एक शाम भर बातें

व्यंगात्मक उपन्यास : तृतीय भाग -> 

 

 ‘बिलकुल, बिल गेट्स की तरह धनी लोग यदि अपनी संपत्ति गरीबों से शेयर कर लें तो दुनिया में कोई दुखी न रहे।’ सुमित ने कहा।

‘अमीर इंडियंस तो अपने धन का इस्तेमाल लॉर्ड्स और बैरंस के ओहदे खरीदने के लिए करते हैं।’

‘और लॉर्ड्स बन कर वे सोचते हैं कि उन्हें तहज़ीबो-तमीज़ का ठेका मिल गया,’ आपा ने रंजीत की ओर देखते हुए तंज किया; उन्होंने हाल ही में सुना था कि रंजीत को लॉर्ड की उपाधि मिलने वाली है।

‘आपा, आप तो साली ख़ामोश ही रहें तो भैन्चो अच्छा रहेगा,’ तीर निशाने पर था; रंजीत को आग लग गयी।

लाहौलविलाकुव्वत, हमने ऐसा क्या कह दिया कि… होंठों पर हाथ रखे आपा अचकचा कर चुप हो गयी; इस मुर्दार से उन्हें पंगा नहीं लेना चाहिए था हसन अपना माथा पीट कर रह गया; उसकी नौकरी ख़तरे में थी

‘मिस्टर रंजीत, आप खुद को समझते क्या हैं? एक भद्र महिला से क्या ऐसे बात की जाती है?’ जैसे ही मोहन ने रंजीत की पीठ पर थपकी देकर कहा, रंजीत ने ग़ुस्से में गिलास की सारी व्हिस्की मोहन के चेहरे पर फेंक दी।

जल्दी में महंगे टिशूज़ वाला डिब्बा मोहिनी के हाथ में आ गया; ढेर सारे टिशूज़ निकाल कर वह मोहन का चेहरा और कुर्ता पोंछने लगी। मोहिनी को अपने रास्ते से हटाते हुए मोहन हाथ-पाँव फेंक रहे थे।

 

इसके पहले कि मोहिनी कुछ और महंगे टिशूज़ बर्बाद करती, मीता ने बड़बड़ाते हुए उसे टॉयलेट-रौल थमा  दिया, जो वह नीचे वाले रेस्टरूम में रखने के लिए लाई थी।

 

‘मरा रैने दो मीता, इनकी इत्ती मैंगी कमीज़ मरी बरबाद कर दी,’ मोहिनी को बहुत गुस्सा आया; उसके धर्मात्मा पति का मुंह पोंछने के लिए मीता को टॉयलेट-रौल ही मिला था?

‘मिक भाई, ॐ शांतिः शांतिः,’ गिरगिट अपने हाथ ऊपर उठाए एक बार फिर भीड़ के मध्य आ खड़ा हुआ।

यह एक नाज़ुक मसला था, मोहन और मोहिनी के सिवा रंजीत के ख़िलाफ़ कोई अपना मुंह खोलने को राज़ी नहीं था।  महंगे टिशूज़ का डिब्बा संभाले मीता अपना सिर पकड़ कर सोफ़े पर निढाल होकर बुदबुदाने लगी; ‘शेरा वाली माँ, मेरी पार्टी को बर्बाद होने से बचा लो,  जगदियां जोता वाली माँ, कोई भूल चूक हो गयी हो तो माफ़ करो…,’

‘वरी नौट भाभी जी, मैं हूँ न,’ गिरगिट को सामने खड़ा देखकर मीता की रही सही हिम्मत भी जवाब दे गयी।

रंजीत को दोष देते हुए मेहमान इधर उधर खिसकने लगे।

‘रंजीत जी ने खरी बात कह दी तो लोग बुरा मान गए। लोग किसी के पीछे हाथ धोकर पड़ जाएं तो कोई क्या करे? थोड़े से टिप्सी हो गए हैं, रंजीत जी, लोगों को इसका तो ख़याल रखना चाहिए।’ रंजीत को सुनाती हुई मंजूषा बोली।

‘टिप्सी होने के बावजूद, रंजीत छोटी छोटी बातें नोटिस करते हैं, हम सब देख कर चुप रहे पर उन्होंने साफ़ साफ़ कह दिया कि प्रभा को कोई तंग कर रहा है,’ सब जानते थे कि राजीव घड़ियाल की बात कर रहा था, जो इस वक्त गीदड़ बना जिया के पास बैठा था।

‘मैं तोसे कऊं, आपा, कम्बखत हमारे किसन जैसे भांजे को घड़ियाल बता रा था,’ जिया ने घड़ियाल की पीठ सहलाते हुए कहा।

‘लाहौलविलाकुव्वत, प्रभा कोई बच्ची थोड़े ही है, अगरचे आपसे बात नहीं करना चाहती थी तो मना कर देती,’ आपा बोलीं।

तभी, ऊपर की सीढ़ी पर खड़ी कैमिला चिल्लाई; ‘मम्मी..ई..ई…, पिक अप दी ब्लडी फ़ोन,’

‘कैमिला डार्लिंग, वाट हैपेंड?’ मीता ने रसोई में से झांकते हुए पूछा।

कैमिला ने अपनी बात दोहराई किन्तु मीता को कुछ सुनाई नहीं दिया। पाँव पटकती हुई कैमिला नीचे पहुँची।

‘जीतो आंटी इज़ इन हौस्पिटल, आस्क कुलदीप अंकल टू फ़ोन कुमार अंकल औन मोबाइल,’

‘डार्लिंग, हू इज़ इन हॉस्पिटल,’ हौस्पिटल का नाम सुन कर घबराई हुई मीता समेत कई अन्य मेहमान कैमिला के नज़दीक चले आए।

‘जीतो आंटी इज़ इन सेंट्रल मिडल्सैक्स हॉस्पिटल, मम,’ मेहमानों से घिरी कैमिला ने कुछ ठंडा होते हुए दोहराया। सभी की आँखे और कान कैमिला पर टिके थे।

‘माई डार्लिंग, डोंट वरी अबाउट ऐनीथिंग, ओके? मैं सब हैंडल कर लूंगी, गो नाउ, स्टडी करो,’ मीता ने कैमिला को आलिंगन में लेकर चूमना चाहा पर वह छिटक कर ऊपर भाग गयी।

सारे मेहमान अब अमृता और कुलदीप के आसपास आ जमा हुए। अमृता अपने मोबाइल फ़ोन पर कुमार से बात कर रही थी।

‘सुनो जी, कुमार त्वानू हिन्लीनग्डन हस्पताल विच सद रए ने,’ देर तक फ़ोन पर गिटपिट करने के बाद अमृता ने कुलदीप को बताया।

‘ओके, तुस्सी मेरी इदरे ही वेट करो, मैं वेख के आंदा हाँ,’ अमृता से कार की चाबियाँ लेकर कुलदीप बाहर भागा।

‘प्लीज़ कीप अस इन्फौर्मड, कुलदीप, हॉस्पिटल पहुँचते ही फ़ोन करना,’ मीता ने आग्रह किया। मेहमानों को भोजन तो नहीं पर एक चटपटा किस्सा ज़रूर मिल गया था।

‘अमृता, क्या यह वही जीतो है, जिसके बारे में आप लोग बात कर रहे थे?’

‘यह तो बताओ, अमृत, के हुआ क्या?’

‘कुमार कैंदे सी के ओहो सीढ़ी से डिग…,’

‘ओह, ज़रूर ज़्यादा चोट लगी होगी, तभी तो अस्पताल लेकर गए हैं…,’

‘घर की सीढ़ियों से लुढ़क कर इतनी चोट थोड़े ही आती है?’

‘ज़रूर किसी ने उसे धक्का दिया होगा,’

‘आई होप, प्रैगनैंट न हो; आजकल ऐसे किस्से बहुत सुनने में आते हैं,’

‘एक न एक दिन तो यह होना ही था…,’

‘मरे शराबी कबाबी बेटे से और मरी क्या उम्मीद की जा सकती है…?’

‘चलो बेटा बुरा निकला, कुमार्स को तो बहु का ख़याल रखना चाहिए था…,’

‘मैं तो कहती हूँ कि कुमार्स को जेल हो जानी चाहिए…,’

‘अमृता, जीतो की फ़ैमिली को तो मरी खबर कर दो,’ मोहिनी ने कहा तो अन्य मेहमानों ने भी उसकी हाँ में हाँ मिलाई।

‘कुल्ले को भैन्चो हॉस्पिटल तो पहुँचने दो, हो सकता है जीतो साली सही-सलामत हो,’ रंजीत झल्लाते हुए बोला।

‘बड़े भाई ठीक कह रहे हैं, अभी हमें उन्हें परेशान नहीं करना चाहिए…’

‘सुनेंगे तो बस रोएंगे, कुछ कर तो पाएंगे नहीं;’

छोटे-छोटे ग्रुप्स में बंट कर मेहमान वही बातें बार बार दोहराए जा रहे थे।

‘ऐ मैं तोसे का कऊं, पुसपा आ गयी,’ इस आड़े वक्त में जिया को दरवाज़े पर अपनी सहेली पुष्पा खड़ी दिखी तो वह चिहुंक उठी। ‘पुस्पा’ के बिना ‘पाल्टी’ का क्या मज़ा? बादामी और हरे रंग की मैक्सी और पंप-शूज़ पहने पुष्पा मौसी कपड़े के एक मटमैले थैले में लाल अंगूर लाई थीं, जो वह सकुचाए हुए सुदामा की तरह मीता और मकरंद से छिपा रही थीं। बिना किसी से दुआ सलाम किए वह सीधे जिया के पास पहुंच गई और फिर वे दोनों फुसफुसाती हुई पीछे के बाग़ में जा बैठीं।

पुष्पा मौसी को देख कर मीता का गुस्सा अपनी बुलंदी पर था; मकरंद का हाथ थामें और मेहमानों की ओर मुस्कुरा कर देखते हुए, वह बुदबुदाने लगीं, ‘एवरी नाउ एंड देन, मैं पुष्पा मौसी को चाय और स्नैक्स देती हूँ एंड लुक एट हर, ख़ाली हाथ लटकाए चली आईं। उन्हें हमें कौन्गरैचूलेट करने तक का टाइम नहीं है,’

‘आया जिया,’ कहते हुए मकरंद वहाँ से खिसक लिए।

‘ऐ मैं तोसे का कऊं, पुस्पा, तूने इत्ती देर कहाँ कर दी? कित्ते दिन बाद आई है री तू?’

‘जो है सो है, तुमे बताई तो थी के शनिश्चर को हम मंदिर में तेल चढ़ा कर आएँगे। और सुनो, तुमने हमसे काय नईं बताई के आज तुमारे बेटा-बऊ की सादी की सालगिरै है?’ उन्होंने अपनी मैक्सी को कुछ ऊंचा उठा कर बैठते हुए पूछा।

‘ऐ मैं तोसे का कऊं, पुस्पा, अब तू रिटारटेड (रिटायर्ड) है, सम्बल के खर्चा किया कर। तुजे बता देती न तो तू बाजार जाके अपनी अंटी खाली कर आती,’

‘जो है सो है जिया, तुमारे बेटा-बऊ का सोच रए होंगे के पुष्पा मौसी हाथ लटकाए चली आई, मुजे तो तुम जानो घनी शरम आ रई है,’

‘ऐ मैं तोसे का कऊं, पुस्पा, तू फिकर तो करै मति, मैं समजा दूंगी उने,’

”जो है सो है, तुमने आंख बनवाई थी न, उसका क्या हुआ?’

‘ऐ मैं तोसे का कऊं, आप्रेसन के बाद डागडर ने रेस्ट बताई थी सो बस्स तोड़ रए थे पिलंग, इसी लई कछु हजम नईं होता,’

‘जो है सो है, जिया तुमें सुगर भी तो है, तुम जानो टैम तो लगेगा, हैं के नईं? कछु दीखने लगा के नाय?’

‘नेक सा दीखै लगा है। तेरा फेस तो हमें बिलकुलै साफ नईं दीखता,’

‘अरे मारो गोली म्हारे फेस को, हमै तो तुम टिप-टॉप लग रइ ओ, तुम बी जीम-शीम जाने लगीं का?’पुष्पा मौसी हो हो करके हंसने लगीं।

‘मैं तोसे कऊं पुस्पा, जीम-शीम तो म्हारे बेटा-बऊ जावें हैं पेट घटाने के वास्ते। अरे, हिलोगे डुलोगे नईं तो ढोलक तो बजेगी ई बजेगी, नई का?’ जिया उचकियाँ सी लेते हुए हंसने लगीं।

‘नेक कान हियाँ तो लाओ जिया, सुना उज्जी की महतारी ने सादी कल्ली!’

‘हाय राम सच्ची का? ऐ मैं तोसे का कऊं पुस्पा, मति मारी गई है का उनकी?’

