसके नीचे से उनके ऊनी मोज़े साफ़ नज़र आ रहे थे, उनके पैरों में टाटा की चप्पलें सुशोभित थीं। अन्दर वाली बैठक की हर चीज़ पुरानी थी; वाल-पेपर से लेकर जिया तक और बाहर वाली बैठक में कारपेट से लेकर मीता तक हर चीज़ नई और चमचमाती हुई। लगता ही नहीं था कि ये दो बैठकें एक ही घर की थीं।

जिया को जिन मेहमानों से ‘जय राम जी की’ करनी होती, वह अपने आसन पर बैठे-बैठे हांक लगातीं और वे दौड़े-दौड़े चले आते, उनके पांव छूते, गाल चूमते और आशीर्वाद लेते। वह बड़े ठाठ और अन्दाज़ से उन्हें गले लगा लेतीं जैसे कि लोगों को जता रही हों कि इस घर में उनका कितना दबदबा था। अलबत्ता मेहमान जब घर में घुसते अथवा वापिस जाने को होते, तब ही उनके पास चंद एक मिनट ठहरते और फिर ऐसे ग़ायब हो जाते जैसे गधे के सिर से सींग। इस बीच, कौन कहां और क्या कर रहा था, जिया और उनकी सहेली, पुष्पा मौसी, की पैनी दृष्टि सबका घूम-घूम कर निरीक्षण करती। जिया अपनी जगह से तभी हिलती जब उन्हें ‘पाख़ाने’ जाने की आवश्यकता पड़ती। इस दौरान, इकहरे बदन की पुष्पा-मौसी भाग-दौड़ कर खाना-पीना और ताज़ा खबरें उन तक पहुंचाती रहतीं।

‘जय साईं राम, जिया, केम छो?’ पड़ोसन सोमा अपनी माँ को जिया के पास बैठा कर ग़ायब हो गयी; जिन्हें हिंदी बोलनी नहीं आती थी।

‘लाहौलविलाकुव्वत, हिंदी और उर्दू तो आजकल सभी बोलते हैं,’

‘गुजराती लोग मरी गुजराती ही में बोलेंगे, आपा, वेम्ब्ली की दुकानों में आप मरी किसी भी भाषा में प्रश्न पूछें, आपको जवाब मरा गुजराती में ही मिलेगा,’

‘गुजराती ही एक ऐसी कौम है, जिसने अपनी भाषा, संस्कृति और रीति-रिवाज़ अब तक संभाल कर रखे हैं,’ मिश्रा जी ने बताया।

‘देखा जाए तो बंगाली, पंजाबी, पाकिस्तानी और पारसी कौमें भी तो नहीं बदलीं, एक सिर्फ हम हिंदी वाले हैं, जो अंग्रेज़ बने बैठे हैं,’

‘जैसा देस वैसा भेस,’

‘कई इंडियंस तो ऐसी ज़ोर-शोर से क्रिसमस मनाते हैं कि अंग्रेज़ों का बी मूं खुला का खुला रह जाता है,’

‘म्हारे बउ-बेटा बी देखियो होली दीवाली चाहे भूल जाएं पर क्रिसमस पर हफ़्तों पैले पेड़ टंग जाए है,’

सोमा की माँ का कुछ इस तरह स्वागत हुआ किन्तु वह यह सोच कर मुस्कुराती रहीं कि उनकी कुशलक्षेम पूछी जा रही थी।

इन दिनों एक नई मुर्गी भी आ फंसी थी जिया के दड़बे में, सीधी सादी अम्मा, जो मोहिनी टयाल की मां थीं और लखनऊ से आईं थीं। छै महीने पूरे होने ही वाले थे कि मोहिनी के जोड़ों की बीमारी यकायक बिगड़ गयी। होम-ऑफिस ने दयापूर्वक अम्मा को छै महीने और रुकने की मोहलत दे दी ताकि वह बेटी की देख-भाल कर सकें जबकि अम्मा अपने दाएं हाथ को, जो छिपकली की कटी पूँछ सा हिलता रहता था, अपने बाएँ हाथ से बस थामें बैठी रहतीं थीं। खाने-पीने में भी उन्हें खासी परेशानी होती थी। हालांकि उम्र में वह जिया और पुष्पा मौसी दोनों से छोटी थीं किन्तु सब उन्हें अम्मा कह कर पुकारने लगे। अल्पभाषिणी होने के कारण अम्मा ने उनका विरोध नहीं किया और इस तरह वह जगत-जिया और जगत-पुष्पा-मौसी की तरह ‘जगत अम्मा’ बन गईं। जिया ने अम्मा को अपने संरक्षण में ले लिया था और इसलिए पुष्पा मौसी को जिया के अलावा अम्मा की भी आवभगत करनी पड़ती थी। मोहिनी और मोहन अम्मा को कल रात ही जिया के पास छोड़ गए थे क्योंकि वे अपने बच्चों को लेकर एक नई अंग्रेज़ी फिल्म देखने लेस्टर-स्क्वेयर जा रहे थे।

‘मैं तोसे कऊं, अम्मा, तुमारे संग कोई हिन्दी फिलम देख लेते तो तुमारी फैमिली का कछु बिगड़ जाता?’ जिया को एक नया मुद्दा मिल गया मोहिनी की बुराई करने का। अम्मा अधिकतर चुप ही रहती थीं, जो जिया को नागवार गुज़रता था। कोई बराबर से बुराई में हिस्सा न ले तो वार्तालाप का क्या मज़ा ही क्या?

‘कोई कहेगा कि मोहिनी की टांग खराब है? इस कमरे से उस कमरे में कैसे कूदती-फांदती फिर रही है,’ मंजूषा फुसफुसाई।

‘ब्लू-बैज पर मज़े हो रहे हैं। जहां जी चाहा, गाड़ी फ़्री में गाड़ी पार्क कर दी और चल दिए,’ राजीव ने कहा।

‘फ्री-पार्किंग के अलावा, उन्हें डिसेबिलिटी-एलाउंस भी तो मिलता है,’

‘एक तरफ़ तो ये दोनों इतना भजन-कीर्तन करते हैं और दूसरी तरफ़ ये झूठ-फ़रेब,’

‘जिस दिन किसी ने देख लिया न कि वह भली-चंगी है, उसी दिन वह जेल में बैठी होगी। इन्हें शायद मालूम नहीं है कि काउंसिल वाले आजकल बहुत सख्त हो गए हैं। सड़कों पर सैंकड़ों कैमरे लगे हैं; कभी न कभी तो वह पकड़ी ही जाएगी,’

तभी एक बड़ी सी हलचल हुई; मेहमानों और मेज़बानों की यंत्रचालित मुंडियां प्रवेश द्वार की ओर घूम गईं। रंजीत के साथ आज के ख़ास मेहमान आ पहुंचे थे – भारतीय उच्चायोग के तीन अधिकारी जिनमें से दो सपत्नीक थे। मीता और मकरंद की तो बांछें ही खिल गईं।

पंद्रह वर्ष हुए, जब मकरंद के स्वर्गीय पिता, रमाकांत मलिक, भारतीय विदेश सेवा के अधीन लन्दन में ही पोस्टेड थे। वह एक बहुत सरल और मिलनसार व्यक्ति थे, हर एक की मदद करने को सदैव तत्पर और यही कारण था कि आज भी, जब किसी अफ़सर की पोस्टिंग लन्दन में होती, वह सीधा मकरंद और मीता के यहाँ परामर्श के लिए ज़रूर आता और ये दोनों भी उसकी मदद करने में कोई कसर नहीं उठा रखते थे। इन्हीं अफ़सरान की वजह से उन्हें शराब, बियर, सिगरेट्स, परफ्यूम्स आदि टैक्स-फ्री मिल जाती थीं, उनका छोटा-बड़ा सामान भारत से लन्दन और लन्दन से भारत फ्री में आता-जाता रहता था और उन्हें वीज़ा आदि बनवाने में कभी किसी कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता था। इसके अलावा, रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों में साख़ तो थी ही कि उच्चायोग में मलिक्स की ऊंची पहुँच थी।

मीता ने यही सोचकर अपनी मुस्कुराहट बरक़रार रखी कि ख़ास मेहमान स्वयं ही एक तोहफ़ा होते हैं, क्या हुआ जो सब के सब ख़ाली हाथ चले आए थे।

सायरा को देख कर हालांकि उम्मीद तो बंधी थी किन्तु मीता को विश्वास नहीं था कि करोड़पति रंजीत मठरानी भारतीय उच्चायोग के एक मंत्री, महावीर जोशी, और दो अन्य अधिकारियों को लेकर सचमुच ही उनके घर पहुंच जाएगा। जोशी जी की पत्नी इस समय मुम्बई में थीं, नहीं तो वह अवश्य आतीं, यह सूचना अताशे बसंत कोडनानी ने आते ही मीता को दे दी थी, ख़ासतौर पर इसलिए कि मेज़बान कहीं मेनका को मंत्री जी की पत्नी न समझ बैठें।

मीता और मकरंद सातवें आसमान पर क्यों न विचरते? उनके जान-पहचान वालों में से आज तक किसी की भी पार्टी में उच्चायोग के तीन-तीन अधिकारी एक साथ सम्मलित नहीं हुए थे; यह एक ऐतिहासिक घटना थी।

‘हेलो मिस्टर रंजीत, हाउ नाइज़ औफ़ यू टु कम। मैक डार्लिंग, लुक हू इज़ हियर,’ बालों में लगे फूल को संभालते हुए मीता इतराई, जो बार-बार खिसक कर उसके कान पर आ टिकता था।

रंजीत न केवल टॉप गियर सीरीज के जेरेमी क्लार्कसन जैसी फिटी-फिटाई जीन्ज़ और मुसी हुई कमीज़ पहने था, वह उसी की तरह स्पष्टवादी और बदमिज़ाज़ भी था। अरमानी सूट में मिनिस्टर जोशी की सज-धज भी देखने काबिल थी; मंजूषा की आँखें तो ख़ास तौर पर उन्हीं पर टिकी थीं। उनके द्वितीय सचिव, वेनू सापलू का नया और चमकता हुआ सूट गवाह था कि उसका अभी हाल ही में विवाह हुआ था और उसकी पत्नी, प्रभा ने भी कांजीवरम सिल्क की भारी साड़ी और सोने के चमचमाते हुए गहने पहन रखे थे। अताशे बसंत कोडनानी ने ज़री की कढ़ाई वाला सिल्क का कुर्ता-पाजामा और उसकी गोरी, दुबली-पतली और तीखे नयन नक्श वाली पत्नी मेनका ने तड़क-भड़क वाला सलवार-सूट पहन रखा था, जिस पर लगे सितारे रौशनी पड़ते ही चमकने लगते थे। मंत्री जी उस पर स्पष्टतः रीझे हुए दिखाई दे रहे थे और उन पर अपने प्रभाव से आश्वस्त मेनका भी प्रसन्न थी।

‘इट्स अ..अ..वर स..स..सिंगुलर हौनर, सर,’ मीता की कोहनी से घायल, मकरंद ने झेंप छिपाते हुए विशिष्ट मेहमानों की अगवानी की तो मोहन ने भी आगे बढ़ कर मेहमानों से हाथ मिलाए। मोहन के एक इशारे पर मोहिनी भी फुदकती हुई वहाँ चली आई। मीता को यह बहुत नागवार गुज़रा; लोग उनके विशिष्ट मेहमानों पर चढ़े चले जा रहे थे, अरे, वी.आइ.पीज़ से बात करने का इतना शौक है तो उन्हें अपने घर बुलाएं।

‘मिक भैय्या, जोशी-सर के साथ मेरी एक फ़ोटो तो लीजिए,’ मीता ने गिरगिट से कैमरा लेकर मोहन को थमाते हुए कहा और स्वयं मिनिस्टर और रंजीत के बीच में जा खड़ी हुई।

