एक शाम भर बातें

व्यंगात्मक उपन्यास : अंतिम भाग -> 

 

‘मार्क ट्वेन ने ठीक कहा है कि क्रोध एक ऐसा तेज़ाब है, जिसका अधिकतम नुकसान उस पात्र को पहुंचता है, जिसमें वह रखा होता है।’ मिश्रा जी ने कहा किन्तु उनकी बात रंजीत के अलावा शायद किसी ने नहीं सुनी थी। रंजीत एक बार फिर करन की ओर बढ़ा किन्तु सुमित और चित्रा ने यह सोच कर कि वह करन को पीटने पर उतारू था, रंजीत को धक्का देकर दूर रखना चाहा। 

‘सौरी करन, ये तुम्हारा साला पर्सनल मामला है, भैन्चो, मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था, आई एम सौरी,’ रंजीत ने माफ़ी मांगते हुए अपना हाथ करन की तरफ़ बढ़ाया।

थैंक यू, रंजीत भाई, आई एम श्योर, करन का भी ऐसा कोई इरादा नहीं था;’ सुमित ने कहा, करन अब भी अपने आपे में नहीं था।

‘बड़े भाई, पार्टियों में तो ऐसा होता ही है। लेट अस शेक हैंड्स ओवर दिस,’ गिरगिट ने भी अपना हाथ बढ़ाते हुए कहा। गिरगिट को नज़रन्दाज़ करते हुए, सुमित करन को धकेलता हुआ अन्दर ले गया और रंजीत कन्ज़र्वेटरी की ओर चल दिया।

‘लाहौलविलाकुव्वत। ऐसी भी क्या बेरुख़ी? माफ़ी ही तो मांग रहे थे। लगता है कि करन की तबियत आज कुछ ज़्यादा नासाज़ है,’

‘ऐ मैं तोसे कऊँ, आपा, म्हारे बेटा-बहु की सादी की ऐनीबरसरी है, बजाय नाचने गाने के लोग कम्मख़त सराब पी-पी के गालियाँ दे रहे हैं,’

‘आप बिलकुल ठीक कह रही हैं, जिया। हम सब को मिलकर मकरंद और मीता की दीर्घायू के लिए कामना करनी चाहिए,’ चेहरे पर भक्ति भाव लिए मोहन लौटे।

‘जिया, आप हमें मरा कीर्तन करने का आदेश दें और फिर देखें। सारे मेहमान मरे झूमने न लगें तो…,’

‘ऐ मैं तोसे कऊँ, मोइनी, पैले जरा गणेस जी मना लीजो,’ जिया बोलीं।

‘मिक, आप अब तक यहीं खड़े हैं? मरा ढोलक बाजा तो निकाल कर लाइए, राजेश, राजीव, ज़रा मिक की मरी सहायता करें,’ मोहिनी ने दोनों हाथ हवा में नचाते हुए आज्ञा दी; इस वक्त मीता किसी भी बात का विरोध करने की स्थिति में नहीं थी

मोहिनी अभी हारमोनियम के कान ऐंठ ही रही थी कि ढोलक पर थाप देते हुए मोहन ने झटपट गणेश वंदना आरम्भ कर दी कि कहीं मीता उन्हें फिर न रोक दे; गिरगिट ने चिमटे को सिर के ऊपर उठा कर बजाना शुरू किया और मोहिनी की उंगलियाँ हारमोनियम पर थिरकने लगीं। जिया बेताली तालियाँ बजाते हुए मेहमानों को उकसाने लगीं कि वे भी तालियाँ बजाएं और मोहन द्वारा गाई हुई पंक्ति को दोहराएं। साज़ और आवाज़ में कोई तालमेल नहीं था किन्तु मोहन पत्नी की ओर यदा-कदा देख कर ‘बहुत अच्छे’ कहते हुए मुस्कुरा उठते थे।

आपा समेत बहुत से मेहमान इधर-उधर खिसक लिए, उन्हें तो इस वक्त सिर्फ एक ही भजन याद आ रहा था, ‘भूखे भजन न होत गोपाला, ये लो अपनी कंठी माला,’ क्योंकि उनके पेटों में चूहे कूद रहे थे, भोजन का कहीं नामों-निशान न था और मीता नदारद थी।

तभी वहाँ वेनू सापलू और बसंत कोडनानी प्रकट हुए। मकरंद  को एक कोने में ले जाकर सापलू ने चारों तरफ़ एक ख़ूफ़िया नज़र घुमाई। सापलू के सेकण्ड इन कमांड, बसंत कोडनानी, ने भी बड़ी बारीकी से माहौल का जायज़ा लिया और फिर सापलू को ‘ऑल क्लियर’ का इशारा देते हुए वह चौकन्ना सा खड़ा हो गया, ताकि वे सब मेहमान, जो उनकी बातें सुनने के लिए बेताब थे, सापलू और मकरंद के अधिक क़रीब न जा पहुंचें।

‘इज़ देयर ए डीले इन सर्विंग दि लंच? ‘सर इज़ गोइंग टू लीव इन ए शॉर्ट वाइल।’ वेनू सापलू ने कंधे सिकोड़े और पैंट की ज़िप पर अपने हाथ रखते हुए सिर झुका कर मैक के कान में फुसफुसाया।

‘सर, खाने में अबी कितनी देर है?’ मकरंद को बौखलाया हुआ देख, बसंत ने सापलू का प्रश्न दोहराया। मकरंद मौके की नज़ाकत को समझता था किन्तु इन्डियन हाई कमीशन के अधिकारियों को जवाब देना एक बड़ी ज़िम्मेदारी की बात थी; हाई-कमान से पूछे बिना वह उन्हें क्या जवाब देता?

चहुँ ओर कुछ ऐसा सन्नाटा व्याप्त था कि सुई भी गिरे तो उसकी गूँज सुनाई दे। सापलू, बसंत और मेहमानों की नज़रें पशोपश में पड़े मकरंद के चेहरे पर टिकी थीं।

सौभाग्य से, मीता ठीक उसी वक्त वहाँ प्रकट हुई। मैक ने एक लम्बी सांस खींची; एक बड़ा ख़तरा टल चुका था।

‘नो सर, हमारी तरफ़ से कोई डीले नहीं है, सर, आई विल गेट द फ़ूड सर्व्ड विदिन नो टाइम, सर।’ मकरंद को अपने पीछे धकेलते हुए मीता ने आगे की कार्यवाही अपने सशक्त हाथों में सम्भाल ली।

वेनू के ‘सर’ की संक्रामक छूत से पीड़ित, मीता ने गोपनीयता को बरकरार रखते हुए मैक डार्लिंग के कान में कुछ खुसपुस की, जिसकी वजह से मकरंद की झेंप दुगुनी बढ़ गयी; वह दो क़दम आगे बढ़ाते तो दो पीछे।

‘मैक डार्लिंग, यू नीड नॉट वरी, लीव इट टू मी, मैं सब संभाल लूंगी,’ मीता ने मैक को झाड़-पोंछ कर वापिस ख़ूफ़िया विभाग के साथ हेडक्वाटर की ओर रवाना कर दिया और खुद ‘लूसी’ और ‘प्रिया’ चिल्लाती हुई रसोई की तरफ़ दौड़ी।

‘शायद भारत पर पाकिस्तान या चीन ने आक्रमण कर दिया है,’ हबड़-दबड़ में गिरगिट चिमटा हाथों में उठाए वहाँ चला आया था।

‘लाहौलविलाकुव्वत, क्या नाम है आपका? ऐसी गैरज़िम्मेदारान बात कैसे कह दी आपने?’

‘मुझे तो लगता है के कोई इन्डियन नेता-शेता मर-मरा गया है,’ घड़ियाल मातमी अंदाज़ में बोला।

‘अरे नहीं, ऐसा कुछ होता न तो ये लोग कब के भाग लिए होते,’

‘बिलकुल, देश पर संकट हो तो कोई लंच के लिए थोड़े ही रुकेगा,’

‘वार-शार की बात सुनके मीता टीवी शीवी खोलने दौड़ती; रसोई की तरफ़ थोड़े ही न भागती?’

सुराग इकट्ठा करने के लिए महिलाएं रसोई के और मर्द मोहन के आसपास इकट्ठे होने लगे; राजीव और मीता के सिवा, किसी का भी रसोई में प्रवेश अवैध था। मीता बाहर निकले तो उससे पूछा जाए कि माजरा क्या था।

‘कुछ न कुछ तो मरा ज़रूर हुआ है,’ हारमोनियम को अकस्मात जोर से बंद करते हुए मोहिनी उठ खड़ी हुई; कहीं यह न हो कि वे भजन-कीर्तन करते रह जाएं और उधर एक बड़ा काण्ड घट जाए। गिरगिट, जो पता लगाने गया था, अब तक नहीं लौटा था; एक आँख बंद किए मोहन बेमन से गणेश वंदना गा रहे थे। सोमा की मान और अम्मा के साथ जिया भी शर्मा-शर्मी में उनके पास बैठी थीं।

‘ऐ मैं तो से कऊं, मोन, लोग काय को बवाल मचा रए हैं? बजन-कीर्तन में एक छिन को बी मन नाय लगे इनका,’ जिया से आखिर नहीं रहा गया।

‘लोगों को तो बस एक बहाना चाहिए, जिया,’ मोहन भी इसी ताक में थे कि जिया और अम्मा उठें; बगैर पत्नी के उनका मन यूं भी नहीं लग रहा था।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, मोन, इण्डिया पाकिस्तान में कईं लड़ाई तो नाय सुरु हो गयी?’ जिया को कुछ ऐसा ही सुनाई दिया था।

ज़मीन पर बाजे-ढोलक और मंजीरों के साथ अम्मा उपेक्षित सी बैठी रह गईं; जिनकी तबियत यूं भी नासाज़ थी; इस सर्कस से उन्हें कब और कैसे निजात मिलेगी?

‘मैं तोसे कऊं, राजेस, क्या हुआ? जब तक जिया और मोहन उठ कर घटना-स्थल पर पहुंचते, मेहमान तितर-बितर हो चुके थे। जिया और मोहन को असमंजस में छोड़, कंधे उचकाता हुआ गिरगिट बिना कुछ कहे, मर्दों में जा मिला।

उधर, रसोई में अवन, ग्रिल, माइक्रो-अवन और गैस के सभी चूल्हे एक साथ औन कर दिए गए। भोजन की खुश्बू पूरे घर में सीलन सी फैलने लगी तो मेहमानों ने भगवान का लाख-लाख शुक्र मनाया। कल सोमवार है, कब खाएंगे, कब केक कटेगा और कब वे वापिस घर पहुंचेंगे?

‘लोग भूल जाते हैं कि भगवान ने संडे आराम के लिए बनाया है,’घड़ियाल का रोना शुरू हुआ ही था कि मोहनी उसके आगे आ खड़ी हुई।

‘मरे बोर हुए हम और आप, वी.आई.पीज़ के मरे मनोरंजन के लिए तो मरी दो-दो मेनकाएँ हाज़िर हैं। अपने सिंघासन पर बैठे-बैठे ही उन्हें मरी सभी सुविधाएं भी मिल रही हैं।’ मोहिनी का इशारा मेनका और मंजूषा की और था जो इस वक्त जोशी-सर के दाईं और बाईं ओर बैठी उनसे ठिठोली कर रही थीं।

‘मीता ने पार्टी पर इतना पैसा खर्च किया है तो एक डी.जे. भी हायर कर लेती, यंग लोग नाच कूद लेते और ओल्ड पीपल गाने सुन कर मन बहला लेते,’ पड़ोसन सोमा बोली।

‘भई, डी.जे. बुलाने के लिए कलेजा चाहिए, अल्हमदुलिल्लाह, आयशा और रिचर्ड  के ब्याह में हमने एक घंटे के हज़ार पौंड्स दिए थे…’शमीम ने बताया।

तभी रसोई से हांफती हुई मीता निकली और सीधे जोशी-सर की ओर बढ़ी।

‘क्या हुआ मीता? कुछ हैल्प चाहिए तो हमें बताओ,’ मीता का रास्ता रोक कर कई महिला-मेहमानों ने एक साथ पेशकश की।

‘नो, थैंक यू, लेडीज़, बस खाना गर्म करवा रही हूँ। जोशी-सर को किसी ज़रूरी काम से कहीं जाना है, इसलिए पहले उन्हें सर्व कर रहे हैं। आई होप यू वोंट माइंड। आप सब तो घर के ही लोग हैं न,’ सब मेहमानों के मुंह लटक गए।

‘खोदा पहाड़ और निकली चुहिया,’

‘मरी जब तक हमारी बारी आएगी, लंच मरा ठंडा हो चुका होगा।’

‘दोपहर के भोजन को अँगरेज़ शायद इसीलिए डिनर कहते हैं।’

भीड़ के अनन्य प्रश्नों का जवाब देती हुई बेहाल मीता जोशी-सर के पास पहुँची।

‘सर, आपके लिए मैंने स्पेशियलि खाना गर्म करवा दिया है, फ़ूड इज़ औन इटस वे, एज़ औफ़ नाऊ, सर,’

थैंक यू, मिस…,’ दो अप्सराओं के बीच बैठे जोशी सर को इस वक्त मीता का सर-नेम तक याद नहीं था।

‘मीता जी, हमारी ज़रुरत हो तो बता दीजिएगा प्लीज़,’ मेनका और मंजूषा दोनों एक साथ खड़ी हो गईं।

‘औफ़ कोर्स बट एवरीथिंग ईज़ टेकन केयर औफ़,’

‘मीता डार्लिंग, इनकी ह..ह..हेल्प ले लो न। अ..अ..आप अ..अ..अकेले क..क..क्या क..क..क्या क..क…,’  मोहन अपनी अति-व्यस्तपत्नी के कान में फुसफुसाए।

‘मैक डार्लिंग, वी शुड थैन्क अवर लक्की स्टार, इन दोनों की वजह से ही जोशी-सर एंड पार्टी शायद यहाँ अब तक टिकी है। आपके रंजीत को तो किसी की फ़िक्र ही नहीं है और न ही किसी के लिए फ़ुर्सत। इससे तो बस गालियाँ बकवा लो…’  मीता बड़बड़ाती और हांफती हुई वापिस रसोई में पहुँची।

कुछ ही देर में निम्न और मध्यवर्गीय मेहमानों ने देखा कि गर्व से अपने सिर उठाए कुछ लोग भोजन के गर्मा-गर्म डोंगे उठाए कन्ज़र्वेटरी की तरफ़ भागे चले जा रहे थे जैसे कि इस महान कार्य के लिए उन्हीं का चुनाव किया गया था। मोहन, राजीव और मकरंद मिनिस्टर एंड पार्टी के सम्मुख हनुमान, अंगद और बाली की तरह हाथ बांधे और सिर झुकाए खड़े थे। मंजूषा और मेनका में होड़ लगी थी कि जोशी-सर की प्लेट में कौन पहले भोजन परोसता है; एक चिकन-करी परोसती तो दूसरी तड़का-दाल। उनका बस चलता तो वे कौर बनाकर जोशी-सर मुंह में भी डाल देतीं।

‘मंजूषा, सर की प्लेट में रायता डालोगी तो मेस हो जाएगा नी,’ मेनका ने मंजूषा की चम्मच-धारी ख़ूबसूरत उँगलियों को एक तरफ़ हटाते हुए बड़े रोष से बरजा और इशारे से बसंत को रसोई से एक छोटी कटोरी लाने की आज्ञा दी। मंजूषा का मुंह छोटा सा हो गया। मेनका ने सोचा था कि चिकन और मीट-करी देख कर मंजूषा स्वयं पीछे हट जाएगी।

‘मंजूषा, कम एंड सिट हियर,’ जोशी-सर ने अपने पास रखी कुर्सी की सीट को थपथपाते हुए कहा।

‘थैंक यू, सर,’ कहते हुए मंजूषा जोशी-सर के प्रति सदैव के लिए अनुग्रहित होकर उनके पास बैठ गयी।

‘मंजूषा को दाना डाल रहे हैं जोशी-सर,’ नैन्सी पति के कान में फुसफुसाई।

‘मंजूषा से उन्हें कुछ नहीं मिलने वाला, काम तो उनके मेनका ही आएगी,’ नरेश बोले।

‘बड़े भाई, आप ठीक कह रहे हैं, मेनका तो असली घी में छुंकी-छुंकाई घर की दाल है, जोशी-सर को छोड़ कर वह कहाँ जाएगी?’ गिरगिट फुसफुसाया; नैन्सी और नरेश सकपका कर चुप हो गए, वे नहीं जानते थे कि कान लगाए गिरगिट उनकी बातें सुन रहा था।

‘आप सब लोग क्यों खड़े हैं, प्लीज़ बैठ जाइए,’ जोशी-सर ने अपने पीछे खड़े लोगों को जैसे अभय दान दे दिया हो। जोशी-सर के आसपास वाली कुर्सियों पर बैठने के लिए ऐसी होड़ लगी कि म्यूज़िकल-चेयर्स वाला दृश्य उपस्थित हो गया। मेनका और बसंत खड़े के खड़े रह गए पर किसी को उनकी परवाह नहीं थी सिवा राजीव के, जिसने खड़े होकर बड़े आदर से मेनका को अपनी सीट दे दी।

‘आप मेरे साथ आइए,’ कहता हुआ राजीव बसंत को लेकर सीधा इला के पास पहुंचा, वह जानता था कि बसंत जैसे कनिष्क अधिकारी भी तवज्जो की तमन्ना रखते हैं। बसंत का इला से परिचय करवाने के बाद, उसने उन्हें कोने में रखी आरामदायक कुर्सी पर बैठा दिया और स्वयं प्रिया की मदद से सीधे पतीलों में से तीन प्लेट्स में गरमा-गरम भोजन लगवा कर ले आया। मंजूषा से मात खाई हुई हताश मेनका भी आकर इला के पास बैठ चुकी थी।

परिस्थिति को अपने अनुकूल हुआ देख राजीव खुश था; मेनका और बसंत दोनों ही पट चुके थे। करने दो मंजूषा को जोशी-सर की चमचागिरी; दफ्तर तो बाबुओं से ही चलते हैं।  बाबुओं को थोड़ी सी तवज्जो दे दी जाए तो वे हमेशा के लिए एहसानमंद हो जाते हैं; अधिकारियों का क्या, खाए-पिए और खिसके।

‘एक बड़ी कमी है इस पार्टी में, इला जी, एंटरटेनमेंट की, हम लोग तो इतने बोर हो गए थे कि फ्लैश खेलने लगे,’ बसंत शायद राजीव और इला को आश्वस्त करना चाहता था कि वह एंटी-सोशल अथवा बददिमाग़ नहीं था।

‘बसंत जी, यहाँ तो चारों तरफ़ मुफ्त का मनोरंजन हो रहा है, ज़रा ध्यान से सुनिए और गौर से देखिए,’ कहते हुए इला ने बसंत का ध्यान आपा और मोहिनी की ओर आकर्षित किया।

‘लाहौलविलाकुव्व्त, भई कोई हमारी भी ख़बर लेगा के नईं? भूख और पियास से हमारे तो होंठ सूख कर पपड़िया गए;’ आपा बोलीं।

‘आपा, मरी ऐसी बेइज्जती तो हमारी जीवन में मरी कबी नहीं हुई,’ मोहिनी बोली।

‘इस समय तो किसी रेस्टोरेंट में भी खाने को कुछ नहीं मिलेगा, लंच का कब का समय बीत चुका है और डिनर में अभी देर है,’

‘मरा गर्म तो हो ही गया है, बाक़ियों को भी मरा सर्व कर देना चाहिए,’ राजीव और इला को खाते देख बाक़ी के मेहमानों की भी भूख भड़क उठी थी।

‘या ख़ुदा! चलिए, किचन में चल कर देखते हैं कि मामला क्या है?’ आपा और मोहिनी उठकर रसोई की और चल दीं। लूसी हाथ बांधे दरवाज़े के बीचों-बीच खड़ी थी। मीता ने लूसी को ताक़ीद की थी कि राजीव और उसके अपने सिवा वह किसी और को रसोई में कदम न रखने दे।

‘वाट हैपनड, लूसी? वाए नॉट सर्विंग?’ आपा ने अपनी कमर पर हाथ रख कर लूसी से तुनक कर पूछा तो उनके झुमकों ने भी अपनी बदमज़गी ज़ाहिर की।

‘सौरी मैडम, दे आर वेटिंग फॉर दि सर्पराईज़ आइटम,’ आपा और मोहिनी ने लूसी की अगल बगल से रसोई के अन्दर झांकने की कोशिश की किन्तु वह अपनी जगह पर डटी रही। प्रिया एक कोने में दुबकी खड़ी थी कि आपा कहीं उससे न कुछ पूछ बैठें।

‘वाट सर्पराईज़ आइटम?’ मोहिनी ने पूछा तो लूसी ने कंधे उचका कर अपनी अनभिज्ञता प्रकट की। खैर, आपा और मोहनी को एक अस्त्र मिल गया था जिसके बल पर वे मेहमानों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर सकती थीं। वे मुस्कुराती हुई वापिस लौटीं तो सबकी नज़रें उन दोनों के चेहरों पर आकर टिक गईं।

‘किसी मरे ’सर्पराईज़ आइटम’ का इंतज़ार हो रहा है,’ मोहिनी ने पहल की।

‘सर्पराईज़ आइटम?’ दो शब्दों दोनों बैठकों में गूँजने लगे।

‘इंशा अल्लाह, आवाम के लिए दस्तरख़ान ‘सर्पराईज़ आइटम’ के बाद ही बिछेगा,’ बेज़ारी में आपा ने अपने चांदी के पानदान में से एक छोटा सा सरौता निकाला और छालिया पर अपना गुस्सा उतारने लगीं।

‘पर वे लोग तो खा रहे हैं,’ राजीव और इला की और इशारा करते हुए घड़ियाल रोता हुआ बोला तो मेहमानों की नज़रें एक बार फिर उनकी गरमा-गर्म प्लेटों पर जाकर ठहर गईं।

‘या इलाही ये माजरा क्या है? ये सब हमें क्यों घूर रहे हैं?’ लोगों से आँखें चुराते हुए राजीव ने इला से पूछा।

‘भूख के मारे मेहमानों के पेट में चूहे कूद रहे हैं और हम गपागप खाना खा रहे हैं, दिस इज़ नॉट फ़ेयर, राजीव,’

सौभाग्यवश, उसी वक्त वायु उधर आ निकली; लोगों के चेहरे उसकी ओर घूम गए; शायद ‘सर्पराईज़ आइटम’ के विषय में वह कुछ जानती हो।

‘कल रात मैंने भैय्या-भाभी को किसी ’सर्पराईज़ आइटम’ के बारे में बात करते सुना था। शायद वर्षा जीजी और जीजा जी ने अमेरिका से कोई तोहफ़ा भिजवाया है, वो दोनों बड़ी बेसब्री से उसी का इंतज़ार कर रहे हैं,’

‘पर वायु, उसके लिए खाना रुकवाने की क्या ज़रुरत है?’

‘हमें घर पहुँचने के लिए दो सौ माइल्स ड्राइव करनी है,’ नैन्सी ने कहा।

‘वही तो, दिन-दिन में निकल जाते तो अच्छा रहता,’ नरेश बोले।

‘नैन्सी दीदी, मुझे तो लगता है कि वर्षा जीजी और जीजा जी खुद यहाँ पहुँच कर हमें सर्पराईज़ देने वाले हैं,’ वायु से कहे बगैर रहा नहीं गया, देखा जाएगा जब मीता उसकी ख़बर लेगी।

‘यह तो भई सचमुच बड़ी हैरतअंगेज़ बात होगी। बहरहाल, अब तक तो उन्हें यहाँ पहुँच जाना चाहिए था,’

‘पार्टी खत्म होने पर पहुंचे तो सर्पराईज़ किसको देंगे?’

‘शायद उनकी फ़्लाइट लेट हो गयी हो,’ वायु को पूरा विश्वास था कि उसकी बहन और जीजा जी वहाँ बस पहुँचने ही वाले थे।

‘चलिए चलिए, खाना सर्व हो गया है, वेरी सौरी फॉर दि डीले, गाइज़,’ घंटी बजाती हुई मीता उन सब के बीच में आ खड़ी हुई किन्तु मेहमानों की आँखे अब भी दरवाज़े पर ही लगी हुई थीं।

‘खुदा ना ख़ासता, भई आपके सर्पराईज़ आइटम का क्या हुआ, मीता?’ आपा से पूछे बगैर रहा नहीं गया।

‘वाट सर्पराईज़ आइटम? जल्दी कीजिए, मुझसे कम्प्लेन मत कीजिएगा इफ़ फ़ूड गॉट कोल्ड,’ मेहमानों को चेतावनी देकर मीता ‘लूसी-लूसी’ पुकारती हुई तेज़ी से रसोई की ओर चल दी; इन लोगों को सर्पराईज़ आइटम के बारे में किसने बताया?