‘तो का मैं तुमसे झूठ कऊंगी? तुम जानो, म्हारी बऊ के साथ काम करै है न उज्जी की बऊ, उसी ने बताई। जो है सो है, सबै बेटा-बऊ का किया-धरा है।’ पुष्पा मौसी ने मैक्सी को खींच कर अपने पैर ढकते हुए कहा।

‘हाय राम पुस्पा, वो पचपन तो पार कर ई चुकी होएंगी, के नईं?’

‘तुम जानो, जिया, हमसे दो एक साल ई तो छोटी हैं, जो है सो है,’

‘ए मैं तोसे कऊं पुस्पा, बुढ़ापा काटना का आसान है, टैम काटे नईं कटता, ही ही ही..,’मुंह में पल्लू ठूंसे, जिया हिचकियाँ लेते हुए हंसने लगीं।

‘ऐ जिया, तो तुम बी कल्लो न अपना बियाह, जो है सो है, हो हो हो…,’ पुष्पा मौसी भी अपनी भौंडी आवाज़ में हंसने लगीं।

‘ए मैं तोसे कऊं पुस्पा, तेरी मति मारी गई है का, ही ही ही? हँसते हँसते जिया के आंसू निकल आए, जिन्हें अपना काला चश्मा उतारकर उन्होंने अपनी बांह से पोंछा।

‘जो है सो है, जिया, ये लो इस टिशू से पोंछो अपनी आँख,’ मौसी ने खट्ट से अपना 18वीं सदी का बटुआ खोला और उसमें से एक मूसा-मुसाया टिशू निकाल कर जिया को पकड़ा दिया।

‘रैने दे, कम्मखत ऐसा रफ है के किसी की इस्किन (स्किन) ही छिल जाए।’ तभी उन्होंने मीता और मकरंद को देखा, जो आपस में कुछ खुसपुस कर रहे थे।

‘डार्लिंग डार्लिंग करते डोले हैं दुई जन। हमने कई के इस सुब दिन अखंड पाठ रखवा लो पर म्हारे तो नेक दो सबद सुन के बी बेटा-बऊ राजी नाय हैं।’

‘जो है सो जिया, म्हारे बेटा-बऊ का बी सेम टू सेम हाल है। तुम जानो, बेटा बैड-टी ले जाये है बैड-रूम में, तब कईं जाकर महारानी जी बिस्तर से उट्ठे हैं,’

‘मैं तोसे कऊं पुस्पा, पोता-पोती को बी म्हारे लिये टैम नाय है। एक बेर हमने कई के बिटवा, अपनी भासा तो नेक सीक लो, तो बऊ ने कई के जिया बच्चन को कनै फूज (कन्फ्यूज़) नाय करो।’

‘हय राम जिया, जो है सो है, अपनी भासा सीकने से तुम जानो कोई कनैफूज होवे है का?’

‘वई तो, गुजराती, पंजाबी और उर्दू वाले नईं होते, म्हारे हिंदी वालों के बच्चे कनैफूज क्यूं हो जावें हैं?’

‘सो तो है जिया, हम तो देस के रए न बिदेस के, तुम जानो, थलिया के बैंगन की नाईं डोल रए हैं बस्स,’

‘मैं तोसे कऊं पुस्पा, खुदै बुलौवा भेजे था के आ जाओ बिलैत, घर की चौकसी करबे को, फंस गये हियां आके हम तो। अबै तो बापस जाने लायक बी नाय रए,’

‘वई तो, म्हारे जेठ के पोते का बियाह है। जो है सो है हमने कई के हम जावे के चाहें, फट मनै कर दी; हमारे लई हज्जार पौण्ड का खर्चा कौन करैं? तुम जानो, जी मार के बैठे हैं,’

‘मैं तोसे कऊं पुस्पा, म्हारा एक ई देवर है जैपुर में। उसकी पोती के बियाह में जाना तो दूर, म्हारी बऊ ने उन्हें एक लायलोन की धोती भिजवाय दी। ऐसी सरम आई के पूछो नाय।’

‘हय राम जिया, का सोचेंगे तुमारे देउर-देवरानी? जो है सो है, तुम्हारे बेटा-बऊ तो सुना है होली-डे पर जनमरी (जर्मनी) जा रए हैं।’

‘हमसे किन्ने पूछी? मैं तोसे कऊं पुस्पा, हमसे पूछते तो का हम इनके संग चल देते? इनके धोरे जनमरी जाने को पौण्ड हैं, अपने देस जाने को नाय,’

‘जो है सो है जिया। नेक उधर तो देखो, अपनी बिमला की बेटी मैंनू कैसी बक्खो बावली लग रई है?’

‘तोसे कऊं पुस्पा, बित्ता भर की छोकरी बरमी के गाम (बर्मिंघम) में दांतन की डागडरी कर रई है। एक बेर म्हारी दाढ़ दुख रई थी तो मैंनू से कई के बेटी जरा म्हारे मूँ में झांक ले। फटाक से बोली, किलनिक (क्लिनिक) में आओ तो देख देंगे। हमें का फायदा ऐसी डागडरी का? ऐ मैं तोसे कऊं, पुस्पा, मैंनू की सास नई दिख रईं,’

‘हाय राम जिया, तुमै नईं मालूम? मैंनू की सास तो तुम जानो परके साल ई औफ़ होय गईं थीं। तबई तो ससुर बिलैत बुला लिये, जो है सो है।’

‘मैं तोसे कऊं पुस्पा, कित्ती बड़ी बात है के सुहागिन मरीं, म्हारी-तुमारी तरह बिधवा होके बच्चन की छाती पे मूंग तो नाय दली,’

‘सो तो है जिया। हम एक दफै मैंनू की ससुराल गए थे। तुम जानो, ऐसी टहल की, का बताएं? बडक़ी ने तो म्हारे लई एक बिलौज (ब्लाउज़) बिनके भेजा, जो है सो है। तनिक चढ़ता नईं अब्ब, तुम जानो पन्द्रह साल पीछे देखा था न हमें।’

‘अरी पुस्पा, अबी कुछ टिकेंगे वो हियां?’

‘जो है सो है, मैंनू के ससुर की पूछ रई हो का जिया? हो हो हो,’

‘ए मैं तोसे कऊं, और कौन धरा है इहां पूछबै को? ही ही ही,’

‘जो है सो है जिया, अबै चानस है तुमारा, हो हो हो,’

‘ए मैं तोसे कऊं, पुस्पा, तुजे कछु सरम-लिहाज बी है के नाय, ही ही ही….’

‘लो, अब्बी तो तुम कै रईं थीं के कोई मिलै बी तो सई, हो हो हो’

‘मैं तोसे कऊं पुस्पा बऊ-बेटियों को तो देख, कैसे चिपक-चिपक के चूमा चाटी कर रईं हैं,’

‘अब जिया बात नईं पलटो तुम, जो है सो है, हो हो हो,’

‘मकरंद के लाला जीते रैते तो मजाल के म्हारे धोरे कोई फटक बी जाता। कोई दो बात बी कल्ले था तो फट डांट पड़ जावै थी।’

‘जो है सो है, जरा सोमा को तो देखो, कैसे अपने दूल्हे से चिपक के बैठी है?’

‘बेलच्छ्नी पेटीकोट-बिलौज पैन के चली आई है। मैं तोसे कऊं पुस्पा, एकै महीना तो हुआ है सादी को, न बिन्दी-सिन्दूर, न चूड़ियाँ न बिछिये,’

‘बिलौज-पेटिकोट नईं, जिया, मिनी इसकरट और टॉप।’

‘मैं तोसे कऊं पुस्पा, कम से कम पालटी में तो ढंग के कपड़े-लत्ते पैन के आना चईए, तुम जानो बख्खो बावली लग रई है।’

‘जो है सो है, जिया, मैंनू के ससुर पिचहत्तर बरस के तो होंगे ही? कैसे हैंड सम दीख रए हैं न, हो हो हो…,’

‘मैं तोसे कऊं, पुस्पा, तेरा दिमाग तो नईं चल गया कईं? ही ही ही….,’

‘जो है सो है जिया, मैंनू और उसके ससुर तो इदर ही चले आ रए हैं,’

‘हय राम पुस्पा, हमने तो आज धोती बी ढंग से नईं पैनी, और देखियो, चुटिया बनाने का बी टैम नईं मिला,’ जिया एक हाथ से अपनी धोती की चुन्नटें ठीक करने लगीं तो दूसरे हाथ से अपनी चुटिया।

‘जै राम जी की जिया, पुष्पा मौसी, कैसी हैं आप दोनों?’ मैनूं ने पूछा।

‘जो है सो है, जीती रओ बेटी, बौत दिन में दीखी आज,’ पुष्पा बुआ बोलीं किन्तु जिया को मानो सांप सूंघ गया था।

‘मौसी, इनके पापा आये हुए हैं न आजकल यहां। बस इन्हें घुमा-फिरा रहे हैं लन्दन। पापा, इनसे मिलिये, ये हैं जिया, मकरंद अंकल की मम्मी और ये हैं जिया की क्लोज़ फ्रैंड, पुष्पा मौसी। ये हैं ‘इनके’ पापा राघव बेनावरी,’ ससुर को जिया और पुष्पा मौसी के हवाले कर मैनूँ झट वहाँ से खिसक ली।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, तुमैं कईं देखा है, यादै नाय पड़ता, तुम जानो म्हारी ममरी (मेमोरी) बौत कमजोर…’

‘तुम्हारी मैमरी बिलकुल ठीक है, जानकी। मैं राघव, रघु बेनावरी। भई बचपन में हम दोनों एक ही स्कूल में तो पढ़ते थे, सत्तो देवी प्राइमरी स्कूल…, दरियागंज…याद आया कुछ?’

‘हय राम, तुम तौ बौत बदल गये। ए मैं तोसे कऊं, तुमने तो हमें फट पैचान लिया,’

‘अरे, जानकी, तुम्हारी तोते-सी लम्बी नाक और ठुड्डी पर ये मस्सा क्या कम है तुम्हें पहचानने के लिये?’

‘(कान में) जो है सो है, मामला जमै का दीखै है, जिया, हो हो हो…,’

‘मैं तोसे कऊं पुस्पा नेक तो चुप्प रै,’

‘भई, हम भी तो सुनें, क्या मामला जम रहा है?’

‘जो है सो है, ये तो आप जिया से ई बूझिए, तब तक हम जरा मीना की महतारी से बात करके आते हैं।’

‘कछु नईं, ये पुस्पा तो बस यूं ही बवाल…’

‘कछू कैसे नईं? मीना बिन बियाहे एक मुसल्ले के हियां रहने लगी है, जो है सो है, तुम जानो तो हो, के नईं?’

‘तोसे किन्ने कई?’

‘अऊर कौन कैता, मीना की महतारी ने खुदै फून पे हमसे कई, जो है सो है। तुम जानो, मुसल्ले के हियाँ बैठने से तो अच्छा था के गले में उंगली डाल के पिरान ले लेती।’

‘ए मैं तोसे कऊं, सच्ची का? इससे तो बियाह देतीं। आदमी का बच्चा ई तो है, मुसलमान हुआ तो का?’

‘वे तो तैयार थीं तुम जानो, पन वो नईं माना, मीना बी अड़ ग़ई, जो है सो है।’

‘मैं तोसे कऊं, कम्मखत क्या जमाना आ गया है? हैं न रग्गु जी?’

‘अरे जानकी, अब तो भारत में भी न जाने कितने लड़के-लड़कियां बिना शादी किए साथ रहने लगे हैं। एक तरह से अच्छा ही है, न दहेज की झिकझिक और न शादी का कोई खर्चा, क्यों पुष्पा जी?’

‘ए मैं तोसे कऊं, कबी सोचा था के हमारी जात में बी ऐसा होगा? इत्ती सी गोद खिलाई, कम्मखत, ऐसे गुल खिलाएगी छोकरी,’ जिया ने जैसे राघव की बात पर ध्यान ही नहीं दिया हो।

‘जानकी, हमें भी समाज के साथ-साथ बदलना चाहिये, क्यों पुष्पा जी?’

‘अरे, मैं कऊं, कैसा समाज, जब जी में आई साथ सो लिये, जब जी में आई उठ के चल दिये।’

‘जो है सो है, मुजे तो ऐसे लोग-लुगाई के बच्चन की टैनसन (टैंशन) होवे है, गलियन में ढोर से घूमते फिरते हैं,’

‘मैं तोसे कऊं पुस्पा, म्हारे जान पैचान वालों में ये तीसरी लौंडिया है जो मुसलमान के घर में जाएगी,’

‘जो है सो है जिया, म्हारी समज में तो ये नईं आता के हिन्दु छोरियां मुसल्लों के हियां च्यों जा बैठती हैं?’