गिरगिट मन मसोस कर रह गया। मीता के आदेश पर उसने खुद को यह सांत्वना देते हुए कैमरा अपनी गर्दन में टांग लिया था कि जहां उसे एक ओर विशिष्ट मेहमानों के नज़दीक जाने का मौक़ा मिलेगा, वहीं दूसरी ओर फ़ोटोज़ खिंचवाने के लिए लोग उसकी चिरौरी करते उसके आगे पीछे घूमेंगे। खैर, जो होता है अच्छे के लिए ही होता है, इसी बहाने उसकी भी कुछ फ़ोटोज़ खिंच जाएँगी। वह मीता के बिलकुल पीछे अपनी बत्तीसी फाड़े खड़ा था। मोहिनी विशेष मेहमानों के बीच खड़े होकर फ़ोटो खिंचवाने की जद्दो जहद में थी और मकरंद इस इंतज़ार में थे कि पत्नी को जगह मिले तो वह फ़ोटो खींचें।

‘मोहिनी, अब एक फ़ोटो तुम लो ताकि मिक भैय्या भी आ जाएं,’ मीता ने अपने कंधे पर चढ़ी हुई मोहिनी को मोहन की ओर धकेलते हुए कहा। यदि लुढ़कते हुए मोहन उनके बीच पहुँच भी गए तो कैमिला से कह कर मीता उन्हें ‘क्रौप’ करवा देगी; फ़ोटो-शौप का यही तो फ़ायदा था।

‘राजेश, जोशी-सर और मिस्टर रंजीत के साथ मेरी और मैक की टू-थ्री गुड फ़ोटोज़ लो,’ मोहिनी से कैमरा लेकर, मीता ने अपने पीछे खड़े राजेश के गले में एक बार फिर डाल दिया। टयाल दम्पति को वहाँ से बेमन से हटना पड़ा और फिर शुरू हुआ एक फ़ोटो-सैशन जो काफ़ी देर तक चलता रहा। गिरगिट प्रसन्न था; किसी न किसी रूप में वह इस विशेष दस्ते का एक हिस्सा तो था।

रंजीत के कहने पर दो-तीन फ़ोटोज़ में अधिकारियों और उनकी पत्नियों को भी शामिल कर लिया गया; जिसके लिए वह अनुग्रहित थे। समय-समय पर बाकी के मेहमानों ने भी आकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवानी चाही लेकिन फ़ोटोज़ न खिंचवा सके।

‘आई प्रॉमिस यू, जब सारे गेस्ट्स पहुँच जाएंगे, तब एक ग्रुप-फ़ोटो ली जाएगी।’ कहते हुए मीता ने यकायक फ़ोटो-सेशन ख़ारिज कर दिया। जो मेहमान इस सेशन के चश्मदीद गवाह थे और मियर-कैटस की तरह सिर उठाए आस लगाए वहाँ अब तक खड़े थे कि शायद एक फ़ोटो में उन्हें भी शामिल कर लिया जाएगा, ‘हमें नहीं खिंचवानी फ़ोटोज़-वोटोज़,’ कहते हुए इधर-उधर खिसक गए।

अभी परिचय का आदान-प्रदान हो ही रहा था कि एकाएक मीता ने देखा कि मेहमानों को चीरता हुआ रंजीत का ड्राइवर एक उपहार लिए अन्दर आया, जिसे गुलाबी और नीले रंगों के रिबंस से बड़े सलीके से बांधा गया था। मीता का मन हुआ कि ज़हीन और शालीन रंजीत को अपने गले से लगा ले। वह एक करोड़पति था, भला खाली हाथ कैसे आ सकता था? एकाएक रंजीत के लिए उसके मन में बहुत सा आदर उमड़ आया, उसकी स्नेह-सिक्त दृष्टि रंजीत की फिटी-फटी जींस और मुसी-मुसाई कमीज़ को प्रशंसा से बुहारने लगी।

किन्तु यह क्या? ड्राइवर ने उपहार सीधा ले जाकर मंत्री जी के हाथों में थमा दिया और बाहर चला गया।

‘हैप्पी वेडिंग एनिवर्सरी,’ बुदबुदाते हुए जोशी-सर ने उपहार औपचारिक रूप से मीता के हाथों में सौंप दिया। रंजीत के मुंह से तो बधाई का एक शब्द तक न फूटा; मीता के सीने में एक दर्द सा उठा किन्तु वह संभल गयी। गूगल-सर्च के अनुसार हर एक व्यक्ति को दिन में छोटे-छोटे दिल के कई दौरे पड़ते हैं; इसमें घबराने की कोई ऐसी आवश्यकता नहीं थी। किन्तु एक ही घंटे में इतने झटके?

ख़ैर, पैकेट के हल्केपन से ही मीता ताड़ गयी कि उसमें क्या था। मेज़बानों को भेंट में देने के लिए भारत सरकार अपने अधिकारियों को बहुत से प्रतीक चिन्ह और शिल्पकृतियाँ भिजवाती है, जिन्हें ग्रहण कर हो जाते होंगे गोरे प्रसन्न किन्तु ‘मिनिमलिज़म’ के इस ज़माने में ऐसी-ऐसी सैंकड़ों चीज़े लोगों के ऐटिक्स में धूल चाट रही थीं।

‘सर, म..म..माई फ़..फ़..फ़ादर व..व..वाज़ व..व..वन इन ऐ म..म..मिलियन, सर,’  मकरंद अपने स्वर्गीय पिता के विषय में जोशी-सर को बड़े गर्व के साथ बता रहा था किन्तु उनका चित्त तो मंजूषा पर टिका था, जो उन्हीं के आसपास मंडरा रही थी कि शायद कोई उसका विधिवत परिचय उनसे करवा दे।

‘ये ‘सर’ तो सबकी जान पर बन आए हैं,’ वायु ने कहा।

‘फ्रांस का ‘सायर’ शब्द बारहवी शताब्दी में अंग्रेज़ों ने ‘सर’ के नाम से अपनाया, उच्चवर्ग में तो यह इतना लोकप्रिय हुआ कि बच्चे अपने माँ-बाप को ‘सर’ और ‘मैडम’ कह कर पुकारने लगे.’ मिश्रा जी ने विकिपीडिया को कृतार्थ किया।

‘मरे अँगरेज़ इस खिताब को मरा इंडिया में छोड़ आए,’

‘और तब से अब तक सरकार में ‘सर सर सर’ चल रही है,’ सुमित बोले।

‘मैक डार्लिंग, जोशी-सर के लिए एक अच्छी सी ड्रिंक बनवाओ,’ मीता ने मंत्री जी का ध्यान बंटाने की कोशिश की।

‘औफ़ क..क..कोर्स, क..क..क्या लेंगे स-स-सर आप, स-स-सर?’ झेंपते हुए मकरंद ने उनसे पूछा।

‘साली व्हिस्की और क्या? हम सब साली व्हिस्की ही लेंगे,’ इसके पहले कि जोशी-सर जवाब देते, अधीरता से रंजीत ने मकरंद को साधिकार आज्ञा दी कि जैसे वह मेज़बान नहीं कोई बैरा हो।

‘श्योर, श्योर। मैक डार्लिंग, आप ज़रा राजीव से कहिए कि सर को व्हिस्की सर्व करे, प्लीज़?’ रंजीत से बुरी तरह भन्नाई हुई मीता ने अपने नाराज़ और झेंपे हुए पति की पीड़ा कुछ कम करनी चाही।

‘लेडीज़ को तो साला आप संभाल ही लेंगी, क्यों मीता जी?’ इस बार रंजीत के निशाने पर थी स्वयं मीता।

‘ऑफ कोर्स, विद प्लैश्ज़र, सर,’ मीता ने गुस्सा पीते हुए कहा, ‘वी आई पीज़ को अपने साथ क्या ले आया, खुद को औरंगज़ेब समझ रहा है,’

‘यहाँ के तो प्रधान-मंत्री भी किसी से ऐसी बदतमीज़ी से पेश नहीं आते।,’ वायु अपने भाई-भाभी का अनादर होते न देख सकी।

‘यही फ़र्क है इंडियंस और गोरों में। चार पैसे हाथ में आ जाएं तो इंडियंस का दिमाग़ सातवें आसमान पर चढ़ जाता है,’ सुमित बोले।

‘यहाँ के तो मरे बड़े-बड़े रईस भी अपने सब काम मरा खुद करते हैं,’ मोहिनी बोली।

‘अरे, बार खुला है, बार-मैन और बार-मेड भी खड़े हैं, जाकर ले क्यों नहीं लेते जो ड्रिंक इन्हें चाहिए? बेचारे मैक और मीता का जी हलकान करने में लगे हैं,’ मोहन ने बड़े प्रेम से पत्नी का अनुमोदन किया।

‘हमने तो अंग्रेजों की भी मरी अक्ल ठिकाने लगा दी पर ऐसे बददिमाग़ इंडियंस का मरा क्या किया जाए?’

‘मैक डार्लिंग, डोंट माइंड, लाइफ़ में ऐसे अप्स एंड डाउंस तो आते ही रहते हैं…,’ मीता के इस तर्क़ से असहमत, मकरंद क्रोध में झेंपते हुए बार-स्टूल पर जा बैठे, सहानुभूति में उनकी गर्दन बाकायदा झटके खा रही थी; जिसके परिणामस्वरुप, उन्हें चक्कर आ रहे थे।

इसी बीच, लूसी एक ट्रे में कोका-कोला, संतरे और सेब के जूसों से भरे गिलास लिए प्रभा और मेनका के पास पहुँची। जोशी-सर एंड पार्टी को भी तो पता चले कि मीता कोई ऐरी गैरी नत्थुखैरी नहीं थी; उसके घर में एक नहीं दो-दो मेड्स थीं, एक गोरी और एक इन्डियन।

‘थैंक यू, नई माँगता। वेयर योर टायलेट?’ प्रभा ने लूसी से झिझकते हुए पूछा। मीता ने झट अनुमान लगा लिया कि प्रभा किसी छोटे गाँव से आई थी; जिसे उसका इतना महँगा रंगीन साइन-बोर्ड नहीं दिखाई दिया, जिस पर ‘रेस्ट-रूम’ छपा था। मीता ने जिया को भी ख़ास हिदायत दी थी कि वह मेहमानों के सामने ‘पाख़ाने,’ ‘टट्टी’ अथवा ‘टायलेट’ जैसे गंवारू शब्दों का प्रयोग न करें।

‘कैन यू गिव मी सम मिनरल वाटर प्लीज़?’ लूसी को नज़रअंदाज़ करते हुए मेनका ने सीधे मीता से पूछा।

मीता के घर को क्या होटल समझ रखा है मेनका ने? ट्रे में जो रखा है, घर में वही सब है पर नहीं, मिनरल वाटर का कहीं नाम सुन लिया होगा, महारानी जी बस वही चाहिए।

‘प्लीज़ गिव मी ऐ मिनट,’ बिफ़रती हुई मीता गिरगिट को ढूँढने लगी कि उसे सुपरमार्केट दौड़ा कर मिनरल-वाटर मंगवा ले। वैसे, मिनरल-वाटर तो उसके घर में होना ही चाहिए था, ‘हाउ एम्बैरेसिंग!’ इतनी बड़ी चीज़ वह कैसे भूल गयी? ‘हे शेरा वाली माता, आज मेरी लाज रखना,’

‘डोंट वरी, डार्लिंग, गेट मी ए ‘जी एंड टी’ प्लीज़?’ मेनका ने इस बार लूसी से कहा कि जैसे लूसी उसकी बात मीता से अधिक अच्छी तरह समझ सकती थी; मीता तिलमिला कर रह गयी।

‘ऑफ़ कोर्स, मैडम,’ कहती हुई लूसी बार की ओर चल दी।

राजीव ने विशिष्ट अतिथियों के लिए ब्लैक-लेबल की एक नई बोतल खोली तो मंजूषा ने चार चमचमाते हुए बिल्लौरी पैमाने लाल टिशूज़ में लपेट कर एक ट्रे में सजा दिए। राजीव ने उनमें व्हिस्की उड़ेली और मंजूषा ने ट्रे मकरंद की ओर सरका दी, जो इतने हतोत्साहित थे कि उन्होंने वहाँ से उठने से भी इनकार कर दिया।

‘वन जिन एंड टी फॉर दि लेडी ओवर देयर, प्लीज़,’ लूसी ने मेनका की ओर इशारा करते हुए राजीव से कहा।

‘मैक डार्लिंग, गुस्सा थूक दो। लेट अस नौट कीप अवर गेस्ट्स वेटिंग, प्लीज़,’ मीता ने आकर मकरंद से प्रार्थना की।