‘मियाँ, इसके पहले कि लोग डोंगों में परोसा गया खाना हिला-हिला कर भुर्ता बना दें, जल्दी से अपनी प्लेट लगा लीजिए,’ अपना पानदान पैक करके हसन को संभलवाते हुए आपा हसन के कान में फुसफुसाईं और जल्दी से भोज-कक्ष की ओर लपक लीं।

‘मैक डार्लिंग, हम और कितना टाइम वेस्ट कर सकते हैं? रियली, मैं तो अमेरिकन फ्लैग में लिपटे एक ह्यूज गिफ्ट-बौक्स की वेट कर रही थी; जिसे देख कर गेस्ट्स खाना-पीना भी भूल जाते,’

‘मीता ड..ड..डार्लिंग, इ..इ..इंतज़ार करने का क..क..कोई फ़ायदा नहीं है,’

‘मैक डार्लिंग, मुझे तो लग रहा है कि एक बड़े से केक में हाइड करके उन दोनों को हमारे घर में डिलिवर किया जाएगा, यू नो, जैसा कि अमेरिकन फिल्मों में होता है।’ मीता एक बार फिर उत्तेजित हो उठी कि सरप्राइज़ आइटम बस पहुँचने ही वाला था।

‘व..व..विशफुल थ..थ..थिंकिंग!’

‘मैक डार्लिंग, कैसी बड़ी-बड़ी बातें बना रही थी वर्षा कि उनकी गिफ्ट मिलेगी तो, हम दोनों स्पेल-बाउंड रह जाएंगे, अरे, एक गुलदस्ता ही ऑर्डर कर देती, हाउ डिसएपोइंटिंग…’

‘यू आर र..र..राईट, मीता डार्लिंग, उसके च..च..चक्कर में तुमने डी..डी..डीजे का भी इ..इ..इंतजाम नहीं किया,’ मीता द्वारा अपने परिवार की भद्द उड़वाने से बचने के लिए मकरंद ने जल्दी से अपनी बहन का दोष स्वीकार कर लिया और ‘क..क..कमिंग जिया’ कहते हुए माँ की ओर लपक लिया।   

‘ऐ मैं तोसे कऊं, पुस्पा, हमसे तो मीता ने नाय बताई के बरसा और जमाई आने वाले हैं,’ जिया कलपने लगीं कि सारे मेहमान बेटी-दामाद के अमेरिका से आने की बातें कर रहे थे और उन्हें इस बात की कानों-कान खबर तक न हुई।

‘जिया, जो है सो है, तुमें बता देते तो फेर सपराईज काय का रै जाता?’ पुष्पा मौसी ने उन्हें समझाया।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, पुस्पा, नेक रग्गु जी को बी ज्योने को न्योत लीजो, कईं सोचें के हम बिना उनें पूछे खाने बैठ गए,’

‘जो है सो है जिया, तुमारे रग्गु जी और मैंनू हमरा ऐडिया (आइडिया) ले उड़ने का पिलैन बना रऐ हैं,’

‘मैं तोसे कऊं पुस्पा, रग्गु ऐसे नाय हैं,’ न जाने क्यों जिया का दिल एकाएक बैठ गया; लगा कि तबीयत कुछ ठीक नहीं थी।

‘जो है सो है, तुम फिकर नाय करो, मीता को पता लगेगा न तो वो उन तीनों की खाट खड़ी कर देगी,’ जिया के चेहरे का रंग उतरता हुआ देख पुष्पा मौसी ने उन्हें दिलासा दी।

‘ऐ मैं तोसे कऊं पुस्पा, म्हारे घुटने अब जवाब देने ई वाले हैं।’

‘जो है सो है, जिया, तुम अम्मा के साथै आराम से बैठो, प्लेट लगाकर हम यईं लिए आते हैं,’ कहते हुए पुष्पा मौसी और सोमा की माँ उठकर चल दीं।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, पुसपा, नेक सुन तो जरा, म्हारे दई में नेक सौंठ अच्छे से डालियो,’

‘जो है सो है, जिया, चटोरी तो तुम एक नंबर की हो, हो..हो..हो,’

‘अरे नईं, पुसपा, पैखाना घनी मुस्किल से आवे है, बकरी की मेंगनी जइसा सखत, दई-सोंठ से सायद पेट मुलैम हुई जावे,’

‘जो है सो है, जिया, म्हारा तो रोज सुबै गऊ-माता के गोबर की नाईं थप्प सा गिर जाय है,’

‘ऐ मैं तोसे कऊं, पुसपा, तू तो घनी लक्की है री। सीने में जलन ने म्हारा तो नाक में दम कर रखा है। ये आपा फेर कईं गायब हो गईं, उने बी नेक यां भेज दीजो,’

‘जो है सो है जिया, वो तो अब सैरा और हसन का रिसता जोड़ के ई आवेंगी,’ पुष्पा मौसी पलटी ही थीं कि गिरगिट उनसे आ टकराया; जो अपनी प्लेट को भोजन से लबालब भर कर खाने की मेज़ पर पहुँचने की जल्दी में था ताकि आराम से बैठ कर खा सके। उसकी प्लेट में से मीट का शोरबा छलक कर बैठक की कार्पेट पर आ गिरा। गिरगिट ने घबरा कर अपने जूते से उसे पोंछना चाहा तो शोरबे के लाल-पीले धब्बे कुछ और फ़ैल गए। इसके पहले कि वह कहीं छिपने-छिपाने की सोचता, अपनी कमर पर दोनों हाथ रखे मीता उसके सामने स्पिट-इंस्पेक्टर की तरह खड़ी थी; उसका गुस्सा सातवाँ आसमान को छू रहा था।

‘राजेश, वाट ऐ मैस यू हैव मेड? इतनी बड़ी डाइनिंग-टेबल बिछी है, वहाँ बैठ कर आराम से खाते,…प्लीज़ यहाँ से हटो,’ क्रीम कार्पेट पर शोरबे के धब्बे ऐसे लग रहे थे कि जैसे किसी का खून बिखरा पड़ा हो; मीता का दिल बैठ गया।

घबराया हुआ गिरगिट मुंह लटकाए वहां से हट कर घड़ियाल के पास जा बैठा, ऐसी स्थिति में उसे किसी और से सहानुभूति की आशा भी नहीं थी।

‘डोंट वरी, मीता ड..ड..डार्लिंग, ल..ल..लम्बी ल..ल..लम्बी सांसे लो, मुझे देखो, ऐसे,’ मकरंद अपनी सांस खींच कर मीता को दिखाने लगे कि जैसे वह बच्चा हो। साँसें खींचते हुए भी मीता की दृष्टि धब्बों से नहीं हट पा रही थी।

‘भाभी, पार्टीज़ में यह सब तो चलता ही रहता है, कहीं आपका ब्लड-प्रेशर न बढ़ जाए, जान बड़ी है कि कार्पेट?’ वायु ने मीता की पीठ सहलाते हुए कहा।

‘फ़िटेड-कार्पेटस का मरा किया भी क्या जाए? मैंने तो इसीलिए अपने घर में मरी गहरे पर्पल रंग की कार्पेटस लगवा लीं हैं, उस पर मरी गंदगी नज़र ही नहीं आती।’

‘मीता ड..ड..डार्लिंग, क..क..कल ही इसे म..म..मैं प..प..प्रोफेशनली क..क..क्लीन क..क..करवा लूंगा,’ मीता को आलिंगन में लिए, उसका माथा और होंठ चूमते हुए, मकरंद उसे ढाढस बंधा रहा था।

‘लाहौलविलाकुव्वत, हमारे ज़माने में मियाँ-बीवी का भरी महफ़िल में आपस में गुफ्तगू करना भी बुज़ुर्गों को गवारा नहीं था,’

‘ऐ मैं तोसे कऊं पुसपा, कलजुग है कलजुग, ऐसन कौन पहाड़ इनके सरों पर टूट गयो के भरी सबा में मियाँ-बीवी लिपट रऐ हैं?’ जिया और आपा मकरंद और मीता के इस खुले प्रेम-प्रदर्शन पर छी छी फू फू करने लगीं। पुष्पा मौसी का दिल अब तक धड़क रहा था कि कहीं गिरगिट उन्हें दोषी ठहरा देता तो उनका क्या होता? जिया और अम्मा के लिए भोजन परोस कर लाने के लिए वह हिम्मत जुटा रही थीं।

‘कार्पेट साफ़ हो न हो, पर लोगों को भी तो कुछ तमीज़ होनी चाहिए,’

‘भई कोई अपनी प्लेट इतनी भर ले तो यही होगा। दोबारा ले लो, तिबारा ले लो, खाना कहीं भागा तो नहीं जा रहा,’

‘जितना यह खाता है न, नैन्सी, उतने में तो अफ्रीका के एक पूरे गाँव का पेट भर जाए,’  

रसोई के तौलियों से लैस लूसी आई और शोरबे को सोखने का प्रयत्न करने लगी किन्तु धब्बे थे कि पिनोकियो की नाक की तरह बढ़ते ही चले जा रहे थे। धब्बों के इर्द-गिर्द खड़े होकर सुझाव पेश करते हुए मेहमानों ने अपना भोजन जारी रखा।

‘मैक, आपके घर में कार्पेट-क्लीनर तो होगा ही, लेट अस ट्राई दैट,’ राजीव बोला।

‘कार्पेट-क्लीनर्स तो बस नाम के होते हैं, ऐसे धब्बे पूरी तरह से कभी नहीं जाते,’ मोहन ने राय दी।

तभी रंजीत शराब की एक पूरी बोतल उठाए वहाँ चला आया।

‘वाट औन द अर्थ आर यू डूइंग, मिस्टर रंजीत?’ बौखलाई हुई मीता के शोर मचाने के बावजूद रंजीत ने, बिना कोई तफ़सील दिए, पूरी बोतल कार्पेट पर उड़ेल दी और लूसी के हाथ से साफ़ तौलिए लेकर उसने धब्बों को अच्छे से ढक दिया।

‘लूसी, नौउ जम्प औन द टॉवल्स।’ रंजीत ने लूसी को आज्ञा दी। लूसी ने एक प्रश्नवाचक दृष्टि मीता पर डाली कि उसे कूदना चाहिए अथवा नहीं। लूसी पर अपनी बात का असर न होते देख रंजीत कार्पेट पर स्वयं कूदने लगा।

मीता अपना माथा पीट रही थी; कार्पेट के साथ-साथ शराब की एक बोतल भी बर्बाद हो गयी थी।

‘ऐ मैं तो से कऊं, मकरंद, अपनी लुगाई को मनै कर, दोनों बखत मिलते समैं माथा पीटना बौत बुरा सगुन होता है,’ जिया कलपने लगीं।

‘जिया, जो है सो है, तुमसे कित्ती बार कहा है के बेटा-बहु के बीच में नाय बोला करो;’ पुष्पा मौसी ने जिया का कंधा झकझोरते हुए उन्हें चुप रहने की ताकीद की।

‘खुदा न खास्ता, ये रंजीत पर अचानक क्या भूत सवार हुआ?’

‘सेनेका का कहना है कि हर बड़ी शख़्सियत में दीवानगी का एक हल्का सा पुट होता है,’ मिश्रा ने यह कहते हुए उन्होंने अपने मोबाइल पर रेडियो औन कर दिया।

‘हंगामा है क्या बरपा थोड़ी सी जो पी ली है,’ सनराइज़ पर ग़ुलाम अली की ग़ज़ल सुनाई दी। कुछ एक मिनट के लिए मेहमान मौसीक़ी में डूब रहे किन्तु ग़ज़ल के ख़त्म होते ही उनकी चपड़-चपड़ एक बार फिर शुरू हो गई।

‘साली शराब बड़े काम की चीज़ है, भैन्चो धब्बों तक को साफ़ कर देती है,’ रंजीत कूद-फांद कर वापिस बार की ओर जाता हुआ दिखाई दिया। तौलिए हटाकर धब्बों की मौजूदा हालत पर तप्सरा करने के लिए कोई भी तैयार नहीं था।

‘भई, हमारे ख़याल से तो शोरबे के धब्बे नीबू से साफ़ हो जाते हैं,’ आपा ने अपनी राय दी।

‘मरा नमक डाल कर क्यों नहीं देख लेते? शायद वह सोख ले मरे घी को,’

मीता का ब्लड-प्रेशर बढ़ गया था; मकरंद एक समाचारपत्र हाथ में लिए पत्नी के चेहरे पर हवा कर रहे थे।

‘गौर-तलब बात तो यह है कि इतनी व्हिस्की पीने के बाद भी रंजीत भाई का दिमाग़ बिलकुल दुरुस्त है,’ हसन ने अपने बौस की तारीफ़ की तो आपा भड़क उठीं।

‘लाहौलविलाकुव्वत, आप कहना क्या चाह रहे हैं मियाँ? कोई कसर बाकी रह गयी हो तो, जाइए, चढ़ा लीजिए और दो-चार पैमाने,’ आपा ने हसन को शराब पीते हुए कनखियों से देख लिया था।

‘कहते हैं कि शराब आदमी के दिमाग़ को शार्प कर देती है,’ सुमित ने कहा।

‘आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं, वर्मा साहब, बड़े-बड़े आर्टिस्ट्स शराब पी कर ही पेंट करते हैं,

‘मैं त्वानुं दस्सां, आपना वो साड्डा पंजाबी सिंगर है न, की नौं है औद्दा? बिना शराब पिए ओ गाईयो इ नईं सकदा,’ अमृत बोली।

‘आसा सिंह मस्ताना,’ कुलदीप ने गायक का नाम सुझाया।

‘शराब में कुछ तो होता ही होगा, नहीं तो इतने सारे आर्टिस्टस शराब पीकर क्यों पेंट करते या गाते-बजाते?’

‘सीधी सी बात है, शराब पीकर आदमी एक ऐसी दुनिया में पहुँच जाता है जहां सिर्फ वह होता है और उसका आर्ट,’ नरेश बोले।

‘वाह, क्या बात कही है आपने, जीजा जी, दिल खुश कर दिया,’

‘मैं आपको सैंकड़ों अच्छे आर्टिस्ट्स के नाम गिनवा सकती हूँ, जो शुद्ध शाकाहारी हैं, और शराब को हाथ भी नहीं लगाते,’ मंजूषा बोली।

‘हम तो कहते हैं कि शराब पीना कुफ़्र है कुफ़्र,’ आपा ने मंजूषा से सहमति जताई तो मेहमान हैरानी से दोनों को देखने लगे।

‘बड़े भाई, आपको भाभी जी का ब्लड-प्रेशर चेक करवा लेना चाहिए,’ मुंह लटकाए गिरगिट ने मकरंद को सलाह दी, प्लेट अब भी उसके हाथ में थी।

‘मीता डार्लिंग, जी.पी. को फ़..फ़ोन ल..ल..लगाऊँ क्या?’ मैक ने अपने कंधे पर टिके मीता के सिर को थोड़ा सा ऊपर उठाते हुए पूछा। मीता ने कुनमुना कर मना कर दिया।

‘भई, हज़बैंड हो तो मलिक साहब जैसा, मीता को गर्म-गर्म चपातियां तक बना कर खिलाते हैं। हमारे इनसे तो एक कप चाय की भी उम्मीद नहीं की जा सकती,’

‘ये टूट-फूट और शापिंग में तो हैल्प कर देते हैं पर किचन में कदम रखने को भी तैयार नहीं होते,’ वायु ने सफ़ाई दी।

‘यू आर वेरी लक्की, वायु, साफ़-सफ़ाई करना तो बहुत दूर की बात है, नरेश तो शौप्पिंग के लिए भी झिक-झिक करते हैं,’ नैन्सी बोली।

‘अँगरेज़ मर्दों को देखो, बेबी की नैप्पी बदलने से लेकर घास काटने तक सब काम करने को राज़ी रहते हैं और हमारे इंडियन हज़बैंड्स…’

‘मोहतरमा, आप हमारा फ़साना सुनेगी तो दंग रह जाएँगी। एक दफ़ा हमने शौपिंग डिक्की में रखी ही थी कि हमारे मियाँ ने, बिना देखे कि हम कार में आकर बैठे भी थे के नहीं, कार चला दी,’ शमीम ने कहा तो सब हंसने लगे।

‘लाहौलविलाकुव्वत, फिर क्या हुआ, शमीम बी?’

‘होता क्या, आपा? मोबाइल पर याद कराने की कोशिश भी नाकाम गयी, ड्राइव करते वक्त फ़ोन उठाना नामुमकिन था। झक मार कर घर पर पैग़ाम छोड़ा। जब घर पहुंचे तो आयशा ने डांट-डपट कर इन्हें हमें लेने वापिस भेजा,’

‘शमीम बाजी, तुम्हारी जगह मैं होती न तो इन्हें मुर्गा बनाकर घर के बाहर बैठा देती।’

‘रोज़ की इसी चखचख से बचने के लिए हमने इंशा अल्लाह ड्राइविंग ही सीख ली,’

‘लाहौलविलाकुव्वत, आपके मियाँ तो शौप्पिंग और ड्राइविंग दोनों से निजात पा गए,’

‘आपा, ये तो घर-घर की कहानी है और इसकी मेन वजह है लड़के-लड़कियों में पैरेंट्स का डिस्क्रीमेशन।’

‘फ़ैमिली के मखौल के डर से भी कई मर्द घर के काम में हाथ नहीं बंटाते,’

‘बिलकुल, हमारी शादी को मरा एक ही हफ़्ता हुआ था, मैं मरी मठरियां बना रही थी के मिक ने मेरे हाथ से मरी पौनी ली और लगे मठरियां तलने। मेरी जिठानी ने मरा ऐसा शोर मचाया कि मरा पूछो नहीं, ‘अरे देखो, लाला जी मरी मठरियां तल रहे हैं। माँ-भौजाई के साथ भी आकर खड़े हो जाया करो मरा कभी-कभी,’ ये ऐसे चंपत हुए के जैसे गधे के सर से मरे सींग,’

‘माई इन-लौज़ तो इन्हें जोरू का गुलाम कहा करते हैं बट वी डोंट केयर, क्यों मैक डार्लिंग?’ अपना सिर दबाते हुए मीता ने कहा और मकरंद ने झेंपते हुए हामी भरी।

‘मीता, बिन्दर दे डैडी वी कदै-कदै माड़ा मोटा कम कर दिंदे हन पर मैं तवानु की दस्सां..,’

‘क्या कह रही हो, अमृत, वो तो पूरा पूरा दिन टिल पर खड़े रहते हैं,’

‘तुस्सी मैन्नु दस्सो, टिल ते ख्लौते रैना केडा औखा हुन्दा ऐ? मेन जाब तां हुन्दी आ कस्टमरां नूं सरब (सर्व) करना,’

‘चाहे इंडियंस हो या गोरे, हाथ पाँव चलाने के सारे काम लेडीज़ के ही ज़िम्मे आते हैं,’ बुलबुल ने कहा।

‘ये रवायतें तो बाबा आदम के ज़माने से चली आ रही हैं, मर्द कमायें और बीवियां चौका-चुल्हा संभालें,’

‘आपा, आपकी इन तमाम रवायतों को क़रार दे देना चाहिए क्योंकि इस ज़माने में औरतें भी काम पर जाने लगी हैं,’ आयशा का ज़बान लड़ाना आपा को एक आँख नहीं सुहाया।

‘इसी वजह से आजकल ज़्यादातर मर्द बेकार बैठे हैं और लुगाईयां मरी इस्कर्ट-ब्लाउज़ पहने दफ्तर भागी जा रही हैं,’

‘मैं तोसे कहूं, अब तो साम को मर्द चौके में न घुसै तो कुछ पकै ई नईं, कित्ता ई झींक लो,’ जिया ने अपनी बहु पर भड़ास निकाली; जो रसोई में झाँक कर भी राज़ी नहीं थी।

‘बहुत मज़े कर लिए मर्दों ने, जिया, अब हमारी बारी है,’ मंजूषा ने कहा।

‘मैं तोसे कऊं, मंजूसा, इंडिया में तेरी सादी हुई होती तो…’

‘अभी हम दिल्ली होकर आ रहे हैं, जिया, वहां भी सभी मर्द घर के काम में हाथ बंटाने लगे हैं,’

‘नरेश तो मेरी एक नहीं सुनते…,’ नैन्सी इधर-उधर देखते हुए बोली कि कहीं नरेश सुन न रहे हों।

‘नैन्सी दीदी, इसका एक बड़ा अच्छा इलाज है मेरे पास, स्टार्ट टॉकिंग इन योर स्लीप, देखिएगा, वह आपकी हर बात बड़े ग़ौर से सुनेंगे।’ औरतों के बीच में बैठते हुए प्रसन्न-वदन गिरगिट बोला, ऐसा लग रहा था कि वह हाल ही में घटी दुर्घटना से पूरी तरह उबर चुका था।

‘हमारे ये तो लेटते ही खुर्राटे भरने लगते हैं, दिन भर बौस की चख़चख़ सुनो और रात को इनका शोर…’ मीता की दाईं तरफ़ रहने वाली पड़ोसन सलोनी बोली।

‘सोर्ट ईट आउट, सलोनी, ऐ.एस.ऐ.पी, ऐसे तुम कब तक कोप करोगी?’ मीता ने हिदायत दी

‘मीता, यही तो प्रॉब्लम है, न जौब छोड़ सकती हूँ, न हज़बैंड,’ सलोनी की समस्या सुलझने वाली नहीं थी, सब ख़ामोश होकर सोचने लगे; कुछ उठ कर वहाँ से चलते बने।

‘बौस से तो आपको ही निबटना होगा पर मियाँ बीबी स्कूटर के दो पहिए हैं, साथ-साथ नहीं चले तो जीवन बेकार है,’

‘बिलकुल ठीक कहा, राजेश, बीवी रोटी बेले तो मियाँ को सेंकना चाहिए,’

‘लाहौलविलाकुव्वत, इन जैसों की वजह ही से तो बीवियों ने आसमान सिर पर उठा रखा है। यही हालात रहे तो हसन मियां, आपको भी कहीं बर्तन न मांजने पड़ जाएं,’

‘हमारे टयाल साहब के मन में तो, आपा, मरा यह ख़याल भी नहीं आता के ये काम मरा औरतों का है या मर्दों का,’

‘एक आदर्श गृहस्थी का आधार है पति-पत्नी के बीच उपयुक्त तारत्मय…’ मिश्रा जी उदाहरण देने जा ही रहे थे कि जिया ने उन्हें टोक दिया।

‘अरे छोड़ो कम्मखत तातरमय को, मिसरा जी, मैं तो कऊं हूँ के जिसका काम उसी को साजे, हमें तो चौका-बासन करते मर्द लुगाई से लगे हैं,’

‘मोची या बढ़ई की बात तो हो नहीं रही, नानी, यहां तो मियाँ-बीवी की साझेदारी पर चर्चा हो रही है,’ बुलबुल ने नानी का गाल चूमते हुए लाड़ जताया।

‘ए का मैं जानूं नईं, बुलबुल?’ जिया ने भी उसे गले लगाते हुए कहा।

‘जिया, अजीज़ की दुल्हन का भी बस यही हाल था। सुबो-शाम वो चौके में आ खड़ी होतीं और डबर-डबर हमें काम करते हुए ताकतीं। सब्ज़ी काटने को कहो तो एक-एक भिंडी को वो यूं देखतीं कि जैसे उसका क़त्ल करने जा रही हों।’

‘लाहौलविलाकुव्वत, ज़रूर कोई हादसा गुज़रा होगा बेचारी पर,’

‘अरे नहीं, आपा, उनके दीदे लड़े थे पीहर के अशरफ़ मियाँ से,’

‘लाहौलविलाकुव्वत, हम तो कहते हैं कि बीवियों को पीहर वालों की शह ही बिगाड़ती है,’

‘ऐ मैं तोसे कहूं आपा, हमारी अम्मां ने तो हमसे साफ़ कै दी थी के आओ जाओ तो जवाईं की राजी ख़ुसी से, नई तो पीहर आने की कोई जरूरत नाय है,’

‘जिया, सास-ससुर के साथ रहने की बात तो दूर, अब तो मियाँ-बीवी कुछ एक साल खुद ही इकट्ठे रह लें तो गनीमत समझिये,’ वायु ने कहा।

‘ऐसी बात नहीं है, वायु, दिल्ली और लखनऊ में मैंने कई जौइन्ट फैमिलीज़ देखीं हैं, जहां सास-बहु-बेटियाँ सब मिल जुलकर चुटकियों में घर के सारे काम निपटा देतीं हैं। शाम को, छोटे बच्चे होम-वर्क करते हैं, तो बड़े बच्चे उनकी मदद करते हैं, दादा-दादी को अखबार पढ़ कर सुनाने के बदले उनसे कहानियों की फरमाइश की जाती है, गाना-बजाना होता है, सचमुच, बहुत मज़ा आता है,’ इला ने कहा।

‘मैं तोसे कऊं, इल्ला, म्हारे जमाने में सब्ब ऐसे ई खुस रैते थे। सास-ससुर ने कब्बी म्हारी आवाज नाय सुनी थी। और देखियो, मकरंद के लाला का तो हमउ चेहरा तक याद नाय,’ जिया ने अपना पल्लू मुंह में ठूंसते हुए उच्कियां सी लेती हुई हंसने लगीं।

‘अरे वाह बुआजी, आपके चार-चार बच्चे हो गए और आपने फूफा का कभी चेहरा तक ठीक से नहीं देखा,’

‘नानी, हम तो अपनी शादी अपनी मर्ज़ी से करेंगे, ठोक बजा कर,’

‘मैं तोसे कऊं, बुलबुल, उससे ये ज़रूर पूछ लीजियो के उसे खाना-वाना पकाना आवै है के नाय,’ जिया अपने मुंह में पल्लू ठूंसे हंस रही थीं।

‘ऑफ कोर्स, ये तो पहली शर्त होगी, नानी। वैसे भी यहां कौन खाना पकाता है? जो चाहिए बाज़ार से मंगा लो, गैस, टाइम, एफ़र्ट, सबकी बचत और किचन इज़ आलवेज़ क्लीन…’

‘अपने अपने शौक की बात है, बुलबुल, हमारे रिचर्ड तो मुख्तलिफ़ खाने पकाते रहते हैं, उन्होंने तो आयशा को भी हरी सब्जियां पकाना और खाना भी सिखा दिया है।’

‘इंशा अल्लाह, खुदा रिचर्ड की उम्र दराज करे, आजकल ऐसे दामाद कहाँ मिलते है, शमीम बीबी?’