‘पुष्पा जी, प्रेम तो प्रेम है, वह जात धर्म नहीं देखता।’

‘मैं तोसे कऊं रग्गु, म्हारी छोरियों से सादी करने में इने कौनो एतराज नईं,’

‘जो है सो है, जिया, उने तो सादी से पैले ये मुसल्ला जो बना लेते हैं।’

‘मैं तोसे कऊं, रग्गु, म्हारे छोरे जब इनकी छोरियां से ब्याह करें हैं तो उने बी जिद करनी चहिए के पैले वो हिन्दु बने,’

‘जानकी, इन लोगों के क़ायदे-कानून इतने सख़्त हैं के चाहते हुए भी इनकी लड़कियां ऐसा नहीं कर पातीं। मैंनू मुझे बता रही थी कि यहां के बैकवर्ड शहरों में मुसलमान लड़कियों को ढूंढ कर वापिस लाने के लिए एजैंसीज़ खोली गईं हैं, जो किसी ग़ैर-मुस्लिम के साथ भाग गई हों।’

‘जो है सो है, ऐसे हादसों में यां बेचारी कितनी छोरियों की जानें जाती हैं, उनके अपने ही घर वाले हत्या कर देते हैं उनकी,’

‘मैं तोसे कऊं, हमारे इंडिया में बी तो यई होता है, हिन्दू लड़कियन के माई-बाप कौन से कम हैं?’  

‘जो है सो है, जिया, बड़े-बड़े बिदबान बी न बीच बचाव कराते इनका,’

तभी राघव बेनावरी से हेलो करते हुए सुमित, गिरगिट और घड़ियाल भी जिया के पास आ बैठे।

‘जिया, औरत को शिक्षा से महरूम और परदे में रखने के खिलाफ़ तो इनके मुस्लिम लीडर्स कभी नहीं बोलते लेकिन एक डेनिश फिल्म के खिलाफ़ दुनिया भर के शेख और इमाम उठ खड़े हुए कि उस फिल्म में उनके मुहम्मद का मज़ाक उड़ाया गया था,’ सुमित वर्मा ने कहा।

‘बड़े भाई, उन दंगो में सैंकड़ों लोग मारे गए,’

‘अजीब बात तो यह है के मक्का-मदीना में मुहम्मद की पहली बीवी खदीजा का घर उखाड़ फेंका गया और वहाँ शौचालय बना दिए गए पर मजाल है के कोई ज़ुबान खोल दे…’ घड़ियाल बोला।

‘बड़े भाई, आप एक घर की बात कर रहे हैं,  मक्का में न जाने कितनी प्राचीन इमारतें गिरा कर सेवन-स्टार होटल्स और एपार्टमैंटस बनाए जा रहे हैं…,’ गिरगिट बोला।

‘हमें तो यह समझ नहीं आता के जब अल्लाह की निगाह में सब बराबर हैं तो सेवन-स्टार होटल्स किसके लिए?’

‘बड़े भाई, यह तो ये मुल्ला-मौलवी ही बता सकते हैं…’

‘सारी प्रौब्लम्स का रूट तो यई लोग है,’ श्रीनिवासन बोले जिन्हें लगा कि इस मौके पर केवल सिर हिलाने से काम नहीं चलेगा।

‘जो है सो है, अब उनके हियाँ बी पैदा हुई है, मलाला यूसफ जाई, वो करेगी ठीक इन सबी को…,’

‘ऐ मैं तोसे कऊं, पुस्पा, चुप हो जा, आपा इदर आ रई हैं,’

‘जो है सो है जिया, ऐसे ही चुप्प रै रै के तो हमने मुसल्लों को अपने सिर पर बिठा रखा है,’

‘मैं तोसे कऊं पुस्पा, अब इसमें आपा और हसन की तो गलती नाय है, ये तो हम तुम जैसे हैं,’ जिया ने आपा की ओर मुस्कुराते हुए कहा।

‘निन्यानवे फ़ी सदी लोग तो हम तुम जैसे ही हैं, पुष्पा जी, केवल एक फ़ी सदी आतंकवादी हैं, जिन्होंने सारी दुनिया को सिर पर उठा रखा है।’

‘अरे भई, ज़रा हम भी तो सुने, किसने दुनिया को सिर पर उठा रखा है,’

‘आपा साहिबा, इनसे मिलिए, राघव बेनावारी जी, दिल्ली से आए हैं।’ गिरगिट ने बात टालते हुए कहा।

‘अरे वाह, हमारी दिल्ली के हैं, आदाब अर्ज़ है, भाई जान, कैसी है भई हमारी दिल्ली? एक ज़माना हुआ हमें वहां गए, एक हसरत ही रह जाएगी बस अब तो…’

‘हमारा भी आदाब क़ुबूल कीजिए, भई दिल्ली कौन सी दूर है?’

‘अब आपको क्या बताएं? अब अपने ही वतन जाने को वीज़ा चाहिए। सैंकड़ों सवाल और दर्जनों दस्तावेज़ जमा कर देने के बाद भी दरख्वास्त रिजेक्ट हो जाती है,’

‘थोड़ा सब्र से काम लें, आतंकवादियों ने ऐसी दहशत फैला रखी है कि सभी देशों को एहतियात बरतनी पड़ रही है,’

तभी आपा को सायरा दिखाई दी, जो अपना कोट उठा कर बाहर निकलने ही वाली थी। आपा झट उठ खड़ी हुईं।

‘इन्शा अल्लाह, भाई जान, माफ़ कीजिएगा, ज़रा सायरा से कुछ ज़रूरी बात कहनी है, हम अभी आते हैं,’ कहते हुए आपा उठ कर सायरा की ओर लपकीं और उनके साथ ही गिरगिट भी ‘माफ़ कीजिएगा’ कहता हुआ उठ गया।

‘मैं तोसे कऊं, इसाई लोग सादी बियाह करके राजी नईं हैं, हिन्दुन ने फैमिली-प्लैंनिंग का ठेका ले रखा है , बस इन लोगन की पौपुलेसन बढ़ती जा रई है, पचास साल बाद देख लेना, पूरी दुनिया पर मुसल्लों का राज होगा?’

‘जिया, सौ टके की एक बात कै दी तुमने, इनका यई तो पिलैन है, धड़ा-धड़ बच्चे पैदा करो और बाकियों को काफ़िर कहि के मार डालो, जो है सो है,’

‘आप दोनों ये अफ़वाहें कहाँ से सुनती हैं?’

‘अरे पुस्पा अबै अपना पिटारा बन्द कर। और सुनाओ रग्गु, दिल्ली में का हो रहा है इन दिनों?’

‘भई, दिल्ली अब लन्दन से कौन पीछे रह गई; वहां भी अब मैकडॉनल्ड, पिज्जा हट्स और फास्ट फूड की कई चेन्स खुल गई हैं। दादा-दादी की तो बात दूर, बच्चों के पास अब मां-बाप के लिये समय नहीं है। हम जैसे रिटायर्ड लोग कभी एक बच्चे के पास तो कभी दूसरे के पास, बस मेहमान हो के रह गये हैं अपने ही घर में,’

कंज़र्वेटरी से आता शोर सुनकर यकायक सुमित और घड़ियाल वहाँ से चुपचाप खिसक लिए; वहाँ कोई बड़ी बाज़ी लगी थी; मेनका हाथ ऊपर उठाए झूम रही थी।

‘रग्गु, हम तो मेमानों से बी बत्तर हैं हियां। मरे पड़ौसी बी ‘हाय डु डु’ कर लेवें हैं, पन म्हारे पोता-पोती और बेटा-बऊ हमसे कबी जै राम जी बी नाय करते। मैं तोसे कऊं, हमैं तो कबी कबी ये बी पता नाय लगै है कि कब्ब तो ये आये और कब्ब गये।’

‘जो है सो है रग्गु जी, आप कब तक हो हियां?’

‘बस देखो, कब तक दिल लगता है। यहां भी वैसे वही सब है, क्लब पार्टियां, जवान अलग, बूढ़े अलग, बच्चे अपने कमरों में बन्द।’

‘मैं तोसे कऊं, मर बी जाओ तो किसी की बलाय से, नेक गले में दो बूंद गंगा जल टपकाने वाला नाय है कोई हियाँ,’

‘जो है सो है, मां-बाप को बूढ़ा-घर में डाल कर खबर बी नाय लेते याँ के बच्चे।’

‘यहाँ बच्चों को फ़ुर्सत ही कहां है, पुष्पा जी, मुंह में एक सूखा टोस्ट दबाए मैं तो इन्हें हमेशा भागते ही देखता हूं और फिर अब छोटे-छोटे घरों में ये ख़ुद रहें, बच्चों को रखें या माँ-बाप को?’

‘सो तो है रग्गुजी, यहां के बच्चन को बी अलग-अलग कमरे में नाय राखो तो उने कौंसिल वाले उठा ले जाते हैं।’

‘मैं तोसे कऊं, हम तो एक चारपाइ पर दो-दो बच्चन को लेकर सो जावें थे,’

‘जो है सो है, अबै तो जिया तुम अपने ई बच्चन के साथ जो लेट जाओ तो वो का कए हैं चैल्ड-क्रूटली (क्रुएल्टी) का मुकदमा ठोक देंगे तुम पै।’

‘मैं तोसे कऊं, पुस्पा ढूंढ-ढूंढ के बुरी खबरें लेके आती है।’

‘जो है सो है जिया, तुम तो जानो हो हम कौंसिल की तरफ से बूढ़ा घर में नास्ता और दुपहर का खाना बांटते हैं, वहां लोग ऐसिन-ऐसिन बात करत रहे के तुम वां हो तो बस्स अपने कान ई बन्द कल्लो।’

‘ज़माना बहुत कुछ अच्छे के लिए भी बदला है, पुष्पा जी, हम लोगो को केवल बुराइयां ही नहीं देखनीं चाहिए।’ राघव की यह सलाह उन दोनों सहेलियों को बिल्कुल पसंद नहीं आई।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, पुस्पा आ जावै है तो टैम गुजर जावै है, तुम जानो इस कम्मखत कुहासे और बारिस में कोई कहां तो जावे अउर किसको बुलावे।’

‘जो है सो है, जिया, हम सबै मिल कर एक बुढ़उ-किलब क्यों ना खोल लें!’

‘अरे वाह पुष्पा जी, क्या शानदार ख़याल है, भई खूब!”

‘ऐ मैं तोसे कऊं, पुस्पा, तेरे इस ठुल्ल किलब में आएगा कौन?’

‘न बी आए तो हम पांच जन तो हैं न; रग्गु जी; तुम और हम; अम्मा, सोमा की माँ…’

‘तुम दोनों सहेलियां तो भई कमाल की हो, क्या नाम चुना है तुमने, जानकी, ठुल्ला क्लब, भई वाह! मज़ा आ गया।’

‘जो है सो है, जिया, रग्गु जी को इसका परसीडेन्ट बना लें का?’

‘मैं आज हूं, कल नहीं। जानकी को आप प्रेज़ीडेन्ट बनायें और पुष्पा जी इस क्लब की सेक्रेटरी हो जायें, लो हो गई आपकी कमेटी तैयार।’

‘हम सरकटी? न जी न, जो है सो है।’

‘मैं तो कऊं रग्गु, परसीडेन्ट तो आप ही रहेंगे, बस हमने कै दी। हमें कुछ नहीं आता जाता,’

‘आने-जाने को जामे का धरा है, जिया? जो है सो है, बुड्ढे-बुढियों का मजमा लगाने में कौनो समय लगता है, भजन-कीर्तन तो खुदै होने लगेगा।’

‘जानकी, तुम्हारी सहेली भी खूब है भई, वाह,’ दो वृद्ध महिलाओं की रचनात्मक सोच से राघव वाकई में अचंभित थे।

‘थैनकयू, रग्गु जी, जो है सो है। आप जन बैठ के रगु-लेसन (रेगुलेशंस) बनाओ, हम दो-चार मैमबरों को पकड़ के लाते हैं।’ कहती हुई पुष्पा मौसी मीता की पड़ोसनों की ओर चल दीं, जो मोहिनी से गप्पे मार रही थीं।

‘मैं तोसे कऊं, ये रगु-लैसन का होवै है, रग्गु?’

‘अरे यही कि क्लब के उद्देश्य क्या होंगे, ये क्लब क्या-क्या करेगा, क्या नहीं, और इस क्लब का कौन-कौन मैम्बर बन सकता है आदि…,’

‘मैं तोसे कऊं, मीना के मां-बाप को तो बिलकुलै ई मेम्बर नाय बनाना, देखो तो, मीना का क्या सत्यानास कियो है। म्हारी जात-बिरादरी की नाक कटा दी।’

‘जानकी, इसमें उन बेचारों का क्या दोष?’

‘दोस कैसे नईं रघु, लच्छन तो मरे मां-बाप के ई दिये होवैं हैं के नाय?’

‘ऐसे लोगों को ही तो इस क्लब की सबसे अधिक जरूरत है। बेचारे वैसे ही दुखी हैं, ऊपर से हम उनका बहिष्कार कर दें,’

‘ए मैं तोसे कऊं, फिर तुमई सोचो रगु-लैसन, इब हम से नाय पूछना। तुमने अबै म्हारा ठौर-ठिकाना तो देखई लियौ है, नेक चक्कर लगाना कबी कबी, रस्ता तो नाय भूल जईओ?’ अपनी चुटिया को ठीक करते हुए जिया ने शर्माते हुए पूछा।

‘अरे, कैसी बातें करती हो जानकी, घूमता-घामता आ जाया करूंगा। तुम्हारे बेटा-बहु ऐतराज़ तो नहीं करेंगे न?’