‘भाभी जी, ड्रिंक्स मैं ले जाता हूँ,’ मकरंद का बिगड़ा मूड देखते हुए राजीव ने प्रस्वाव रखा तो मीता झट राज़ी हो गयी। राजीव सोच रहा था कि इस बहाने मेनका से भी परिचय हो जाएगा।

मंजूषा का अनुमान था कि बार की शोभा बढ़ाते हुए उसे बड़े-बड़े अमीर और विशिष्ट लोगों से मिलने का मौक़ा मिलेगा किन्तु यहाँ तो ड्रिंक्स मेहमानों तक पहुंचाई जा रही थीं।

‘डार्लिंग, सून इट विल बी क्रिसमस,’ मीता ने मकरंद का माथा चूमते हुए उन्हें दिलासा दी तो वह क़समसा उठे। मकरंद का प्रस्ताव था कि शादी की बीसवीं सालगिरह उन्हें स्विट्जरलैंड में अकेले मनानी चाहिए पर मीता नहीं मानी; मकरंद के साथ स्विट्जरलैंड में वह क्या झक मारती? वैसे भी मलिक्स की एक पार्टी कई महीनों से बकाया थी; दर्जनों पार्टीज़ में शामिल हो चुकने के बाद अब किसी के यहाँ जाते हुए मीता को शर्म आने लगी थी। एक तीर से दो शिकार करने की ठानी थी मीता ने, पार्टी की पार्टी और शादी की बीसवीं सालगिरह भी निबट जाएगी, लोग बड़े-बड़े उपहार लेकर आएंगे, सो अलग।

‘हमारी बीसवीं एनिवर्सरी पर मैक डार्लिंग हैज़ बौट मी ऐ प्लैटिनम रिंग,’ मीता ने मकरंद को मस्का लगाने के लिए अपनी रिंग-फिंगर मेहमानों के सामने कर दी, जिस पर एक प्लैटिनम की अंगूठी चमक रही थी। इस अंगूठी की चर्चा मीता ने फेसबुक पर महीने भर पहले छेड़ दी थी। ‘आह’ और ‘ऊह’ के अतिरिक्त सैकड़ों ‘लाइक्स’ देख कर उसने सोचा था कि उसके मेहमानों के बीच यही तर्क-वितर्क चल रहा होगा कि मीता जैसी ‘पौश-सोशलाईट’ के लिए क्या उपहार लेकर जाया जाए। उसे उम्मीद ही नहीं विश्वास था कि मेहमान उसके लिए बोन-चाइना अथवा क्रिस्टल के उपहार लेकर आएंगे।

‘पार्टी की रौनके-बहार को इस नाचीज़ का आदाब क़ुबूल हो,’ रंजीत मठरानी को अन्दर वाली बैठक में प्रवेश करते देख गिरगिट ने बड़े नाटकीय ढंग से झुक कर आदाब पेश किया, नमस्ते की और फिर बड़ी गर्मजोशी से रंजीत का हाथ अपने दोनों हाथों में लेकर चारों ओर दृष्टि दौड़ाई यह देखने के लिए कि सब मेहमान उसे रंजीत का हाथ पकडे हुए देख रहे थे अथवा नहीं।

‘बड़े भाई, क्या आपने भाभी जी की प्लैटिनम की अंगूठी देखी?’ गिरगिट ने रंजीत से पूछा। मीता गिरगिट की आभारी थी कि वह मेहमानों का ध्यान जब तब उसकी छोटी सी अंगूठी की ओर दिला रहा था। मीता ने इठलाते हुए अपना हाथ रंजीत के सामने कर दिया। अंगूठी की तारीफ़ करने की बजाय रंजीत ने बड़े ठाठ से कमरे में बारी-बारी सब मेहमानों पर एक उचटती सी निगाह डाली। अंत में उसकी नज़र सायरा पर जा कर ठहरी, जो दुर्भाग्यवश, उसी पल हसन के बगलगीर हुई थी। रंजीत को देखते ही वे दोनों बड़ी फ़ुर्ती से उठ खड़े हुए कि जैसे चोरी करते हुए पकड़े गए  हों। उन्हें साथ बैठे देख रंजीत का एंटीना भी हिल गया था।

रंजीत का हाथ अब भी गिरगिट की गिरफ्त में ही था पर दोनों के दिमाग़ किसी तीसरी जगह पर थे। गिरगिट जानता था कि रंजीत की उपस्थिति में हसन और सायरा बात करना तो दूर, अब सारी शाम एक दूसरे की ओर देखने की भी हिम्मत नहीं कर पाएंगे।

स्प्रिंग-रोल्स की ट्रे लिए लूसी रंजीत के पास पहुँची ही थी कि मंजूषा फ़ुर्ती से वहाँ प्रकट हुई। बड़े अंदाज़ के साथ उसने एक स्प्रिंग-रोल उठा कर अपने होंठों के बीच कुछ देर घुमाया और फिर आँखे बंद किए ‘यमयम’ कहते हुए उसे खाने लगी। रंजीत के अलावा दूर खड़े जोशी-सर भी अपना दिल थामें उसे अपलक निहार रहे थे। मंजूषा की इस कामोत्तेजक मुद्रा के कई और मेहमान भी साक्षी थे, विशेषतः सायरा, जिसे रंजीत ने इस पार्टी में मिलने के लिए ख़ासतौर पर बुलाया था।

‘मीता जी, आपके स्प्रिंग-रोल्स तो भई वाह, बहुत ही टेस्टी हैं। चाइनीज़ स्टोर वाले हैं न? उनकी वेजिटेबल्स कमाल की क्रिस्पी होती हैं, आप भी लीजिए न,’ पलकें झपकाते और मुस्कुराते हुए मंजूषा ने मीता के हाथ से प्लेट झपट कर जोशी-सर के सामने कर दी। मीता कुढ़ते हुए वहाँ से चल दी; कभी कभी एक गलती भी बहुत भारी पड़ जाती है। मीता उसे पार्टी में न्यौत कर पहले ही से पछता रही थी।

‘तेरी राहों में खड़े हैं दिल थाम के, हाय, हम हैं दीवाने सीख़-कबाब के,’ घुटनों पर बैठ कर गिरगिट अपनी बेसुरी आवाज़ में गाने लगा तो हतप्रभ मंजूषा को स्प्रिंग-रोल्स की ट्रे उसके सामने करनी पड़ी। एक चिंगारी, जो बारहा भड़कने को थी, बुझ गयी; झेंपे हुए जोशी-सर मुड़कर कंज़र्वेटरी की ओर चल दिए और रंजीत सायरा की ओर बढ़ गया। तभी वहाँ आपा प्रकट हुईं।

‘लाहौलविलाकुव्वत, ये घास फूस तो, मंजूषा बी, आपको ही को मुबारक हो। हम तो भई सीख़-कबाब और चिकन टिक्कों के ख्वाब देख रहे हैं,, ख़ुश्बू आ रही है तो वे भी ज़हे-नसीब आते ही होंगे,’

‘मुझे तो यह समझ नहीं आता कि लोग मांस-मच्छी खा कैसे लेते हैं?’ गिरगिट और आपा ने आकर उसका बना-बनाया खेल बिगाड़ दिया था; खिसियाई हुई मंजूषा की सारी अदा धरी की धरी रह गयी।

‘लाहौलविलाकुव्वत, हम क्या यहाँ सब्ज़ी-खोरों के क़िस्से सुनने आए हैं?’

‘लोगों को लाशें हज़म कैसे हो जाती हैं?’ मंजूषा एकाएक तल्ख़ हो उठी।

‘मंजूषा जी, आप शायद नहीं जानतीं कि हर सांस में हम लोग लाखों-करोणों जीवाणु निगलते हैं और इनसे कहीं अधिक को हम अपने पाँव तले हर क्षण रौंदते हैं,’ शाकाहारी मिश्रा जी से किसी को भी इस कथन की आशा नहीं थी, ख़ासतौर पर आपा को। कई अन्य मेहमान भी ये तमाशा देखने के लिए उनके आसपास आ जुटे।

‘उस सब पर तो हमारा बस नहीं, मिश्रा अंकल, लेकिन भोजन के लिए पशु-पक्षियों की हत्या करना क्या ज़रूरी है?’ मंजूषा एकाएक थोड़ा शांत होते हुए बोली।

‘सब साले टेस्ट की बात है,’

 

‘बड़े भाई, मुझे तो बीफ़ और पोर्क के सिवा सब पसंद है,’ गिरगिट ने बताया।

 

‘गोश्त तो गोश्त है, चाहे फिर वो बकरे का हो, गाय का हो या सूअर का,’ घड़ियाल ने कहा।

 

‘महँगा तो बहुत है पर हम तो भई स्प्रिंग लैम्ब ही खाते-खिलाते हैं, सॉफ्ट, जूसी और लज़ीज़,’ वायु अपना पल्ला सम्भालते हुए बोली।

 

‘जोनाथन स्विफ्ट ने अपने प्रस्ताव में लिखा था कि एक साल के स्वस्थ बच्चे का गोश्त पौष्टिक, स्वास्थ्यकर और लज़ीज़ होता है,’ सुमित के इस कथन ने लगभग सभी को चौंका दिया।

 

‘सुमित जी, आप अच्छी तरह से जानते हैं कि यह पाश्विक कटूपहास अमीरों और गरीबों के बीच खाई पाटने के प्रसंग में था। आयरलैंड में जब ग़रीबी अपनी चरम सीमा पर थी तो स्विफ्ट ने कहा था कि भुखमरी से निजात पाने के लिए बच्चों का गोश्त…’ इसके पहले कि इला अपनी बात पूरी करती, मुंह पर अपना हाथ रखे मंजूषा बाथरूम की ओर भागती हुई दिखाई दी।

 

‘स्विफ्ट भैन्चो कैनाबिलिज़म को डिफैंड नहीं कर रहा था, वह सोशल और साले इकोनोमिक रिफौर्म्स की मांग कर रहा था,’ रंजीत इस वक्त पूरे होशो हवास में था।

 

‘बड़े भाई, रिफौर्म्स की मांग करने वाले को बच्चों के गोश्त की रेसीपीज़ बताने की क्या ज़रुरत थी?’ गिरगिट ने पूछा।

 

‘रेसीपीज़ से याद आया, किसी के पास नरगिसी कोफ़ते बनाने की रेसिपी हो तो प्लीज़ मुझे ज़रूर बताइएगा,’ वायु ने बात का रुख पलटा तो श्रोताओं ने चैन की सांस ली।

 

‘वायु बी। हमारी अम्मीं, खुदा उन्हें जन्नत बख्शे, ऐसे लाजवाब नरगिसी कोफ़्ते बनाती थीं के कोफ़ता तोड़ो तो शोरबा बह निकले,’

‘सुमित मेरा मज़ाक उड़ा रहे थे कि ऐसी कोई डिश ही नहीं होती। इसका मतलब है कि मैं बस ख़याली पुलाव ही नहीं पका रही थी।’

 

‘जहां तक मेरा अंदाज़ा है, नरगिसी कोफ्तों में अंडे भरे जाते हैं,’ सुमित को आपा की रेसिपी पर भरोसा नहीं था।

 

‘लाहौलविलाकुव्वत। आज के ज़माने में इत्ती मशक्कत किससे होती है? शोरबे की जगह अंडे भर लो, हुंह।’ आपा गुस्से में बोलीं।

 

‘आपा, प्लीज़ मुझे रेसिपी दें तो मैं सुमित को नरगिसी कोफ़ते बनाकर खिलाऊँ, तभी इन्हें हम पर विश्वास होगा,’ वायु ने हाथ जोड़ते हुए आपा से रेसीपी देने की गुज़ारिश की।

 

‘लाहौलविलाकुव्वत वायु बी, रसिपी-वसिपी की खुराफ़ात रहने दें। अल्हमदुलिल्लाह, हमारा तो सब कुछ इस ज़हन में है।’ अपनी एक उंगली कनपटी पर मारते हुए आपा शुरू हो गईं, ‘आपको जित्ते कोफ़ते बनाने हों, उत्ते ही अंडे लीजिए, बड़ी एहतियात से  अंडे के सिर पर चाकू से एक छोटा सा छेद करने के बाद, बड़े जतन से उसका गूदा ख़ाली कीजिए ताकि अंडे का खोल सही सलामत रहे,’

 

‘यानि कि पचास कोफ़तों के लिए आपको पचास अण्डों का खोल चाहिए?’ सुमित ने अविश्वास के साथ पूछा तो वायु ने उन्हें ख़ामोश रहने का संकेत दिया।

 

‘बिलकुल जनाब, और उन्हें ठंडा करने के लिए, इंशा अल्लाह, आपको बरफ़ की दो या तीन सिल्लियों की भी ज़रूरत पड़ेगी,’

 

‘और अण्डों के योक का क्या होगा?’ सुमित ने फिर टोका।

‘खुदा ना ख़ास्ता, उसका आमलेट बना लीजिए,’

‘पचास अण्डों का आमलेट कौन खाएगा, किसे खिलाएंगे?’