‘मेरी भांजी गीता को तुम मरा जानती ही हो, शमीम, छोटे छोटे तीन बच्चों के साथ मरी झींक जाती है। किचन में मरा हाथ बंटाना तो दूर, रवी बच्चे तक नहीं संभाल सकता,’

‘इंडिया से दामाद मंगाओ तो यही होगा।’ मीता की बाईं तरफ़ रहने वाली पड़ोसन श्रीलेखा बोली।

‘बिलकुल ठीक कह रही हो, श्रीलेखा, हमारा दामाद भी दिल्ली का ही है। हमने उसे और उसके परिवार को दिल्ली-लन्दन-दिल्ली के हवाई टिकेट देकर बुलवाया, शादी का सारा खर्चा भी हमने ही उठाया। वो तो अपने साथ एक सगाई की अंगूठी तक लेकर नहीं आए थे।’ सलोनी ने दुखभरी आवाज़ में बताया।

‘तुमने तो कमाल कर दिया, सलोनी, बेटी-दामाद को घर तक ख़रीद कर दे दिया, तुम्हारी नीरू में क्या कमी थी?’ नैन्सी ने पूछा।

‘कमी? वो तो अच्छा ख़ासा कमा भी रही थी। नीरू के पापा को तो बस इंडिया का ही दामाद चाहिए था।’

‘चलो, जो है सो है, सलोनी, दोनों साथ तो रै रहे हैं,’ पुष्पा मौसी ने सांत्वना दी।

‘बड़े प्यारे बच्चे हैं नीरू के पर उसको इतनी जल्दबाज़ी नहीं मचानी चाहिए थी;’

‘मैं तोसे कहूं, बच्चा जित्ती जल्दी कल्लो उत्ता अच्छा, बड़ी उम्र में सरीर उतना लचीला थोड़े रै जाऐ है, घनी पिरौब्लम हो जावे हैं,’

‘जिया, आप ठीक फ़रमा रही हैं। अपनी कौम को इंशा अल्लाह बढ़ाना बड़े सबाब का काम है,’

‘क्यूं नहीं, आपा, धड़ाधड़ बच्चे पैदा करो और छोड़ दो उन्हें सोशल-सिक्योरिटी के सहारे,’ बुलबुल ठसक के आपा के सामने खड़ी हो गयी।

‘लाहौलविलाकुव्वत, बुलबुल, ये हमने कब कहा?’

‘कभी आप आलडगेट या ग्रीन-स्ट्रीट जाकर देखें, हर तरफ़ आपको गिट्ठे मियां, उनके हाथ पकड़े दो बच्चे, उनकी छटंकी सी बीबी, जिसकी गोद में एक दूध-पीता बच्चा, उनका पल्लू पकड़े दूसरा बच्चा, दो या तीन बड़े बच्चे, जिनके हाथ थामें कुछ और बच्चे, एक क़तार में खड़े या चलते नज़र आएंगे। इतनी एम्बैरेसमैन्ट होती है कि पूछो नहीं,’

‘लोग होलसेल में बच्चे क्यों न पैदा करें? हर बच्चे के लिए सरकार चाइल्ड-बेनेफ़िट जो देती है,’ श्रीलेखा बोली।

‘बिना किसी काम-धंधे के बच्चे पैदा करते चले जाना बड़ी ग़ैर-ज़िम्मेदारान बात है,’

‘सरकार अगर चाइल्ड-बेनेफ़िट बंद कर दे तो इनकी अक्ल दो दिन में ठिकाने आ जाए,’ बुलबुल ने कहा।

‘सिर्फ़ सोशल-सीक्योरिटी के पैसों से तो खाने को भी पूरा नहीं पड़ता,’

‘इन गोरों को देखो, वे शादी और बच्चों के बारे में सोचते ही नहीं,’

‘तभी तो गोरों की तादाद कम होती चली जा रही है और एशियंस चूहों से बढ़ रहे हैं,’

ब्रिटेन में एशियन बच्चों की बढ़ती हुई आबादी पर बहस होने लगी; आपा उठ कर खाने की मेज़ पर दोबारा जा बैठीं; पहली प्लेट रखे हुए उन्हें पूरे बीस मिनट हो चुके थे।

लाहौलविलाकुव्वतये चिकन कैसा चमचिचड़ा हो गया है?’ तन्दूरी मुर्गे को आपा अपने दांतों में दबा कर तोड़-मरोड़ रही थी; प्लेट पर झुके होने की वजह से उनके लम्बे-लम्बे झुमके मुर्गे की टांग के आस पास लहरा रहे थे। जितना ज़ोर से वह उन्हें पीछे धकेलती, वे उतने ही वेग से वापिस आकर उनके दांतों में दबी टांग को घेर लेते।

‘लगता है कि मरे बचे खुचे चिकन टिक्कों को शोरबे में डाल कर मीता ने मरी चिकन-करी बना दी है,’ आपा को मुर्गे की टांग से लड़ते-भिड़ते देख मोहिनी बोली।

‘या खुदा। आपने बजा फरमाया, मोहिनी बीबी,’ टांग को मुंह से निकाल कर उसका मुआयना करते हुए आपा बोलीं।

‘लोग अपने मेन्यू क्यों नहीं बदलते? वही चिकन-करी, इडली-सांभर, मटर-पनीर, आलू-बैंगन और ज़ीरा-चावल,’ मंजूषा आ पहुंची; बुराई सुनने के लिए उसके कान तरस गए थे।

जोशी-सर एंड पार्टी के मुंह-हाथ धुलवाने के लिए मीता उन्हें ऊपर अपने शयन-कक्ष में बने बाथरूम में ले गयी थी; नीचे वाला बाथरूम तो सेकण्ड और थर्ड-क्लास मेहमानों ने अब तक सड़ा दिया होगा। सीढ़ी से उतरते वक्त उसने मंजूषा, आपा और मोहिनी आदि को अपनी बुराई करते हुए सुना तो वह वहीं ठिठक गयी।

‘हम तो अपनी मरी कार में तबला-बाजा, चिमटा-मंजीरे सब मरा ढोकर लाए थे के आज मेहमानों को मरे नए नए भजन सुनाएंगे…’

‘इस पार्टी में यंगर-जैनरेशन के लिए तो कुछ भी नहीं है। एक डीजे हायर किया होता तो थोड़ी सी रौनक हो जाती,’

‘वही तो, बिना नाच-गाने के भी कहीं पार्टी का रंग जमता है?’ मंजूषा की टांगें थिरकने को आतुर थीं।

‘कंजूसी की भी कोई हद होती है।’

‘अल्हमदुलिल्लाह, शादी की बीसवीं सालगिरह है, कुछ तो स्पेशल पकवाना चहिए था। मीता बाजी हमसे कहती तो हम कोफ्ते बनवा लाते,’ शमीम बोली।

‘लाहौलविलाकुव्वत। हसन मियां से तो बिना गोश्त और मछली के खाना ही हज़म नहीं होता। यह घास-फूस तो वो खाने से रहे। ख़ैर, हम तो उनके लिए प्रौन-बिरियानी बना कर फ्रिज में रख कर आएं हैं,’

‘मैन्यू में फ़िश-टिक्का या फ़िश-करी ऐड कर दी जाती तो मैन्यू में चार चाँद लग जाते,’ आयशा ने राय दी।

‘आयशा, जानती हो आजकल फ़िश कितनी महंगी है?’

‘शराब से ज़्यादा तो नहीं?’ मंजूषा ने बात बढ़ाई, वह ‘बार’ की ओर बड़ी हसरत से देख रही थी, जहां बहुत से लोग बिना किसी परवाह के बस पिए चले जा रहे थे, उन्हें खाने में भी कोई दिलचस्पी नहीं थी। मंजूषा की हसरत थी कि कोई उसे भी बार-चेयर पर बैठा कर एक बिल्लौरी जाम थमा दे ताकि वह रंजीत की तरह ‘पौश’ दिखाई दे अथवा बुलबुल की तरह बेपरवाह! दोपहर से अब तक राजीव ने उसे सिर्फ मैलिबू में अनन्नास का जूस पीने को दिया था, जो उसे ख़ास अच्छा नहीं लगा था; उसे तो व्हिस्की पीने की तमन्ना थी। कुछ तो होगा व्हिस्की में कि बड़े लोग बड़े ठाठ से वही पिए जा रहे थे।

राजीव इस वक्त आदर्श पति बना इला के साथ भोजन खाने में व्यस्त था और कुलभूषण अपनी प्लेट लगाकर मिश्रा जी के पास जा बैठा था। यही हाल रहा तो मिनिस्टर एंड पार्टी के चले जाने के बाद मंजूषा क्या करेगी? राजीव क्या उसे यहां बोर करने के लिए लाया था? जीवन केवल एक ही बार मिलता है और उसे भरपूर जीने के लिए उसने लन्दन-निवासी कुलभूषण से विवाह भी कर लिया था जबकि उन दोनों की आदतों में ज़मीन आसमान का अंतर था। टी.वी कार्यक्रमों और फिल्मों में देखी हुई लंदन की रंगीनियों के मुकाबले कुलभूषण के साथ उसकी गृहस्थी बिल्कुल नीरस थी।

रंजीत को डाइनिंग-हौल में घुसते देख वायु ने अपने पल्लु को कंधे से सरका दिया। रंजीत की नज़र उसके लो-कट ब्लाउज पर पड़ी तो वह बीच रास्ते से ही लौट गया।

‘वायु के बूब्स फाड़े गए दूध की पोटलियों जैसे लगते हैं; बेचारा रंजीत पलट के भाग लिया?’राजीव के कान में मंजूषा फुसफुसाई, जो रसोई की ओर जा रहा था।

‘यू आर समथिंग,’ राजीव उसकी संकोच-हीनता पर चौंक कर रह गया। तभी मीता वहाँ से गुज़री।

‘मीता जी, अब हमें केक की तैय्यारी कर लेनी चाहिए,’ असंयमी मंजूषा बात पलटने की ख़ातिर बोली थी किन्तु मीता को लगा कि जैसे उसका तात्पर्य पार्टी की कमान संभाल लेने से था।

‘राजीव नोज़ दि शैड्यूल,’ मीता ने मंजूषा को एक बार फिर फटकार दिया।

‘गो टू हेल,’ मन ही मन मंजूषा भुनभुनाई; एक ही मिनट में उसे दो झटके लग चुके थे।

‘राजीव, मरा अकेले जाना है सतनाम को मरा साऊथहाल। इतना पिला दोगे तो वह मरी ड्राइव कैसे करेगा?’ कह कर मोहिनी ने मीता को और परेशान कर डाला।

‘मोहिनी जी, इट्स नौट मी,’ राजीव कहना चाहता था कि सतनाम को वह नहीं, मकरंद पिला रहे थे पर वह चुपचाप वहाँ से खिसक लिया; कुछ कह देता तो बैठे बैठाए बेचारे मकरंद की शामत आ जाती।

‘राजीव ड्रॉप कर देंगे, सतनाम अपनी कार सुबह आकर ले जाएंगे,’ मंजूषा ने फिर अपनी टांग अड़ाई और फिर पछताई।

‘मंजूषा, हैव यू आस्कड इला एंड राजीव? वे अपनी न्यू कार में सतनाम को पैर भी नहीं रखने देंगे, स्पेशलि इन दिस कंडीशन, थिंक बिफ़ोर यू स्पीक,’ मीता ने हालांकि ठीक ही कहा था किन्तु जली-भुनी मंजूषा जाकर कुलदीप के सिर पर खड़ी हो गयी।

‘चलो घर चलें,’

‘राजीव और इला तो अभी बिज़ी लग रहे हैं,’

‘टैक्सी मंगवा लो न, मेरा मन नहीं लग रहा अब यहाँ,’ मंजूषा ने ज़िद की।

‘क्या फ़ायदा? पचास-साठ पौंड्स ठुक जाएंगे। केक तो कट जाने दो,’ बिना कुछ और सुने वह टीवी के सामने जा बैठा; वह जानता था कि मंजूषा कुछ देर तक ठुनठुनाएगी; फिर कहीं व्यस्त हो जाएगी। वही हुआ, रंजीत उधर आ निकला तो मंजूषा उसे देख कर तत्क्षण मुस्कुराने लगी। सायरा जा चुकी थी और मौक़ा अच्छा था।

‘ओह, मैं तो सोच रही थी कि आप लोग चले गए,’

‘निकल ही रहे थे कि साले रिचर्ड ने जोशी को एक नया गेम सिखाने के लिए बैठा लिया, अब देखो साला कब उठते हैं,’

‘ओह! इट्स सो बोरिंग हियर…,’ मंजूषा जोड़ना चाहती थी ‘आपके बगैर’ पर झिझक गयी।

‘साला दैट्स ट्रू। ग़म ग़लत करना हो तो चलो वोदका के साले एक-दो शौटस लें,’ अंधा क्या चाहे दो आँखें, दोनों बार-स्टूल्स पर जा बैठे। मंजूषा तो यह भी नहीं जानती थी कि शॉट्स क्या होते हैं पर अपनी बोरियत को दूर करने के लिए वह इस वक्त वह कुछ भी करने को तैयार थी। जहन्नुम में जाएं, राजीव, मीता और कुलदीप।

‘लाहौलविलाकुव्वत, ये क्या शरीफ़ज़ादियों के लच्छन हैं?’ आपा ने रंजीत और मंजूषा की बातें सुन ली थीं।

‘सायरा की गैरहाज़री में रंजीत मियाँ मंजूषा से इश्क लड़ा रहे हैं,’

‘मरा ये कुलभूषण भी अजीब है, मरा अपनी बीवी को नहीं, टीवी देख रहा है,’

‘क्या ज़माना आ गया है? मोहिनी बीबी, ज़रा बुलबुल को तो देखो; माँ-बाप के सामने मरी सिगरेट पे सिगरेट फूंक रही है,’

‘हमें तो भई गोरियां भी अच्छी नहीं लगती मरी सिगरेट पीतीं।’

‘अपनी सिलबिल्ली सी लड़कियां अपनी छिपकली जैसी उंगलियों में सिगरेट दबाए सोचती हैं के बड़ी इस्मार्ट लग रही हैं,’

‘सब कुछ शोभा मर्दों को ही देता है क्या? घड़ियाल का लड़कियां छेड़ना बजा है पर एक अधेड़ उम्र की औरत का ईश्क गवारा नहीं; दमे से अधमरे जैन साहब चेन-स्मोकर है पर बुलबुल स्मोक नहीं कर सकती, ये डबल-स्टैण्डर्ड क्यों?’ वायु ने मोहिनी और आपा दोनों को डपट दिया, बुलबुल की मौसी जो ठहरी।

‘मरी सिगरेट तो शराब से भी बदतर है,’

‘इससे तो बेहतर है के कोई आत्महत्या कर ले,’ और एक बार फिर शोर मचने लगा।

‘आत्महत्या कर ले तो ठीक है पर ये पैसिव-स्मोकिंग तो ह्त्या है ह्त्या; स्मोकर्स के आसपास बैठे लोगों के फेफड़ों में भी तो घुसता है धुआं,’

‘कोई मीता को जाके बताये के बार पर बैठे मेहमान सिगरेट पी रहे हैं,’

‘बहनों और भाइयों, ॐ शान्ति शान्ति, यदि आप सब शांत हो जाएं तो मीता जी एक घोषणा करना चाहती हैं,’ कहते हुए मोहन ने मीता की ओर इशारा किया। मेहमानों को लगा कि मीता उन्हें सरप्राइज़ आइटम के विषय में बताने जा रही थी।

‘फ्रेंड्स, लूसी और प्रिया फ़िफ़्टीन मिनट्स में टेबल्स से फूड हटा लेंगी, हाफ़ पास्ट फ़ाइव हो चुके हैं, लैट अस फ़िनिश लंच क्विकली प्लीज़,’ मीता ने मेहमानों को चेतावनी दी।

 

‘दोस्तों, जैसा कि मीता जी ने आपसे निवेदन किया; जिस किसी देवी अथवा सज्जन ने अभी तक भोजन नहीं किया है, वे कृपया फ़ुर्ती  से काम लें। देर काफ़ी हो चुकी है और अभी केक काटा जाना बाकी है,’ मोहन ने हाथ जोड़ कर मीता की चेतावनी को ऊंची आवाज़ में दोहराया ताकि बार पर बैठे मेहमान भी सुन लें।

 

‘आप दोनों के खाना खा लेने के बाद ही मैं केक काटने की तैय्यारी करूंगा,’ राजीव ने मीता और मकरंद से कहा।

 

‘राजीव, मेरे हिसाब से तो तुम अब केक की तैय्यारी करवा ही लो, तब तक मैं दुल्हा-दुल्हन के लिए भोजन गर्म करवाता हूँ,’ मीता शरमाई, मकरंद झेंपे और राजीव और मोहन दो दिशाओं में सरपट दौड़े।

 

‘मैक डार्लिंग, लूसी के निकलने से पहले मैं सारी क्रॉकरी धुलवा लेना चाहती हूँ; यदि एक प्लेट भी टूट गई तो हमारा रॉयल डौलटन का पूरा सेट बिगड़ जाएगा।’

 

‘मीता डार्लिंग, यू ड..ड..डोंट वरी योर ल..ल..लिटिल हैड अ..अ..अबाउट दिस मैं ल..ल..लूसी को स..स..सुपरवाईज़ कर लूंगा,’

 

‘ठीक है पर मैक डार्लिंग ‘बार’ तो अब बंद करवा ही दो प्लीज़, ब्लैक लेबल की एक पूरी बोतल तो अकेले रंजीत ने ही पी ली होगी,’

 

‘मीता डार्लिंग, शुक्र है क..क..के हमें श..श..शराब ड..ड..डिप्लोमैटिक प..प..प्राइज़ पर मिल जाती है,’

 

‘बट मैक डार्लिंग, फ्री में तो नहीं मिलती न? यह पार्टी तो हमें बहुत महंगी पड़ी; कार्पेट धुलवाने में ही सौ-डेढ़ पाउन्ड्स ठुक जाएंगे,’ एकाएक मीता मुस्तैदी से उठ खड़ी हुई; मैक के बस का कुछ नहीं; बार बंद करवाने को भेजा तो पीने बैठ जाएंगे और पिलाते रहेंगे किसी पिए हुए को शराब। तभी उसकी दृष्टि बुलबुल और रंजीत की ओर गयी जो मंजूषा को सिगरेट पीना सिखा रहे थे। आपा, मोहिनी और गिरगिट ताज़ा प्लेटे उठाए डाइनिंग रूम की ओर जाते देखा तो मीता की रही सही भूख भी मर गयी; कितना खाएंगे ये लोग!

‘मरा साम्भर अच्छा बना है, आपने लिया?’ आपा के पास बैठते हुए मोहिनी ने पूछा।

‘लाहौलविलाकुव्वत, मोहिनी बीबी, अकेला साम्भर क्या भाड़ झोंकेगा? नान खंखड़ हो गए हैं, खाएं तो कैसे खायें? चावल तो हम सिर्फ़ दोपहर को ही खाते हैं, अब तो रात होने को आयी,’ आपा अब एक नान को झिंझोड़ हुए बोलीं।

‘आपा, सांभर में नान को थोड़ी देर डुबाए रखिए, नर्म हो जाएगा,’ आग में घी डालती हुई मंजूषा आपा और मोहिनी के बीच से ग़ुज़रती हुई रेस्टरूम की ओर चली गयी। तीन शॉट्स पीने के बाद उसका सिर घूम रहा था। इस समय उसे एक अच्छे दोस्त की ज़रुरत थी और रंजीत उसे छोड़ कर जोशी सर के पास जा बैठा था और वह परेशान थी कि उसका रूप और यौवन भी रंजीत को क्यों न बाँध सका।

‘मरी मेरी मानो तो आपा, न ही खाओ। घर जाके मरी ताहरी खा लेना कम से कम आराम से सोओगी, नहीं तो मरा चिकन और सूखे नान पेट में रात भर मरे खड़ख़ड़ करते रहेंगे।’

‘ख़ुदा न ख़ास्ता, अम्मी जान, ख़ुदा उन्हें जन्नत बख्शे, अब्बा को कहीं ऐसा कुछ परोस देतीं तो वह रकाबी उठा के सहन में फेंक देते।’ आपा के होंठों के दोनों ओर लाल घी की लकीरें कुछ और ही इज़हार कर रही थीं।

‘आप्पा जी, अस्सी रोट्टी सुट देइए ते साड्डी जनानी सानु बार सुट देवे।’ सतनाम बोला।

 

‘सतनाम, बीवियों को शुरु में ही क़ाबू कर लिया जाए तो ऐसी नौबत ही क्यों आए?’ आपा फिर भी बाज़ नहीं आईं।

‘आपा, मैंने तो नैन्सी को पहले दिन ही बता दिया था कि कमाना मेरा काम है, बच्चे और घर संभालना उसका, आज तक कोई प्राब्लम नहीं हुई,’ शराब के असर में नरेश ने अतिविश्वास के साथ कहा था।

‘परसों रात आपके घर से कप-प्लेटें टूटने की आवाजें आ रही थीं, प्यार-मुहब्बत में क्या यही सब होता है?’ करन ने पूछा। इसके पहले कि नरेश की कोई और पोल खुलती, वह चुपचाप उठ कर नैन्सी के बग़लगीर हो गया ताकि लोग देख सकें कि पति-पत्नी के बीच कोई टकराव न था।

 

‘लोग भी न ऐसी ऐसी डींगे मारते हैं कि…,’

 

‘ये ठीक ही कह रहे हैं, हम ही नहीं, पूरा मोहल्ला निगम्स के रोज़-रोज़ के झगड़ों से परेशान है जो देर रात गए नरेश के पब से लौटने के बाद शुरू होते हैं,’ चित्रा ने जोड़ा जो नीट व्हिस्की पी रही थी।

‘शुश चित्रा। मिक ने खाना गर्म करवा लिया है, चलो हम भी अब खा लेते हैं,’ सुमित ने आकर करन को वहाँ से दूर ले जाने की कोशिश की।  इनका झगड़ा हुआ तो उसकी मुश्किल हो जाएगी; उसकी रिश्तेदारी दोनों तरफ़ से थी।

‘ऐद्दी वोटी नूं वेखो, पल्ला ला के रंजीत दे पिच्छे पई सी।’ नशे में सतनाम ने सुमित को ही लताड़ दिया।

‘लाहौलविलाकुव्वत, किसी की बहु-बेटी के लिए आपको ऐसी नामाकूल बात नहीं कहनी चाहिए, सतनाम,’

‘अपनी बीबी तो इससे संबलती नईं दूसरों के फटे में हाथ डालता फिरता है,’ कुलभूषण भी मुंहफट हो उठा। रंजीत की आज्ञानुसार, राजीव उसे और कुलदीप दोनों को ही कोक की बोतलों में व्हिस्की पिलाता रहा था।

राजीव झट इला के पास जा खड़ा हुआ जैसे वह जानता था कि अगली पोल मंजूषा की ही खुलेगी, ऐसी स्थिति में उसे भी चपेटा जाएगा।

‘बूशन ओए, नच्च शुरू होन लैन दे, फेर देखियो आपणी जनानी नूँ, किस किस्नु जफ्फी पाके ओहो नचदी ऐ।’ वही हुआ जिसका डर था; कुलभूषण ने उठ कर सतनाम का गला पकड़ लिया।

”देखिए रंग में भंग न डालिए, शान्ति से खाना खा लीजिए, प्लीज़,’ कुलभूषण और सतनाम के बीच दमकल विभाग आ खड़ा हुआ, यानि कि मोहन और गिरगिट। सतनाम को मोहन ने और कुलभूषण को गिरगिट ने खींच कर अलग किया।

‘निपट क्यों नहीं लेने दिया दोनों को? आपका हर एक बीच टांग अड़ाना क्या ज़रूरी है? करन ने मोहन से पूछा।

‘लड़ाई कुलभूषण और सतनाम के बीच हो रही हैं, आप बीच में अपनी क्यों टांग अड़ा रहे हैं, साहब?’