‘उनकी भली चलाई, मैं तोसे कऊं, घर में होंगे तो टोकेंगे। आवै के पैले फून जरूर कर लीजो,’ जिया आसपास देखते हुए फुसफुसाईं।

‘चलो, अच्छा समय गुज़रेगा, मिलके बैठेंगे जब दीवाने दो।’ रघु मुस्कुरा उठे।

‘मैं तोसे कऊं रग्गु, तुमारी सैतानी की आदत अब्बी नाय गई है,’ मुंह में पल्ला ठूंसे जिया इतरा उठीं।

‘तुम्हें देख कर पुराने दिन याद आ गये, जानकी। याद है स्कूल में फैन्सी-ड्रेस में तुम मीरा बनी थीं, गेरूआ कपड़े पहने हाथ में एकतारा लिये! कौन सा भजन गाया था तुमने, जानकी?’

‘ए मैं तोसे कऊं, तुम अबै तक नाय भूले? चार-एक ई साल इ तो रए थे हम इस्कूल में।’

‘हां, याद आया, ‘गिरधारी मनै चाकर राखौ जी,’ मुझे वह भजन आज भी बहुत भाता है। क्या अब भी गाती हो?’

‘ए मैं तोसे कऊं, अब्ब का गावेंगे। याँ न तो कोई तीज, न त्यौहार। सावन में झूले नईं, होली पे रंग नईं, तीजों पे मैंदी नईं। किसको टैम धरा है बजन-कीर्तन का हियाँ?’

मैं सुनूंगा जानकी, तुम्हारी आवाज़ बहुत मधुर थी। जानती हो, उस दिन के कार्यक्रम में तुम्हारा भजन सुनकर माँ ने तुम्हें मेरे लिए पसंद कर लिया था,’

‘सच्ची का?’ जिया के गाल सुर्ख़ हो उठे। वह बेचैन हो उठी यह जानने के लिए कि ब्याह का पैग़ाम लेकर वह आए क्यों नहीं।

‘सचमुच, हम लोग छुट्टियां मना कर गोवा से लौटे जाना कि तुम्हारी सगाई हो चुकी थी।’ जिया पुरानी यादों में खो गईं।

‘चलो अच्छा हुआ, मुझसे ब्याह हो गया होता तो हम दिन रात तुमसे बस भजन ही सुनते रहते,’

‘ए मैं तोसे कऊं, चालीस पिन्तालिस बरस तो हो ई गए होंगे हमें गाये, कछु यादै नईं पड़ता,’ जिया ने अपने अपने भावी पति और सास-ससुर के सम्मुख यही भजन सुनाया था।

‘तो याद करो अभ्यास करो। ठुल्ला क्लब को भी तो पता लगे कि हमारी जानकी कितनी टैलेंटेड है।’

‘रैन दो रग्गु, किसी से कइयो नाय के मैं गाऊं थी,’ बहत्तर वर्षीया जिया एक चंचल युवती की तरह लजा उठीं।

‘यह कैसे हो सकता है? यह राज़ तो मुझे मेहमानों के सामने खोलना ही पड़ेगा,’ बिना समय गवांऐ रघु ने तालियाँ बजा कर मेहमानों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया और बोले, ‘हियर-हियर, लेडीज़ एंड जेंटलमैन, आप लोग शायद नहीं जानते होंगे कि जानकी मलिक यानि आप लोगों की प्यारी जिया एक बहुत अच्छी गायिका भी हैं। तो आइए, हम सब उनसे एक भजन सुनाने का अनुरोध करें,’

‘ए मैं तोसे कऊं, रग्गु…,’ घबराई हुई जिया की आवाज़ तालियों की गड़गड़ाहट में डूब गयी, बहुत से मेहमान उनके आसपास इकट्ठे हो गए और पुष्पा मौसी उन दोनों के बीच में बैठ गयी।

‘जो है सो है जिया, तुम तो बड़ी छुपी रूस्तम निकलीं। रग्गु जी से मिले पांच मिनट बी नाय हुए और तुम गाने लगीं,’

‘ए मैं तोसे कऊं, पुस्पा, तुझे कछु सरम लिहाज है के नाय?’

‘जो है सो है जिया, आज तुमारे बज्जन से हम ठुल्ला किलब का इंग्रेसन करते हैं।’

‘इनगरेसन?’

‘इनॉग्रेशन जानकी, श्रीगणेश,’ श्री गणेश के नाम पर शर्माते, सकुचाते और आँखे झुका कर जिया ने भजन शुरू किया। बजाय फ़ोटोज़ लेने के मकरंद ने वीडियो औन कर दिया, वह भी हैरान थे कि जिया अच्छा गाती थीं ।

‘राणा जी, मैं तो गिरधर के घर जाऊं, जित बैठा दे तित ही बैठूं, बेचे तो बिक जाऊं,’ जिया की आवाज़ बेगमों जैसी मंजी हुई थी। वह सचमुच अच्छा गा रही थीं; लोग बड़ी हैरानी और शान्ति से सुन रहे थे क्योंकि जिया से उन्हें ऐसे साफ़ उच्चारण और ताल की उम्मीद नहीं थी।

‘मेरी उनकी प्रीत पुरानी, उन बिन पल न रहाऊं…,’

मीता के कान खड़े हो गए कि कहीं उसका घर ठुल्ला-क्लब बूढ़ों का अड्डा ही न बन जाए। जल्दी ही उसने मकरंद को ढूंढ निकाला, जो भाव-विहल हुए जिया के भजन को रिकॉर्ड कर रहे थे।

‘मैक डार्लिंग, टेक ए लुक एट योर मदर, कैसे चहक रही हैं? उन्होंने विद पुष्पा मौसी और राघव जी कोई ठल्ला क्लब बनाया है, हमारे घर को कहीं ये हेडक्वार्टर ही न बना लें।

‘मीता डर्लिंग, ज़रा धीरे ब..ब..बोलो, जिया भ..भ..भजन ग..ग..गा…,’

‘बट, मैक डार्लिंग, पुष्पा मौसी जब देखो तब इज़ हियर, जिया कभी चाय मंगवाती हैं तो कभी फल एंड नाउ दिस ठल्ला क्लब! दिस इज्ज़ टू मच। इफ़ दीज़ बुड्ढाज़ वांट टु होल्ड ए मीटिंग तो मैंनू अपने यहां बुलाए। चली आई अपने ससुर को मिलवाने। हाउ क्लैवर!’ मीता के बदन पर जैसे लाल चींटियाँ रेंग रही  थीं।

‘मीता डार्लिंग, वह कुछ ही द..द..दिनों के लिये ल..ल..लन्दन आये हैं। तुम ब..ब..बेकार में…,’ मकरंद को बड़े बेमन से रिकॉर्डिंग बंद करनी पड़ी।

‘बट मैक डार्लिंग, आपको तो कोई फ़िक्र ही नहीं है। कैमिला और हैरी के एग्ज़ाम्स चल रहे हैं और जिया को ठल्ला क्लब बनाने की सूझी है? ज़रा फ़ाइंड तो आउट वाट इज़ हैपेनिंग?’

‘मीता डार्लिंग, भ..भ..भजन तो खत्म हो ल..ल..लेने दो,’ एक हाथ से अपना कान बंद किए मकरंद अपनी माँ का भजन सुनने का प्रयास कर रहे थे।

‘मैक डार्लिंग, इनकी रागनी अब कभी खत्म नहीं होगी। आए एम तो पहले से ही फ़ैड-अप, जिया ने मेरे ड्राईंगरूम को नाई की दुकान बना रखा है, जहां देखो, देवी-देवताओं की मूर्तियां, कैलेण्डर्स और धूपबत्ती की राख!’

‘डार्लिंग, ज़रा तो स..स..सब्र करो,’

‘सब्र करो, सब्र करो, कह-कह कर तुमने हमारे घर का यह हाल कर दिया है। इंडिया बुलाना तो दूर, तुम्हारे भाई कभी जिया का हाल तक नहीं पूछते; क्या हमारे पैसे नहीं ख़र्च होते कानपुर फोन करने में? जस्ट फ़ोन देम कि जिया का यहां मन नहीं लग रहा, वह कुछ महीनों के लिए कानपुर आना चाहतीं हैं,’ यह पहली बार था कि मीता का वाक्य ’मैक डार्लिंग’ के बगैर शुरू हुआ था।

‘मीता, ऐसे क..क..कैसे भेज दूं?’मैक के एक कान में रस घुल रहा था तो दूसरे कान में सीसा। इस हबड़-दबड़ में वह भी मीता के नाम के पहले उपसर्ग लगाना भूल गया; मीता के कान खड़े हो गए।

‘बट मैक, वाए डोंट यू अंडरस्टैंड? सुबह चार बजे से लेकर रात के आठ आठ बजे तक जिया ड्राइंग रूम में बैठी रहती हैं, बच्चों को कोई प्राइवेसी ही नहीं मिलती। उनके फ्रेंड्स आते हैं तो वह उनसे ऐसे ऐसे वीयर्ड क्वेश्चंस पूछती हैं कि पूछो नहीं, हाउ ऐमबरिसिंग फॉर देम, मैक?

‘जिया क..क..कहेंगी तो फ़..फ़..फ़लाईट ब..ब..बुक कर दूंगा,’ मैक ने झल्लाते हुए अपना निर्णय सुना दिया; वो भी बिना ‘डार्लिंग’ कहे। मीता के तन बदन में आग लग गयी। एक ही भजन का इतना असर?

‘शी विल नैवर नैवर से दैट। गैस्टो के बीच रास रचा रहीं हैं और राघव जी को तो देखो, हाउ लविंग्ली इज़ ही लुकिंग ऐट हर?’ मीता अपनी बात पर अड़ी थी। उसे डर था कि यदि वह एक बार पीछे हट गयी तो मकरंद को हमेशा के लिए छूट मिल जाएगी।

‘मीता डार्लिंग, तुम भी क..क..कैसी बातें क..क..करती हो?’ इस बार मकरंद ने मीता को ठीक से संबोधित किया; वह उससे झगड़ा मोल नहीं लेना चाहता था।

‘डार्लिंग, यू आर ऐ बूबी, अज्जी भैया की मां के आते ही भाभी ने उन्हें ओवर-फ़िफ़्टी क्लब ज्वाइन करा दिया था एंड नाउ, मैंनु ने अपने ससुर को हमारी जिया के पीछे लगा दिया है, देखना, वो भी अब रोज़ यहीं बैठे रहा करेंगे,’ मीता को तसल्ली हुई कि मकरंद की अक्ल ठिकाने पर आ रही थी।

‘डार्लिंग, अ..अ..अज्जी भैया की मां अ..अ..अंग्रेज़ी में एम.ए हैं और ब..ब..बहुत फ..फ..फारवर्ड हैं, जिया ने तो प..प..पांचवी क..क.क..क्लास भी प..प..पास नहीं की। उन्हें तो ठीक से ब..ब..बात भी क..क..करना नहीं आता,’ समंदर एकाएक फिर उबाल पर था।

‘यू आर जोकिंग, मैक, राघव जी से मिले जिया को फ़िफ़्टीन मिनटस भी नहीं हुए और देखो कैसी फॉरवर्ड दिख रही हैं?’