 

‘लाहौलविलाकुव्वत, सुमित मियाँ, आपको रासीपी चाहिए के नहीं?’

 

‘माफ़ कीजिएगा, आपा, प्लीज़ बताइए,’ वायु ने सुमित को चुप रहने का इशारा किया।

 

‘अच्छे घी में लहसुन, अदरक, हरी मिर्च और प्याज़ को सुनहरा हो जाने तक भून कर उसमें मसाले मिलाइए,’

‘आपा, कौन कौन से मसाले?’

‘अरे भई, वही सब जो कलिए में डाले जाते हैं, एक पोटली में खड़ा मसाला भी बांध कर मसाले में डाल दीजिए। जब तक मसाला घी न छोड़ दे, उसे भूनते रहिए, फिर चूल्हे से उतार कर उसे ठंडा होने को रख दीजिए, फिर बड़े जतन से मसाले को अण्डों के खोलों में भर-भर कर बरफ़ की सिल्ली पर रखते जाइए,’

 

‘मरी सुबह से शाम तक दो जने तो बस मरे कोफ़ते बनाने को ही चहिएँ,’

 

‘वायु जीजी, घर तो घर, पूरा मोहल्ला मसाले की बदबू से हाहाकार कर उठेगा,’ गिरगिट बोला।

 

‘हू हैज़ सो मच फ़ालतू टाइम इन दिस डे ऐंड ऐज?’ मीता घबरा कर बोली कि जिया और मकरंद कहीं उससे नरगिसी कोफ़ते बनाने को न कह दें।

‘लाहौलविलाकुव्वत दुल्हन, नरगिसी कोफ़ते पेड़ों पर तो उगने से रहे,’

‘पेड़-पौधों पर तो सब्जियां ही उगती हैं, आपा। जितनी देर में आपके नरगिसी कोफ़ते बनेंगे, उतनी देर में तो मैं सौ तरह की सब्जियां बना कर पांच सौ लोगों को भोजन करा सकती हूँ,’ होंठों पर टिसू लगाए मंजूषा लौट आई थी।

‘लाहौलविलाकुव्वत, हमारी रासिपी में आप दखलंदाज़ी न करें, मंजूषा बी। यूं भी, वेज या नोनवेज, सबका ज़ाती मामला है,’

‘ज़ाती मामला, माई फुट! एनिमल राइट्स के बारे में भी सोचा है कभी आपने?’ कमर पर हाथ रखे हुए मंजूषा ने उनसे पूछा।

‘साले ह्यूमन राइट्स के मसले तो हमसे अब तक भैन्चो हल हुए नहीं…’

‘एंड वाट अबाउट प्लांट राइट्स, मंजूषा? घास-फूस और सब्जियों में भी तो जान होती है,’ मीता ने कहा।

‘लाहौलविलाकुव्वत, हमें तो कोई ये बताए कि मोहतरमा यहाँ पार्टी में करने क्या आई हैं? खेतों में गाय-भैंसों के साथ चारा क्यों नहीं चर रहीं?’ आपा कुछ इस तरह से फुसफुसाईं कि सिवा मंजूषा के आसपास खड़े सारे मेहमान सुन लें।

‘चारे की आजकल कमी हो गयी है, आपा। फ़सलों को अब इन्जैक्शंस देने पड़ रहे हैं,’ गिरगिट फुसफुसाया।

‘एनीवेज़, हू नोज़ के आजकल हम रियली खा क्या रहे हैं?’ मीता ने कहा।

‘बर्गर्स में घोड़ों का मीट पाया गया है, सौसेजेस में तो न जाने कितने जानवरों का मीट मिला दिया जाता हो,’ सुमित बोले।

‘फिर वही बात, मांस खाने वाले को क्या परवाह कि मांस घोड़े का है या सूअर का,’ घड़ियाल ने अपनी बात दोहराई।

‘जब नेचर ने हमें हज़ारों फल और सब्ज़ियां दी हैं तो पशु-पक्षियों की ह्त्या क्यों की जाए?’ मंजूषा अपनी बात पर डटी रही।

‘यह तो प्रकृति का नियम है, ताकतवर का कमज़ोर को निगल जाना,’

‘वादो नावल्म्ब्यः अर्थात कभी वाद-विवाद में नहीं पड़ना चाहिए,’ मिश्रा जी का पांडित्य किसी के पल्ले नहीं पड़ा।

आपा और मंजूषा जैसे दो ढीठ और निडर सेनापतियों ने युद्ध की बागडोर संभाल रखी थी, कोई भी पीछे हटने को तैयार न था। एक ओर, जहां तर्कों से कहीं अधिक, मंजूषा के नयनों के बानों से घायल मांसख़ोर मर्द भी उसकी हाँ में हाँ मिला रहे थे तो दूसरी ओर उनकी पत्नियां, ज़ाहिर था, कि आपा की तरफ़दारी लेतीं। शाकाहारियों और माँसाहारियों के बीच ठन चुकी थी।

आपा ने मंजूषा के कंधे पर हाथ रख कर कुछ कहना ही चाहा था कि वह भड़क उठी।

‘आप यह मत समझिएगा, आपा, कि आप मुझे धक्का देकर एक तरफ़ बैठा सकती हैं,’ गुस्से में मंजूषा ने आपा को ज़ोर से धकेलते हुए कहा।

‘मंजूषा जी, आपको आपा की उम्र का तो ख़याल करना चाहिए…,’ रोनी सूरत घड़ियाल जिया को संभाल न लेता तो वह लुढ़क ही गयी होतीं।

‘उम्र में बड़ा होने का फ़ायदा तो तब होता कि जब आपा बात को संभाल लेतीं,’  राजीव ने घड़ियाल का कंधा थपथपाते हुए कहा।

‘मैं तोसे कऊं, आपा, लोगन में बड़े-बूढ़न के ताईं कौनो रिप्सेक्ट (रिस्पेक्ट) नाय बची है,’ एक हंगामा मच गया जो फ्रेंच-रेवोल्यूशन से कम नहीं था।

‘मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने कहा था कि अंधेरे को अन्धेरा नहीं मिटा सकता, सिर्फ़ प्रकाश ही उसे दूर कर सकता है। नफ़रत ने मन में जगह बना ली तो एक दिन हम ख़ुद अपने से ही नफ़रत करने लगेंगे।’ मिश्रा जी की बात वह स्वयं ही नहीं सुन पाए।

‘मैं हाथ जोड़ के आप लोगों से बिनती करता हूँ कि प्लीज़ मैक और मीता की पार्टी बर्बाद न करें,’ एकाएक मोहन का पर्वताकार शरीर मंजूषा और आपा के बीच आ खड़ा हुआ, जिसके आर-पार कुछ भी देखना असंभव था। धीरे-धीरे जैसे कोई रेडियो का वॉल्यूम कम कर रहा हो, सर्वत्र शान्ति फैलती चली गयी; फ़साद टल गया।

मीता ने चैन की सांस ली ही थी कि देखा लूसी सीख़-क़बाब की ट्रे लिए मंजूषा के बिलकुल सामने खड़ी थी; घबराई हुई मीता दौड़ कर लूसी और मंजूषा के बीच आ खड़ी हुई।

‘लूसी, प्लीज़ रिमेम्बर, दिस लेडी इज़ ए प्योर वेजिटेरियन,’ मीता ने बेचारी लूसी को बिना किसी ग़लती के लताड़ दिया था।

‘हाउ द हैल वुड आई नो…,’ लूसी ने गुस्से में पूछा।

‘इट्स ऑल राइट, लूसी, माई फ़ॉल्ट,’ मीता ने इस वक्त चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी।

मंजूषा पाँव पटकती हुई ‘बार’ पर पहुँची तो देखा कि राजीव और मकरंद चटख़ारे लेते हुए चिकन-टिक्के खा रहे थे। नागिन सी फुफकारती हुई वह बैठक में लौटी तो वहाँ उसे मीता दिखी, जो सीख़-क़बाब से लबालब भरी ट्रे को रंजीत की नाक के ठीक नीचे घुमाती हुई मुस्कुरा रही थी।

‘लीजिए सर, ज़रा ये सीख़-क़बाब टेस्ट करके बताइए कि कैसे बने हैं? मधुर जाफ़री की रैसिपी है, यू मस्ट ट्राइ,’ रंजीत की बेरुखी के बावजूद मीता ने तय किया था कि वह उसे पश्चापाप के लिए कम से कम एक मौक़ा अवश्य देगी। ‘सर’ के खिताब से रंजीत को सम्बोधित करना मीता को अच्छा नहीं लग रहा था किन्तु वह जानती थी कि ‘सर’ कहने से बिगड़े से बिगड़े काम बन जाते हैं। तभी रंजीत के दाएं और बाएं घड़ियाल और गिरगिट आ खड़े हुए।

‘बड़े भाई, चिकन-टिक्कों के स्वाद की गारंटी तो मैं आपको दे सकता हूं पर सीख़-क़बाब तो मैंने अब तक चखे ही नहीं। आप श्री गणेश करें तो भाभी जी हमें भी प्रसाद दें,’ गिरगिट कब से इसी ताक़ में था कि किसी तरह गरमा-गरम सीख़-क़बाब जल्दी से उसके हाथ लग जाएं। मीता का बस चलता तो वह नदीदे गिरगिट के मुंह में सीख़-क़बाब तब तक ठूंसती रहती जब तक कि उसके प्राण-पखेरू उड़ न जाते।

‘सौरी मीता, मैं तो साला डाइट पर हूं। मुझे आप सिर्फ़ मेन-कोर्स पर ही याद कीजिएगा,’ मीता की आशा के विपरीत, सीख़-क़बाब का निमंत्रण ठुकरा कर रंजीत अन्दर वाली बैठक की ओर चल दिया। ‘समझता क्या है यह अपने आप को? औरंगज़ेब की औलाद? देखती हूँ इसे मेन-कोर्स के लिए अब कौन याद रखता है,’ मन ही मन मीता उसे एक बार फिर कोसने लगी।

‘वरी नौट, भाभी जी, हम दोनों बिल्कुल डाइट पर नहीं हैं। बड़े भाई, आप भी नोश फ़रमाइए, भाभी जी ने सीख़-क़बाब अपने कर-कमलों से बनाए हैं,’ गिरगिट ने बौखलाई हुई मीता के हाथों से ट्रे हथिया ली और घड़ियाल के आगे कर दी।

‘तुम बहुत ज़िद करते हो, राजेश, पेट में जगह तो नहीं है पर चलो मेज़ पर बैठ कर आराम से खाते हैं। ये खड़े होकर खाने की रीति जाने किस गधे ने शुरू की थी?’ रोती हुई आवाज़ में घड़ियाल ने रही सही क़सर भी पूरी कर दी; मीता की सहनशक्ति कगार पर खड़ी डगमगा रही थी।

‘बड़े भाई, ज़रूर कोई अँगरेज़ होगा, लोग-बाग़ ज़्यादातर उन्हीं की नकल किया करते हैं,’ दोनों ट्रे लेकर कोने में रखी हुई एक छोटी मेज़ पर बैठ गए और गपागप खाने लगे; उनसे चटनी का भी इंतज़ार न हुआ।

‘तुम ठीक कह रहे हो, राजेश। अँगरेज़ एक झक्की कौम है, ट्रेन्स और बसों में भी वे खड़े होकर ही ट्रैवल करते हैं,’