‘उसकी दुकान से सामान खरीदते होंगे आप, आप दबिए उससे। हम तो पैसा देकर सुपरस्टोर से सामान लाते हैं,’ चित्रा ने करन के कंधे पर हाथ रख कर उसे शांत करना चाहा किन्तु वह चित्रा से छिटक कर थोड़ी दूर जा खड़ा हुआ।

‘आप तो ऐसे कह रहे है कि जैसे कि कुलभूषण हमें मुफ़्त में सामान दे देता हो,’ मोहन अपने गुस्से पर क़ाबू पाते हुए बोले।

‘तरफ़दारी तो आप कुछ ऐसे ही ले रहे थे…,’ ऐसा लग रहा था कि जैसे एक-एक कौर हलक से नीचे उतारने के लिए करन को व्हिस्की के दो-दो घूँट पीने पड़ रहे हों।

‘आप भी मरा किससे मुंह लग रहे हैं?’ मोहिनी और मीता मोहन को धकेलते हुए रसोई में ले गईं।

‘यू नो हाऊ ड्रंक एण्ड स्टूपिड करन इज़? वी शुडन्ट हैव इन्वाइटड हिम,’ मोहन को शांत करने हेतु मीता बोली।

‘मीता जी, आज तक किसी की हिम्मत नहीं हुई कि मुझसे कोई ऐसी बदतमीज़ी से बात करे, आपकी ऐनिवर्सरी नहीं होती न तो मैं करन का भुरता बना के रख देता,’ मोहन के भारी शरीर में ज्वार भाटा आ रहा था।

‘भाई साहब, करन वाज़ आफ़टर मी के मैं उसे सुरभि से अकेले में मिलवा दूं। आई डिडनट नो के वो चित्रा को भी यहाँ ले आएगा।’

‘मरा तुम्हें क्या पता था, मीता कि सुरभि और चित्रा में ठनी है तो दूसरी ओर करन और सुरेन्द्र में,’

तमाशा देखने के लिए आपा भी रसोई में चली आईं थीं, उनके पीछे-पीछे मंजूषा और बुलबुल और अन्य कई मेहमान भी मीता की रसोई के बाहर आ जमा हुए।

‘थैंक यू मिक भैय्या, आपने करन की अक्ल ठिकाने लगा दी।’ मंजूषा ने मोहन की तारीफ़ की तो वह गर्व से फूल उठे।

‘लाहौलविलाकुव्वत, इन आदम हौर हव्वा के क़िस्सों में हमने तो बस सिर ही फूटते देखें हैं,’ आपा बोलीं।

‘आप सब की कहानियां सुनकर तो लगता है कि मैंने अच्छा ही किया जो शादी नहीं की।’

‘कुछ नहीं रखा शादी में, बुलबुल,’ चित्रा भी वहाँ आ पहुँची।

‘ये वो लड्डु हैं जो खाये वो पछताए, जो न खाये वो भी पछताए,’ मंजूषा ने कहा।

‘फ्रांसीसी मनोवैज्ञानिक माइकेल मौन्टेन का कहना है कि विवाह एक ऐसा पिंजरा है जिसमें खुले आसमान में उड़ते हुए परिंदे अन्दर आकर कैद हो जाना चाहते हैं, और कैदी पक्षी बाहर निकलने के लिए बेताब रहते हैं।’ मिश्रा जी बोले।

‘मर्द एक बीवी की नहीं, प्रेयसी की कामना रखते हैं,’ भुक्त-भोगी चित्रा बोली।

‘शाम को मियाँ फूल और तोहफ़ा लेकर घर आए जैसा कि वो अपनी माशूका के लिए करता है तो बीवी भी प्रेयसी बनने से इन्कार नहीं करेगी,’ मंजूषा बड़ी हसरत से बोली।

‘मुसीबत तो यह है कि आदमी रात को बस एक आधे घंटे के लिए चाहता है कि उसकी बीवी प्रेयसी बन जाए,’

‘आपने मेरा ई-मेल देखा, मीता आंटी, जो मैंने आपको कल फौर्वार्ड किया था?’

‘इट वाज़ रियलि फ़न्नी, बुलबुल, थैंक्स,’

‘लाहौलविलाकुव्वत, भई हमें भी तो बताओ; उसमें ऐसा फ़न्नी क्या था?’ आपा ने पूछा।

‘उसमें लिखा था कि औरत के सिकुड़े दिल में तो बस उसका प्रेमी या पति रहता है किन्तु पति के बड़े से दिल में प्रेमिका, साली, भाई की साली, काम वाली, दोस्त की प्रेमिका, बीवी की सहेली, सामने वाली, बाजूवाली, ऊपर वाली, नीचे वाली, सब्ज़ी वाली, कपड़े वाली और थोड़ी बहुत पत्नी के लिए भी जगह तो रहती ही है।’ हर तरफ़ हंसी के फव्वारे छूटने लगे।

‘विवाह कोई मज़ाक नहीं है। एक सफल विवाह के लिए ज़रूरी है कि पति-पत्नी हर काम एक दूसरे की रज़ामंदी से करें।’ मिश्रा साहब ने गंभीरता से कहा।

‘मिश्रा जी, ये पौराणिक बातें हैं। घर में शान्ति रखने का बस एक ही तरीक़ा है; अगर बीवी दिन को रात कहे तो जवाब में मियाँ कहे के ‘बिल्कुल प्रिय, चाँद और तारे चमक रहे हैं,’ नाटकीय अंदाज़ में गिरगिट बोला।

‘मीता और मैक की जोड़ी बिलकुल ऐसी ही है, तभी तो इनके घर में कभी कलह नहीं होती,’

‘इंशा अल्लाह, भई इनकी जोड़ी यूं ही सलामत रहे,’

‘आमीन,’

‘भगवान करे कि आपकी शादी की सालगिरह साल में बारह बार आये ताकि हम छड़ों को महीने में कम से कम एक बार अच्छा खाना नसीब होता रहे।’ घड़ियाल ने कहा।

‘भाभी जी, आप नहीं जानती के आज कितने महीनों बाद मुझे और घनश्याम को घर का खाना नसीब हुआ है? तृप्ति हो गई। आपके हाथों को तो हमें चूमना चाहिए,’ गिरगिट और घड़ियाल दोनों घुटनों पर बैठ कर मीता के हाथ चूमने लगे। बुलबुल को फ़ोटो लेते देख मंजूषा भी अपने मोबाइल फ़ोन पर फ़ोटो लेने लगी।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, राजेस, घनसाम, खाना तो रोजै बने है, टेबल पर दो-एक जन और आ जाएं तो कोए फरक नाय पड़ता, क्यों मकरंद?’ जिया बोलीं।

‘यू आर म..म..मोस्ट वैल्कम,’ मकरंद ने भी शर्मा-शर्मी में हामी भर दी।

‘आपा, खाना तो मेरी वाइफ़ बनाती थी। लाख बुराइयां थी उसमें पर खाना ऐसा लज़ीज़ पकाती थी कि पूछिए नहीं,’ घड़ियाल रोने-रोने को हो उठा।

‘घ..घ..क्या नाम है आपका? खैर, आप कब तक मातम मनाते रहेंगे? दूसरी शादी क्यों नहीं कर लेते?’ आपा ने अपनी दो टूक राय दी।

‘कैसे कर लूं आपा, मैं तो रानी से अब भी प्यार करता हूं। आज भी वापिस आ जाए तो मैं उसे सिर आंखों पर बैठा लूं। मेरी नज़र तो किसी की ओर उठती ही नहीं,’ घड़ियाल मुंह में पनीर का एक बड़ा सा टुकड़ा ढूंसते हुए बोला।

‘हमारे पड़ौस में एक विधवा औरत रहती है, बड़ा अच्छा खाना बनाती है, कहो तो उससे तुम्हें मिलवा दूं, तुम्हारी ही जात की है,’

‘जातपात में क्या रखा है, आपा। आप कह रही हैं तो आ जाऊंगा,’ चंद एक पल के लिए आपा के झुमके स्थिर हो गए। वह खाना बनाने वाली की बात कर रही थीं और घड़ियाल शायद कुछ और समझ बैठा था। लोगों को सदमाँ पहुंचाने वाली आपा इस समय खुद सकते में थीं।

‘आज के खाने में घी बहुत ज़्यादा है, मैंने मीता भाभी को राय दी थी कि दुर्गा केटरर्स से ही खाना बनवाएं,’आपा को चुप देख कर घड़ियाल ने पैंतरा बदला।

‘लाहौलविलाकुव्वत, हमने भी मीता को ख़ान-पकवान वालों का नाम बताया था; वे खाना बनाते तो मेहमान उंगलियां चाटते रह जाते। आपा जल्दी ही संभल गईं थीं।

‘आपा, मरे ख़ान-पकवान वाले भी आपके हाथ के पुलाव का मुकाबला नहीं कर सकते। आपके जैसा मरा पुलाव तो मैंने कहीं और नहीं चखा। मरा आप कभी मुझे सिखाइएगा,’ मोहिनी ने कहा।

‘लाहौलविलाकुव्वत, मोहिनी बीबी, ये भी कोई कहने की बात है? आप जिस वक्त बुलाएंगी, हम हाज़िर हो जाएंगे,’ मोहिनी ने अपने ही पाँव पर कुल्हाड़ी मर ली थी।

‘अब क्या बताएं आपा, मरे गैरेज में हम शौवर-बाथरूम लगवा रहे हैं न, अभी तो घर में मरी ऐसी धूल-मिट्टी फैली है कि मरा उठना-बैठना मुहाल है,’

‘इंशा अल्लाह, बाथरूम का इनौग्रेशन तो करोगी के नहीं? उसी दिन आकर हम पुलाव बना देंगे,’

‘जी आपा,’ मोहिनी जल्दी से उठ कर रसोई की तरफ़ बढ़ गई; कहीं आपा उनके घर आने का दिन ही न तय करने लगें; आजकल लोग दूसरों के घर आने के लिए उधार खाए बैठे रहते हैं।

‘अरे, बातें बनाने से तो कोई पुलाव बनाना सीख नहीं जाएगा।’ आपा बड़बड़ाईं।

‘लगता है आप सब आज ब..ब..बातों से ही प..प..पेट भर लेंगे। स..स..साथ-साथ कुछ खाते प..प..पीते भी रहिए,’ मीता ने एक आख़िरी बार मैक को शायद मेहमान-नवाज़ी के लिए भेजा था किन्तु वह उसके पीछे पीछे खुद भी चली आई थी यह सोचकर कि मैक से तो कोई काम ढंग से होगा नहीं। वही हुआ जो उसने सोचा था; मैक मेहमानों से ‘पीने’ को भी पूछ रहे थे जबकि मीता ने उनसे सिर्फ ‘खाने’ की बात कही थी।

‘पार्टी तो भई आपकी होती है। मैं तो यही सोचकर हैरान होता हूँ कि इतना समय मिल कैसे पाता है आप दोनों को?’ मोहन ने कहा तो मीता फूल कर कुप्पा हो उठी।

‘मिक भाई साहब, आप सब आ गए तो समझिए हमारी मेहनत सफल हो गयी,’ मीता बोली और मकरंद ने झेंप कर उसकी बात का अनुमोदन किया।

‘आप तो हमें यह बताइए कि खाना सचमुच बनाया किसने है?’ सुमित ने मज़ाक में पूछा।

‘व्हाट डू यू मीन?’ मीता अपनी आंखें नचाती हुई ठुनकी।

‘सुमित, तुम्हें आम खाने से मतलब या पेड़ गिनने से?’ भाभी के कंधे पर हाथ रखते हुए वायु बोली।

‘आम? वेयर आर आम?’ आम के नाम पर रिचर्ड यह सोच कर उत्तेजित हो उठा कि कहीं आम सर्व किए गए थे; जो उसे दिखाई नहीं दिए।

‘मीता आन्टी, रिचर्ड को आम बहुत पसंद हैं,’ आयशा ने सफ़ाई देते हुए रिचर्ड के ऐन होंठो पर चुम्मा दिया तो आपा, मोहिनी और पुष्पा मौसी ने अपने चेहरे फेर लिए। जैसे ही उनकी मुंडियां वापिस पलटीं, रिचर्ड ने आयशा को आलिंगन में लेकर बड़े अच्छे से चूमा।

‘अरे आयशा, गिव वन मैंगो टू माई डार्लिंग रिचर्ड। लूसी से कहो कि फ्रिज से जरा एक आम निकाल कर काट दे,’ मीता ने मन ही मन ख़ुश होते हुए कहा। एक ही तो गोरा बचा था ले देकर उसकी पार्टी में, जूली को तो लोगों ने पहले ही खदेड़ दिया था।

‘कम रिचर्ड, आई विल कट ऐ मैंगो फ़ार यू,’ इसके पहले कि आयशा उठती, मीता रिचर्ड को घसीटती हुई स्वयं रसोई में घुस गई। उसे फ़िक्र थी कि कहीं बाक़ी के मेहमान भी आमों की फ़रमायश न कर बैठें। रिचर्ड ने चलते चलते आयशा को भी अपने साथ घसीट लिया।

‘इन गोरों को तो मुफ़्त में कुछ भी मिल जाए, थैंक्यू-थैंक्यू करते हुए ये लोग कितना खाना डकार जाते हैं,’

‘लोग फिर भी इनके आगे दुम हिलाने से बाज़ नहीं आते।’

‘हाथ कंगन को आरसी क्या? रिचर्ड को किचन में ले चुपचाप आम खिलाए जा रहे हैं,’ नैन्सी ने नाक-भौं चढ़ाई।

‘जबकि वह अदना सा कांट्रेक्टर है, किसी बड़ी पोस्ट पे होता तो मीता भाभी उसकी आरतीं उतार रही होतीं।’ वायु बोली।

‘मरा छोटा हो या बड़ा, मरे महंगे-महंगे उपहार दे-देकर और मरा खाना खिला-खिला कर हम ही इन्हें मरा बिगाड़ते हैं,’

‘गोरों के घर जाओ तो दिखाने भर के लिए वे आपसे ‘कप्पा टी? कप्पा टी?’ पूछते रहेंगे पर मज्जाल है कि एक गिलास पानी भी पिला दें,’

‘खाना पीना तो कोई इंडियंस से सीखे,

‘खाना-पीना और पैख़ाना भी,’

 

‘आपा, छी छी, पार्टी में तो आपको पू पू की बात नहीं करनी चाहिए,’

 

‘मैंने तो भई अपने पोता-पोती को ‘प्लौप प्लौप’ कहना सिखाया है, साउंड्स बैटर,’

 

‘मैं तोसे कऊँ, गू तो गू ई रएगा, चाऐ जिस नाम से बी पुकारो,’

 

‘जो है सो है, गू, टट्टी, पू पू, मल, पूप, प्लौप-प्लौप, पैख़ाना…’

 

‘पुष्पा मौसी, कोई नाम छूट तो नहीं गया? मैं सब नोट कर रहा हूँ,’

 

‘लाहौलविलाकुव्वत, आपने तो मुंह का ज़ायका ही खराब कर दिया,’

 

‘आप कुछ भी कहें, अंग्रेजों के रसोईघर और टॉयलेट दोनों ऐसे साफ़ होते हैं कि फ़र्श में अपने चेहरा देख लो­­…’

 

‘न कुछ पकाएंगे, न कुछ खाएंगे तो साफ़ ही रहेंगे,

‘भई अँगरेज़ का गुज़ारा तो शराब से चलता है, शराब पीकर न तो इन्हें ठण्ड लगती है और न ही भूख।’

‘शराब के साथ ये लोग चना-चबैना भी तो नहीं लेते,’

‘आयशा की सगाई में देखे थे स्टार्टर्स? माशा अल्लाह, भुने हुए काजू से लेकर सीख़ कबाब, चिकन और फ़ीश टिक्कों तक, इंशा अल्लाह, क्या नहीं था वहाँ?’ कितना चाहतीं थीं आपा कि आयशा का ब्याह हसन से हो जाता पर यह लल-मुहां न जाने कहां से आ टपका।

‘शमीम बड़ी लक्की है भई, उनका दामाद तो उन्हें भी चूमता चाटता रहता है,’

‘इंशा अल्लाह, देखें कब तक चलती है ये चूमा-चाटी। ऐसे शादी-ब्याह ज़्यादा दिन नहीं टिकते। जिस दिन उसे एक अच्छी गोरी मिल गयी न तो देख लेना, एक पल नहीं लगाएगा रिचर्ड आयशा को छोड़ने में।’

‘अल्लाह करे इनके बाल-बच्चे न हों, नहीं तो उन दो-रंगों की मिट्टी ख़राब होगी,’

‘ऐसे बच्चे होते बड़े इंटेलीजेंट हैं,’

‘वो तो है पर एक वीकेंड पर मदर के पास तो दूसरे वीकेंड पर फ़ादर के पास, ज़िन्दगी भर मम्मी-पापा के बीच बस वे दौड़ ही लगाते रहेंगे,’

शमीम अपनी प्लेट लगाकर आपा के पास आ बैठीं तो कहीं जाकर विषयांतर हुआ। रसोई में आम खाता हुआ छोड़कर मीता जल्दी से वापिस आ गई कि कहीं कोई उसे ढूंढता हुआ रसोई में न पहुंच जाए और आम की फरमाइश कर बैठे; कितने महंगे हैं आम आजकल लन्दन में!

‘मीता जी, हमें तो आप अपनी नान-ब्रेड के इतना ताज़ा रहने का राज़ बताइए,’ निगम साहब ने मीता की तारीफ़ की तो नैन्सी को सचमुच आग लग गयी।

‘थैंक यू, जीजा जी, इट्स सो सिंपल। नान्स को पानी में वेट करने के बाद नौंन-स्टिक-पैन पर थोड़ा सा औइल छिड़क कर मैं उन्हें तेज़ आंच पर सेंक लेती हूं, नान्स साफ्ट और टेस्टी हो जाते हैं, यू नो,’

‘तुमने सुना, नैन्सी, मीता जी क्या कह रही हैं? कुछ सीखो इनसे।’

‘मीता से या मैक से?’ नैन्सी ने चिढ़ क़र पूछा। मीता ग़ुस्सा पी गई और झेंपे हुए मकरंद रसोई की ओर बढ़ गए।

‘एक ही बात है, नैन्सी,’ नरेश खिसियाए।

‘तो फिर देखती हूं कल से आपके नान कैसे मुलायम होते हैं,’ नैन्सी के ताने पर इस बार नरेश की बारी थी तिर-किट-धिन करने की।

‘भई वाह, क्या क़रारा जवाब दिया है आपने, नैन्सी दीदी,’ गिरगिट और घड़ियाल तालियां पीटने लगे।

‘भई, मज़ाक एक तरफ, दुल्हन, आपके खाने का सचमुच कोई जवाब नहीं,’ आपा भी गोली देने में किसी से भला पीछे क्यों रहतीं? मीता और उसके खाने का वह दोपहर भर तिया-पांचा करती रही थीं; अब विदाई से पहले वह अपनी बिगड़ी सुधार लेना चाहती थीं।

‘आपा, जैसे गाना, नाचना और पेंटिंग करना कलाएं है, वैसे ही कुकिंग भी एक आर्ट है, जिसमें हमारी भाभी की कोई बराबरी नहीं कर सकता,’ वायु ने कहा तो मीता ने चौंक कर उसके चेहरे का मुआयना किया कि कहीं वह उसका मज़ाक तो नहीं उड़ा रही थी क्योंकि नन्द-भाभी की ज़िंदगी में कभी नहीं पटी।

‘आप तो फिर मास्टर-शैफ्फ़ ज़रूर देखती होगी, वो मेरा फेवरेट प्रोग्राम है। खाना बनाना तो एक तरफ, मैं तो उनके परोसने की कला की दीवानी हूँ, उनकी खाने से सजी हुई प्लेट को देखते ही मेरे मुंह में पानी भर आता है…’ मंजूषा ने कहा।

‘हम तो कहते हैं कि बातें बनाना सबसे बड़ी कला है, क्यों वायु?’ नैन्सी ने कहा तो मंजूषा के तन बदन में आग लग गयी; यह तंज उसी पर किया गया था; बहुत हो गया; अब वह इन सब की अक्ल ठिकाने लगाकर ही दम लेगी।

‘मेक-अप करना भी एक आर्ट है, जो सबके बस की बात नहीं…,’ मंजूषा के कहते ही नैन्सी को अहसास हो गया कि उसे मंजूषा से पंगा नहीं लेना चाहिए था।

‘ए मैं तोसे कऊं, मंजूसा, मेक-अप के आरट में तो भई म्हारी नैना से कोई टक्कर नाय ले सके; कोई कै सकता है के वो परके बरस पचास की है गयी?’ जिया ने, जो शौचालय के खाली होने के इंतज़ार में वहाँ आ खड़ी हुई थीं, नहले पर दहला ठोक दिया था; नैन्सी को लगा कि धरती फट जाए और वह उसमें समा जाए। जिया ने मंजूषा का अधूरी बात निबटा दी थी।

मेहमान जिया की शक्ल देख रहे थे कि वह किस नैना की बात कर रही थीं? क्या वह सठिया तो नहीं गईं थीं?

‘जिया मुझे हमेशा नैना कह कर बुलाती हैं,’ इसके पहले कि उसकी कोई और पोल खुलती, नैन्सी खुद ही बोल उठी। वह तो सबसे यही कहती फिरती थी कि वह पैंतालीस की होने वाली थी।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, हमें तो अपने इंडियन नाम ई सुहाते हैं, ये मिक, मैक, नैन्सी, फैंसी बी कोई नाम हुए?’ नैन्सी के अलावा कई अन्य लोग भी जिया को गुस्से में घूरने लगे; नैन्सी की पीड़ा कुछ कम हुई।

‘लोगों को नाम बिगाड़ने में जाने क्या मज़ा आता है? हमारा पड़ौसी बलविंदर अपने को बिल कहने लगा है, पूछा तो बोला की गोरों को उसका नाम लेने में मुश्किल होती थी,’

‘ऐ मैं तोसे कऊं, मोहन कित्ता सुन्दर नाम है, किसन भगवान की साकसात मूरत सामने आ जाए है। मैक, हैरी अउर कमीला बी कोई नाम हुए? जिया निडर हो चली थीं; इसके बाद न जाने किसकी ऐसी की तैसी हो?