‘वह स..स..सब तो ठीक है, पर…’

‘मैक डार्लिंग, इतना ही शौक है गर्ल-फ्रैंड बनाने का तो जिया को ले जाकर अपने घर में रख लें। मैं फ़िक्स करती हूं इनकी अगली मीटिंग। न दो मीटिंग्स में इन दोनों के फेरे पड़वा दिये तो मेरा भी नाम मीता नहीं,’ तभी जिया का भजन समाप्त हुआ और तालियाँ बजने लगीं, तारीफों के पुल बांधते हुए मेहमान बिखरने लगे।

‘शुश, मैंनू इ..इ..इधर ही आ रही है,’ मकरंद का दिमाग़ घूम रहा था।

‘अरे मैंनू, तुम्हारे पापा ने तो हमारी पार्टी में चार चांद लगा दिये,’

‘अरे नहीं मीता आंटी, यह तो आपकी जिया का कमाल है। एक्चुयलि, आपके सभी गेस्ट्स हैरान हैं कि वह इतना अच्छा गाती हैं,’

‘मैनूं, हमें तो आज तक यह भी मालूम नहीं था कि जिया गाती भी हैं। सचमुच, राघव जी तो सचमुच कमाल हैं भई,’ मैनूं अच्छी तरह समझ गयी कि मीता क्या कहना चाहती थी।

‘हाँ आंटी, कैन यू बिलीव पापा और जिया एक ही स्कूल में थे? वह जब तक यहाँ हैं, उनकी अच्छी कंपनी रहेगी,’

‘आई वाज़ जस्ट टैल्लिन्ग मैक द सेम थिंग। एनीवे, मैंनू, क्यूं न ठल्ला क्लब की नैक्स्ट मीटिंग तुम अपने यहां रख लो। इस बहाने, जिया भी तुम्हारा घर देख लेंगी।’ मीता के इस आकस्मिक हमले से मैंनू हड़बड़ा उठी; उसे जल्दी से कोई अच्छा बहाना ढूंढना होगा।

‘बात यह है, आंटी, कि मैं तो हार्डली घर पर होती हूं…’

‘अरे, लीव इट टू मी, मैंनू, ठल्ला क्लब के सारे मेम्बर्स  घर से एक एक डिश बना कर ले आयेंगे। पुष्पा मौसी इज़ सो गुड एट सुपर्वाइज़िन्ग थिंग्स,’ मीता ने मैंनू को अपना वाक्य भी पूरा नहीं करने दिया।

‘इस बड़ी कोठी के मुक़ाबले हमारा फ्लैट बहुत टाइनी है, आन्टी, सब लोग वहाँ कैसे फिट होंगे?’ मैंनू ने एक बार फिर कुछ बोलने का प्रयत्न किया।

‘बिग और स्माल मैटर्स नौट, मैंनू, आदमी का बस दिल बड़ा होना चाहिये। ये लो पुष्पा मौसी भी यहीं आ गईं। पुष्पा मौसी, मैंने आपके ठल्ला क्लब की अगली मीटिंग फ़िक्स करवा दी है, नैक्स्ट सैटरडे, मैनूं के फ़्लैट में,’

‘अरे थैन-कयू, जो है सो है। अरे जिया, सुनी तुमने? ठुल्ला किलब की अगली मीटिंग रग्गु जी के इहां है,’ पुष्पा मौसी ने वहीं से चिल्ला कर जिया को बताया।

‘ए मैं तोसे कऊं, बउ, इहां का बुराई है? मैंनू बेचारी डागडरी करेगी या ठुल्ला किलब….?’ जिया उठ कर झट मीता और मैनूं के निकट आ गईं।

‘जिया, मैंनू को कुछ नहीं करना पड़ेगा, सब मिल जुल कर हो जाएगा,’ इसके पहले कि जिया उसका बना-बनाया खेल बिगाड़तीं, मीता ने उन्हें बीच में ही टोक दिया।

‘अरे जानकी, मैं संभाल लूंगा सब। मैंनू बेटी, तुम्हें भी फ़िक्र करने की कोई ज़रुरत नहीं है। एक ज़माना था जब हम लोग पचास-साठ मेहमानों का खाना चुटकी बजाते बना लिया करते थे।’

‘पापा, लेट अस डिस्कस इट बिफ़ोर यू कन्फर्म,’ गुस्से में मैंनू के मुंह से निकल पड़ा; वह मन ही मन सोच रही थी कि इन बूढों की यही मुसीबत है कि बिना घर वालों से सलाह किए, जो मुंह में आया बक देते हैं। ससुर की ज़िम्मेदारी पहले ही क्या कम थी कि अब ये ठुल्ला क्लब की मीटिंग्स शुरू हो गईं? पति की लम्बी ग़ैरहाज़िरी में उसका घर कहीं ठुल्ला क्लब का दफ्तर बन कर ही न रह जाए।

जिया और पुष्पा मौसी हक्का-बक्का हुई खड़ी थीं; रघुवीर को काटो तो खून नहीं; अपनी बहु से यह आशा नहीं थी; कम से कम उसे मेहमानों का तो लिहाज़ करना चाहिए था; वह यकायक ख़ामोश हो गए।

‘जो है सो है, रग्गु जी, अगली मीटिंग हम हैइड पार्क में कर लेंगे,’ पुष्पा मौसी ने ख़ामोशी तोड़ी। वह समझ गईं कि मीता और मैनूं दोनों ही नहीं चाहती थीं कि उनके घर में बूढ़े-बूढ़ियाँ इकट्ठे हों। पुष्पा मौसी को किसी का एहसान लेना वैसे भी पसंद नहीं था।

‘ए मैं तोसे कऊं, पुस्पा, बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम चालो भई लोगों करो सलाम, अब बुढ़ापे में का हम हैड पार्क में जइके बैठेंगे?’ जिया ने राघुव का ध्यान बंटाने की ख़ातिर कहा।

‘पुष्पा जी, बहुत बढ़िया सुझाव है आपका, हाइड पार्क में जिसके जो जी में आए कहा जा सकता है,’ राघव जी झट बोल उठे। मैंनू मुंह छिपाए वहाँ से हट गयी; ससुर ने यदि अपने बेटे से शिकायत की तो बैठे बैठाए घर में क्लेश हो जाएगा क्योंकि उसके पति पिता की बहुत इज्ज़त करते थे। यह सब मीता की कारस्तानी थी; कम से कम इस वक्त उसे चुप रहना चाहिए था!

यत्र, तत्र, सर्वत्र, समाज में बूढों के प्रति दुर्व्यवहार पर टिप्पड़ियां सुनाई देने लगीं।

‘मैनूं के फ़ादर-इन-लॉ सिर्फ़ विज़िट पर आए हुए हैं तो उसका यह हाल है, साथ रहते तो न जाने क्या करती?’

‘मरी आजकल की बहुएँ तो अपने सास-ससुर को मरा एक महीना रख के भी राजी नहीं हैं,’

‘ऐ मैं तोसे कऊं, मोइनी, म्हारी ससुराल में तो मकरंद की बड़ी बुआ और म्हारी सास की माँ बी हमारे साथ रैती थीं, जबान लड़ाना तो दूर, हम हमेस उनके आगे पीछे डोले थें,’

‘इस कंट्री में तो, जिया, माँ-बाप को भी अपने साथ रखने का फैशन नहीं है,’ मुंह-फट मंजूषा बोली।

‘सोमा ने तो अपने ही फ़ादर को मरे ओल्ड-एज-होम में भरती करवा दिया है,’

‘मैं तोसे कऊं, मोइनी, सरम लिहाज तो लोगन ने ताक पे धर दीना है,’

‘बिल्कुल, जिया, मरी चालीस की तो होगी सोमा और उसके मरे दूल्हे को देखो, मूंछे तक नहीं आई हैं बेचारे के…’

‘किसकी मूंछें नहीं आई हैं, मोहिनी आंटी?’ तभी सोमा ने वहाँ आकर पूछा तो सबके मुंह पर ताले पड़ गए।

‘आपकी अंगूठी बहुत खूबसूरत है, सोमा आंटी, पंद्रह सौ पाउन्ड्स से कम क्या होगी?’ मंजूषा के मुंह में पानी भर आया, इतना बड़ा हीरा तो उसने जीवन में पहले कभी नहीं देखा था।

‘मेरी वेडिंग-रिंग है कोई मज़ाक थोड़े ही है। मंजूषा, प्लीज़ डोंट काल मी सोमा आंटी, आई हेट दिस वर्ड,’

‘सोमा डार्लिंग, तुमने अपनी वेडिंग-रिंग रौंग फिंगर पर क्यों पहन रखी है?’ मीता ने पूछा।

‘इसलिए कि मैंने एक रौंग आदमी के साथ शादी की है। ऐट लीस्ट, लोग तो यही समझते हैं,’ मंजूषा की ओर गुस्से में देखते हुए सोमा ‘बार’ की ओर चल दी।

‘जो लोग गलत काम करते हैं, न वही ज़्यादा अकड़ते हैं,’ कहते हुए मंजूषा भी बार की ओर चल दी, वह आशिंकित थी कि सोमा राजीव से जाकर उसकी शिकायत न कर दे।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, मिसरा जी, कैसी मुहं-फट है ये मंजूषा, हमसे बेट (शर्त) लगा लो जो ये कुलभूसन के साथ एक बरस बी टिक जाए,’

‘और वो सोमा? उसका ब्याह तो अगले हफ्ते तक बी टिक जाए, जिया, तमैं म्हारा नाम बदल दीजो,’

‘आप भी क्या बेकार की बातों में उलझीं है? मैं तो आपको यह बताना चाहता हूँ कि वृद्धावस्था एक राष्ट्रीय समस्या है, जिसका एक अच्छा समाधान ढूंढने के लिए आपके ठुल्ला क्लब को सरकारी अनुदान और नव-प्रवर्तन-पुरस्कार आसानी से मिल सकते हैं,’ मिश्रा जी के इस कथन में सभी को दिलचस्पी थी; अनुदान और पुरस्कार की भला किसे इच्छा नहीं होती?

‘मिश्रा अंकल ठीक कह रहे हैं, नानी, पर आपको प्रूव करना होगा कि ठुल्ला क्लब कम्यूनिटी के लिए अच्छे काम कर रहा है।’

‘मरी उसमें क्या मुश्किल है, बुलबुल? मरे ठुल्ला क्लब का लांच तो आज हो ही गया है, दो चार मरी मीटिंग्स दिखा कर मरा पेपर-वर्क पूरा कर लो, बस,’

‘यू आर ऐ प्रो इन दीज़ थिंग्स, मोहिनी,’ सबके मन की बात मीता ने कह दी थी, मोहिनी सकपका के चुप हो गयी; वह और मोहन काउंसिल को छल कर नियमित भत्ते लेते रहे थे।

‘नानी, मैं ठुल्ला क्लब का फेसबुक अकाउंट देती हूँ, रातों रात यह कितना पापुलर हो जाएगा कि…’

‘बुलबुल, फेसबुक को मैनेज क्या तेरी नानी करेंगी?’ सोमा ने पूछा।

‘मैं करूंगी; आपके लैटर-हैड्स और इन्वाइटस बनाने और सर्कुलेट करने में भी मैं इनकी हैल्प कर सकती हूँ,’ सबसे पहले बुलबुल ने अपनी सेवाएं अर्पित कीं।

‘काउंसिल की मदद चाहिए तो अपने रंजीत भाई हैं, न,’ गिरगिट रंजीत को पकड़ कर सबके बीच में ले आया और खुद भी वहीं टिक गया।

‘दिस ठुल्ला क्लब इज़ ऐ ब्लडी गुड आइडिया,’ रंजीत की स्वीकृति का ठप्पा लग जाने के बाद लोगों में एक सनसनी सी दौड़ गयी। मीता और मैनूं दोनों के कान खड़े हो गए; इस प्रोजेक्ट में जान है, चार पैसे बनाए जा सकते हैं।

‘बहुत बहुत बधाई हो, जिया और पुष्पा जी, आप दोनों को, जिन्होंने एक राष्ट्रीय, मैं तो इसे एक अंतर्राष्ट्रीय समस्या मानता हूँ, का समाधान बातों बातों में ढूंढ लिया। मैं भाग्यशाली हूँ कि ठुल्ला क्लब के उदघाटन-समारोह में उपस्थित हूँ।’ मिश्रा जी का भाषण शुरू होने से पहले ही समाप्त हो गया जब मोहिनी ठीक उनके आगे आकर खड़ी हो गयी।

‘जिया, पुष्पा मौसी और राघव जी, ठुल्ला क्लब के लिए मरी बहुत-बहुत बधाई। हमें तो आप फ़ाउंडर-मैम्बर्स मान कर चलिए, क्यों मिक?’ मोहिनी ने अपनी बाईं आँख दबाते हुए मोहन की ओर देखा, जो अपना सिर ज़ोर-ज़ोर से ‘हाँ’ में हिलाते हुए खुश हो रहे थे कि इतने सारे बूढ़े यजमानों से उनकी कीर्तन मंडली का कल्याण होकर रहेगा।

‘मैं आपके ठुल्ला क्लब का पहला सदस्य बनता हूँ, कृपया मुझे बताइए कि आपका सदस्यता शुल्क क्या है? और हाँ, आप लोग जब चाहें मेरे घर पर मीटिंग कर सकते हैं, सिर्फ़ सफ़ाई और भोजन जैसे दायित्व किसी और को देने होंगे, ये मेरे बस के बाहर हैं,’ जेब में से बटुआ निकालते हुए मिश्रा जी ने दरियादिली दिखाई; जिया और पुष्पा मौसी मुंह फाड़े मिश्रा जी की शक्ल देख रही थीं।

‘दैट्स वेरी नाइज़ औफ़ यू, मिश्रा जी,’ मिश्रा जी को निपटा कर मीता रंजीत की ओर घूम गयी, ‘वी आर सो ग्रेटफुल फॉर योर इनपुट, रंजीत-सर, मैं और मैक आपसे ड्यूरिंग दिस वीक मिलते हैं।’

‘मिस्टर रंजीत, ठुल्ला क्लब की मीटिंग्स के लिए काउंसिल का एक कमिटी रूम बैटर रहेगा, वहाँ मीटिंग्स होंगी तो प्रोफेशनल भी लगेगा,’ मैनूं ने अपने अनुपयुक्त आचरण की क्षतिपूर्ती करनी चाही।

‘आई एम सो एक्साइटेड, रंजीत-सर, हम इस प्रोजेक्ट पर इमिजिएटली काम शुरू कर सकते हैं,’ मैनूं की अवहेलना करते हुए मीता बोली।

लोगों के गुट अपने-अपने स्थानों पर लौट गए और फिर शुरू हुआ एक नया पुराण कि मीता और मकरंद कौन होते हैं ठुल्ला क्लब के विषय में रंजीत से बातचीत करने वाले?