‘इंडियंस इतना ज़्यादा खाते हैं कि वे खड़े नहीं रह पाते, उन्हें बैठने की ज़रूरत पड़ती है।’ मंजूषा के इस सीधे प्रहार का भी गिरगिट और घड़ियाल पर कुछ असर नहीं हुआ।

‘यू आर राईट, मंजूषा, अँगरेज़ लंच में सिर्फ सूप और सैलेड से काम चला लेते हैं ताकि दिन में हलके-फुल्के रहें,’ मंजूषा हैरान थी कि मीता ने एक बार ही सही, उससे सम्मति तो प्रकट की। तभी, अपनी धोती की चुन्नटें संभालती हुई जिया भी वहाँ आ बैठीं, रेस्टरूम के बाहर मंजूषा और सायरा पहले से ही खड़ी हुई थीं।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, म्हारे इंडिया में तो मुर्गन ने बांग दी नईं के चा-बिस्कुट सुरु हो जावे थे, उसके बाद नास्ते में दलिया या बथुए की पूरी; लंच में दाल-चावल, रायता, एक सब्ज़ी और फुल्के; साम की चा के संग ताली हुई मूंगफली, नमकीन या पकौड़े, डिनर में कलिया या मछली का सालन और प्याज हरी मिरच का लच्छा, डिनर के बाद मिठाई, पान या सौंउफ-इलाइची। फेर देर रात गए, लड़के और मरद बज्जार जावें थे मलाई वाला दूद पीने। लुगाइयों को छिन बर की बी फुर्सत नाय थी,’

मीता सोच रही थी कि जिया का बस चलता तो उसके घर में भी सुबह से शाम तक यही सब कुछ होता।

‘मुझे तो सुन कर ही उबकाई आ रही है, हज़म कैसे कर लेते थे लोग इतना सब कुछ?’ मीता की बात का समर्थन करके मंजूषा उऋण होना चाहती थी।

‘हज्जम कइसन नईं होता, मंजूसा? आजकल की तरै थोड़े ई था, मैक्रो, ओवन, कटा-कटाया साग, पका पकाया खाना, हूबर, डिस-वासर, मैं तोसे कऊं, सबै काम के लिए कमबखत मसीने…’

‘भाभी जी, लूसी के हाथ ज़रा हरी चटनी तो भिजवाइए,’ घड़ियाल की रोती हुई आवाज़ सुनाई दी। दैवयोग से सास-बहु की झड़प बीच में ही रह गयी।

‘बड़े भाई, हमारी ज़ायकेदार धनिए-पोदीने की चटनी से इस मिंट-सौस का क्या मुकाबला?’

‘मिंट-सौस न हो गयी, मुसीबत हो गयी, योरोप ही क्या, अमेरिका के भी किसी रेस्तरां में चले जाओ, हर मेज़ पर आपको एक यही मीठी मिंट-सौस रखी मिलेगी,’

‘भाभी जी, आपकी लूसी कहाँ रह गयी?’ इस बार गिरगिट ने अपनी आँखें ऊपर नीचे करते हुए होंठों से ‘च च च’ की आवाज़ निकाली।

मीता की कनपटियाँ क्रोध के मारे फड़कने लगीं; कहीं उसे ब्रेन-हेमरेज न हो जाए! जहन्नुम में जाएं मेहमान, उसे कुछ हो गया तो किसी का क्या जाएगा? किन्तु अगले ही पल वह लूसी को पुकारती हुई रसोई की ओर लपकी; कहीं लूसी और प्रिया अवन औफ़ करना तो नहीं भूल गईं? ‘ओ माई शेरां वाली माँ! मिनी-इडलीज़ तो अभी परोसी ही नहीं की गईं, मेडस पर कोई कैसे डिपेंड करे?’

घबराई हुई मीता सीधे रसोई में पहुंची तो देखा वहाँ कोई नहीं था, ‘मेडस की इतनी हिम्मत! मैंने कहा था न कि वन ऑफ़ देम को आलवेज़ किचन में रहना चाहिए।’ पैर पटकती हुई मीता गैरेज में पहुँची। दरवाज़ा खोला तो देखा प्रिया अपने बेटे, मुरली को अपने हाथ से चीनी-इडली खिला रही थी। प्रिया ने बिना उसकी इजाज़त के इडली का बौक्स कैसे खोल लिया, हाउ डेयर शी?

‘सारी मैडम जी, मुरली को बुक लगा था जी, उसे चिकन-मटन नईं माँगता जी,’ खड़े होकर प्रिया ने डरते हुए सफ़ाई पेश की।

‘यू आर फ़ीडिंग मुरली विद हैण्ड? हैरी और कैमिला जब वन-इअर ओल्ड भी नहीं थे, मैंने उनके हाथों में प्लास्टिक के कांटे-चम्मच पकड़ा दिए थे,’ गुस्सा तो बहुत आ रहा था किन्तु मीता ने उसे अधिक नहीं फटकारा कि कहीं इला से जाकर वह उसकी बुराई न करे।

‘सारी मैडम जी,’ प्रिया गर्दन मटकाते हुए बोली।

‘इसे खिला कर क्विकली अन्दर आओ, इडलीज़ हार्ड हो जाएँगी, एंड वेयर इज़ लूसी?’ प्रिया ने गर्दन मटका कर अपनी अनभिज्ञता दर्शाई। मीता बुदबुदाती हुई वापिस अन्दर आ गयी। रसोई पर नज़र रखने के लिए मीता को कोई उपयुक्त व्यक्ति नहीं मिला था या यूं कहिए कि मीता को किसी पर विश्वास नहीं था। पिछले हफ्ते की ही तो बात है, मकरंद की भांजी बुलबुल का जन्मदिन था। मेहमानों को भोजन परोसे जाने से भी पहले बावर्चियों ने अपने घर से लाए टप्पावेयर के डिब्बों में सीख़-क़बाब, चिकन टिक्का मसाला और शाही-पनीर भर कर गैरेज के बाहर वाली झाड़ियों में छिपा दिए थे, जो रात के वक्त वे चुपचाप घर ले जाते। वो तो कहो कि मीता की नज़र पड़ गयी, नहीं तो उस रात खाना ज़रूर कम पड़ जाता और निंदा होती बेचारे नरेश और नैन्सी की।

प्रिया और लूसी से उसे ऐसा कोई ख़तरा नहीं था। लूसी को भारत अथवा भारतीय खानपान के विषय में कोई जानकारी नहीं थी और प्रिया साउथ-इन्डियन थी, जो इडली-साम्भर से ही प्रसन्न थी। मीता ने तय कर लिया था कि बची-खुची इडली-साम्भर वह प्रिया को ही दे देगी; अन्यथा, साम्भर की तेज़ गंध उसके फ्रिज में ही नहीं, पूरे घर में कई दिनों तक फ़ैली रहेगी।

असल में तो मीता ने लूसी को मेहमानों को दिखाने भर के लिए भाड़े पर रखा था। घर का कोना-कोना साफ़ करवा लेने के बावजूद मीता को उसे अस्सी पाउन्डस देने खटक रहे थे क्योंकि गोरों को सप्ताहांत में डेढ़ गुना वेतन देना पड़ता था और पांच घंटों से कम के लिए आने को कोई तैयार नहीं होता।

‘जब से कमबख्त होम-ऑफिस वालों ने मरे स्टूडेंट्स वीज़ास पर रोक लगाई है, इल्लीगल नौकर-चाकर मिलने मरे बंद हो गए हैं,’ मोहिनी बता रही थी, जो मीता के यहाँ माली या सफ़ाई करने वालों को अक्सर भेज दिया करती थी, वे चार पाउंड घंटे के हिसाब से पूरे दिन के जी-तोड़ काम के सिर्फ़ तीस-पैंतीस पाउंडस लेते थे। जितने पैसे उसे लूसी को देने पड़ रहे थे, उतने में तो मीता दो गुजराती औरतों से सौ लोगों का खाना घर में ही पकवा लेती। रात के बारह बजे तक वे मेहमानों को भोजन परोसतीं और फिर उसका चौका चमका कर ही अपने घर वापिस लौटतीं।

‘वो दिन मरे फाख्ता हुए, मीता, आजकल नौकरों का रेट मरा दस से लेकर पंद्रह पाउंड प्रति घंटा है,’ मोहिनी की बात सुन कर मीता को हौल उठने लगे थे। मकरंद के बस का तो कुछ भी नहीं, वह अकेले क्या-क्या संभालेगी?

‘तुम तो मरे ढेर सारे डिप्लोमैट्स को जानती हो, मीता, किसी से कहो न तुम्हारे लिए मरा एक नौकर ला दें,’

‘भाभी, इन्डियन सर्वेन्ट्स कौन से चीप हैं? यहाँ आकर वे प्राइवेट काम करना चाहते हैं, मना करने पर वे सीधे पुलिस में झूठी रिपोर्ट फ़ाइल करने की धमकी देते हैं,’

तभी लूसी ने रंजीत आदि की ओर इशारा करते हुए मीता का ध्यान भंग किया। लूसी को निर्देश दिया गया था कि यदि उसे कोई छिप-छिपा कर सिगरेट पीता हुआ दिखाई दे तो वह सीधे आकर मीता को सावधान कर दे।

‘मैडम, दोज़ गाईज़ ओवर देयर, आर स्मोकिंग,’ बैठकों, कंजरवेट्री और दोनों शौचालयों में मीता ने ‘नो स्मोकिंग’ के चेतावनी-सूचक नाम-पट्ट चिपका रखे थे, जो उसे एक हेल्थ-शो में मुफ्त में मिले थे।

‘शैल आई आस्क देम टू स्टब देयर सिगरेट्स?’ मीता को चुप देख कर लूसी ने पूछा।

‘नो लूसी, लीव देम टू मी,’ कड़ी जांच-पड़ताल करने पर मीता ने जाना कि रंजीत को मुंह में सिगार दबाए देख गिरगिट, राजीव और घड़ियाल ने भी सिगरेट्स सुलगा लीं थीं। इस वक्त यदि वह उनमें से एक को भी टोकती तो उसे सीधे बिगड़े हुए सांड यानि कि रंजीत से पंगा लेना पड़ता, जिसने मीता से अब तक सीधे मुंह बात नहीं की थी। संयम से काम लेते हुए मीता ने यह निर्णय लिया कि वह अभी चुप रहेगी और जैसे ही रंजीत वहाँ से हटेगा, वह बाकियों की अक्ल ठिकाने लगा देगी। वह बड़े तनाव में थी; सिगरेट की गंध उसके सोफों और पर्दों में बस गयी तो बड़ी मुश्किल से निकलेगी।

धुएं के छल्लों में पिरी बातें पूरे घर में जंगल की आग की तरह फैलने लगीं; जितने मुंह उतनी बातें, जिनका न कोई सिर था न पैर।

‘यू नो, आइ एम सो एलर्जिक टू स्मोक,’ नाक पर महंगा वाला टीशु रखे झूठमूठ खों खों करती हुई मीता दोनों बैठकों के चक्कर लगाने लगी। असल में तो वह देखना और सुनना चाहती थी कि कौन, कहाँ और क्या कर और कह रहा था। तभी उसने देखा कि घनश्याम यकायक अपनी सिगरेट बुझा कर उसी की ओर आ रहा था। मीता ने सोचा कि अब चटाएगी बच्चू को मज़ा किन्तु वह सीधा प्रभा सापलू के पास जा बैठा, जो अकेली बैठी थी। उसकी प्लेट में एक इडली थी, जिसे उसने अभी तक छुआ तक नहीं था।

‘प्रभा जी, मुझे रानी का इतना ग़म नहीं, जितना अपने जिगरी दोस्त नौलखा का है, हमारा बचपन का याराना था; बिल्कुल शोले फिलम के जय और वीरू जैसा, आपने शोले तो देखी ही होगी?’