‘हमारे भी एक जान-पहचान वाले हैं, जो अपने बेटों को ऑस्कर और टामी कहकर पुकारते हैं,’

‘जो है सो है, ये तो मरे कुत्तों के नाम हैं,’

‘गोरों की सुविधा के लिए हमने अपने शहरों और लोगों के नाम बदल दिए, चटोपाध्याय चैटर्जी हो गए, बंदोपाध्याय बैनर्जी हो गए…’ मिश्रा जी का यह प्रिय विषय था, जिस पर वह घंटों आख्यान दे सकते थे।

शेक्सपियर के मुताबिक़ नाम में क्या रखा है? जिसे हम गुलाब कहते हैं उसे जिस किसी नाम से पुकारें, वह उतनी ही खुशबू देगा।’ सुमित बोले।

‘नाम की महता नहीं जानते हैं लोग…,’ एक बार फिर मिश्रा जी ने प्रयत्न किया मेहमानों को विषय से जोड़ने का।

‘लो, ये मरी बारिश फिर शुरु हो गई,’ मोहिनी ने जल्दी से विषय बदल दिया।

‘भारत में हम बारिश को तरस-तरस जाते थे और यहां प्रार्थना करने पर भी बंद नहीं होती,’ निगम साहब बोले।

‘ऐसी बारिश भारत में हो जाए तो कैसा सुकून मिले?’ वायू ने कहा।

‘और भारत की थोड़ी सी धूप यहां चमकने लगे तो कैसा रहे?’ नैन्सी बोली।

‘पैंजी, आप ते फिलासाफिकल हो जान्दे ओ, ओए मैक यारा, थोड़ी हरी चटनी होर ला, वड्डी सोनी बनी है,’ सतनाम के हाथ में झूमती हुई प्लेट को मकरंद ने झट से लपक लिया तो मीता डार्लिंग का दिल बाग़-बाग़ हो गया, उसका रौयल-डौल्टन का सेट ख़राब होने से बाल-बाल बच गया था।

‘म..म..मीता ड..ड..डार्लिंग, बड़ी प..प..पार्टी में क..क..कौन देखता है कि प..प..प्लेट कैसी है? तुम्हारा र..र..रौयल-डौल्टन का स..स..सेट कहीं खराब न हो जाए,’ मैक ने समझाया भी था मीता को पर मिनिस्टर के रैंक के लोग और रंजीत जैसे करोड़पति आ रहे थे पार्टी में, कोई मज़ाक थोड़े ही था।

‘मीता, प्रिया नहीं दिखाई दे रही, घर चली गयी क्या?’ तभी इला ने आकर मीता से पूछा।

‘प्रिया का बस चले न, इला, तो वह रसोई के एक कोने में दुबकी खड़ी रहे, एनी वे, वो अकेले कैसे जा सकती है?’

‘मैं ज़रा उससे मिल कर आती हूँ,’ कहती हुई इला रसोई में आ पहुँची; चौकन्नी मीता भी उसके पीछे-पीछे चली आई। उसने अभी तक प्रिया का वेतन तय नहीं किया था, इला शायद उसी के बारे में पूछने आई होगी। मिनिमम वेजेस से मीता उसे एक पैसा ज़्यादा नहीं देने वाली। सुबह से प्रिया के बेटे की बेबी-सिटींग भी तो कर रहे हैं हैरी और कैमिला; खाना-पीना, चाय नाश्ता, अलग।

‘वेयर इज़ प्रिया, लूसी?’ इला ने लूसी से पूछा।

‘शी इज़ इन द स्टोर-रूम…, मैम,’

‘वाट द हेल, इज़ शी डुइंग इन द स्टोर-रूम?’ मीता के मन में सौ बातें आई-गईं। मीता दनदनाती हुई गैरेज से होती हुई स्टोर-रूम में पहुँच गयी। इला भी परेशान थी कि प्रिया को क्या ज़रुरत थी किसी के स्टोर-रूम में घुसने की।

मीता ने एक झटके से स्टोर-रूम का दरवाज़ा खोला। स्टोर में फेंके गए पुराने सामान के बीचों-बीच एक टूटे-फूटे सिंगल-बेड पर एक दूसरे से जूझते हुए दो बदन एकाएक अलग हो गए।

भयभीत और अस्त-व्यस्त प्रिया आकर इला से चिपट गयी।

‘इल्ला, आई वांट टू डाई,’ कहते-कहते प्रिया बेहोश होकर ज़मीन पर लुढ़क गयी। मीता और इला सकते की हालत में थीं। इला ने झुक कर प्रिया को हिलाया-डुलाया तो वह होश में आ गयी और दोनों हाथों से अपने चेहरे को छिपाए सुबक उठी।

‘भाभी जी, बिलीव मी, इसने ही मुझे स्टोर में बुलाया था, आप लूसी से पूछ लीजिए,’ पैंट की ज़िप चढ़ाते हुए घड़ियाल खिसियाता हुआ उठ खड़ा हुआ।

‘आई ऍम कालिंग द पुलिस,’ गुस्से में इला ने अपना मोबाइल-फ़ोन निकाल लिया, तब कहीं जाकर मीता को होश आया; उसने झपट कर इला का फ़ोन बंद कर दिया।

‘नौट नाऊ, इला, प्लीज़।  तुम प्रिया को मेरे बेड-रूम में ले जाओ,’ घड़ियाल को नफ़रत से देखते हुए मीता बोली।

‘मीता, हमारी ऐसी ही हरकतों से रेपिस्ट्स बच निकलते हैं। ये न जाने कितनी औरतों का रेप कर चुका होगा।’

‘भाभी जी, आप तो मुझे अच्छी तरह जानती हैं,’ मीता के पैर पकड़ कर घड़ियाल अपनी आँखें मलता हुआ रोने का नाटक करने लगा; उसे देख कर मीता इतनी कुंठित हो उठी कि वह इला की बात मान लेने को झट तैयार हो गयी।

‘यू आर राईट, इला।  आर यू रेडी, प्रिया, टु रिपोर्ट?’

‘नो मैम, जेल नई जाने का, मुरली का क्या होएंगा?’  प्रिया हाथ जोड़ कर बोली।

‘थैंक यू, प्रिया, मैं तुम्हें कभी तंग नहीं करूंगा, आई एम रियली सौरी,’ घड़ियाल की जान में जान आई।

‘आई प्रॉमिस यू, प्रिया, तुम रिपोर्ट नहीं करोगी तो यह तुम्हारी जैसी न जाने कितनी और औरतों को सताएगा,’  इला ने उसे ऊंची आवाज़ में समझाने की कोशिश की तो प्रिया और भी घबरा उठी।

‘सोर नई मचाने का, मैम। ओम-आफिस का रिचर्ड इदर है, अमें इण्डिया बापिस बेज देगा जी।’ कहकर प्रिया फिर रोने लगी। घड़ियाल अपना सिर पकड़ कर बैठ गया। इला और मीता को विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई इतना नीच भी हो सकता था।

‘प्रिया, रिचर्ड होम-ऑफिस से नहीं आया है, शमीम आंटी हैं न, वो उन्हीं का सन-इन-लॉ है,’

वाट? पण घनसाम बोला…’ प्रिया जैसे आसमान से गिरी हो, वह ग़ुस्से और घृणा से घड़ियाल को घूरते हुए बोली, ‘अम क्या करने का, मैम?’ एकाएक प्रिया ने तय कर लिया कि अब वह घड़ियाल को सबक सिखा कर ही रहेगी।

‘प्रिया, यू आर वेरी ब्रेव,’  कहते हुए इला ने ९९९ डायल किया और आपरेटर से बात करने लगी।

इसी बीच, गैरेज का शट्टर उठा कर घड़ियाल भागने की फ़िराक में था। मीता ने गुस्से में कांपते हुए कोने में पड़े एक डंडे से उसकी पिटाई शुरू कर दी। तभी राजीव और मंजूषा भी वहाँ आ पहुंचे।

‘क्या हुआ, मीता जी?’ प्रिया को रोते हुए देख कर मंजूषा ने पूछा तो राजीव ने उसे इशारे से चुप रहने का संकेत किया।

‘राजीव, मैं तो रसोई में प्रिया से सिर्फ यह कहने आया था कि मैं उसे घर छोड़ दूंगा पर वो मुझे यहाँ ले आई और…,’ यह सोच कर कि पुरुष होने के नाते शायद राजीव उसकी मदद करेगा; घड़ियाल का नाटक फिर शुरू हो गया।

मीता को लगा कि उसका दिलो-दिमाग़ स्टोर-रूम में फैले कचरे का ढेर था, जिसकी सफ़ाई वह घड़ियाल को पीट पीटकर कर सकती थी।

‘ये कहानी अब तुम पुलिस को सुनाना, तुम्हारे ऐसे कई कारनामों से मैं वाकिफ़ हूँ, ’ राजीव ने मीता के हाथ से डंडा अपने हाथ में लेते हुए कहा तो एक लाठी खाए कुत्ते की भाँति बेड पर दुबक कर बैठ गया।

‘राजीव, इसे गार्डन-वायर से बाँध दो,’ इला को लग रहा था कि कहीं घड़ियाल निकल न भागे।

‘इला, तुम फ़िक्र न करो, मैं इसे कहीं नहीं जाने दूंगा,’ उसी वक्त उन्हें पुलिस का सायरन सुनाई दिया।

‘राजीव, प्लीज़ हेल्प मी, प्लीज़, मैं कान पकड़ता हूँ; दोबारा ऐसा कभी नहीं होगा,’ घड़ियाल एक आख़िरी बार गिड़गिड़ाया।

‘इला, जब तक हम पुलिस से निपटते हैं, तुम प्रिया को अन्दर ले जाकर इसका मुंह-हाथ धुलवा लाओ, मंजूषा तुम जाकर मेहमानों को संभालो; उन्हें कुछ पता नहीं लगना चाहिए, अंडरस्टैंड? मेहमानों ने शायद पुलिस का सायरन सुन लिया हो, कोई पूछे तो कह देना कि गैरेज में बर्गलर्स घुसने की कोशिश कर रहे थे कि पड़ोसियों ने पुलिस वालों को फ़ोन कर दिया।’ कहते हुए राजीव ने जल्दी से गैरेज का शटटर खोल दिया कि कहीं पुलिस वाले मुख्य द्वार पर लगी घंटी न बजा दे; दो पुलिस अधिकारी अन्दर आ गए।

इला ने प्रिया को रसोई में ले जाकर उसके मुंह पर ठंडे पानी के छींटे डाले तो कहीं जाकर प्रिया की हिचकियाँ रुकीं।

‘सौरी प्रिया, तुम्हें तो मैंने मीता के पास इसलिए भेजा था कि तुम पैसे कमाने के साथ-साथ कुछ अंग्रेज़ी भी सीख जाओगी। खैर, कान्तन से तलाक हो जाएगा तो कोर्ट तुम्हें कान्तन से बच्चे का खर्चा दिलवा देगा; तुम्हें फिर घरों में काम करने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी।’

‘अमको नईं माँगता उसका पीसा, अमारी सैलेरी से चलता सब इला,’

‘मुरली के साथ एक दड़बे में कब तक रहोगी? किसी ने शिकायत कर दी तो काउन्सिल उसे अपनी सिक्योरिटी में ले लेगी, फिर क्या करोगी?

‘अम कुद बूका रैता पन उसको काना देता जी, सोशाल वाले कैसे ले जाने को सकता जी?’

‘अगर उनको लगा कि मुरली की ठीक से देख रेख नहीं हो रही तो वे इसे अपने साथ ले जा सकते हैं।’

‘पण कांतन कैता के होम-आफिस वाले मुज्जे और मुरली को सीदा प्लेन में बिठा के इन्डिया बेजने का,’

‘वह तुम्हें खाली पीली डरा रहा है,’

‘कान्तन का आफिस में एक मेम है डैफनी, उसके सातईच गूमता ओ, अमारे सामने इच किस करता ता दोनों। वो हमें वापस इंडिया बेजना मांगता,’ अपने में सिमटती हुई सी प्रिया बोली।

‘प्रिया, तुम्हें अपने राइट्स के लिए से लड़ना होगा; किसी से डरने की ज़रुरत नहीं है। इस कंट्री में तुम्हारे साथ नाइन्साफ़ी नहीं हो सकती और मैं हूँ न तुम्हारी मदद के लिए,’

‘तुम बौत अच्चा इल्ला, अम तुमारा…’

‘मैं तुम्हारी मदद इसलिए कर रही हूं ताकि मुरली को एक अच्छी जिंदगी मिल सके, जो उसका जन्म-सिद्ध अधिकार है,’

‘तुम टीक केता पन अम कू डर लगता, कान्तन किदर शिकायत कर दे होम…,’

‘प्रिया, तुम क्या सोचती हो कि इस चूहे की हिम्मत है होम-आफिस जाने की भी? वैसे भी, पासपोर्ट पर इनडैफिनिट-स्टे की मुहर एक बार गलती से भी लग जाए तो होम-आफिस वाले खुद भी इसे नहीं मिटा सकते।’

‘कान्तन तो बोला…’

‘गोली मारो कान्तन को, प्रिया, इस वीकैन्ड पर मुरली को लेकर मेरे घर आ जाना। मैं वकील को भी वहीं बुला लूंगी, मेरा फ़ोन नंबर है न तुम्हारे पास?’

तभी राजीव ने आकर इला और प्रिया को गैरेज में बुलाया; पुलिस अधिकारी प्रिया का बयान लेने के लिए तैयार थे। प्रिया एक बार फिर घबरा गयी।

‘डरने की कोई बात नहीं है, प्रिया, उनके लिए मीता और इला की गवाही ही काफ़ी होगी।’ राजीव बोला तो इला का हाथ थामें प्रिया गैरेज में आ पहुँची।

‘मीता जी, अब आप अन्दर जाइए, यहाँ मैं और इला सब संभाल लेंगे,’ राजीव ने मीता को ज़बरदस्ती बैठक में भेज दिया।

मीता ने मुस्कुराते हुए मेहमानों पर एक सरसरी नज़र डाली, शायद किसी को अंदाजा नहीं था कि गैरेज में इस वक्त पुलिस प्रिया का बयान ले रही थी। मीता के दिमाग़ में बादल छंटने ही वाले थे कि ज़ोर-शोर से फ़ायर-अलार्म बजने लगा, मेहमानों में हबड़-दबड़ मच गयी। ‘ओ शेरा वाली माँ, अब क्या होना बाकी है? मुझसे क्या गलती हो गयी? रक्षा करना,’

‘डोंट पैनिक, एवरीथिंग इज़ अंडर कण्ट्रोल,’ गिरगिट रसोई की ओर दौड़ा तो मीता घबरा गयी कि उसकी नज़र कहीं पुलिस पर न पड़ जाए।

‘डोंट वरी, राजेश, मैं अवन का टाइमर लगाना भूल गयी थी। तुम गेस्ट्स को काम-डाउन करो; मैं अलार्म ऑफ़ करके आती हूँ,’ कहते हुए मीता ने रसोई के दरवाज़े बंद कर लिए। अवन में से धुंआ निकल रहा था; अलार्म ऑफ़ करने के बाद मीता ने अवन के सारे स्विचेस औफ़ कर दी और सारे दरवाज़े खोल दिए ताकि धुंआ बाहर निकल जाए।

फ़ायर-अलार्म सुनकर शायद पुलिस वालों ने ही फ़ायर-ब्रिगेड को सूचना दे दी थी। अभी वे घड़ियाल को पुलिस-कार में बैठा ही रहे थे कि दमकल विभाग आ पहुंचा। अपना-अपना सामान संभालते हुए मेहमानों में हबड़ दबड़ मच गयी।

‘ख़तरे की कोई बात नहीं है, आप लोग प्लीज़ घर के अन्दर ही रहें या पीछे गार्डन में चलें जाएं, फ़ायर-ब्रिगेड वालों को अपना काम करने दीजिए,’ राजीव ने बैठक में आकर बात संभाल ली।

मकरंद ने फ़ायर-ब्रिगेड वालों को सफ़ेद और लाल शराब पेश की किन्तु वे ड्यूटी पर थे, कैसे पीते? ‘वेडिंग ऐनिवर्सरी,’ के नाम पर छै बोतलें लेकर वे खुशी-खुशी विदा हुए।

शेरां वाली माँ को धन्यवाद देती हुई मीता वापिस बैठक में पहुंची तो देखा कि जिया के दाएं और बाएँ उसके राजदुलारे सिर झुकाए ऐसे खड़े थे कि जैसे उन्हें सज़ा मिली हो, जो शायद फ़ायर-अलार्म सुन कर नीचे चले आए थे। इसके पहले कि वह अपने  ‘पुअर डार्लिंगस’ को जिया अथवा ज़ालिम मेहमानों से बचाती, जिया ने उन्हें साधिकार आज्ञा दी।

‘हरी, कमला, मैमानों से जय राम जी की कहो,’ हैरी और कैमिला ने प्रतिवाद में अपने सिर हिला दिए तो जिया ने आँखों ही आँखों में मकरंद को डपटा कि उसे अपने बच्चों पर इतना तो नियंत्रण होना चाहिए कि जैसा कहा जाए वैसा करें। मकरंद के लिए एक तरफ़ कुआं था तो दूसरी ओर खाई क्योंकि गुस्साई हुई मीता उसे और जिया को कच्चा चबा जाने वाली नज़र से देख रही थी।

‘इंशा अल्लाह, बेटा, कौन सी किलास में पढ़ रहे हो?’ आपा ने हैरी से सवाल किया, जो एक बैग्गी जीन्ज़ और ढीला स्वेटर पहने था, जिसकी आस्तीनें खींचकर उसने अपनी मुट्ठियों में पकड़ रखी थीं; उसकी ठुड्डी भी स्वेटर में अध-धंसी सी थी।

‘वाट?’ आपा से आँखें चुराते हुए हैरी बोला, जिया ने शर्मिन्दगी से मुंह में अपना पल्लु ठूंस लिया; उनका पोता क्या इतना नालायक़ था? इतनी इंग्लिश तो उन्हें भी आती थी।

‘हैरी बेटा, किस किलास में पढ़ते हो?’ आपा उसे कहां छोड़ने वाली थीं; इस बार उन्होंने अपना सवाल कुछ धीरे-धीरे दोहराया।

‘वा डा या मीन (व्हाट डू यू मीन)?’ हैरी ने पूछा तो जिया और आपा दोनों हैरानी से मीता का मुंह ताकने लगीं।

‘हैरी बेटा, आप कौन सी क्लास में पढ़ते हो? आपा को बताओ, इन व्हाट क्लास आर यू स्टडीइंग?’ हड़बड़ाई हुई मीता ने पहले हिन्दी और फिर अंग्रेज़ी में आपा का प्रश्न दोहराया और फिर मेहमानों की तरफ़ देखते हुए बोली, ‘हैरी इज़ सो शाई, यू नो।’

‘आइ एम सिटिंग फ़ार माइ ऐ लेवल्स दिस ईयर,’ माँ को घूरते हुए हैरी ने जवाब दिया। जिया ने प्यार से हैरी के बाल संवार दिए तो उसने नाराज़गी में अपने उलझे बाल कुछ और उलझा लिए। जिया ने आपा को सगर्व निहारा कि जैसे कह रही हों, ‘देखा, मेरा पोता कैसी अच्छी इंग्लिश बोलता है? चली थीं उसका टेस्ट लेने,’

‘सुभान अल्लाह, और हमारी बिटिया कमीला किस किलास में है?’ कैमिला को ज़बरदस्ती अपनी ओर खींचकर उसका गाल चूमते हुए आपा बोलीं। कैमिला ने नाभि दर्शाता हुआ एक टौप पहन रखा था और आपा के हिसाब से उसकी स्कर्ट भी काफ़ी ऊंची थी।

‘सेम ऐज़ हिम,’ कैमिला ने अपनी जान छुड़ाने के लिए कह दिया और छिटक कर मीता के पास जा खड़ी हुई। कैमिला ‘ओ’ लेवल कर रही थी न कि‘ऐ’ लेवल्स। वह हैरी से पूरे दो साल छोटी थी हालांकि उम्र में वह भाई से कहीं बड़ी दिखाई दे रही थी। मीता और उसकी दो-दो बुआओं ने उसका झूठ चुपचाप बर्दाश्त कर लिया।

‘माशा अल्लाह, भई आपकी कमीला तो खूबसूरत होने के साथ-साथ ग़ज़ब की अक्लमंद भी है, चश्मे बद्दूर,’ आपा ने अपने दोनों हाथ कानों पर लगा कर इस बार कैमिला की दूर से बलाएँ लीं।

बाकी के मेहमान भी कैमिला और हैरी को ऐसे घूर रहे थे कि जैसे वे चिड़ियाघर के जानवर हों। एक दूसरे के पीछे छिपने की कोशिश में वे दोनों जल्दी से जल्दी वापिस अपने कमरों में चला जाना चाहते थे।

‘मीता, अगर बुरा न माने तो एक बात कहूं? आपको घर में बच्चों से हमेशा हिन्दुस्तानी में ही बात करना चाहिए,’ मिश्रा जी ने अनापेक्षित सलाह दी।

‘मिश्रा जी, जिया आल्वेज़ टाक्स टु दैम इन हिंदी, समझते सब हैं पर जवाब इंग्लिश में ही देते हैं।’ कुढ़ी हुई मीता ने सफ़ाई देने की कोशिश की। मकरंद की सलाह मान जाती तो आज वह स्विट्ज़रलैंड में होती।

‘अरे, अब इंडिया ही में कौन हिंदी में बात करता है, जो यहां हम अपने बच्चों को ज़बरदस्ती हिंदी सिखाएं?’ नैन्सी ने अपनी भाभी की तरफ़दारी ली।

‘इंडिया पाकिस्तान की बात और है, नैन्सी, यहां अगर बच्चों को अपनी ज़ुबान और तहज़ीब से नहीं जोड़ोगी तो खुदा न ख़ास्ता ये बच्चे फिरंगी हो जाएंगे।’

‘ऐ मैं तोसे कऊं, आपा, हम तो इनसे कै-कै के हार गए के बच्चन से हिंदी में बात किया करो, पूछो इनसे? इदर आ कमला, इने बता के मैंने तुजसे कित्ती बेर कई है के मोसे हिंदी में बात किया कर,’ जिया को मन की भड़ास निकाल कर कुछ चैन मिला।

‘अब तो यहां हिंदी सीखने की सब सुविधाएं मौजूद हैं, फिर भी बच्चे उनका लाभ नहीं उठाते। जो बच्चे हिंदी ज्ञान प्रतियोगिता में अच्छे नम्बर लाते हैं, उन्हें हर साल भारत-भ्रमण के लिए भेजा जाता है, जहां उन्हें राष्ट्रपति और प्रधान मंत्री से लेकर शाहरुख़ ख़ान, प्रियंका चोपड़ा और अमिताभ बच्चन जैसे स्टार्स से मिलाया जाता है,’ मिश्रा जी ने बताया।

‘अरे वाह, मिश्रा जी, आपने तो बहुत अच्छी बात बताई, हमें भी उनके डिटेल्स दीजिएगा। हमारे पड़ौस में हाल में ही एक नई इंडियन फैमिली आई है, वे बड़े परेशान थे कि उनके बच्चे कहीं हिंदी न भूल जाएं,’

‘एक ज़माना वो भी था के जब कोई बच्चा क्लास में हिंदी का एक शब्द भी बोल देता था तो स्कूल से फट मेमो आ जाता था,’

‘आजकल भी तो अंग्रेज़ हमारे हिंदी बोलने पर आपत्ति करते हैं।’

‘एक बार बुलबुल की टीचर ने मुझे एक नोट भेजा था कि घर में उसे पहाड़े सिखा कर मैं उसे कंफ़्यूज़ कर रही थी,’

‘गोर तो चाहते ही हैं कि हमारा कलचर ही ख़त्म कर डालें,’ सुमित बोले।

‘जब हम ही अपनी भाषा और संस्कृति की क़द्र नहीं करते तो दूसरों से क्या अपेक्षा की जा सकती है? इस देश में मुसलामानों को पांच बार नमाज़ पढ़ने और स्कूल में उनकी बच्चियों को बुर्का पहनने की इजाज़त है। यदि चाहें तो हम भी अपनी मांगे मनवा सकते हैं किन्तु हम तो अपनी भाषा, वेशभूषा और रीति रिवाज़ सब बदलने को तैयार हैं, तो इसमें किसी का क्या दोष?’ मिश्रा जी ने अपने मन की भड़ास निकाल ली।