‘आइडिया तो मरा पुष्पा मौसी का था, उन्हें तो मरी किसी ने घास तक नहीं डाली,’

‘अभी तक तो मीता भन्नाती हुई घूम रही थी कि जिया और पुष्पा मौसी ने उनके लिए यह क्या मुसीबत खड़ी कर दी और जैसे ही मिश्रा जी ने सरकारी अनुदान की बात चलाई तो वह रंजीत से मिलने के लिए फट तैयार हो गयी।’

‘हाँ, आपने तो देखा ही होगा, बेचारी मैंनू के कैसे हाथ धोकर पीछे पड़ी थी मीता,’

‘आई डोंट रियली माइंड, मैं तो बस यह कह रही थी कि…’ मैंनू ने भी अपना पैंतरा बदला।

‘अरे तुम डेंटिस्ट्री पढ़ोगी या ठुल्ला क्लब चलाओगी?’

‘अच्छा है न, आंटी, पापा को भी टाइम पास करने के लिए एक अच्छा बहाना मिल गया,’ मैंनू के यह कहते ही मेहमान एक बार फिर दो गुटों में बंट गए।

‘अब ये अपने ससुर को क्यों घुसा रही है बीच में? अभी तो कह रही थी कि फ़्लैट छोटा है, वह बहुत बिज़ी रहती…’

‘असल में शुरुआत तो मरी राघव जी ने ही की थी, घामण जिया और धोबड़ पुष्पा मौसी तो मरी हवा में तीर छोड़ रही थीं,’

‘आप क्या वहाँ थीं जो इतने कॉन्फिडेंस के कह रही हैं?’ मंजूषा ने मोहिनी से दरयाफ्त की।

‘जैसे तुम तो उन लोगों के मरी बीच बैठी थीं…,’

‘प्रश्न यह नहीं है कि वहाँ कान लगाए कौन-कौन सुन रहा था, मोहिनी तो एक स्वाभाविक बात कह रही थीं,’ मोहन बोले तो मोहिनी ने उन्हें द्रवित नेत्रों से ऐसे देखा कि जैसे भरी सभा में कृष्ण ने द्रोपदी की लाज बचा ली हो।

‘मैं सब सुन रही थी, मोहन अंकल, पुष्पा मौसी ने बुढ़उ-किलब कह कर बात शुरू की थी और ठुल्ला क्लब का नाम जिया ने ही सुझाया था, राघव अंकल ने तो बस दोनों की इमैजिनेशन की दाद दी थी। जिया और पुष्पा आंटी ने राघव अंकल से प्रेसिडेंट बनने के लिए कहा पर वह नहीं माने….’ मंजूषा अभी खुलासा दे ही रही थी कि मोहिनी मुंह बिचकाती हुई वहाँ से उठ कर प्रतिस्पर्धियों में जा बैठी।

इस भीषण युद्ध-स्थल से निकल भागने का फ़ैसला कर सायरा, जो दरवाज़े तक पहुँच गयी थी, ठुल्ला क्लब का मज़ेदार किस्सा सुने बगैर न जा पाई। अब कि जब वह खिसकने के लिए तैयार हुई; दुर्भाग्यवश, गिरगिट ने उसे खूंटी से अपना कोट उतारते देख लिया।

‘सायरा जी, ज़रा रुकिए, मैं इन्हें आपसे ही मिलवाने ला रहा था, ये हैं मंजूर भाई-जान, अभी-अभी करांची से पधारे हैं, लन्दन यूनिवर्सिटी से एन्थ्रोलोजी में एम.ए. कर रहे हैं। और मंजूर भाई, मलका-ए-तरन्नुम मोहतरमा सायरा खान की ग़ज़ल आपने मिस कर दी, सैड, वेरी सैड।’ गिरगिट ने सायरा को हसन से मिलवाते हुए कहा। मंज़ूर के ऊपरी होंठ पर एक ख़ासा बड़ा तिल था। सायरा ने उस पर एक सरसरी निगाह डाली तो उसे मंज़ूर काफ़ी दिलकश लगा। उसने खुद को लताड़ा कि कुछ ही देर पहले वह रंजीत से वादा कर चुकी थी कि अब वह किसी गैर का मुंह नहीं देखेगी; फिर क्या ज़रूरी था कि मंज़ूर औरों की तरह बेमुरव्वत न निकले?

‘भई, मौसीकी के शौक़ीन तो हम भी हैं, सायरा, में आई कौल यू सायरा?’

‘यह तो इनकी ज़र्रा नवाज़ी है, इंशा अल्लाह, हम तो बस शौकिया गा लेते हैं कभी कभी, मंज़ूर, में आई कौल यू मंज़ूर?’

बंद गले की टेलर्ड अचकन पहने मंज़ूर अदब की जीती जागती तस्वीर लग रहा था पर उसके मुकाबले में सायरा नहले पर दहला ही थी। गुलाबी रंग के लखनवी कुरते-पाजामें के साथ उसने गले में पन्ना-माणिक का हल्का किन्तु असाधारण सा एक सेट पहन रखा था जो उसके गेहुएं रंग को और भी निखार रहा था। लोग उसके पीछे यूं ही पागल हुए नहीं घूम रहे थे। जलन-खोर महिला-मेहमान भी उसके बारे में तरह-तरह की बातें बना कर अपने दिल की बस भड़ास ही निकाल रही थीं।

‘खुदाया, हमें भी मौसीकी की बारिश से नवाजें; चंद एक शेर ही…,’

‘माफ़ कीजिएगा, मंज़ूर, हमें कहीं ज़रूरी काम से पहुंचना है…,’

‘ऐसी भी क्या नाराज़गी? खुदा न ख़ासता, कुछ देर ठहरें तो जहां चाहेंगी हम छोड़ देंगे आपको,’ जिस भरोसे और गुरूर के साथ वह सायरा की तरफ बढ़ा था, वे कब के ग़ायब हो चुके थे।

‘नहीं नहीं, तकल्लुफ़ की कोई ज़रूरत नहीं, मंज़ूर। आप पार्टी का लुत्फ़ उठाईए और हमें इजाज़त दीजिए, ख़ुदा हाफ़िज़।’ अपना पर्स और कोट हाथ में उठाए वह सिर पर पाँव रख कर वहाँ से भागी कि कहीं दिल के हाथों मजबूर होकर वह रुक ही न जाए।

‘यह वही है न जिसने…’ मंज़ूर का चेहरा तमतमा उठा; दो टके की औरत ने उसे घास तक नहीं डाली थी।

‘भाई-जान, आपने ठीक पहचाना,’ गिरगिट ने मंज़ूर की हेकड़ी के हवा हो जाने का लुत्फ़ उठाते हुए कहा।

‘और वो साहब इनके लेटेस्ट महबूब हैं?’ अपना होंठ चबाते हुए मंज़ूर ने रंजीत की और इशारा करते हुए पूछा; ‘इस मामूली से दिखाई देने वाले आदमी में सायरा ने क्या देखा?’

‘भाई-जान, बड़े भाई को आप कोई मामूली आदमी नहीं समझिएगा, यह लन्दन की तोप है तोप, दोनों अभी-अभी कहीं जाने का प्लैन बना रहे थे,’ रंजीत के हाथ में रायन-ऐयर का लिफ़ाफ़ा देखकर दस नम्बरिया घाघ ने झट अंदाज़ा लगा लिया था कि वे एक रौमैंटिक वीकेंड पर कहीं जा रहे थे।

‘जनाब, दैट साउन्ड्स इंटरेस्टिंग, वेरी इंटरेस्टिंग इनडीड,’ गिरगिट के इस खुलासे से मंज़ूर को उम्मीद बंध गयी कि सायरा को वह भी हासिल कर सकता था।

‘चाणक्य के अनुसार औरत की जवानी और ख़ूबसूरती दुनिया की सबसे बड़ी ताक़त है।’ मिश्रा जी, जो गिरगिट और मंज़ूर के पीछे खड़े थे, रंजीत को सुनाते हुए बोले तो गिरगिट खिसिया गया; शायद रंजीत ने भी उन दोनों की बातें सुन ली थीं।

‘और उसका डाउनफ़ौल भी, मिश्रा जी।’ रंजीत ने कहा। वह भी मंज़ूर और सायरा पर कड़ी नज़र रखे था।

‘फ़िलहाल तो तूफ़ान का रुख़ पलट गया,’ मिश्रा जी ने कहा।

‘इन छोटी मोटी हवाओं की मैं परवाह नहीं करता, मिश्रा जी,’

तभी उन्हें आपा अपनी ओर आती हुई दिखाई दीं, जो बुदबुदाती हुई हसन को ढूँढने निकली थीं, वे दोनों पलट कर बार की ओर चल दिए।

‘लाहौलविलाकुव्वत मियाँ, सायरा बीबी को ज़रा दरवाज़े तक छोड़ने की तो ज़हमत फ़रमाते। किसी ने अलविदा तक नहीं कहा, बेचारी अकेली निकल गईं। मेज़बानों को तो अपना ही होश नहीं है…,’ आपा ने हसन को एक बार फिर सायरा के पीछे दौड़ा दिया। रंजीत को कहीं भनक भी लग गई तो वह हसन की टांगें तोड़ के हाथ में रख देगा। खैर, आपा के डर के मारे हसन घर के बाहर आकर खड़ा हो गया, जहां राजीव और मंजूषा आदतन खिल्ली उड़ा रहे थे और इस बार उनके निशाने पर थे सुरेन्द्र और सुरभि।

‘ये सुरभि ने ‘हैं न सुरेन्द्र? हैं न सुरेन्द्र?’ क्या लगा रखी है?’ राजीव ने सिगरेट का एक कश लेते हुए पूछा।

‘मीता बता रही थी कि कालेज के दिनों में सुरभि और करन दो शरीर एक जान हुआ करते थे। फिर एक दिन करन अचानक ग़ायब हो गया और सुरभि ने सुरेन्द्र से शादी कर ली। अब सती सावित्री बनी ‘हैं न सुरेन्द्र, हैं न सुरेन्द्र,’ करती फिर रही है जैसे कि सारी दुनिया बेवकूफ़ है।’

‘करन? चित्रा का हजबैंड?’

‘हाँ वही, काली गुद्दी-सफ़ेद मुंह वाली चित्रा,’ तभी दिनेश बाहर आया और राजीव को देख कर बोला।

‘मिस्टर राजीव, यू आर वांटेड इंसाइड, इमीडिएटली,’ दिनेश ने मज़ाक में कहा।

‘मीता को पता लग गया होगा कि आप बाहर खड़े हुए स्मोक कर रहे हैं, ओह माई गौड! राजीव, ये देखो उसने बाहर की दीवार पर भी ‘पैस्सिव स्मोकिंग आल्सो किल्स’ का साइन लगा रखा है,’ मंजूषा बोली।

‘इसके पहले कि वह बाहर आ जाए, अन्दर चलते हैं,’ राजीव ने सिगरेट को अपने जूते से मसल कर बुझाते हुए कहा।

‘मीता खिड़की में से देख रही है, स्टब उठा कर डस्टबिन में फेंक दीजिए,’ दिनेश बोला।

‘येस सर,’ कहते हुए राजीव ने स्टब उठा कर डस्टबिन डाल दिया।

उसी वक्त वहाँ एक टैक्सी आकर रुकी, जिसमें से एक छरहरे बदन की स्मार्ट युवती उतरी। राजीव और मंजूषा से उसने हेलो कहा और फिर दिनेश को देखा तो उसकी आँखें चमकने लगीं कि जैसे उसे कोई खोया हुआ खज़ाना मिल गया हो।

‘अरे दिनेश तुम यहां कहां? तुम भी मलिक्स को जानते हो?’

‘हेलो माला, वाट ऐ प्लेजेंट सरप्राइज़!’ माला के प्रश्नों को नज़रन्दाज़ करते हुए दिनेश ने पूछा। काली सिल्क की एक महंगी कमीज़ में से दिनेश की तोंद किसी तरह समाने के प्रयत्न में थी।

‘गर्मियों की छुट्टियों में जीजा जी यहाँ आए तो मेरा परिचय जिया से करवा गए। उनकी मौसी और जिया बहने हैं।’ मोतियों की एकल माला, मैचिंग बुँदे और फिरोज़ी रंग के कुर्ते-पाजामें में माला तरो-ताज़ा और खूबसूरत लग रही थी।

‘तुम आज बहुत अच्छी लग रही हो,’ माला को अनौपचारिकता से निहारते हुए दिनेश बोला।

‘ये डोरे डालने बंद करो, तुम्हारा जादू अब मुझ पर नहीं चलने वाला,’

‘वाए नौट? ऐनी वे, तुम्हारी मम्मी कैसी हैं? तुम क्या कर रही हो आजकल?’ दिनेश ने कुछ झेंपते हुए पूछा।

‘इतने सारे प्रश्न एक साथ? मम्मी ने तुम्हें अब तक माफ़ नहीं किया है,’ एकाएक माला की आँखें भीग गईं, ‘तुम तो ऐसे ग़ायब हुए कि… कुछ तो कह कर जाते,’ लगा कि जैसे माला के गले में कुछ फंस गया था।

‘सौरी, वो सब…जाने दो, …तुम अब भी ब्रिटिश गैस में ही हो?’