घड़ियाल की पत्नी रानी नौलखा के साथ फ़रार थी। उसे बेहद रंज था – रानी का नहीं, नौलखे का। अपनी गर्दन भारत-नाट्यम नृत्य की मुद्रा में मटकाते हुए हतप्रभ सी प्रभा घड़ियाल की व्यथा सुन रही थी, जिसकी पेचीदा बातें उसकी समझ के बाहर थीं। दुर्भाग्यवश अथवा सौभाग्यवश, प्रभा की हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों कमज़ोर थीं।

पत्नी की दुविधा से अनभिज्ञ, वेनू सापलू अपने के साथ चिपका हुआ ‘येस सर’, ‘नो सर’, ‘यू आर वेरी राइट सर’, किए चला जा रहा था। जोशी-सर और उनके अधिकारियों का दरबार कंजरवेटरी में लग चुका था; जहां वह हाथ में एक बिल्लौरी पैमाना थामें अंगद की तरह अचल खड़े थे। उनके दायीं और बायीं ओर बसंत और मेनका कोडनानी संतरियों से पहरे पर थे। बड़े अदब से अपनी कमर और आंखें झुकाए, दोनों हाथों से पैंट की ज़िप को छिपाए, कभी इस किनारे तो कभी उस किनारे पर खड़ा वेनू बार-बार जोशी-सर का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयत्न कर रहा था पर उनके दिमाग़ में कमबख्त मंजूषा ने खलबली मचा रखी थी। वह अचम्भे में थे कि मंजूषा जैसी यौवना एक मामूली दुकानदार से विवाह के लिए क्यों राज़ी हो गयी थी और पति की उपस्थिति में भी वह राजीव के साथ कैसे चिपकी थी? ख़ूबसूरत सायरा का नमकीन सा यौवन भी उन्हें कुछ कम आकर्षक नहीं लग रहा था। ऐसे विषयों पर रंजीत से बात करना ख़तरा मोल लेने वाली बात थी; वह इतना बेबाक था कि भरी महफ़िल में न जाने क्या बक दे। उन्हें अधिकारियों से घिरा देख लोग उनसे बात करने में कतरा रहे थे; तिस पर, मेनका की बकबक ने उनकी नाक में दम कर रखा था।

‘सर, पकोरे खाओ नी,’ ‘थोरी चटनी लाओ नी,’ ‘टिक्के गरम कराओ नी,’ ‘सर के लिए एक फ्रेश पेग बनाओ नी,’ मेनका के अनंत निर्देशों का पालन बसंत बड़ी मुस्तैदी के साथ कर रहा था। गर्मा-गर्म पकौड़ों, चिकन टिक्कों, सीख़-कबाबों और चटनी की सप्लाई में मजाल है कि कहीं बाधा उपस्थित हुई हो। स्पष्टतः बसंत के निर्देशों का पालन लूसी और प्रिया बड़ी मुस्तैदी से कर रही थीं। राजीव के निर्देशानुसार, भारतीय उच्चायोग के अफ़सरान को खुश रखना उनका परम धर्म था।

झनक-झनक-पायल-बाजे फिल्म की हीरोइन संध्या जैसी अदाओं से जोशी-सर को टिक्के और पकौड़े खिलाने में व्यस्त थे अटाशे और उसकी पत्नी मेनका, जिन्होंने मिल कर द्वितीय-सचिव सापलू को भी ठिकाने लगा दिया था। स्टार्टर्स के प्लैटर्स रसोई से सीधे पहले जोशी-सर के दरबार में घुमाए जाते और जब वह उन्हें छू कर पवित्र कर देते, तब कहीं जाकर वह प्रसाद किसी अन्य मेहमान को परोसा जाता।

मेहमानों के तथा-कथित स्टैण्डर्ड के हिसाब से उन्हें तवज्जो दी जा रही थी; ये वर्गीकरण भी मीता का ही तय किया हुआ था, जिसका न तो कोई भारत से सम्बन्ध था और न ही ब्रिटेन से। मकरंद को ठोक-पीट कर अपने स्तर पर लाने में मीता को कई साल लगे थे। ससुराल वालों को स्पष्टतः वह मध्यम-वर्ग का मानती थी और जब कभी वह उनसे ख़फ़ा हो जाती, जो बहुत आम बात थी, तो वह उन्हें एक पायदान और गिरा देती। बहुत से विशिष्ट मेहमानों के आ जाने के कारण मीता आज अपने पीहर वालों के साथ भी मध्य-वर्गीय बर्ताव कर रही थी, जिन्हें साधारणतः वह अप्पर-क्लास में गिनती थी।

गरमा-गरम स्टार्टर्स की ट्रे उठाए मुस्कुराती हुई लूसी वी.आई.पीज़ के बीच घूम रही थी और उसके संग थी स्वयं मीता, हीरे की अंगूठी वाले हाथ में महंगे टिशूज़ थामे, मेहमानों से आग्रह करती। इस महत्वपूर्ण राउंड के बाद लूसी वही ट्रे सस्ते टिशूज़ के साथ मध्य-वर्गीय मेहमानों के बीच घुमा देती, माइनस मीता के, जो विशिष्ट मेहमानों से बातें करने के लिए उन्हीं के बीच रुक जाती।

इस बीच, बचे खुचे गुनगुने टिक्कों और टूटे फूटे समोसों की हालत सुधार कर, वही ट्रे बड़ी नम्रता के साथ प्रिया निम्न दर्जे के मेहमानों में घुमा देती; नम्रता के साथ इसलिए कि उसके हिसाब से यह भोजन झूठा हो चुका था।

उच्च और मध्यम वर्ग के लिए जगह बनाने के लिए, निम्न दर्जे के सादे और विनीत मेहमान मीता के इशारे पर बिना किसी हील-हुज्जत के एक स्थान से उठ कर दूसरे स्थान पर बैठ जाते थे; मीता का आभार प्रकट करते हुए कि उसने उन्हें इस विशेष उत्सव में शामिल किया था।

निम्न से मध्यम वर्ग में पहुंचे लोग मीता के लिए सिर-दर्द बने हुए थे, जो उसका ही खाकर उसी की बुराइयों में जुटे थे।

‘मरे हम सब तो कूड़ा ठहरे, असली मेहमान तो जोशी-सर और उनकी मरी वानर-सेना है। हमें बुलाकर मरा बेइज़्ज़त करने की क्या जरूरत थी?’ जलती-भुनती हुई मोहिनी मेहमानों का ध्यान कई बार मीता के इस भेद-भाव की ओर दिला चुकी थी।

‘हम तो अपने मेहमानों को भगवान का दर्जा देते हैं और देना भी चाहिए,’ पत्नी का अनुमोदन करने में मोहन भी नहीं चूक रहे थे किन्तु पति-पत्नी के भड़काने के बावजूद, मेहमान मुंह बाएँ चुपचाप जुगाली किए चले जा रहे थे। रविवार का दिन बहस के लिए नहीं बनाया गया था किन्तु कुछ विवेकशील मेहमानों के लिए सब दिन समान थे।

‘लाहौलविलाकुव्वत…,’ जिया की उपस्थिति में आपा को इस वक्त कुछ और कहना वाजिब नहीं लगा किन्तु जिया जानती थीं कि आपा और अन्य मेहमानों के दिलों में भी वही सब था जो मोहन-मोहिनी कहते फिर रहे थे। यूं भी, निम्न-वर्ग के मेहमानों में अधिकतर जिया की सहेलियां और मीता के अड़ौसी-पड़ौसी ही थे। जिनमें प्रमुख थीं, श्रीलेखा, सोमा, सलोनी और श्रीनिवासन, जो मीता के दाएं और बाएँ वाली कोठियों में रहते थे। मीता की गैरहाजिरी में सोमा और सलोनी मीटर-रीडिंग को आए गैस-बिजली-पानी कर्मचारियों से लेकर सफ़ाई-कर्मचारियों पर कड़ी निगरानी रखती थीं क्योंकि मीता को जिया पर एक रत्ती भर भी भरोसा नहीं था। जो भी घर में आता, जिया उसे ज़बरदस्ती चाय-नाश्ता करवाती और किसी-किसी के लिए तो वह खाना तक पकाने बैठ जाती थीं। खैर, मीता की ग़ैरहाज़री में जिया अपनी पड़ोसनों से ढोकला, श्रीखंड, थेपला और खांडवी के अलावा, नियमित रूप से गाजर-अदरक-हरी मिर्च का अचार भी डलवा लेती थीं।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, मोइनी, इस घर में म्हारी एक नाय चलै। करने दो जो मियाँ-बीबी के मन को भावै,’ अप्रसन्न जिया आखिर कब तक चुप रहतीं? मन की भड़ास निकाल कर उनका जी कुछ हल्का हुआ।

‘जिया, ऐसा होते तो हमने मरा कहीं नहीं देखा,’

‘मोहिनी जी, शोर मचाने से क्या फ़ायदा? आजकल तो सभी पार्टीज़ में ऐसा ही होता है। लोगों का कद देख कर उन्हें तवज्जो दी जाती है। आपको प्रॉब्लम है तो आपसे रुकने के लिए कौन कह रहा है?’ सुमित बोले।

‘आप मिक और मोहिनी की बातों में न ही आएं तो अच्छा है। ये दोनों महा चुगलखोर हैं।’ कंधे पर अपने पल्ले को ठीक से रखते हुए वायु ने अपने पति को सलाह दी।

‘हुंह, अपने को मैक का बड़ा भाई-भाभी बताते फिरते हैं और पीठ पीछे उन्हीं की बुराई कर रहे हैं,’ सुमित ने गुस्से में आँखें तरेरते हुए कहा।

‘वही तो, आपकी पीठ पीछे ये कहते फिरेंगे कि मेहमानों को भड़काने वाले आप ही थे…,’ तभी एक ज़ोर के ठहाके ने उन दोनों का ध्यान अपनी ओर खीच लिया। मेहमानों के लांछनों से बेखबर, राजीव और मंजूषा कभी फुसफुसाते तो कभी ज़ोर- ज़ोर से हंसने लगते।

‘आओ नी, पेर के नीचे बैठ के बरे-बरे पकोरे खावो नी,’ कॉपी-कैट मंजूषा ने मेनका की नकल एक बार फिर उतारी। किसी के एक चुटकले पर कोई भला कब तक हंस सकता था? राजीव तंग आ चुका था मंजूषा के इस थकाऊ दुहराव से; असल में तो वह मिनिस्टर एंड पार्टी को नाराज़ नहीं करना चाहता था क्योंकि ओ.सी.आई लेने के लिए उसे उनमें से एक की मदद चाहिए होगी। जोशी-सर तक पहुंचने का कोई और ज़रिया नहीं था। वेनू सापलू के पास जाने का उसका मन नहीं था; जाने यह साऊथ-इंडियन उसकी सहायता करे न करे या फिर दस नियम गिनाकर उसे बाहर लम्बी क्यू में खड़ा हो जाने की सलाह दे दे; इनके इल्ले-पिल्लै-मरगिल्ले क्लब्स में घुसना कोई आसान बात थोड़े ही थी। शायद बसंत और मेनका को डिनर या लंच पर बुला लेने से काम बन जाए पर इला ऐसी चालों के सख्त खिलाफ़ थी।

‘चाहे मुझे इंडिया-हाउस के दस चक्कर लगाने पड़ें, मैं अपना ओ.सी.आई. ख़ुद बनवा लूंगी। वैसे भी, इन्डियन हाई कमीशन ने अपनी सब सर्विसेज आउटसोर्स कर दी हैं; कम्प्युटर पर फॉर्म्स भरो और जमा कर दो, क्या ज़रुरत है किसी की लल्लो-चप्पो करने की?’