‘ओके माइ डार्लिंगस, क्विकली ईट समथिंग एण्ड रन अपस्टेअर्स,’ इससे पहले कि मेहमान बच्चों से कोई अन्य प्रश्न कर पाते, मीता ने उन्हें झटपट छुटकारा दिलवा दिया।

‘थैंक्स मम, बट वी आर नौट हंगरी,’ कहते हुए वे सिर पर पांव रखकर सीढ़ियों की ओर भागे; मेहमानों की नज़रें उनके पीछे थीं।

‘बुरा नहीं मानें तो भई एक बात कहें, कमीला आप दोनों की बेटी तो बिल्कुल नहीं लगती। आप दोनों सांवले और वह दूध सी गोरी, मलाई सी नाज़ुक और क़द तो देखो माशा अल्लाह कैसा खेंचा है?’ आपा ने अपने कानों को छूते हुए कैमिला की एक बार फिर बलैय्याँ लीं। कैमिला की तारीफ़ सुन कर जिया और मीता फूल कर कुप्पा हो गईं।

‘कहीं साले मिल्क-मैन्स डाटर तो नहीं?’ रंजीत ने फुसफुसा कर गिरगिट से पूछा था किन्तु दुर्भाग्यवश रंजीत का तंज़ मकरंद ने भी सुन लिया था, जो उसी वक्त लौट कर मीता के पास आ खड़ा हुआ था।

‘ज़बान स..स..संभाल कर ब..ब..बात कीजिए, म..म..मिस्टर रंजीत,’  मीता के रोकने ने बावजूद, गुस्से में मकरंद  रंजीत की ओर लपका।

‘वरी नौट बड़े भाई, रंजीत साहब तो मज़ाक कर रहे थे,’ मकरंद के कंधे दबाते हुए गिरगिट ने उसे रोक लिया।

‘मज़ाक की भी कोई हद होती है, राजेश।’ मैक की पीठ सहलाते हुए मीता ने उसे शांत करना चाहा।

‘साले चिढ़े तुम ऐसे कि जैसे भैन्चो तीर निशाने पर लगा हो।’ रंजीत के यह कहते ही गिरगिट और मीता को धकेलते हुए मकरंद घूँसा ताने रंजीत की और बढ़ा। मोहन को बैठक में दंगे की ख़बर मिल हो चुकी थी। इसके पहले कि मकरंद और रंजीत आपस में भिड़ते, वह बीच में आ गया और मकरंद को रसोई की ओर धकेलने लगा।  मीता भाग कर दरवाज़े के बीच जा खड़ी हुई।

‘लेट अस मूव टू दी बैक गार्डन,’ कहते हुए मीता ने रसोई का दरवाज़ा बंद कर दिया।

‘बड़े भाई, शांत हो जाइए,’ गिरगिट वापिस आकर रंजीत के कंधे दबाने लगा।

‘मैक भैय्या, टेक नो नोटिस, यहां तो लोग पार्टीस में इस तरह के जोक्स सुनाते ही रहते हैं।’ चित्रा बोली।

‘हूज़ साइड आर यू औन, चित्रा?’ मीता को चित्रा पर बहुत ग़ुस्सा आया।

‘दीदी, मेरा वो मतलब नहीं था,’ चित्रा घबरा कर चुप हो गयी।

‘तुम्हारी औलाद के लिए कोई ऐसा-वैसा कुछ कह देता न तो मैं तुमसे पूछती, चित्रा, कि यह मज़ाक तुम्हें कैसा लगा?’ नैन्सी बोल उठी।

‘हमें ताना मारने की कोई ज़रुरत नहीं है, नैन्सी। जब बच्चा चाहिए होगा, हम कर लेंगे या गोद ले लेंगे, तुमसे पूछने नहीं आएँगे,’ बेऔलाद चित्रा रुआंसी होकर वहाँ से उठ कर करन के पास पहुँच गयी जो सुरभि से बातें कर रहा था।

‘करन, चलो घर चलते हैं,’

‘क्यों क्या हुआ?’

‘पार्टी में बुलाकर हमारे बच्चा न होने पर तानें मारे जा रहे हैं,’

‘चित्रा तुम्हें ग़लतफ़हमी हो गयी होगी, ऐसा कोई क्यों कहेगा?’

‘मेरा तो दिमाग़ ही ख़राब है कि मैं तुमसे शिकायत कर रही हूँ? ऐनी-वे, मुझे चाबी दो, मैं कार में बैठ कर इंतज़ार कर लूंगी। तुम अपनी महबूबा के साथ एन्जॉय कर चुको तो आ जाना,’ सुरभि को घूरते हुए चित्रा ग़ुस्से में बोली।

‘वाट आर यू टाकिंग अबाउट, चित्रा? …ठीक है चलो…बाय सुरभि,’ झींकते हुऐ करन ने अपना ओवरकोट खूंटी से उतार कर हाथ में लिया और बाहर निकल आया। चित्रा अपना कोट पहन ही रही थी कि सुमित ने उसके हाथ से कोट छीन कर वापिस टांग दिया।

‘सुनो तो चित्रा, करन, कम से कम केक तो खाकर जाओ,’ सुमित ने कहा।

‘इन्सल्ट की भी कोई हद होती हैं, भैय्या,’ कहती हुई चित्रा बाहर कार में आकर बैठ गयी; उसका कोट हाथ में लिए सुमित भी बाहर आ गया और करन की कार का दरवाज़ा खोल कर उससे रुक जाने की विनती करने लगा।

‘मैक डार्लिंग, चित्रा-करन हमसे बाय करके भी नहीं गए,’ मेहमानों की अशिष्टता पर मीता हैरान और परेशान थी।

‘भैय्या, नैन्सी दीदी को तो पता है कि जीजी-जीजा जी के कोई औलाद नहीं है तो क्या ज़रुरत थी उन्हें इस सब्जेक्ट को टच भी करने की? हम पर निकालेंगे अब जीजा जी अपना ग़ुस्सा,’ मुंह फुलाए हुए वायु बोली।

‘पर हमने तो उनकी इन्सल्ट नहीं की थी न, वायु,’ मकरंद की जगह मीता ने कहा।

‘मेज़बान के नाते आप उन्हें रोक तो सकती थीं,’ कहती हुई वायु भी बाहर निकल गयी।

मीता की पार्टी फ्लॉप हो चुकी थी। अभी केक तक नहीं कटा था और मेहमान जाने की तैय्यारी में थे। वह डीजे को हायर कर लेती तो सब नाच कूद रहे होते, ऐसी बेइज्ज़ती तो न होती।

‘डोंट वरी मीता, साली स्पोर्ट्समेनशिप जैसी कोई चीज़ ही नहीं रह गयी है भैन्चो हम लोगों में,’ रंजीत ने कहा तो मीता प्रसन्न हो उठी, आज वह पहली बार उससे ठीक से पेश आया था।

‘मीता भाभी, कॉमेडियन्स तो यहाँ की रौयल्टी को भी नहीं बख्शते। और तो और, जिन लोगों का वे मज़ाक उड़ा रहे होते हैं, वे खुद भी उनके साथ हँसते रहते हैं।’

‘आपने वो प्ले देखा था, ‘नो सैक्स, वी आर ब्रिटिश प्लीज़? क्या धमाकेधार कामेडी….’  मंजूषा ने कहा, तभी राजीव ने आकर उसकी बांह थाम ली।

‘कम औन, मंजूषा, इट्स केक टाइम। चौप-चौप। तुम मैक और मीता को लेकर आओ, मैं मोमबत्तियां जलाता हूँ,’ राजीव उसके कान में फुसफुसाया तो मंजूषा और मीता ने इशारे में पूछा कि क्या पुलिस और फ़ायर ब्रिगेड वाला मामला निपट चुका था; राजीव ने अपना अंगूठा हवा में उठा कर उन्हें सांत्वना दी।

‘बड़े भाई, घनश्याम भाई साहब कहीं दिखाई नहीं दे रहे, आपने उन्हें देखा है कहीं?’ गिरगिट ने राजीव से पूछा।

‘राजेश, उनका पेट कुछ अपसेट हो गया था; वह घर चले गए,’

‘अरे, मुझे बताया तक नहीं…’ गिरगिट के कान खड़े हो गए।

‘आईए मैक भैय्या, मीता जी, केक इज़ रेडी,’ मंजूषा एक मॉडल की तरह अपने दोनों हाथों से केक की ओर इशारा करते हुए मेज़बानों और मेहमानों को इकट्ठा करने में जुट गयी। राजीव गुलाबी और नीले रंग के रिबंस से बंधी हुई चांदी की एक छुरी लिए खड़ा था।

‘बड़े भाई, भाभी जी, मेक ऐ विश,’ गिरगिट चिल्लाया तो अन्य मेहमानों ने भी शोर मचाना शुरू कर दिया। सज़ा के रूप में मीता ने कैमरा गिरगिट को फिर थमा दिया, यदि फ़ोटोज़ ठीक नहीं आईं तो मीता उसकी जान ले लेगी।

मोमबत्तियां बुझाते हुए मीता ने मन्नत माँगी कि जब वह आँखे खोले तो उसके साफ़-सुथरे घर में कोई न हो किन्तु मोमबत्तियां बुझने का नाम ही नहीं ले रही थीं, रावण के सिरों की तरह वे बार बार जल उठतीं। शोर अपनी चरम सीमा पर  था; मकरंद बुरी तरह खांसने लगे तो राजीव ने मैजिक-मोमबत्तियों को केक से निकाल कर एक प्लेट में रख दिया और तब कहीं जाकर केक कटा। मीता और मकरंद ने एक दूसरे को केक कई-कई बार खिलाया, तब कहीं जाकर गिरगिट को सही पोज़ मिला।

केक खाते-खिलाते पचासियों फ़ोटोज़ ली गईं। जिया और उनकी सहेलियों के साथ फिर एक फ़ोटो सेशन हुआ, जो मीता की मर्ज़ी के खिलाफ़ था।

मेहमानों के पाँव तले केक के टुकड़े महीन चूरा बनकर कार्पेट में समा रहे थे किन्तु मीता और मकरंद इस वक्त सारी चिंताओं के परे थे।

केक के अलावा मीठे में गाजर का हलवा, आइस-क्रीम, कटे हुए फल और आपा की लाई हुई जलेबियाँ थीं, कुछ मेहमान एहतियात बरत रहे थे किन्तु कुछ थे कि एक बार फिर से शुरू हो गए थे; इसके बाद न जाने फिर कब एक अच्छी पार्टी हो।

‘दुल्हन, लूसी से कह कर ज़रा जलेबियों को आधा मिनट माइक्रो में रखवा दीजिए तो करारी हो जाएँगी। जब हम लाए थे तो कैसी खस्ता थीं?’ गाजर का हलवा खाते हुए आपा एक बार फिर सब को जता रही थीं कि जलेबियाँ उन्हीं के सौजन्य से आई थीं।

‘प्लीज़ हैव सम कॉफ़ी बिफ़ोर यू लीव,’ मीता और मकरंद मेहमानों से आग्रह कर रहे थे; राजीव और मंजूषा बड़ी-बड़ी केतलियों में से डिस्पोज़ेबल कप्स में कॉफ़ी और चाय उड़ेल कर मेज़ पर रख रहे थे। तभी मीता ने मोहिनी को पर्स उठाते देखा तो वह जल्दी से उसकी और लपकी।

‘अरे मोहिनी, आरती और दीपक के लिए खाना लेकर जाना। किचेन में जाकर ज़रा हैल्प यौर्सेल्फ़ प्लीज़,’

मीता जल्दी से मेहमानों के लिए खाना पैक करने के लिए दही, क्रीम और मार्जरिन के ख़ाली डिब्बों के साथ टैस्को और सेन्स्बरीज़ के प्लास्टिक के थैले लिए लौटी।

‘मरा रैने दो, मीता, अब तक तो वो खा चुके होंगे, मरी फ़िश एण्ड चिप्स खाने को कै रहे थे,’

‘नो, नो, मोहिनी भाभी, किडस के लिए मैं थोड़ा सा पैक कर देती हूं। दिस इज़ नौट डन, एक तो उन्हें लाई नहीं, डोंट रन अवे, मैं अभी लाई,’

‘लाल झंडी दिखा दी है, खिसकने को तैयार हो जाओ,’ मोहन ने कहा।

‘मीता को कम से कम मरे घर वालों से तो रुकने के लिए कहना चाहिए था। मरा बचा-खुचा खाना बाँध कर कौन ले जाएगा?’

‘इसके पहले कि गिरगिट, घड़ियाल और आपा डब्बे भर लें…’ मोहन ने मोहिनी को आगाह किया।

‘चलो, मीता मरा इत्ता कै रइ है तो, मिक, ज़रा किचन में झाँक ही लो, पनीर बचा हो तो मरा थोड़ा सा पैक कर लो, डिक्की में मरे टप्पावेयर के डिब्बे रखे हैं,’मोहिनी के सुझाव पर मोहन झट से रसोई में घुस गए।

‘मोहिनी जी, आपने खाना पैक कर लिया क्या?’ मंजूषा ने पूछा।

‘मरा कौन खायेगा फ़्रीज़र से निकला हुआ खाना? मरा न रख सकते हैं और न ही मरा फ़्रीज़ कर सकते हैं। कल तक तो मरा यूं ही बुस जाएगा,’ मोहिनी बड़बड़ाई। तभी मोहन पनीर का एक बड़ा सा डिब्बा उठाए बाहर आए।

‘मैं अबी मंजूषा से यही कै रई थी कि…’ पल भर में ही पोल खुल जाने पर मोहिनी का मुंह उतर गया।

‘मीता जी ने ज़बरदस्ती पकड़ा दिया,’ मोहन ने बात संभालने की एक असफल कोशिश की।

अपना-अपना सामान बटोरते हुए मेहमान अब चलने की तैय्यारी में भाग-दौड़ रहे थे, रास्ते के लिए बोतलों में पानी भरा जा रहा थी, ई-मेल्स और फोन्स की अदला बदली हो रही थी; जल्दी मिलने की क़समें खाई जा रही थीं।

‘सतनाम अंकल, हमारे साथ चलना हो तो रैडी रहना, दस मिनट में निकलते हैं बस,’ बुलबुल ने कहा।

‘मैं आप्पे चला जावांगा, बुलबुल, मैं थोड़ी जेई पित्ती है। मैनूं ते कदी वी नईं चढ़ दी,’ हिचकियाँ लेते हुए सतनाम ने जवाब दिया।

‘भाई-जान, कोई हसीना हमें छोड़ने को कहती तो हम अपनी मर्सेडीज़ छोड़ कर उसके साथ हो लेते,’ हसन ने कहा। पानदान संभाले आपा हसन के ठीक पीछे खड़ी थीं।

‘लाहौलाविलाकुव्वत, मियां, आप भी सवार हो जाइए इन परकटियों के कंधों पर।’ फिर घूम कर वह बुदबुदाई, ‘कैसे राज़ी हैं बेलच्छिनियां, एक पराये मर्द को अपनी गाड़ी में बिठाने के लिए?’ बुलबुल आपा की बात को नज़रान्दाज़ करती हुई वापिस घर के अन्दर चली गयी।

‘चलिए हम भी पी लेते हैं थोड़ी सी और देखते हैं के हमें कौन छोड़ने आता है,’ कहते हुए इठलाती हुई मंजूषा ने रंजीत की तरफ निगाह घुमाई तो देखा सायरा उसके पास बैठी कॉफ़ी पी रही थी; यह कहाँ से आ टपकी?

‘मंजूषा, अभी तो साले छै भी नहीं बजे, आओ यहाँ बैठो।’ रंजीत ने सोफे को थपथपाते हुए कहा। घर पर काफ़ी देर इंतज़ार करने के बाद सायरा रंजीत को लिवाने आ पहुँची थी।

‘नो थैंक्स, हम लोग बस निकल ही रहे हैं, बाय मिस्टर रंजीत, बाय सायरा,’ मुंह लटकाए मंजूषा ने कहा।

‘खुदा हाफ़िज़, मंजूषा, मिलते हैं,’ सायरा ने उठ कर मंजूषा को गले लगा कर चूमा।

‘चलो हसन, बहुत देर हो गई, बिल्ली बेचारी भूखी पड़ी होगी।’ आपा बोलीं किन्तु हसन सायरा को निहार रहा था। गुस्से में आपा उसे बाहर की ओर खदेड़ने लगीं।

‘खुदा हाफ़िज़, जिया, आप भी कभी तशरीफ़ लाइएगा हमारे ग़रीबखाने पर,’ हसन ने जिया के गाल चूमते हुए कहा।

‘ऐ मैं तोसे का कऊं, बेटा, इससे पैले कि हम चल बसें, तुम जल्दी से दुल्हन ले आओ,’

‘लाहौलविलाकुव्वत, जिया, खुदा आपको हज़ार बरस सलामत रखे,’ आपा ने जिया को गले से लगाते हुए विदा ली।

‘लाहौलविलाकुव्वत, सतनाम तो लुढक़ गए,’

‘इसे जल्दी से बाहर ले चलो, कहीं कालीन पर उल्टी ही न कर दे,’

‘आई हेट पीपल हू वॉमिट,’ घबराई हुई मीता ने, जो रसोई में से खाने से भरे हुए थैले उठाए निकली थी, थैलों को वहीं पटक दिया।

‘हम तो सतनाम को ले जाते पर अभी अभी बच्चों का फ़ोन आ गया है कि वे पिकैडिली पर ठंड में खड़े हमारा इंतजार कर रहे हैं।’ वायु बोली।

‘ख़ुदा हाफ़िज़, भाई जान, भाभी जान, कभी तशरीफ़ लाईयेगा न हमारी तरफ,’ हसन और आपा जल्दी से प्रवेश-द्वार पर आ खड़े हुए कि कहीं सतनाम को उनकी मर्सेडीज़ में ही न बैठा दिया जाए।

रिचर्ड और मकरंद मिल कर सतनाम को बाहर वाले बगीचे में ले आए।

‘लाहौलविलाकुव्वत, बेचारे को ठण्ड में बाहर निकाल खड़ा किया, अरे कोई उसे कोट तो पहना दो, नहीं तो उसे निमोनिया हो जाएगा,’ आपा से कहे बिना नहीं रहा गया। मकरंद सतनाम का कोट ढूँढने अन्दर चले गए। तभी लपकती हुई वायु अन्दर आई।

‘भाभी जी, सतनाम बाहर उल्टियां कर रहा है, सुबह आपके नेबर्स देखना कितना शोर मचाएंगे।’ वायु अपना सामान समेटते हुए बोली।

‘अरे कोई उसे बाथरुम में ले जाकर हाथ-मुंह धुलवा दो। राजेश, ज़रा मैक की मदद कर दीजिए प्लीज़,’

‘आप मुझसे और कुछ भी करा लीजिए, मीता भाभी, पर ये मेरे बस की बात नहीं, मेरी तबियत तो पहले ही ख़राब हो रही है,’ गिरगिट ने हाथ खड़े कर दिऐ।

‘आयशा तो सतनाम के पड़ौस में ही रहती है। उससे कहिए न, भाभी, लीजिए वो इधर ही आ रही है,’ वायु बोली और अपना पर्स और कोट उठाकर ये जा ओर वो जा; जिया कलपती रह गईं कि माँ से मिलकर तो जाती।

‘फूड वाज़ वन्डरफुल मीता आंटी, थैक्यू वैरी मच, वी एन्ज्वायड इट वेरी मच,’ आयशा ने कहा तो रिचर्ड ने भी सिर हिला कर अपनी स्वीकृति दी।

‘यू आर मोस्ट वेलकम, आयशा, सतनाम की तबियत ख़राब हो गई है, वो ड्राइव नहीं कर …”

‘आंटी, वी विल ड्राप हिम, ही ओनली लिवस नैक्स्ट डोर,’ आयशा के कहते ही कई मेहमानों ने चैन की सांस ली।

‘आर यू श्योर?’ मीता हैरान थी कि उसकी इतनी बड़ी मुसीबत ऐसी आसानी से टल गई थी।

‘ओह, ही इज़ ए डार्लिंग, डोन्ट वरी, मीता आंटी। रिचर्ड, हेल्प मी पुट सतनाम इन अवर कार,’ रिचर्ड की सहायता से आयशा ने सतनाम को पीछे की सीट पर बैठा दिया।

‘थैंक्यू यू आयशा सो वेरी मच,’ मीता ने कहा।

‘म..म..मच आब्लाइजड, अ..अ..आयशा,’ झेंपते हुए मकरंद सचमुच आभार से दबे जा रहे थे।

‘अन्कल, डोन्ट बी एबसर्ड, हम आपके कुछ काम तो आए,’

”सतश्री अकाल प्राजी, मैं त्वानुं दसया सी न, मैन्नू कद्दे वी नई चढ़दी,’ खिड़की में से अपना सिर बाहर निकाल कर सतनाम बोला।

‘दुल्हन, बाग़ से थोड़ी मिट्टी खोद कर सतनाम की क़ै पर डाल दो, खुदा ना खास्ता, बदबू सोख़ लेगी,’ आपा बोलीं, जो अभी कुछ देर पहले जल्दबाज़ी मचा रही थीं। इस अरूचिकर घटनास्थल से काफ़ी सारे मेहमान बिना दुआ-सलाम के अपनी अपनी कारों के नज़दीक जाकर खड़े हो गए थे कि जैसे वे अब बस चल ही देंगे।

‘आंटी, एक खाली प्लास्टिक का थैला हो तो दीजिए, रास्तें में कभी सतनाम अंकल को फिर क़ै न हो जाए,’  आयशा सतनाम को कार में बैठा कर बैल्ट लगा रही थी कि रस्ते में वह कहीं गिर गिरा न जाए।

 

‘मैं बैल्ट आप्पे ला सकदा हाँ, बच्चिऐ,’ बिना हाथ हिलाए सतनाम ने कहा।

 

इस सबसे अनभिज्ञ, बार में बैठे गिरगिट, सायरा और रंजीत शाम भर की बातों का संपादन करते हुए बची-खुची शराब को ठिकाने लगा रहे थे।

घर के बाहर मेज़बानों और मेहमानों की एक अच्छी ख़ासी भीड़ इकट्ठी हो गयी थी जो वहाँ विदा लेने देने के बहाने खड़े थे; बातें अब भी जारी थीं।

‘घर में सबसे छोटी है बुलबुल पर उसकी कार तो देखो, कित्ती बड़ी है?’

‘महंगी और पौश,’

‘कार हो तो मिस्टर रंजीत के जैसी; मर्सेडीज़ का लेटेस्ट मौडल है, क्रीम कलर के लैदर की बड़ी-बड़ी और गुदगुदी सीटें देख कर मन होता है कि उन पर लेटें और बस सो जाएं,’ वायु बोली।

‘रौल्स-रोयस का मुकाबला नहीं कर सकती मर्सेडीज़,’ अपनी कार को गर्वपूर्वक निहारते हुए नरेश बोले।

‘बस ब्रैंड की बात है, नरेश, पैट्रोल कितना खाती है रौल्स-रोयस? मर्सेडीज़ जैसी टिकाऊ कार और दूसरी हो ही नहीं सकती,’ अपनी कार को थपथपाते हुए सुमित ने कहा।

‘भैन्चो, असली कार तो साली टोयोटा-यारिस है, रफ़ एंड टफ़, भैन्चो ज़िंदगी भर खराब नहीं होती,’ रंजीत लुढ़कता हुआ बाहर आया और राजीव की कार के पास आकर खड़ा हो गया, जिसकी पिछली सीट पर मंजूषा बैठी थी।

‘बिलकुल, हमारा पेट्रोल का खर्चा भी एग्ज़ैक्टली आधा हो गया है,’ राजीव ने बताया, उस पौश कॉलोनी में सबसे छोटी कार राजीव की ही थी; जिसमें बैठी मंजूषा शर्मिन्दा हो रही थी।

उसी वक्त हसन की कार से निकलते हुए धुंए और कर्कश ध्वनि ने सबका ध्यान अपनी और आकर्षित कर लिया।

‘लाहौलविलाकुव्वत, मियाँ, आपसे हम कब से कह रहे हैं की इस ख़टारा को बेच कर एक नई कार ले लीजिए,’ आपा ज़ोर से बोलीं ताकि सब सुन लें और फिर पहिए को लात मारती हुई बुड़बुड़ाईं, ‘यहाँ से थोड़ी दूर जाकर खराब हो जाती तो तुझ नामुराद का क्या जाता?’