‘कहाँ? छ: महीने हो चुके रिडनडैन्ट हुए। किसी तरह सोशल सीक्योरिटी पर गुज़र हो रही है,’ माला सँभलते हुए बोली।

‘मुझे मालूम था कि एक दिन यही होगा। याद है, वो गोरा मेरे पीछे कैसे हाथ धोकर पड़ गया था?’

‘एट लीस्ट तुम्हारे पापा तुम्हारे साथ थे,’

‘हाँ, पोस्ट-ऑफिस खरीदने के लिए पापा ने पैसे तो दे दिए पर एक शर्त पर…खैर, अब तो मैंने एक पैट्रोल-पंप भी खरीद लिया है।’

‘गुड फॉर यू, दिनेश यू मेड इट, बधाई हो,’ माला ने अपनी खुशी ज़ाहिर की।

‘जब सिर पर पड़ती है न माला तो…,’ जैसे पश्चाताप में जल रहा हो, कुछ कहना चाहता था दिनेश पर अचकचा कर चुप हो गया।

‘इटस औल राइट, दिनेश। जो होता है, अच्छे के लिए ही होता है। आई डोंट ब्लेम यू एनिमोर। तुम तो खुश हो न?’

‘थैंक्स, इट मीन्स ई लौट। सुना है तुमने अब तक शादी नहीं की, कोई तो होगा…’

‘जाने भी दो अब दिनेश, हमारे सम्बन्धों को दुनिया जानती थी, यहाँ कोई कुछ नहीं भूलता। वैसे, तुमने कभी सोचा कि मेरा क्या हुआ होगा?’

‘कोई ऐसा दिन नहीं गुज़रता जब मैं तुम्हें याद नहीं करता, माला, समय मिला तो सुनाऊंगा अपनी राम कहानी भी तुम्हें। खैर, कल क्या कर रही हो?’

‘कुछ नहीं,’

‘लन्च टाईम पर आ जाना, यह मेरे दफ्तर का पता है,’ जेब से अपना कार्ड निकाल कर माला को देते हुए दिनेश बोला। मंजूषा और राजीव दरवाज़े के भीतर खड़े हुए दिनेश और माला की बातें सुन रहे थे।

‘ओहो, तो साहब का दफ़्तर आक्सफोर्ड-स्ट्रीट पर है, मिलिनेयर तो हो ही गए होगे अब तक, क्यों, दिनेश?’

‘बस, ज़रा ससुर जी स्वर्ग सिधार जाएं…’

‘वाट नौन्सैंस। सुनो, अन्दर एक मोटी सी औरत तुम्हें ज़ोर-शोर से इशारे किए जा रही है,’

‘माई वाइफ़, डेज़ी।’ बताते हुए दिनेश झेंप गया।

‘वाह वाह, क्या डील डौल पाया है…, मुबारक हो। मिलवाओगे नहीं क्या?’

‘माला, न ही मिलो तो अच्छा है,’

‘क्यों; ऐसी भी क्या बात है, दिनेश? अब तक तो उसे हमारे बारे में किसी ने बता ही दिया होगा,’

‘पैसों के लालच में मैंने शादी कर ली थी। अब पैसा ही पैसा है और सारी उम्र का रोना,’ माला की ओर देखते हुए दिनेश ने एक ठंडी आह भरी।

‘भगवान करे तुम खूब भुगतो।’

‘क्यों बद्दुआएं दे रही हो? लन्च मेरे साथ ही कर रही हो न फिर?’ भीतर का रुख़ करते हुए दिनेश ने पूछा।

‘औफ़ कोर्स पर बाहर से कुछ मंगवाने की ज़रुरत नहीं, मैं घर से आलू के परांठे बना कर लाऊंगी,’

‘थैंक यू, माला, तरस गया था मैं तुम्हारे आलू के परांठों के लिए, आज रात को ठीक से सो भी नहीं पाऊंगा, परांठे ही परांठे दिखेंगे नींद में,’

‘इससे पहले कि डेज़ी बाहर आकर तुम्हारा परांठा बना दे, अन्दर जाओ। हो सके तो मेरी नौकरी का कुछ इन्तज़ाम करना।’

‘तुम कहो तो तुम्हारे लिए एक नई फैक्टरी खुलवा दूं? तुम कल आओ तो सही,’

‘बुलडोज़र ठीक तुम्हारे पीछे है, सी यू टुमौरो,’

माला पलटी ही थी कि मणि-मंडित आसमानी साड़ी में लिपटे सफ़ेद त्वचा के एक गोल-मटोल बंडल से जा टकराई, जो तिरछी नज़र से उसे एक साथ जलन, स्पर्धा और द्वेष से घूर रहा था।

‘डार्लिंग, इसने मिलो, ये है माला, कालेज में मेरे साथ पढ़ती थी और ये हैं हमारी शरीक़े-हयात, डेज़ी मान, आज हम न जाने कितने सालों बाद मिले हैं, हैं न माला?’

‘नाइज़ टु मीट यू,’ डेज़ी ने सिर हिला कर माला का अभिवादन कुछ यूं स्वीकार किया कि जैसे उस पर एहसान कर रही हो। मुस्कुराती हुई माला जिया की ओर चल दी; उसके दिन फिरने में अब देर नहीं थी।

‘हाउ एम्बैरेस्सिंग, सारे मेहमानों की नजरें तुम दोनों पर ही टिकी थीं,’ माला के वहां से हटते ही आशंकित डेज़ी गुस्से में बुदबुदाई।

‘डार्लिंग, यू नो, माला से मेरी ख़ासी दोस्ती थी…,’

‘जानती हूँ, मीता आंटी ने मुझे सब बता दिया है,’

‘क्या बता दिया है?’ दिनेश को गुस्सा आ गया, घर में अभी कदम रखा नहीं कि शुरू हो गईं चुगलियाँ।

‘जाने दो…मैंने तो डैज़र्ट भी खा लिया, तुम खाना खाओ। ज़रा मैं सुरभि से हेलो कर लूं,’ डेज़ी मुंह फुलाए वहाँ से चल दी।

‘ओके डार्लिंग, ज़रा सुरभि को चौकन्ना कर देना, सुरेन्द्र की नज़र करन पर है,’

‘क्या बात करते हो दिनेश? तुम्हें सब अपने जैसे दिल-फेंक नज़र आते हैं। सुरभि और करन बचपन के दोस्त हैं,’

‘डार्लिंग, तुम तो यार कमाल की भोली हो,’

‘आई नो, एण्ड यू आर मोस्ट विकेड,’ डेज़ी मुस्कुराई तो दिनेश की जान में जान आई, नहीं तो आज रात को भी उसे सोफ़े पर ही सोना पड़ता।

डेज़ी को अपनी ओर आते देख कर घड़ियाल, जो सुरभि को घेरे बैठे था, अदब से उठा और अपनी कुर्सी डेज़ी की ओर सरका कर जिया की ओर चल दिया, हालांकि उसका मन हो रहा था कि प्रभा के पास जाकर बैठे पर रंजीत के फटकार के बाद ऐसा संभव नहीं था; कमबख्त ने उसकी शाम बर्बाद कर दी थी। उसने तय किया कि महिलाओं से छेड़छाड़ में ख़तरा कम था क्योंकि उन्हें तवज्जो की दरकार रहती है किन्तु युवतियों पर सभी मर्दों की लार टपकती है। यदि चाकलेट उन्हें न मिले तो किसी को और को भी नहीं मिलनी चाहिए।

‘हेलो सुरभि, दिनेश कह रहा था कि तुम्हारा और करन का अफ़ेयर चल रहा है, क्या यह सच है?’ डेज़ी ने सीधे-सीधे सुरभि से पूछ लिया।

‘क्या डेज़ी? यू नो, करन और मैं बचपन से साथ पले-बढ़े हैं। वो पूरे एक साल बाद बंबई से लौटा है और सुरेन्द्र चाहता है कि मैं उसकी तरफ देखूं तक नहीं, यह भी कोई बात हुई?’

‘ये आदमी भी न, सुरभि, खुद चाहे किसी से इश्क लड़ाते फिरें पर अगर उनकी वाइव्स किसी से बात कर लें तो…’

‘वही तो। खैर, ये माला कहाँ से आ टपकी यहाँ? तुझे पता है न…’

‘अरे हाँ, मीता आंटी ने मुझे शादी से पहले ही सब बता दिया था।’

‘कितनी ख़ूबसूरत लग रही है न माला? कहीं फिर से न शुरू हो जाए इन दोनों का रोमैंस,’

‘मुझसे बहुत डरता है दिनेश, एक कदम भी टेढ़ा रखा न तो बच्चू सड़क पर नज़र आएगा। तू जा, आराम से बात कर करन से; मैं सुरेन्द्र को बिज़ी रखती हूँ। ले करन यहीं आ गया, हाय करन!’ करन को अपनी सीट देकर डेज़ी सुरेन्द्र की ओर बढ़ गयी।

‘हाय सुरभि, तुम मुझे पिछले डेढ़ हफ़्ते से टाल रही हो, अपना मोबाइल तुम उठाती नहीं, वाए?’

‘समय, जगह और मौक़ा देख कर बात करनी चाहिए, करन,’ सुरभि चौकन्नी थी कि कहीं सुरेन्द्र उनकी बातें न सुन ले।

‘मेरी जिंदगी का तो मकसद ही शायद मौके तलाशना रह गया है, सुरभि,’

‘तुम समझते क्यों नहीं, करन?’

‘तुम भी क्यों नहीं समझती, सुरभि? कब तक दूर रहूं तुमसे और अपनी बच्ची से, कब तक?’

‘शट-अप, दीवारों के भी कान होते हैं, करन, और यहां की दीवारें भी लकड़ी की हैं। सुरेन्द्र को बड़ी मुश्किल से रास्ते पर लाई हूं। तुम ज़रा रिज़र्वड नहीं रह सकते?’

‘और कितना रिज़र्वड रहूं? तुम्हारे कहने पर मैंने चित्रा से शादी भी कर ली और बम्बई चला गया,’

‘वो सब तो ठीक है पर अपनी शक्ल क्या बना रखी है तुमने? साठ बरस के बूढ़े लग रहे हो,’

‘और तुम आज भी अठारह बरस की लग रही हो; उतनी ही हसीन जितनी कालेज के ज़माने में लगा करती थीं,’ करन की आवाज़ में थोड़ी नरमी आई।

‘काश कि तुम मेरे दिलो-दिमाग़ पर पड़ी झुर्रियाँ देख सकते, करन। सुनो, लोग हमें देख रहे हैं, मुस्काते हुए बात करो जैसे कि हम प्लेजेंट्रीज़ एक्सचेंज कर रहे हों,’

‘मेरा मन तो रोने को कर रहा है,’

‘तो बाहर चले जाओ गार्डन में या सड़क पर; दूसरों के जश्न में मातम मनाने को तुम्हें कोई हक़ नहीं,’

‘तुम पत्थर होती जा रही हो, सुरभि, तुम्हें मुझ पर ज़रा भी दया नहीं आती?’

‘जिंदगी सब सिखा देती है, करन, पर तुम कुछ नहीं सीख पाये, वही लकीर के फ़कीर रहे,’

‘सड़क के भिखारी को भी गाहे-बगाहे भीख दे दी जाती है। तुम्हारी खींची हुई लक्ष्मण-रेखा मैंने कभी पार नहीं की, सुरभि। जिसको चाहता हूं, उससे बात करना भी गुनाह है, जिसका बाप हूं, उस बच्ची को देखने को भी तरस गया हूं। यहां ले आतीं उसे, दूर से देख ही लेता,’

‘अपनी ज़ुबान को लगाम दो, करन, क्या इज्ज़त रह जाएगी मेरी? सोनिया के बारे में सोचा है कभी? लोग क्या कहेंगे?’

‘सुरभि, मैंने तुमसे हज़ार बार कहा है कि यहां किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता,’

‘पड़ता कैसे नहीं? अपने देश से दूर, ये लोग अब तक उसी सदी में जी रहे हैं, जिस सदी में वे यहां आए थे,’

‘मैं कहता हूं सुरभि, बड़े से बड़ा लफ़ड़ा यहां दो चार दिन से ज़्यादा नहीं टिकता, चार्ल्स और डायना तक का…’

‘तो तुम लफ़ड़ा किये बिना नहीं मानोगे?’ सुरभि एकाएक तन कर खड़ी हो गयी।

‘सुरभि, तुम तो महात्मा बुद्ध में विश्वास रखती हो, उन्होंने ही कहा था कि तीन चीजें अधिक समय तक छुपी नहीं रह सकती, सूरज, चंद्रमा और सच। तुम ये झूठ कब तक ढोती रहोगी?’