एकाएक राजीव के दिमाग़ में आया कि जोशी-सर और उनके अधिकारियों को घर पर बुला कर उनकी ख़ातिर करने से सस्ती और बेहतर थी मीता की चापलूसी। बस थोड़ी सी तारीफ़ की ज़रूरत थी, मीता उसका काम मुफ़्त में करवा देगी। अच्छा हुआ कि वह आज की पार्टी में मीता का हाथ बंटाने पहुंच गया था किन्तु मंजूषा के उपहास के कारण कहीं उसका खेल बिगड़ न जाए; राजीव ने तय किया कि वह अब उससे दूरी बनाए रखेगा।

जिन मेहमानों का मंत्री और अधिकारियों से परिचय नहीं करवाया गया था, वे सब अपने को उपेक्षित महसूस कर रहे थे। वे अपनी भड़ास भारतीय उच्चायोग पर उतारने लगे और मंजूषा उनकी अगुवा बन बैठी, विशेषतः इसलिए कि राजीव उसे अकेला छोड़ कर अधिकारियों की चाटुकारिता के लिए लालायित था।

‘आप यहाँ नई हैं, मंजूषा जी, हम तो यहाँ तीस बरसों से रहे हैं। इंडियन हाई कमीशन से कुछ भी एक्सपैक्ट करना बेकार है।’ सुमित ने कहा।

‘पर किया क्या जाए, बड़े भाई? एजेंटों को सौ-डेढ़ सौ पाऊंडस देकर भी भरोसा नहीं किया जा सकता कि पासपोर्ट समय पर मिल जाएगा,’

‘आप सौ-डेढ़ सौ पाऊंडस की बात कर रहे हैं, साउथ-हौल और ईस्ट लन्दन वाले एजेन्टस ओ.सी.आई लगवाने के पांच-पांच सौ पाउंडस मांग रहे हैं,’

‘एजेंट्स के चक्करों में पड़ने की क्या ज़रुरत है? अगर आपको कोई जल्दी नहीं है तो पोस्ट से भेज दीजिए,’ इला ने सलाह दी।

‘इला जी, इंडिया हाउस से आपका पासपोर्ट सही-सलामत लौट जाए तो आप मेरा नाम बदल दीजिएगा,’

‘पासपोर्ट सही सलामत लौट भी आए तो जनाब बड़े ध्यान से चेक कीजिएगा, नाम के स्पैलिंग्स ठीक होंगे तो आपकी डेट ऑफ बर्थ शर्तिया ग़लत होगी,’

‘वाट टू डू जी? वो लोग कब्बी फ़ोन नई उठाता और न ही ई-मेल्स का जवाब देता है,’ श्रीनिवासन ने कहा, जो बोलते बहुत कम थे, अधिकतर अपना सिर ज़ोर ज़ोर से हाँ या नहीं में हिला कर काम चला लेते थे।

‘आप ठीक कह रही हैं, वायु जी, मुझे इंडिया-हाउस के चार चक्कर काटने पड़े तब कहीं जाकर मेरा पासपोर्ट बना।’

‘हमें तो खुदा ना ख़ास्ता पूरे चार महीने हो गए अप्प्लाई किए हुए, क़यामत से पहले वीज़ा मिल जाए तो हम एक दफ़ा लखनऊ और दिल्ली हो आएं,’ आपा बोलीं।

‘आपा, एक दिन आप लोग वहां जाकर धरने पर बैठ जाएं, देखें क्या करते हैं,’ सुमित ने सुझाव दिया।

‘इंडिया हाउस के बाहर लोग रोज़ धरना देते हैं, उनके कान पर जूं तक नहीं रेंगती,’

‘काउंटर-स्टाफ़ से कभी पाला पड़ा है आपका? इतने रूड हैं कि बस पूछिए नहीं। मज़ाल है कि कोई मुस्कुरा तो दे,’

‘सुना है कि रुखाई से पेश आने के लिए उन्हें दिल्ली में स्पेशियली ट्रेंड किया जाता है,’

‘मुझे तो लगता है कि आप में से किसी का अब तक फ्रेंच, डच या जर्मन एम्बेसीज़ से पाला नहीं पड़ा, तभी आप इंडिया-हाउस की इतनी बुराई कर रहे हैं। मुझे हौलैंड जाने के लिए क्या-क्या पापड़ नहीं बेलने पड़े, यह बस मैं ही जानता हूँ,’ राजीव ने यह देखने के लिए कि उसकी बात जोशी-सर एंड पार्टी में से किसी के कान में पड़ी अथवा नहीं, कंजरवेटरी की ओर नज़र दौड़ाई पर सब ताश खेलने में मग्न थे; वह इस गौरव से वंचित रह गया।

‘तुम बिलकुल ठीक कह रहे हो, राजीव, इन्डियन एम्बेसी में जाकर हम लोग कम से कम हल्ला तो मचा सकते हैं। फ़ोन पर कुछ सिर-फिरे उन्हें माँ-बहन की गालियाँ तक सुना देते हैं। किसी और एम्बेसी में जाकर कोई अपना मुंह खोल कर तो दिखाए,’ गीदड़ ने कहा।

‘बड़े भाई, रशियन एम्बेसी में घुसो तो लगता है कि जैसे हम उनकी कैद में हों,’ वही मेहमान जो भारतीय दूतावास को गालियाँ देने में लगे थे, अब ज़ोर-शोर से बारी बारी सारे विदेशी दूतावासों की चिंदी करने में व्यस्त हो गए।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, तुम सब ये का पिटारा खोल के बैठ गए? इस खुसी के मौके पर भगवान का नाम लो, नाचो-गाओ,’ जिया अपने हाथ नचाते हुए बोलीं।

‘आप तो बस आज्ञा दें, जिया, बाजा-ढोलक-मंजीरे सब कार में रखे हैं,’ ईलिंग-कीर्तन मंडली के संस्थापक, मोहन टयाल उठ खड़े हुए; उनका चेहरा दमक रहा था। मोहिनी की उंगलियाँ भी हारमोनियम पर थिरकने के लिए मचलने उठीं, मीता के मेहमान अब देखेंगे मोहन-मोहिनी की सुर-साधना। जिया, अम्मा और सोमा की माँ विशेष तौर पर चिहुंक उठी।

‘नौट नाऊ, मिक भैय्या, प्लीज़,’ मीता तमक कर बोली; लोग उसकी पार्टी का स्टैण्डर्ड गिराने पर क्यों तुले थे? उसे जगराता ही करवाना होता तो वह वुल्वरहैम्पटन-मंदिर वाली पार्टी को बुलाती; वे मुहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर और अनूप जलोटा आदि की आवाजों में लोकप्रिय फ़िल्मी गीतों पर आधारित ऐसे-ऐसे भजन गाते हैं कि मंत्र-मुग्ध श्रोता रात-रात भर वहीं जमें रहते हैं।

‘जब आपको ठीक लगे, मीता जी, आप हमें बस एक इशारा कर दीजिएगा,’ मोहन ने हताश होकर बैठते हुए कहा; पापियों के उद्धार का एक मौक़ा उनके हाथ से निकल चुका था। कितने शौक से लाए थे वे दोनों अपना साज़ो-सामान कि जिया उनसे भजन-कीर्तन को अवश्य कहेंगी। इससे पहले कि जिया अपना प्रस्ताव दोहरातीं, मीता उठ कर वहाँ से चल दी।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, मोइनी, आज सुबै से लक्स्मी-गनेस बी नाय मनाए गए, म्हारे जमाने में बर्र-डे के दिन सुबै-सुबै हवन औउर फेर सुन्दर-काण्ड का पाठ होवे था और इब…,’ जिया का ‘भज गोविन्दम’ शुरू हो गया; मोहन-मोहिनी उनके दाएं और बाएँ कन्धों से लगे बैठे उन्हें हौसला रखने की हिदायत दे रहे थे।

‘सत्य वचन, जिया, जैसे काष्ठ गत अग्नि को जलाने के लिए जलते हुए अंगारों के योग की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार से जीवन जागृति के लिए सत्संग आवश्यक होता है।’ मिश्रा जी इस उक्ति पर मोहन और मोहिनी अपनी मुंडियां हिलाते हुए बस झूम ही तो उठे।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, नेम धरम अब कछु नाय बचो है, मिसरा जी, गीता और रामायन तो अब लोगन ने कोल्की मां धर दीने हैं,’

‘जिया, महाभारत और रामायण सब गढ़ी-गढ़ाई कहानियां हैं,’ मंजूषा ने कहा।

‘लाहौलविलाकुव्वत, इन्हें तो खुदा का भी खौफ़ नहीं,’

‘आ शूँ जमानो आव्यो छे?’ सोमा की माँ ने कहा।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, मंजूसा, किसन जी साक्सात भगवान विस्नू जी के औतार थे,’

‘कृष्ण वाज़ ऐ पक्का साला पौलिटीशियन, नौट इश्वर का अवतार,’ रंजीत ने कहा, जो टहलता हुआ उधर आ निकला था।

‘हय राम,’

‘लाहौलविलाकुव्वत,’

‘आ शूँ जमानो आव्यो छे?’

‘यू आर सो राईट, मिस्टर रंजीत, वाइफ़ के होते हुए वो राधा और गोपियों के साथ खुले आम फ्लर्ट किया करते थे।’ मीता के इस कथन से जिया के तन बदन में आग लग गई। मन में तो आया कि वह शेरां वाली माता की भक्तन को टोक दें किन्तु वह चुप रहीं। बात बढ़ जाएगी तो इसका खामियाज़ा बेचारे मकरंद को भुगतना पड़ेगा।

‘चलिए, आपके कृष्ण कन्हैय्या को जाने देते हैं, आप युधिष्ठर को लें। महाभारत में उन्हें धर्मराज कहा गया है, वह कैसे मान गए द्रौपदी को भाइयों के साथ शेयर करने के लिए?’ सुमित ने पूछा।

‘बड़े भाई, बेचारे पांडव तो अपनी मां की आज्ञा का पालन कर रहे थे,’ गिरगिट बोला।

‘द्रोपदी को दाँव पर लगाने के लिए तो माँ ने उनसे नहीं कहा था?’ वायु बोली।

‘और मिश्रा जी, पिछले हफ्ते आपने कम्यूनिटी-सेंटर में झूठ पर भाषण दिया था; वहाँ लोगों को प्रश्न नहीं पूछने दिए गए। मैं पूछना चाहता था कि कृष्ण ने युधिष्ठर को गुरु द्रोणाचार्य के सामने झूठ बोलने के लिए क्यों उकसाया था?’ सुमित ने पूछा।

घोर पापियों से घिरी हुई किंकर्तव्यविमूढ़ जिया, आपा, सोमा की माँ और अम्मा अपने कान बंद किए  बैठी थीं। विशेषतः आपा, जो जानती थीं देर सवेर से ही सही, मुसलमानों पर आंच आई तो वह अकेली पड़ जाएँगी; हसन और सायरा तो उनका साथ देने से रहे।

‘यदि आपने पूरा महाभारत पढ़ा होता तो आप इस प्रकार की शंका नहीं करते, क्यों मिश्रा जी?’ मोहन ने कहा।

‘कृष्ण जानते थे कि आसुरी स्वभाव के लोग धर्मयुद्ध नहीं करेंगे। शत्रुओं ने जब युद्ध के नियमों का उलंघन किया तभी न श्री कृष्ण ने पांडवों से कहा कि उन्हें भी रणनीति से काम लेना चाहिए। हमारे शास्त्रों में इसके प्रयोग का विधान है।’ मिश्रा जी के इस कथन पर जिया, अम्मा, आपा, मोहन और मोहिनी को राहत मिली।

‘मिश्रा जी, आप किस-किस बात की सफ़ाई पेश करेंगे? रामायण और महाभारत ऐसे ऐसे न जाने कितने कंट्राडिक्शन्स से भरे पड़े हैं…’ सुमित ने जिरह की।

‘हरे राम हरे राम, राम राम हरे ह…’

‘वाट राम राम, जिया? सीता वाज़ ब्लडी प्रेग्नेंट जब राम ने उन्हें साला जंगल में छुड़वा दिया था।’

‘राम तो अन्तर्यामी थे, फिर क्यों सीता को अग्नि-परीक्षा देनी पड़ी?’ राजीव ने पूछा।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, कोई कुरआन के खिलाफ़ कछु कै के दिखाए, उसकी जुबान न काट लें मुसल्ले तो म्हारा नाम बदल दीजो, एक म्हारा हिन्दू धर्म ही है के तुम सब…’ जिया ने विवाद को मोड़ देना चाहा, बहुत हो गयी उनके हिन्दू धर्म की बुराई!