‘हसन, मुझे न..न..नम्बर दीजिए, मैं र..र..रिकवरी के लिए फ़..फ़..फ़ोन मिला दूं,’ मैक अपना मोबाईल निकालते हुए बोले।

‘बड़े भाई, कितना अच्छा हुआ कि आप लोग अभी घर के बाहर ही हैं, कहीं सुनसान में खराब हो जाती तो मुश्किल हो जाती,’ गिरगिट बोला।

‘साली टोयोटा-यारिस होती तो मजाल थी…’ रंजीत फिर शुरू हो गया।

सारे मर्द हसन के इर्द-गिर्द आकर खड़े हो गए और बातों का रुख़ अब कारों की ओर था; जापानी, इटैलियन अथवा ब्रिटिश कारों की तुलना हो रही थी। महंगी-सस्ती, पेट्रोल-डीज़ल, इंश्योरैंस, एम.ओ.टी, पार्किंग-डिस्क, रोड-टैक्स, कार से सम्बंधित शायद ही कोई ऐसा विषय हो, जिस पर वहाँ बहस न हो रही हो।

बाहर खड़ी हुई मीता कलप रही थी कि इतवार का दिन होने के कारण रिकवरी-वैन न जाने कितनी देर में पहुंचे। इस दौरान, आपा और हसन कहीं फिर घर के अन्दर आकर न पसर जाएं। अभी वह शेरा वाली माँ से शिकायत कर ही रही थी कि काफ़ी सारे मेहमान मीता और मकरंद के इर्द-गिर्द दो घेरे बना कर खड़े हो गए।

‘खुदा न ख़ास्ता, आप लोग अब निकल ही लीजिए, रिकवरी-वैन के जल्दी आने का हमें बिलकुल भरोसा नहीं है,’ आपा मेहमानों से कहती फिर रही थीं।

‘अरे आपा, आप भी कैसी बातें कर रही हैं? चले जाते तो और बात थी..’

‘हम आपको सड़क पर कैसे छोड़ कर जा सकते हैं? आधा एक घंटा और सही,’

‘ऐ-ऐ के मुकाबले आर.ऐ.सी-रिकवरी वाले बड़े प्रांप्ट हैं,’ ज़ोर-शोर से रिकवरी सर्विसेज़ पर बहस होने लगी।

मीता अपना धीरज खोने को ही थी कि एक सफ़ेद रंग की मेटाडोर उसके पास आकर रुकी, जिस में से चार कसरती और कामाकर्षक युवक उतरे और भीड़ के सम्मुख हाथ बांधे खड़े हो गए। उन्होंने काले चमकते हुए सूट पहन रखे थे और गुलाबी रंग की बो-टाइज़ लगा रखी थीं।

‘इज़ दिस मैक एंड मीताज़ प्लेस?’ उनमें से एक युवक ने पूछा।

‘येस, हू इज़ आस्किंग?’ सीना ताने और कमर पर हाथ रखे मीता ने भीड़ के आगे आकर हुए पूछा। युवकों को चेतावनी सा देता हुआ औरतों का वो रेला, जो मीता के क़दम से क़दम मिला कर आगे चला आया था, मीता के कुछ और करीब आ गया जैसे कह रहा हो, ‘मीता से पंगा मत लेना वरना…’

‘शैल वी गो इन?’ नीली आँखों वाले युवक ने मीता के कान में फुसफुसा कर पूछा तो मीता हड़बड़ा कर दो कदम पीछे हट गयी, यह कैसा मज़ाक था?

‘लाहौलविलाकुव्वत, नामुराद की हिम्मत तो देखो, दुल्हन से सरे आम अन्दर चलने को कै रा है,’

‘व..व..वाय ग..ग..गो इन? हू अ..अ..आर यू, एनी वे?’ मकरंद ने मीता को अपने पीछे धकेलते हुए पूछा। मकरंद से सटे हुए पुरुषों के घेरे ने महिलाओं को पीछे धकेल दिया; उनकी औरतों की आबरू खतरे में थी।

हाँफते हुए मोहन अपनी कार में से निकल कर दौड़े चले आए; यह तो अच्छा हुआ कि वह अभी यहीं थे, छोटे भाई पर मुसीबत आ जाती तो बेचारा अकेला क्या करता?

‘कुछ हमें भी पता चले के मरा हुआ क्या?’ कहती हुई मोहिनी भीड़ को चीरती हुई सबसे आगे आ खड़ी हुई।

आयशा ने अपनी कार को अभी रिवर्स किया ही था कि देखा कि कुछ गड़बड़ है। उसने रिचर्ड को दौड़ाया कि देख कर बताए कि माजरा क्या था।

रिचर्ड युवकों को देखते ही समझ गया कि वे मेहमानों के मनोरंजन के लिए आए थे।

‘मैक, दे आर दी सरप्राइज़ आइटम यू वर टॉकिंग अबाउट,’ यह सुन कर मेहमानों की अदावत कुछ कम हुई। वे थोड़ा पीछे हट कर अब आपस में खुसपुस करने लगे।

‘अरे, मैं तो हैंडसम बॉयज़ को देखते ही समझ गयी थी ये वर्षा जीजी का ‘सरप्राइज़ आइटम’ हैं पर भाभी ने मेरी एक नहीं सुनी,’ वायु बोली।

‘डू यू वांट अस टु परफ़ॉर्म आउटसाइड हियर?’ हरी आँखों वाले युवक ने बड़ी अदा से अपना ओवरकोट उतारते हुए रिचर्ड से पूछा।

‘प्लीज़ आस्क मीटा,’ रिचर्ड ने कंधे उचका कर उन्हें मीता से बात करने का इशारा दिया।

मीता और मकरंद के बीच तोता-मैना जैसी खुसपुस शुरू हो गयी; उनके सामने एक बहुत बड़ा मुद्दा आ खड़ा हुआ था; जिसके लिए उन्होंने कोई तैय्यारी नहीं की थी।

‘वी आर हियर ओनली फॉर वन आवर,’ इस बार नीली आँखों वाले अधीर से दिखने वाले युवक ने रिचर्ड को और रिचर्ड ने मीता को आगाह किया।

‘मैक डार्लिंग, डोंट वेस्ट टाइम, इन्हें जल्दी से अन्दर ले चलो,’ मीता ने कहा तो मेहमानों में सनसनी दौड़ गयी। जल्दी से जल्दी उन्होंने अपने पर्स, कोट मफ़लर आदि कारों के अन्दर फेंके और झट घर के अन्दर पहुंच गए कि कहीं वे कुछ मिस न कर दें। ऐसी भगदड़ मची थी कि खिड़कियों से झांक रहे अड़ौसी-पड़ोसी भी यह तमाशा देखने के लिए अपने घरों से बाहर निकल आए थे। ब्रिटेन वालों के लिए यह एक असाधारण घटना थी कि कारों की हैड-लाइट्स औन किए मेहमान सड़क पर खड़े शोर मचा रहे थे।

जो मेहमान जा चुके थे, उन्हें मोबाइल-फ़ोन पर खबर दी जा रही थी कि वे कितने बड़े और मज़ेदार ‘सरप्राइज़ आइटम’ से महरूम होने जा रहे थे।

कारों को मोटर-वे पर जोखिम भरे और आपत्तिजनक यू-टर्नस लेने पड़े।

‘अरे, वो कौन सी मरी फिल्म थी जिसमें पांच गोरे मरे कपड़े उतारते हुए नाचते हैं? मरा वई करेंगे ये लड़के भी?’

‘द फुल मौंटी, इस फिल्म को बाफ्टा अवार्ड मिला था,’ मकरंद ने बताया।

‘अब आएगा मज़ा,’ बेसब्री से मंजूषा कूदती हुई बैठक में चली आई, उसके पीछे पीछे कुलभूषण, इला, राजीव और रंजीत भी अन्दर आ गए। सायरा वहाँ पहले से ही बैठी रंजीत का इंतज़ार कर रही थी।

‘लाहौलविलाकुव्वत, हसन मियाँ, ज़रा रिकवरी-वैन को फ़ोन लगाइए, पूछिए कितनी दूर हैं? हमें नहीं देखना इनका नंगा नाच।’ आपा ने खड़े-खड़े कहा; उनसे रुकने के लिए अब कौन इल्तजा करता?

युवकों से कंज़र्वेटरी में तैय्यारी करने के लिए कहकर, बीच वाली बैठक के दरवाज़े पर गिरगिट को तैनात करने के बाद, मीता ने एक आपत्कालीन-गोष्ठी बुलाई, जिसमें मेज़बानों के अलावा मोहन, रंजीत, और राजीव भी शामिल थे। भारी तर्क-वितर्क के पश्चात, प्रदर्शन के लिए कंज़र्वेटरी को चुना गया क्योंकि दोनों बैठकों और कन्ज्र्वेटरी के पीछे वाले उद्यान से युवकों के प्रदर्शन को अच्छे से देखा जा सकता था।

जिया, पुष्पा मौसी, आपा और अम्मा के लिए दीवार से सटा कर कुर्सियां रख दी गईं ताकि भीड़-भड़क्के में वे कहीं गिर-गिरा न जाएं।

‘मैं तोसे कऊं, पुस्पा, ये छोकरे का ‘लैस बियन’ हैं?’ बदन से चिपके हुए चमचमाते लिबास पहने युवकों को देख कर जिया ने ज़ोर से पूछा।

‘श श श, जिया, जो है सो है, लैस बियन तो छोरियां हॉवे हैं, ये शायद ‘गे’ होंगे,’ पुष्पा मौसी जिया को चुप कराती हुई बोलीं।

‘ओह, तो ये गोरे छोरे हमें कोई जादू-सादू दिखाएंगे का, पुस्पा?’

‘सौ टके की मरी एक बात, पुष्पा मौसी, हमारे पल्ले मरा कछु नईं पड़ने वाला,’

‘लाहौलविलाकुव्वत! अंग्रेज़ तमाशबीनों की क्या तुक थी? हमने एक उम्दा शामे-ग़ज़ल तजवीज़ की थी…’ झक मार कर आपा को अन्दर आना पड़ा था।

‘जो है सो है, म्हारी फैमिली में तो ऐसे मौकन पर साईं बाबा का बजन-कीरतन करवाते हैं,’

‘मैं तोसे कऊं, इंडिया में होते तो हम हिजड़े नचवाते, घने लक्की होवे है हिजड़े,’

उत्तेजना में मीता एकाएक दरिया-दिल हो उठी थी, उसने अड़ौसियों-पड़ौसियों को गैरेज के बगल वाली गली से पीछे के उद्यान में पहुंचकर प्रदर्शन देखने की छूट दे दी थी।

‘मीता डार्लिंग, क..क..कार्पेट का तो स..स..सत्यानास हो ही चुका है और अब ग..ग..गार्डन का न जाने क्या ह..ह..हाल होगा,’ मकरंद ने पत्नी को आगाह किया।

‘डोंट वरी, मैक डार्लिंग, ऐसे मौक़े क्या बार-बार आते हैं? लेट अस पार्टी, जम कर।’ मैक हैरान था कि क्या यह सचमुच मीता ने ही कहा था?

अपने साथ लाए हुए संगीत और लेज़र-प्रकाश के उपकरणों को फ़िट करने के पश्चात वे चारों युवक अब प्रदर्शन के लिए तैयार थे।

‘दिस इज़ ऐन एनिवर्सरी प्रेजेंट फ़्रौम वर्षा एंड जुगल फ्रोम लास-एन्जेलस,’ कहते हुए कान-फोड़ संगीत के साथ युवक हौले हौले अपनी कमर नचाने लगे।

कैमिला, हैरी, बुलबुल, माला, दिनेश, डेज़ी, आयशा, रिचर्ड और मंजूषा को थिरकते देख गिरगिट, राजीव, वायु-सुमित, नैन्सी-नरेश भी नाचने लगे। दो मिनट भी नहीं गुज़रे होंगे कि एकाएक ‘सैक्स-बौम्ब’ गीत की धुन पर नाचते हुए युवकों ने एक-एक करके अपने कपड़े उतार कर युवतियों पर फेंकने शुरू कर दिए। मेहमानों में एक अजब सी उत्तेजना पैदा हो गयी थी। युवतियां ’मोर’ ‘मोर’ चिल्ला रही थीं और नर्तक-युवक उन्हें आलिंगन में ले-लेकर चुम्बन दे रहे थे।

अब युवक सिर्फ़ अपने जांघियों बो-टाइज़ में नाच रहे थे। वाद्य-संगीत अपनी चरम सीमा पर आया तो एकाएक युवकों ने अपने जांघिए कुछ पल के लिए नीचे सरकाऐ  और झट से फिर चढ़ा लिए।

‘ओ माई गौड, वाट दि हैल वाज़ दैट?’ कई आवाजें सुनाई दीं।

‘लाहौलविलाकुव्वत, हमें तो लगता है, जिया, के यही क़यामत है,’

‘आ शूँ जमानो आव्यो छे?’

‘हय राम, मैं तोसे कऊँ, आपा, जई है कलजुग,’ अचानक जिया को अपने पोते-पोती की फ़िक्र हुई, कैमिला और बुलबुल तो अपने आपे में ही नहीं थीं; कल्ला फाड़ कर वे ऐसे चीख-चिल्ला रही थीं कि जैसे उन पर भूत सवार हो।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, पुस्पा, हरी को तो देख, बिल्कुलै माईका लाल जै किसन की तरें नाच रा है,’ जिया ने देखा कि उनका दब्बू सा दिखने वाला पोता माइकेल जैक्सन की तरह थिरकते हुए जब तब अपना लिंग दबोच लेता था।

‘वंस मोर,’ ‘वंस मोर,’ चिल्लाती हुई बुलबुल, मंजूषा, डेज़ी, माला और आयशा युवकों को ललकारने लगीं कि वे अपना करतब एक बार फिर दोहराएं। युवकों ने भी चंचल और शोख़ युवतियों का अनुग्रह खुशी-खुशी स्वीकार किया और इस बार बाकी की महिलाएं भी ‘ओए’ ओए’ कहते हुए शोर मचाने लगीं। राजीव, रंजीत, गिरगिट और नरेश आदि ने सीटियाँ बजा कर युवकों और महिलाओं का मनोबल बढ़ाया।

तभी आपा और पुष्पा मौसी की नज़र यकायक कैमिला पर पड़ी जो एक गोरे लड़के के सीने से चिपकी और उसकी आँखों में कहीं गहरे झाँकते हुए नाच रही थी।

‘लाहौलविलाकुव्वत, जिया, ये कमीला किस लौंडे के गले में हाथ डाले नाच रई है?’ आपा ने पूछा तो जिया का दिल बैठ गया।

‘ऐ मै तोसे कऊं, आपा, आजकल की छोरियों को तो बिल्कुलै सरम-लिहाज नईं रा,’

‘जो है सो है, जिया, नेक अपने बेटा-बऊ को तो खबर कर दो, हमें तो ये छोरा किसी करम का नईं लग रा,’ घबराई हुई पुष्पा मौसी ने भी अपनी सहेली को नेक सलाह दी। जिया जानती थीं कि कैमिला उनकी तो क्या, अपने माँ-बाप की भी नहीं सुनने वाली। अपनी बेचारगी ज़ाहिर करते हुए जिया ने इशारे से उन दोनों को चुप रहने का संकेत दिया तो आपा मुंह बिचका कर वहाँ से चली गईं।

मीता और मकरंद को अपना ही होश नहीं था; वे एक दूसरे के सीने से चिपके हुए ‘लेडी इन रेड’ की धुन पर हिलने-डुलने का प्रयत्न कर रहे थे, जिसकी फ़रमाइश मीता ने नीली आँखों वाले युवक से ख़ासतौर पर की थी।

युवक-युवतियां तो एक तरफ़, मोहिनी-मिक, वायु-सुमित, नैन्सी-नरेश, सुरभि-सुरेन्द्र, करन-चित्रा, माला-दिनेश, सभी जोड़े नृत्य के नाम पर बस हिल-डुल रहे थे।  इला और कुलभूषण को भी घसीट लाया था राजीव। कुछ देर अपने हाथ बदन से चिपकाए और भीड़ का धक्का-मुक्की सहने के बाद, वे दोनों धीरे-धीरे ताल में बहने लगे थे। मंजूषा को अपनी ओर आते देख इला ने राजीव को अपने आगोश में ले लिया और अपना सिर उसके कंधे पर टिका कर नाचने लगी। मंजूषा को मजबूरन कुलभूषण का साथ देना पड़ा। कुछ देर के अटपटेपन के बाद, दोनों जोड़ों के तारतम्य स्थापित होने में अधिक देर नहीं लगी।

पीछे के बाग़ में अड़ोसी-पड़ोसी और उनके बच्चे मोबाइल-फ़ोन्स की रौशनी में नाच रहे थे। मीता की इजाज़त लिए बिना, बाग़ की मेजों पर मकरंद ने बीयर की बोतलें खोल कर रख दी थीं; बच्चों के लिए कोक और केक भी सजा दिए थे; उसकी दरियादिली की पड़ोसी तारीफ़ करते नहीं अघा रहे थे।

इसी बीच, हैरी ने अपनी डांसिंग-लाइट्स और साउंड-उपकरण बीच वाली बैठक में फिट कर लिए; कुलदीप और सतनाम की कारों से भांगड़ा नृत्य के सीडीज़ लेकर वह बिलकुल तैयार था कि कब उन युवक-नर्तकों का एक घंटे का कार्यक्रम समाप्त हो और कब वह अपनी करामात दिखाए।

छत पर लगाई गयी हैरी की लेज़र-गेंद रंग-बिरंगे सितारे दीवारों और ज़मीन पर फेंकने लगी जो टप्पा खाकर नाचते हुए वापिस गेंद में जज़्ब हो जाते थे। भांगड़ा संगीत अपने पूरे ज़ोर-शोर के साथ शुरू हो गया तो वे लोग, जो अंग्रेज़ी धुनों पर हिलते-डुलते बोर हो चुके थे, एक नए उत्साह के साथ नाचने लगे।

‘जो है सो है, उठो अम्मा, आज तो तुम बौत बैठ लीं,’ कहते हुए पुष्पा-मौसी ने अम्मा को ज़बरदस्ती उठा कर खड़ा कर दिया और उनके दोनों हाथ थामें वह कूदने फांदने लगीं।

ऐ मैं तोसे कऊं, पुसपा, बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम…’ मुंह में पल्लू ठूंसे जिया उन दोनों पर हंसने लगीं।

‘जो है सो है, जिया, मन-मन भावे, मूढ़ हिलावे वाली बात तो इब हमसे करो मति, अरे अब नईं नाचोगी तो फेर कब नाचोगी? इहाँ तुमें कोई नईं देख रा, चलो उठो,’

तभी, अमिताभ बच्चन की तरह मंद गति से नाचते हुए राघव बेनावारी जिया के सम्मुख आ खड़े हुए और उनसे इशारे में खड़ा होकर नाचने का अनुरोध करने लगे।

‘ए मैं तोसे कऊं, रग्गु, बिलायत आए के कईं तुमारा दिमाग तो नाय फिर गवा?’ अपना पल्लू मुंह में दबाए वह हिचकियाँ लेते हुए हंसने लगीं।

एकाएक राघव बेनावरी ने जिया के दोनों हाथ पकड़ कर उन्हें खड़ा कर लिया। बाहर वाली बैठक में केवल बड़े-बूढ़े और पड़ोसी ही थे, इसलिए जिया की भी थोड़ी सी हिम्मत बंधी हालांकि वह शर्म से चूर थीं।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, रग्गु,’ दोहराते हुए जिया अपने को हिलाने डुलाने का प्रयत्न करने लगीं किन्तु उनकी टांगों ने हिलने से साफ़ इनकार कर दिया। उन्हें सहारा देने के लिए राघव ने अपने एक हाथ से जिया का कंधा थामा तो दूसरे से उनकी कमर, जिया का शरीर मानों झनझना उठा।

‘लाहौविलाकुव्वत, जब पकी उम्र वाले ही शर्मो-हया को ताक पर रख दें तो बहु-बेटियों को हम क्या इलज़ाम दें?’ आपा ने असंतुष्टि और अस्वीकृति में अपना सिर हिलाते हुए सोमा की माँ की तरफ़ देखा, जो कुर्सी पर बैठी नाच का आनंद ले रही थी; वह क्या कहतीं? कहतीं भी तो आपा की समझ में क्या आता? उनके झुमकों ने एक ज़ोर का ठुमका लगाकर सोमा की माँ को उनकी बुज़दिली के लिए धिक्कारा।

जिया के आनंद का पारावार न था किन्तु जहां तक नृत्य का सम्बन्ध था, शर्माती, सकुचाती और हिचकियाँ ले लेकर हंसती हुई जिया, अपने हाथ हवा में ऐसे फेंक रही थीं कि जैसे कबूतर उड़ा रही हों।

 

 

 

पुनश्चः

 

‘मैक, हौसला रख, भैय्या, बड़ी किस्मत वाली थीं हमारी जिया, कैसे हंसती, नाचती गाती गयीं, हैं न?’ अपनी नाक और आँखों को टिशु से पोंछती हुई नैन्सी सुबकते हुए मकरंद को ढाढस बंधा रही थी। बौखलाई हुई मीता के दोनों हाथ थामें वायु भी सिसक रही थी।

‘तुम्हारी ग्रैंडमाँ तुम दोनों को बहुत प्यार करती थीं, यू मस्ट बी सो प्राउड औफ़ हर!’ कहते हुए सुमित और नरेश कैमिला और हैरी को चुप कराने का प्रयत्न कर रहे थे, जो अपने पिता से चिपके हुए रो रहे थे।

‘मैक-मीता, आप दोनों और बच्चे सचमुच बड़े भाग्यशाली हैं कि जिया जैसी पवित्र आत्मा की छत्रछाया आप पर रही। भाई मैक ने उन्हें अपने सिर आँखों पर रखा तो मीता जी ने उन्हें अपनी सगी माँ से भी ज़्यादा प्यार और इज्ज़त दी। उन्होंने मुझे कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि मेरी अपनी माँ नहीं हैं। मोहिनी तो जब तक दिन में दो या तीन बार जिया से फ़ोन पर बात नहीं कर लेती थी, उसे चैन नहीं आता था।’ अपना सिर ज़ोर-ज़ोर से हिलाते हुए मोहिनी ने पति का समर्थन किया; वे दोनों जिया के पार्थिव शरीर के दाएं और बाएँ हाथ जोड़े बैठे थे।

‘मीता, जिया के सिरहाने जोत जला दो। उनकी आत्मा तेरह दिनों तक इसी स्थान पर निवास करेगी,’ अपने जुड़े हुए हाथ माथे पर रख मोहिनी ने मीता को निर्देश दिया; मकरंद जिया का सिर अपनी गोदी में लिए फूट फूट कर रोने लगा।

‘मकरंद, धीरज रखो। इस पृथ्वी पर जो भी जन्म लेता है, उसकी मृत्यु अवश्यंभावी है पर उसका पुनर्जन्म भी उतना ही निश्चित है जैसे कि फूल खिलते हैं, मुर्झा जाते हैं और फिर खिलते हैं,’ मिश्रा जी ने मकरंद का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा तो उसे कुछ राहत महसूस हुई।

मीता को लगा कि कहीं वह दुस्वप्न तो नहीं देख रही थी; पुलिस, फ़ायर-ब्रिगेड, ऐम्बुलेंस और अब जिया की मौत – सब के सब एक ही दिन में? मकरंद का कहा मान लेती तो वे इस वक्त स्विटज़रलैंड में बैठे मज़े कर रहे होते।

‘हमउ इकल्ले छोड़ के तुम कइसे औफ़ हय गईं, जिया? एक तुमी तो थीं, जो है सो है, जिनसे हम अपनी भासा में गप्प मार के नेक जी बहला लेते थे। चलती बेर हमसे बाय तक नाय की, जिया। अरे हमें बी अपने संग ले चलतीं…,’ अपना माथा ठोकते हुए पुष्पा मौसी बुड़बुड़ा रही थीं।

‘खुदा के वास्ते, खुद पर काबू रखिए, पुष्पा मौसी, और इंशा अल्लाह जिया के लिए दुआ मांगिए कि अल्लाह ताला उन्हें जन्नत बख्शे, उनकी रूह को सुकून से नवाज़े,’ आपा ने पुष्पा मौसी को गले लगा कर उन्हें हौसला देते हुए कहा।

चांदी की थाली में गुलाब के फूलों के बीच जलती हुई जोत और धूपबत्तियां लिए मीता बैठक में पहुँची ही थी कि ऐम्बुलेंस का सायरन सुनाई दिया। मीता के हाथ से थाली लेकर इला ने जोत को लाश के पीछे रखी मेज़ पर रख दिया और धूपबत्तियां दूसरे कमरे में रख आई; कुछ मेहमानों को धुंए से एलर्जी हो सकती थी।

पैरामैडिक्स ने मेहमानों से बैठक के बाहर जाने का अनुरोध किया। इला ने, जिसने जिया को आर्टिफिशियल रेस्पीरेशन देकर जिलाने की कोशिश भी की थी, पैरामैडिक्स को सूचित किया कि जिया को प्राण त्यागे लगभग दस-बारह मिनट हो चुके थे। आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करने के बाद उन्होंने जिया की लाश को एक प्लास्टिक के बैग में सील कर स्ट्रेचर पर रख दिया।

‘जिया, र..र..रुको जिया, र..र..रुको, म..म..मैं आ र..र..रहा हूँ,’ मकरंद ऐम्बुलेंस के पीछे भागा। मीता ने हैरी और कैमिला से अपने पिता को लिवा लाने के लिए भेजा; वह जानती थी कि इस समय वह और किसी की नहीं सुनेगा।

सड़क के बीचों-बीच, पड़ोसियों और मेहमानों से घिरे खड़े, मकरंद और बच्चे रोते हुए एक दूसरे को दिलासा देने का प्रयत्न कर रहे थे।

गैरेज के बाहर खड़ा गिरगिट मोबाइल पर किसी से बातें कर रहा था।

‘बड़े भाई, आप कहाँ गा़यब हो गए? मैं तुम्हें ढूँढता फिर रहा था…फ़ोन तो उठाते वर्षा ने तो भई कमाल ही कर दिया, क्या फड़कता हुआ आइटम भेजा के… और सुनो, जिया…’

‘तू अपनी ही गाता रहेगा, छछूंदर की औलाद, या फिर कुछ मेरी भी सुनेगा?’ घड़ियाल गुर्राया।

‘हाँ हाँ बोलो न, तुम हो कहाँ, यहाँ क्या क्या न हुआ और अभी अभी जिया…’

‘तुझे तो यह भी नहीं मालूम कि मैं जेल में हूँ…’

‘वाट?’

‘इला और राजीव के बहकावे में आकर प्रिया ने मुझ पर रेप का झूठमूठ इलज़ाम लगाया है,’ घड़ियाल ने बताया।

‘वाट?’ गिरगिट को विश्वास नहीं हो रहा था कि उसके घर में रहते हुए इतना बड़ा काण्ड हो गया और उसे कुछ पता तक नहीं चला।

‘वाट वाट क्या लगा रखी है? मैं ज़्यादा देर बात नहीं कर सकता, तू वाटफर्ड पुलिस स्टेशन में आकर जल्दी से मेरी बेल भर दे, प्लीज़, मैं बाहर आते ही तेरे पैसे लौटा दूंगा,’ घड़ियाल गिड़गिड़ाया।

गिरगिट ऐसा भी बेवकूफ़ नहीं था कि उसकी बातों में आ जाता। इला और राजीव से वह ऐसी आशा नहीं कर सकता कि वे घड़ियाल को बेकार में फंसाएंगे। खैर, उसके दिमाग़ के घोड़े तेज़ी से दौड़ने लगे; सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।

‘बड़े भाई, तुम्हारे लिए गुड न्यूज़ यह है कि जिया स्वर्ग सिधार गईं,’

‘क्या बकवास कर रहा है, राजेश? मैं यहाँ जेल में सड़ रहा हूँ और तुझे मज़ाक सूझ रहा है…’

‘मज़ाक नहीं कर रहा हूँ, बड़े भाई, बस अभी पंद्रह मिनट पहले, जिया नाचते गाते स्वर्ग सिधार चुकी हैं और फ़ैमिली में किसी की डेथ हो जाने पर परोल मिल जाती है, तुम्हें बस थोड़ी सी एक्टिंग करनी होगी,’

राजीव और मीता को अपनी ओर आते देख गिरगिट ने बिना घड़ियाल का जवाब सुने फ़ोन बंद कर दिया।

‘यह क्या हो गया, भाभी जी? जिया को भी आपकी वेडिंग एनिवर्सरी के दिन ही गुज़रना था। खैर, खुदा को जो मंज़ूर।’ अपने हाथ ऊपर उठाए और आसमान की ओर देखते हुए गिरगिट बोला, ‘खैर, कुछ काम हो तो मुझे बताइए,’

‘राजेश, भाभी जी और मैक भाई साहब अभी इस हालत में नहीं हैं कि फ्यूनरल के बारे में सोच भी सकें, हमें ही…’

‘मैक भाई और जिया बहुत क्लोज़ थे, जिया की डेथ से वह न जाने कैसे डील कर पाएंगे? भाभी जी, उन्हें तो बस आप ही संभाल सकती हैं,’ अपने हाथ मलते हुए गिरगिट बोला।

‘राजीव, आप प्लीज़… फ्रेंड्स…रिलेटिव्स…’ मीता के दिमाग़ में जैसे रुई भरी थी; जिसमें शब्द उलझ के अंधे हो गए थे।

‘डोंट वरी, मीता जी, आप अपने फ्रेंड्स और फ़ैमिली के कॉन्टैकटस बस इला को दे दीजिए, वह सबको फ़ोन पर इन्फॉर्म कर देगी।’

‘इंडिया में रिश्तेदारों को मैं इन्फॉर्म कर देता हूँ, मेरे पास सबके नंबर हैं,’ तभी गिरगिट का मोबाइल बजने लगा, वह जानता था कि कौन होगा, ‘मैं अभी शुरू हो जाता हूँ,’ कहते हुए वह जल्दी से अंदर वाली बैठक में जा बैठा, जहां लैंडलाइन का फ़ोन लगा था; वह अपने मोबाइल का खर्चा बचाना चाहता था।

‘मीता जी, बस एक बात आपसे पूछनी थी; फ्यूनरल का अरेंजमेंट सैमेटरी में ही करना है न?’

‘…और कहाँ?’  मीता ने पूछा।

‘ठीक, सभी हिन्दूज़ ऐसा ही करते हैं, जिया…बॉडी को मॉर्चरी से घर लाकर यहीं से प्रोसैशन सैमेटरी के लिए रवाना…’

‘किड्स अभी छोटे हैं, बॉडी को घर लाना ठीक नहीं होगा…,’ मीता कुछ और भी कहना चाहती थी पर चुप हो गयी।

‘आप ठीक कह रही हैं, मोर्नर्स को सीधे सैमेटरी में ही बुला लेंगे; दो एक हफ़्तों बाद आप घर में हवन-ववन करवा लीजिएगा,’

‘…तो मैं सैमेटरी, पंडित जी, कार्स और फ्लोरल-ट्रिब्यूटस आदि की बुकिंग कर दूं? हफ्ता दस दिन का नोटिस तो हमें उन्हें देना ही पड़ेगा।’ मीता को ख़ामोश देख कर राजीव ने बात आगे बढ़ाई।

‘जो तुम ठीक समझो, राजीव,’ मीता का दिमाग़ न जाने कहाँ था पर इंतज़ाम के लिए राजीव को तफ़सील तो चाहिए ही थी।

‘मेरे हिसाब से, मैक भाई साहब, नैंसी दीदी और वायु जी बॉडी के साथ एस्टेट-कार में बैठकर जा सकते हैं। मैं दो लिमोसींस ऑर्डर कर देता हूँ, एक में बच्चों के साथ आप और दूसरी में घर के बाकी लोग…,’ लिमोसींस के नाम से ही मीता के कान खड़े हो गए।

‘एक लिमोसीन काफ़ी है, राजीव, बाक़ी सबके पास अपनी कारें हैं, थैंक यू, राजीव, सो मच, सचमुच…,’

‘ओके, मीता जी, मैं सब अरेंज कर लूंगा, आप तो बस मैक भाई साहब और बच्चों को सम्भालिए,’

मीता सोच रही थी कि मैक को ढाढस बंधाने के बहाने नैंसी और वायु जिया के कमरे में वसीयत ढूंढ रही होंगी या मैक के कान भर रही होंगी। फ्यूनरल के इंतजाम की किसी को फ़िक्र नहीं। सबके सब ऊपर जा बैठे हैं, कोई तो नीचे भी होना चाहिए मेहमानों के साथ। एक मन हुआ कि ऊपर जाकर उन सबकी खबर ले किन्तु वह वापिस बैठक में मेहमानों के बीच आ बैठी।

‘न कोई कम्प्लेंट, न कोई तकलीफ़; ऐसे अचानक…’

‘बचने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी, मैस्सिव हर्ट-अटैक था,’

‘यूके के लोगों की औसत उम्र अस्सी साल है, जिया तो अभी बहत्तर के आसपास की ही थीं, कुछ जल्दी नहीं चली गईं?’ सुमित ने पूछा।

‘अपनी जिया तो भई टिपिकल इन्डियन थीं, इंडिया में लोगों की औसत उम्र यहाँ के मुकाबले बहुत कम है,’ नरेश बोले।

‘एब्राहिम लिंकन ने एक बार कहा था कि यह महत्वपूर्ण नहीं कि आप कितने साल जिए, महत्वपूर्ण यह है कि आप कैसे जिए।’

‘खुदा न ख़ास्ता, क्या ज़रुरत थी जिया को नाचने कूदने की?’ शमीम ने पूछा, जो जिया की मौत की ख़बर सुन कर आधे रस्ते से ही लौट आई थीं।

‘वो तो इंकार कर रही थीं पर राघव साहब नहीं माने। खुदा न खास्ता ज़बरदस्ती उठा कर उन्हें खड़ा कर दिया,’ आपा ने बताया।

‘तो अच्छा ही किया न, आपा, ऐसी हैप्पी एंडिंग किसको नसीब होती है?’ मैनूं ने कह तो दिया किन्तु गुस्सा तो उसे अपने ससुर पर आ रहा था; क्या ज़रुरत थी तमाशा खड़ा करने की? इस बात को अब सदियों तक बार बार दोहराया जाएगा।

‘मैंनू मरा ठीक ही कै रई है, आपा, लोग तो पैर रगड़-रगड़ के मरते हैं, लेटे लेटे बदन में मरे कीड़े पड़ जाते हैं…,’

‘आप दुरुस्त फ़रमा रही हैं, मोहिनी बीबी, पर उनके ठुल्ला क्लब का क्या हश्र होगा? यह उनकी आख़िरी ख्वाहिश थी,’ शमीम बोली।

‘इंशा अल्लाह, जिया की खिराजे अक़ीदत की ख़ातिर यह काम पुष्पा मौसी को ही संभालना होगा,’ मुंह में पान ठूंसती हुई जिया बोलीं। तभी मकरंद विलापियों के बीच आ बैठे।

‘मैक डार्लिंग, आई हैव मेड अप माई माइंड, इस क्लब का नाम हम ‘जानकी क्लब’ रखेंगे,’ एकाएक मीता ने शोक विह्वल पति का हाथ सहलाते हुए घोषणा की। परिणामस्वरुप, मकरंद में प्राणों का संचार हुआ, उसके चेहरे पर रौनक लौटने लगी।

‘साला हियर, हियर, जिया के लिए यह हम सबकी भैंचो सच्ची श्रद्धांजलि होगी,’ मीता के प्रस्ताव पर रंजीत की मोहर लगते ही गीदड़, मोहिनी और मोहन ने भी फ़टाफ़ट अपनी सम्मति प्रकट की।

‘पापा कैन आल्सो हेल्प, हैं न पापा?’ डूबते हुए जहाज को बचाने के लिए मैनूं ने ससुर का कंधा हिलाते हुए पूछा; उन्हें तो जैसे कुछ सूझ ही नहीं रहा था।

‘जो है सो है, बिन जिया के म्हारी लाइफ़ में तो अबउ कछु नाय बचो है, क्या कैते हो, रग्गु जी? अप्पन यई करें?’ पुष्पा मौसी ने बड़ी आस से राघव को देखते हुए पूछा कि जैसे उनके जीवन का दारोमदार राघव के जवाब पर टिका हो।

‘आप ठीक कह रही हैं, पुष्पा जी, जब तक है दम, अब यही सही,’ तन और मन से टूटे हुए नीमसंजीदा राघव जी धीरे से बोले।

‘रग्गु जी, अबै तुम ये सोच-सोच के हैरान नाय होओ के तुम जिया से नाचने को नाय कैते तो वो जिन्दा होतीं…’

‘इंशा अल्लाह, आप बिलकुल ठीक फ़रमाँ रही हैं, पुष्पा मौसी, हमारी एक एक साँस का हिसाब अल्ला ताला के ख़ाते में दर्ज है,’ शमीम ने कहा।

‘लेट अस लीव नाउ, मेज़बानों को हमें साला अकेला छोड़ देना चाहिए, दे नीड टू डील भैन्चो विद डिसास्टर,’ कहते हुए रंजीत उठ खड़ा हुआ।

‘जो है सो है, बऊ, तेरवीं तक यह जोत नाय बुझने पाए और सुनो, आज सब इसी जग्गे सोना, इकट्ठे होकर,’ पुष्पा मौसी ने उठते हुए सलाह दी तो एकाएक मीता घबरा उठी।

‘पुष्पा मौसी, इतनी रात को आप कहाँ अकेले जाएँगी, यहीं सो जाइए,’ मीता ने पुष्पा मौसी की मनुहार की। वह बहुत अकेली हो उठी थी; नैन्सी और वायु के साथ मकरंद और बच्चे जिया के कमरे में थे।

‘जो है सो है, म्हारा बी जी नाय है जाने का। हमउ पूरी रात यईं बैठके गीता का पाठ करेंगे,’ कहते हुए पुष्पा मौसी अम्मा के साथ सोफे की टेक लगा कर कारपेट पर बैठ गयीं।

‘फ्यूनरल के अरेंजमैन्टस के बारे में हम आप सबको टैक्स्ट से सूचना दे देंगे,’ राजीव विदा लेते हुए मेहमानों से कह रहा था।

‘मीता, तुम्हीं को सम्भालना है सब, में गौड गिव यू स्ट्रेंथ,’

‘कुछ काम हो तो बताना, मीता, डोंट यू हैज़िटेट,’

‘मीता, हम जिया के लिए प्रे करेंगे,’

‘मुझे तो लगता है के जिया जहां भी हैं, खुश हैं,’ मैनूं ने कहा।

‘मैंने तो सुना है के रोने पीटने से आत्मा को बहुत कष्ट पहुँचता है,’ सोमा अभिशंसा के साथ बोली।

‘हां, यह लेटेस्ट थ्योरी है। हमें वही करना चाहिए जो जिया को पसंद था, जिन बातों से उन्हें खुशी मिलती थी,’ मंजूषा बोली।

‘तुम मरा ठीक कह रही हो, मंजूषा, उन्हें सत्संग कीर्तन मरा इतना पसंद था के हमसे वो हमेशा भजन गाने की मरी फ़रमाइश किया करती थीं,’ मोहिनी के इस प्रस्ताव पर मेहमानों के कान खड़े हो गए।

‘जो है सो है, मोइनी, अबै हम भजन गावेंगे तो उनकी आत्मा को शान्ति मिलेगी…,’ पुष्पा मौसी ने अभी अपनी बात भी पूरी नहीं की थी कि मोहिनी ने गाना शुरू कर दिया कि मीता उसे कहीं फिर न टोक दे।

‘प्रेम मुदित मन से कहो राम, राम, राम, श्री राम, राम, राम,’ हाथ जोड़े मोहन भी वहाँ आ बैठे और ज़ोर-ज़ोर से ‘श्री राम, राम, राम’ दोहराने लगे।

बीच से उठ कर जाना बुरा लगता, इसलिए बाकी के मेहमान भजन शुरू होते ही उठ खड़े हुए, मोहिनी और मोहन को यह नागवार गुज़रा।

‘मैक, मीता, अपना और बच्चों ध्यान रखना, वी विल बी इन टच,’ एक बार फिर से विदा लेते हुए लोग धीरे-धीरे बाहर सड़क पर आ इकट्ठे हुए; कुछ मेहमान एक दूसरे की कारों में बैठकर बातें करने लगे क्योंकि ठंड कुछ बढ़ गयी थी।

पड़ोसी श्रीनिवासन ने मेहमानों के लिए अपने दरवाज़े खोल दिए थे, उनकी पत्नी भारत गयी हुई थीं सो मंजूषा, सायरा और इला ने उनकी रसोई संभाल ली। अलमारियां खोल कर खाने-पीने का सामान ढूंढ लिया गया था, मसाला लगे काजू, चिप्स और रोस्टेड मूंगफलियां प्लेटों में घुमाई जा रही थीं। गर्मा-गर्म चाय और कॉफी के साथ बातें रोचक हो उठीं। दरियादिली दिखाते हुए रंजीत अपनी कार में से विस्की, वोदका और जिन की बोतलें निकाल लाया था; यह शुभ समाचार सुनकर बहुत से अन्य मेहमान भी वहाँ आ पसरे।

‘रात को मैं लोगों को डिस्टर्ब नहीं करना चाहता, सुबह फोन करूंगा,’ कहते हुए गिरगिट भी वहाँ धरा; सुमित और नरेश उसके पीछे ही थे क्योंकि नैन्सी और वायु आज मैक के यहाँ ही रुकने वाली थीं।

‘मुझे नहीं लगता के जिया ने कोई विल-शिल छोड़ी है, उनके पास देने को बचा ही क्या था?’ नरेश बोले।

‘क्यों, कानपुर वाली कोठी का क्या हुआ?’ सुमित ने पूछा।

‘बड़े भाई, जिया को अपने साथ रखने की एवज में मैक और मीता ने जिया से कोठी के दो तिहाई हिस्से पर अपना नाम लिखवा लिया था,’ गिरगिट ने बताया।

‘तो क्या मैक के भाई-भाभी राज़ी हो गए?’ नरेश ने पूछा।

‘बड़े भाई, दोनों भाइयों के बीच गहरी दरार पड़ गयी है और इसी बात को लेकर जिया बहुत परेशान थीं पर मीता भाभी के आगे उनकी एक नहीं चली,’

‘मैक के बड़े भाई तो बेचारे बरसों से बीमार हैं, उन्हीं को दे देते तो इनका क्या जाता? इनके यहाँ किस बात की कमी है?’

‘खैर, हमें क्या? जैसा वो चाहें, हमें तो बता दें कि फ्यूनरल कहाँ हो रहा है…’

‘जिया चाहती थीं कि उनका फ्यूनरल इंडिया में हो,’

‘बौडी को इंडिया ले जाना आसान है क्या?’

‘मैक और मीता की तो बहुत जान पहचान है, उनका तो यहीं बैठे बैठे सब इंतजाम हो जाएगा,’

‘अब तो ब्रिटिश सरकार ने हिन्दुओं को अपने मुर्दे खुली चिता पर जलाने की भी इजाज़त दे दी है,’

‘अच्छा ही है, इतना खर्चा करने का फ़ायदा भी क्या? सोने चांदी के कुंडे लगे महंगी लकड़ी के ताबूत को भी तो भाड़ में ही झोंकना है,’

‘इस मामले में इंडिया बहुत एनवायरनमेंट फ्रेंडली है, एक चादर में लपेट कर डेड-बॉडी को चिता पर रख देते हैं,’

‘बहुत से अमेरिकनों ने अपने शवों को सुरक्षित रखने का प्रबंध करवा लिया है ताकि टैक्नौलोजी के डेवेलप होने पर उन्हें जिला लिया जाऐ,’ सुमित ने बताया।

 

‘ऐसा क्या है मानव शरीर में कि उसे हमेशा जीवित रखा जाऐ? गांधी, मदर टेरेसा या मार्टिन लूथर किंग जैसे लोगों को सुरक्षित रख पाते तो और बात थी,’ मिश्रा जी ने अपनी राय दी।

‘आई होप के जिया ने कम से कम अपनी आइज़ डोनेट कर रखी हों,’

‘मुझे तो इसकी बिलकुल आशा नहीं है। जिया को पक्का विश्वास था कि उन्हें जलाने से पहले यदि उनकी आँखें निकाल ली गईं तो अगले जन्म में वह अंधी पैदा होंगी,’ इला ने बताया।

‘वाट ऐ ब्लडी वेस्ट!’

‘मैंने तो साली अपनी पूरी बॉडी ही डोनेट कर दी है, भैन्चो मरने के बाद वो इसका चाहें तो साला पिक्कल बना लें,’

नौ बजने को थे पर हर तरफ़ उजाला था। बातों का सिलसिला टूट टूट के जुड़ रहा था। रात को पीछे धकेलती हुई, बातों भरी शाम एक वृहत ग़ुब्बारे की तरह फैलती चली जा रही थी; जिसके फूटने के कोई आसार नज़र नहीं आ रहे थे।

समाप्त

- दिव्या माथुर

दिव्या माथुर 1984 में भारतीय उच्चायोग से जुड़ीं, 1992-2012 के बीच नेहरु केंद्र में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी रहीं और आजकल भारतीय उच्चायोग के प्रेस और सूचना विभाग में वरिष्ठ अधिकारी हैं। रौयल सोसाइटी की फ़ेलो, दिव्या वातायन कविता संस्था की संस्थापक और आशा फ़ाउंडेशन की संस्थापक सदस्य हैं।

कहानी संग्रह - आक्रोश (पद्मानंद साहित्य सम्मान, हिन्दी बुक सैंटर, दिल्ली), पंगा और अन्य कहानियां (मेधा बुक्स, दिल्ली), 2050 और अन्य कहानियां (डायमंड पौकेट बुक्स, दिल्ली) और हिन्दी@स्वर्ग.इन (सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली)।

अँग्रेज़ी में कहानी संग्रह (संपादन) – औडिस्सी: विदेश में बसी भारतीय महिला कहानीकारों की कहानियां (स्टार पब्लिशर्स), एवं आशा: भारतीय महिला कहानीकारों की कहानियां (इंडियन बुकशैल्फ़, लन्दन)।

कविता संग्रह - अंतःसलिला, रेत का लिखा, ख़्याल तेरा, चंदन पानी, 11 सितम्बर, और झूठ, झूठ और झूठ (राष्ट्रकवि मैथलीशरणगुप्त सम्मान)।

अनुवाद - मंत्रा लिंगुआ के लिए बच्चों की छै पुस्तकों का हिंन्दी में अनुवाद : औगसटस और उसकी मुस्कुराहट; बुकटाइम, दीपक की दीवाली; चाँद को लेकर संग सैर को मैं निकला; चीते से मुकाबला और सुनो भई सुनो। नैशनल फ़िल्म थियेटर के लिये सत्यजित रे-फ़िल्म-रैट्रो के अनुवाद के अतिरिक्त बी बी सी द्वारा निर्मित फ़िल्म, कैंसर, का हिंदी रूपांतर। इनकी रचनाओं का भी विभिन्न भाषाओं में अनुवाद।

नाटक : Tête-à-tête और ठुल्ला किलब का सफल मंचन, टेलि-फ़िल्म : सांप सीढी (दूरदर्शन)।

सम्मान/पुरस्कार : भारत सम्मान, डॉ हरिवंश राय बच्चन लेखन सम्मान, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त प्रवासी भारतीय पुरस्कार, पदमानंद साहित्य सम्मान, प्रवासी हिन्दी साहित्य सम्मान, आर्ट्स काउंसिल औफ़ इंगलैंड का आर्टस एचीवर पुरस्कार, चिन्मौय मिशन का प्रेरणात्मक व्यक्ति सम्मान, इंटरनैशनल लाइब्रेरी ऑफ़ पोइटरी द्वारा पुरस्कृत कविता, बौनी बूंद ‘Poems for the Waiting Room’ परियोजना में सम्मलित, ‘दिव्या माथुर की साहित्यिक उपलब्धियाँ’ नामक स्नातकोत्तर शोध निबन्ध, ‘इक्कीसवीं सदी की प्रेणात्मक महिलाएं’, ‘ऐशियंस हू ज़ हू’ और विकिपीडिया की सूचियों में सम्मलित।

संप्रति : भारतीय उच्चायोग, लंदन, में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी।

 

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