‘जिया, इनके धर्म ईमान के बारे में किसी ने मुंह भी खोला होता न तो अब तक कई फ़तवे निकल चुके होते इन सब के नाम,’ मोहन ने रंजीत, मंजूषा और राजीव को इंगित करते हुए कहा तो मोहिनी, आपा और जिया ने सिर हिलाते हुए अपनी सहमति जताई।

‘धर्म समाज के उत्थान के लिए बनाए गए थे ताकि लोग-बाग़ सुख शान्ति और परस्पर सद्भावना से रहें…’

‘मिश्रा जी, भोली-भाली और कमज़ोर जनता को क़ाबू में रखने के लिए धर्म के नाम पर ढकोसले ईजाद किए जाते रहे हैं और किए जाते रहेंगे,’ सुमित ने कहा।

चारों तरफ़ हाहाकार मच गया। देवी-देवताओं और धर्म-ग्रंथों की फ़जीहत के बीच ‘कयामत बस आने को है,’ ‘हय राम’, ‘आ शूँ जमानो आव्यो छे’ और ‘लाहौलविलाकुव्वत’ जैसी दुहाइयां सुनाई दे रही थीं।

‘मुझे तो आज तक यह समझ में नहीं आया कि हमारा हिन्दु धर्म है क्या बला,’ घड़ियाल रो दिया। ‘

‘यह तो बड़ा कठिन सवाल है। आप ही बताइए मिश्रा जी,’

‘प्रथम तो यह कि हिन्दुइज़्म कठोर नियमों अथवा धारणाओं का घिसा पिटा ढांचा नहीं है, असल में वह धर्म है ही नहीं, ‘

‘लाहौलविलाकुव्वत,’

‘आ शूँ जमानो आव्यो छे?’

‘ऐ मैं तोसे कऊँ, मिसरा जी, हमऊ तुमसे ये उम्मीद नाय थी,’

‘जिया, साफ़ सुथरे ढंग से जीने का तरीका  है हिन्दुइज़्म, जिसे हम सच्चिदानंद अर्थात सत, चित और आनंद कहते है। जीवन से सम्बंधित विज्ञान का लक्ष्य है अद्वैत सत्य की अनुभूति और उपलब्धि। उसके दार्शनिक पक्ष को ‘सांख्य’ तथा  प्रयोगात्मक पक्ष को ‘योग’ कहते हैं।  जीवन सम्बंधित विज्ञान की उपलब्धियों का प्रयोग, जो मानव-मात्र के लिए उपयोगी हैं; आप चाहें तो इसे हिन्दु धर्म या हिंदुइज्म कह सकते हैं…,’

मिश्रा जी का भाषण आरम्भ हो गया तो लोग खिसकने लगे। बदहवास मीता को पहली बार पछतावा हुआ कि उसने मनोरंजन का प्रबंध क्यों नहीं किया; कहीं उसकी पार्टी फ्लॉप ही न हो जाए।

‘बोलो वृन्दावन बिहारी लाल जी की जय,’ यकायक मोहन ने खड़े होकर एक ज़ोर की हुंकार लगाई,’

‘जय,’ मोहिनी, अम्मा और जिया एक साथ चिल्लाईं। मोहन एक आक्रामक मुद्रा में तैनात हो गए कि कोई इस विषय पर फिर मुंह खोले और वह उसकी ऐसी की तैसी कर दें;  यह उनके पेशे का सवाल था।

मेहमानों की टोलियों में एक बार फिर रद्दो-बाल हुआ। एक वर्ग अब भी राम और कृष्ण की बखिया उधेड़ने में लगा था तो दूसरा, जिसमें मंजूषा, राजीव और सुमित शामिल थे, दबी ज़ुबान में फ़तवे का जनाज़ा निकालने पर तुले थे।

हसन और सायरा अभी एक दूसरे का हालचाल पूछने बैठे ही थे कि गिरगिट एकाएक उनके नज़दीक खड़ा होकर ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ पीटने लगा। रंजीत समेत लगभग सभी मेहमान उन दोनों की ओर देखने लगे। गिरगिट चाहता था कि सायरा और हसन के बीच चल रही रासलीला रंजीत अपनी आँखों से देख ले। वे दोनों घबरा कर यूं उठ खड़े हुए कि जैसे चोरी करते पकड़े गए हों, विशेषतः बेचारा हसन, जिसे रंजीत बुरी तरह घूर रहा था।

‘ख्वातीनों हज़रात, लेडीज़ एंड जेंटलमेन, हियर, हियर, गिव मी योर इअर, मास्टर ग़ज़लकार जनाब हसन कुरैशी और मल्लिकाए-तरुन्नुम मोहतरमा सायरा ख़ान साहिबा आपको अपने कुछ पसंदीदा शेर और ग़ज़लें सुनाने जा रहे हैं। गौर फरमाएं और ज़ोर से तालियाँ बजा कर इस्तकबाल कीजिए जनाब हसन कुरैशी साहब का,’ तालियाँ बजाती हुई औरतें जल्दी ही हसन और सायरा को घेर कर बैठ गईं और मर्द उनके पीछे आ खड़े हुए। मजमा जुटते देख कर मीता ने शेरां वाली माँ को धन्यवाद दिया; शेरो-शायरी से उसकी पार्टी में जान आ जाएगी।

शायरी के दीवाने हसन से तो बस कहने भर की देर थी; फिर मौक़ा भी था और दस्तूर भी। हसन का एक हाथ बालों को संवारने लगा; उसकी कमर स्वतः लचक उठी।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, सेरो-सिरी से पैले कोई गनेस तो मनाय लो,’ जिया कलपने लगीं तो आपा ने अपने होंठों पर उंगली रखकर उन्हें ख़ामोश रहने का इशारा किया, जो जिया को बहुत नागवार गुज़रा; ‘गनेस जी नाराज हो गए तो? आपा के अल्लाह मियाँ सायद खुस होंगे।’ मेहमानों की दृष्टि हसन और सायरा पर टिकी थी।

‘अर्ज़ किया है, जहां रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा, जहां रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा, जहां रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा, किसी चराग़ का अपना मकां नहीं होता!’ हसन ने कविवर नीरज की अदा और आवाज़ में शेर पढ़ने शुरू किए।

‘वाह, क्या बात है, मुक़र्रर, मुक़र्रर,’ सायरा और जोशी-सर ने दाद दी।

 

‘एक ही लाइन को हसन तीन बार तो पहले ही दोहरा चुका है।’ मंजूषा राजीव के कान में फुसफुसाई। जिन्हें शेरो-शायरी में कोई दिलचस्पी नहीं थी, वे सब अब भी गप्पों में लगे हुए थे, जिनमें शामिल थीं मीता की पड़ोसनें, जिया और उनकी सहेलियां। आपा उन्हें गुस्से में घूरते हुए ख़ामोश रहने का इशारा कर रही थीं।

‘अब  पेशे-ख़िदमत है क़तील शिफ़ाई की एक नज़्म, समाद फ़रमाइए, एक ही सर है, झुका सकता हूँ किस किस के लिए, एक ही सर है, झुका सकता हूँ किस किस के लिए, अनगिनत मेरे ख़ुदा और मैं अकेला आदमी,’

अपने सिर को दाएं-बाएँ ज़ोर-ज़ोर से हिलाते हुए गिरगिट तालियां पीटने लगा। लोग ‘वाह-वाह’ करते हुए शोर मचाने लगे, कुछ एक ने सीटियाँ भी बजाईं, जिनमें मंजूषा भी शामिल थी। इससे पहले कि हसन नज़्म पूरी करता, राजीव बोल उठा।

‘सायरा जी, अब एक ग़ज़ल तरुन्नम में हो जाए,’ राजीव ने गुज़ारिश की तो लोग एकाएक सायरा की तरफ घूम गए और तालियां पीटने लगे। हसन खिसिया कर चुप हो गया।

‘तहज़ीब नाम की तो कोई चीज़ ही नहीं बची, क्या नाम है भई आपका? हसन मियाँ को नज़्म तो पूरी करने दी होती…,’ आपा की किसी ने नहीं सुनी तो वह ख़ामोश होकर सायरा को देखते हुए कुलबुलाईं, ‘मुंह से फूट नहीं सकती थीं कि पहले हसन मियाँ की नज़्म पूरी होने पर ही गाएंगी? देखते हैं, क्या तीर मारती हैं? सिवा हसन के इनसे कौन निकाह पढ़वाएगा?’

हथेलियों को अपनी ठुड्डी से लगाए संजीदगी का नाटक करते हुए गिरगिट सायरा के क़दमों में आ बैठा। मर्दों की लपलपाती नज़रें सायरा को बेशर्मी से चाट रही थीं और औरतें जल-भुन कर राख़ हो रही थीं।

‘तुम्हें मालूम है न, राजीव, के सायरा जेल में थी,’ मंजूषा ने राजीव का ध्यान बंटाना चाहा; बहुत से अन्य सांपों ने भी फुफकारने के लिए अपने फन उठा लिए। वायु और सुमित के साथ-साथ हसन ने भी मंजूषा की बात सुन ली थी।

‘सुना तो था पर कोर्ट ने उसे बाइज्ज़त बरी कर दिया था,’ राजीव ने मंजूषा को चुप रहने का इशारा करते हुए अपनी दृष्टि सायरा पर टिका दी।

इससे पहले कि सायरा का अगला पिछला इतिहास दोहराया जाता, सायरा ने गाना शुरू कर दिया; पृष्ठभूमि की फुसफुसाहटें पार्श्व संगीत में तब्दील हो गईं।

                 क्रमशः

 

- दिव्या माथुर

दिव्या माथुर 1984 में भारतीय उच्चायोग से जुड़ीं, 1992-2012 के बीच नेहरु केंद्र में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी रहीं और आजकल भारतीय उच्चायोग के प्रेस और सूचना विभाग में वरिष्ठ अधिकारी हैं। रौयल सोसाइटी की फ़ेलो, दिव्या वातायन कविता संस्था की संस्थापक और आशा फ़ाउंडेशन की संस्थापक सदस्य हैं।

कहानी संग्रह - आक्रोश (पद्मानंद साहित्य सम्मान, हिन्दी बुक सैंटर, दिल्ली), पंगा और अन्य कहानियां (मेधा बुक्स, दिल्ली), 2050 और अन्य कहानियां (डायमंड पौकेट बुक्स, दिल्ली) और हिन्दी@स्वर्ग.इन (सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली)।

अँग्रेज़ी में कहानी संग्रह (संपादन) – औडिस्सी: विदेश में बसी भारतीय महिला कहानीकारों की कहानियां (स्टार पब्लिशर्स), एवं आशा: भारतीय महिला कहानीकारों की कहानियां (इंडियन बुकशैल्फ़, लन्दन)।

कविता संग्रह - अंतःसलिला, रेत का लिखा, ख़्याल तेरा, चंदन पानी, 11 सितम्बर, और झूठ, झूठ और झूठ (राष्ट्रकवि मैथलीशरणगुप्त सम्मान)।

अनुवाद - मंत्रा लिंगुआ के लिए बच्चों की छै पुस्तकों का हिंन्दी में अनुवाद : औगसटस और उसकी मुस्कुराहट; बुकटाइम, दीपक की दीवाली; चाँद को लेकर संग सैर को मैं निकला; चीते से मुकाबला और सुनो भई सुनो। नैशनल फ़िल्म थियेटर के लिये सत्यजित रे-फ़िल्म-रैट्रो के अनुवाद के अतिरिक्त बी बी सी द्वारा निर्मित फ़िल्म, कैंसर, का हिंदी रूपांतर। इनकी रचनाओं का भी विभिन्न भाषाओं में अनुवाद।

नाटक : Tête-à-tête और ठुल्ला किलब का सफल मंचन, टेलि-फ़िल्म : सांप सीढी (दूरदर्शन)।

सम्मान/पुरस्कार : भारत सम्मान, डॉ हरिवंश राय बच्चन लेखन सम्मान, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त प्रवासी भारतीय पुरस्कार, पदमानंद साहित्य सम्मान, प्रवासी हिन्दी साहित्य सम्मान, आर्ट्स काउंसिल औफ़ इंगलैंड का आर्टस एचीवर पुरस्कार, चिन्मौय मिशन का प्रेरणात्मक व्यक्ति सम्मान, इंटरनैशनल लाइब्रेरी ऑफ़ पोइटरी द्वारा पुरस्कृत कविता, बौनी बूंद ‘Poems for the Waiting Room’ परियोजना में सम्मलित, ‘दिव्या माथुर की साहित्यिक उपलब्धियाँ’ नामक स्नातकोत्तर शोध निबन्ध, ‘इक्कीसवीं सदी की प्रेणात्मक महिलाएं’, ‘ऐशियंस हू ज़ हू’ और विकिपीडिया की सूचियों में सम्मलित।

संप्रति : भारतीय उच्चायोग, लंदन, में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी।

 

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