‘नहीं, मुझसे यह नहीं होगा, करन,’

‘सुरभि, कब तक इन्तज़ार करवाओगी? सोनिया अभी छोटी है, आसानी से मान जाएगी; एक टीनेजर को समझाना बहुत मुश्किल होता है,’

‘करन, मैंने उसे सच बता दिया तो हो सकता है कि वह हमें जीवन भर माफ़ न करे; मैं ऐसा कोई रिस्क नहीं लेना चाहती,’

‘कभी मेरी जगह खुद को रख कर देखो, सुरभि,’

‘कभी तुम मेरी जगह लेकर देखो, करन। जानते हो कैसा महसूस करती हूं उस आदमी के पहलु में, जिसे मैं प्यार नहीं करती? अपनी दो बच्चियों के लिए मैं ज़िंदा जल रही हूं, दिन रात। एक तुमसे है, एक सुरेन्द्र से, किसे छोडूं?’

‘मैं भी तंग आ गया हूं इस दोग़ली ज़िंदगी से, सुरभि, आओ आज फैसला कर…’ करन की बात अधूरी रह गयी, सुरेन्द्र वहाँ आ धमका। दूर खड़ी डेज़ी इशारे से सुरभि को ‘सौरी’ कह रही थी कि वह सुरेन्द्र को अधिक देर के लिए उन दोनों से दूर नहीं रख पाई।

‘हेलो करन, कब लौटे बम्बई से?’ सुरभि को घूरते हुए सुरेन्द्र ने करन से पूछा।

‘करीब एक महीना हो गया,’ करन अपना चेहरा बाएँ किए बोला। सुरभि और करन के चेहरों पर भावनाओं का सर्कस चरम सीमा पर था।

‘और अब तक घर नहीं आए?’ सुरेन्द्र दोनों के चेहरों को बारी बारी गौर से देख रहा था।

‘बस यूं ही,’

‘बीमार हो क्या? बिलकुल मजनूँ लग रहे हो। कोई चक्कर-वक्कर चल रहा हो तो भई हम भी सुनें,’ सुरेन्द्र दोनों के ज़ख्म कुरेदने पर उतारू था।

‘अभी-अभी फ़्लू से उठा हूँ,’ करन साफ़ झूठ बोल गया।

‘ओह! अब तो ठीक हो? सुरभि डार्लिंग, बुलाओ न इन्हें कभी घर?

‘मैं अभी इनसे यही कह रही थी,’

‘यह भी कोई पूछने की बात है? कल शाम क्या कर रहे हो, करन?’

‘कुछ ख़ास नहीं,’ करन तपाक से बोल उठा।

‘तो कल शाम ठीक रहेगी। मैं भी ऑफिस से जल्दी आने की कोशिश करुंगा, क्यों सुरभि?

‘जी ठीक है,’

‘कल शाम को मिलते हैं फिर, बाय फॉर नाऊ,’ कहते हुए करन उठ कर जिया कर पास जा बैठा।

‘क्या खुसर पुसर चल रही थी तुम दोनों के बीच?’ करन के जाते ही सुरेन्द्र ने सुरभि को आड़े हाथों लिया।

‘सुरेन्द्र, तुम इतने शक्की क्यों हो?’

‘सुरभि, मुझे क्या उल्लू का पट्ठा समझ रखा है? डेज़ी को मेरे पीछे लगा कर तुम सोच रही थीं कि मेरी आँखें बंद हैं, मैं सब देख रहा था,’ सुरेन्द्र गुस्से में काँपने लगा।

‘ज़रा धीरे बोलो, सुरेन्द्र,’ घबराई हुई सुरभि इधर-उधर देखने लगी कि सुरेन्द्र गुस्से में कहीं फिर न बिफ़रने लगे। सुबह भी जब सुरभि ने उससे मीता की पार्टी में चलने के लिए कहा तो वह चीख़ने-चिल्लाने लगा था और जब सुरभि ने न जाने का फ़ैसला कर लिया तो शाम के चार बजे एकाएक वह पार्टी में चलने को उठ खड़ा हुआ। न खुद तैयार हुआ और न ही उसने सुरभि को कपड़े बदलने का मौक़ा दिया।

‘अपनी दोनों की शक्लें देखी थीं तुमने? कहानी कह रही थीं,’

‘तो पढ़ क्यों नहीं ली?’ सुरभि ने तंग आकर कहा।

‘मेरे सिवा यहां और लोग भी ब्लडी पढ़ना जानते हैं,’

‘चलिए, घर चलकर बात करते हैं,’

‘ये हरामी का पिल्ला यहाँ भी आ टपका। सुबह तुम इसीलिए ही ज़िद कर रही थीं कि मीता के यहाँ चलो, मीता के यहाँ चलो; सोचा होगा कि मैं कह दूंगा अकेली चली जाओ,’

‘गाली देना क्या अच्छी बात है?’

‘ईश्क लड़ाना बड़ी अच्छी बात है? दो बच्चियों की मां हो तुम, कुछ तो शर्म करो,’

‘मैंने किया क्या है, सुरेन्द्र? एक दूसरे का हालचाल पूछना क्या गुनाह है? और ऐसी ही बात तो थी तो करन को घर पर न्योतने की क्या ज़रूरत थी?’

‘उसे तो मैंने बात की तह में जाने के लिए बुलाया है,’

‘क्यूं बात का बतंगड़ बना रहे हो, सुरेन्द्र?’

‘हद होती है आदमी के सब्र की,’

‘घर पहुँच कर जो जी में आए कह लेना, अभी तो…’ तभी वहाँ गिरगिट आ पहुंचा और वे दोनों सकपका कर चुप हो गए।

‘मोहब्बत हो तो तुम मियाँ-बीवी जैसी, पार्टी में आकर भी एक दूसरे से चिपके हो। औरों को भी चान्स दो न, बड़े भाई, बात-वात करने का,’

‘राजेश भाई, बस हम निकल ही रहे थे, बच्चियां घर पर अकेली हैं न,’ सुरेन्द्र बोला। सुरभि सोचने लगी कि लोगों के सामने कैसा साधू बन जाता है उसका पति?

‘आप दोनों बात कीजिए, मैं ज़रा जिया से ‘बाय’ कह कर आती हूँ,’ मौक़ा पाकर सुरभि जिया की ओर लपक ली।

‘बड़े भाई, आप लोगों के दम से ही तो पार्टी में रौनक है और आप जाने को कह रहे हैं। बच्चियों को भी करने दो थोड़ा रिलैक्स, ऐसी क्या जल्दी है?’ करन का गिरगिट से जल्दी निबटना मुश्किल था; सुरभि इस बीच करन को चेतावनी दे देना चाहती थी।

‘जैसे मौका ही ढूंढ रहे थे घर आने का तुम,’ करन को देखते ही सुरभि फुसफुसाई।

‘बच्ची को देखे बगैर अब नहीं रहा जाता। मैं खाने के लिए नहीं रुकूंगा।’ फिर कुछ सोचते हुए करन बोला, ‘कहो तो चित्रा को साथ ले आऊं?’

‘उस बेचारी को तुम इस पचड़े से अलग ही रखो तो अच्छा है और सुनो कल तुम हमारे घर न ही आओ तो अच्छा है,’

‘क्यों, सुरेन्द्र ने खुद इनवाईट किया है। मैं बस आधे घंटे बैठ कर निकल जाऊंगा, सुरभि,’ करन गिड़गिड़ाने पर उतर आया।

‘सुरेन्द्र गुस्से में है, कहीं बच्चियों के सामने न कुछ बक दे? कहीं बाहर क्यों नहीं मिल लेते, करन?’

‘जैसा तुम ठीक समझो, बोलो कहां मिलें?’

‘मैं सोनिया और गिन्नी को लेकर सुबह नौ बजे हैरो लैज़र-सैन्टर जा रही हूं। स्वीमिंग-वेटिंग-एरिया में मिलना। सोनिया अच्छी तैराक है। पूछ भी रही थी तुम्हें?’

‘अच्छा, क्या कह रही थी?’ करन पिघलने लगा।

‘यही कि बहुत दिनों से करन अंकल को नहीं देखा,’

‘मैं तो सोच रहा था कि वह मुझे भूल ही गयी होगी,’ करन की आँखें एक बार फिर भर आईं।

‘सुरेन्द्र इधर ही आ रहे हैं। मैं चलती हूँ और सुनो, इन्हें फ़ोन पर कल घर न आने के लिए माफ़ी मांग लेना, ओके?’

‘ओके, बाय सुरभि,’ इसके पहले कि सुरेन्द्र उन तक पास पहुंचता, करन उठ कर बाहर निकल गया और सुरभि बाय कहने के लिए जिया की ओर मुड़ गयी।

जिया ने करन और सुरभि की बातें सुन ली थीं, उनके कान जानवरों से कहीं अधिक तेज़ थे। यह राज़ पुष्पा मौसी को बताने के लिए उनका दिल मचा उठा, जो इस वक्त अम्मा की खाने-पीने में मदद कर रही थीं। जिया के पेट का अफ़ारा कहीं फूट ही न जाए, न चाहते हुए भी वह यह राज़ आपा को बताने के लिए आतुर हो उठीं किन्तु आपा हसन, सायरा और रंजीत के इर्द गिर्द घूम रही थीं।

‘मिस्टर रंजीत, तो सुनाइए आपका बिज़नेस कैसा चल रहा है? घड़ियाल की रोती हुई सूरत ने बात उठाई। इतनी बेइज्ज़ती हो जाने के बावजूद भी, गिरगिट ने उसे रंजीत से सुलह कर लेने की सलाह दी थी।

‘साला ठीक ही है बस,’ रंजीत ने बेमन से जवाब दिया; वह हैरान था कि भरी महफ़िल में अपमानित होने के बावजूद घड़ियाल उससे बात करने को आतुर था।

‘भाई घर में बेकार बैठा है, कोई छोटा-मोटा काम भी हो तो चलेगा,’ घड़ियाल ने गिड़गिड़ाते हुए कहा। रंजीत को उसने अधिक सोचने का मौक़ा नहीं दिया; वह असल मुद्दे पर जल्दी ही आ गया।

‘आजकल साले रिसैशन ने भैन्चो सब की कमर तोड़ रखी है, नो वैकेंसीज़ एनीवेयर,’ रंजीत ने उसे झट टाल दिया; वह घड़ियाल के भाई से मिल चुका था; वह भी उसी की तरह रोती-शक्ल था।

‘बड़े भाई सही फ़र्मा रहे हैं, इंग्लैण्ड की इकौनमी का बुरा हाल है, हज़ारों लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं,’ गिरगिट ने रंजीत की बात का समर्थन किया।

‘लगता है कि इकौनमी सिर्फ मर्दों के लिए बिगड़ रही है, औरतों के लिए कोई रिसेशन नहीं है,’ घड़ियाल रोष में भर कर बोला।

‘साला मतलब क्या है आपका?’ बावजूद खुमार के रंजीत चौकन्ना था।

‘भाई साहब के कहने का मतलब यह है, बड़े भाई, कि क्या औरतें मर्दों के मुकाबले अधिक पढ़ी-लिखी और क़ाबिल हैं कि उन्हें जॉब्स की कमी नहीं है?’ गिरगिट ने बात संभालने की कोशिश की।

‘या वे मेल बौसेस की नब्ज़ पहचानती हैं?’ घड़ियाल ने संभल चली बात को फिर बिगाड़ दिया। तभी करन रायज़ादा भी वहाँ आकर बैठ गया, उसके हाथ में भी व्हिस्की का एक सादा गिलास था, बिल्लौरी पैमाने सिर्फ़ विशेष मेहमानों के लिए सुरक्षित थे।

‘ऐसी साली कितनी होंगी? मोस्टली तो अपनी मेहनत और साली काबलियत के बल पर ही टिकीं हैं,’ यह जानते हुए भी कि घड़ियाल का इशारा किस ओर था, रंजीत ने उसे टालना चाहा।

‘रंजीत यार, तुम अब मुंह मत खुलवाओ हमारा,’ करन रायज़ादा ने अपनी बाईं आँख दबाते हुए कहा; यह जग ज़ाहिर था कि रंजीत का दफ्तर ख़ूबसूरत बालाओं से भरा था।

‘क्यों नहीं, साला तुम्हें अपना मुंह खोलने की भैन्चो पूरी इजाज़त है,’ रंजीत एकाएक उग्र हो उठा।

‘हम भी तो देखें, बड़े भाई, तुम्हारा पूरा खुला हुआ मुंह,’ गिरगिट ने बात बढ़ाई तो करन भड़क उठा।

‘वही नौकरी जो एक मर्द को मिलनी चाहिए, किन्हीं वजहों से एक ख़ूबसूरत महिला को दे दी जाती है,’ एक ही झटके में गिलास खाली करते हुए करन बोला। आज की ताज़ा ख़बर उसके कान में पड़ ही चुकी थी कि रंजीत ने सायरा को एक लिफ़ाफ़ा पकड़ाया था।

‘यार, उन वजहों का खुलासा तो दो?’ घड़ियाल भला भी कब तक पानी में रहता? उसे तो बस एक मौका चाहिए था रंजीत को कीचड़ में घसीटने का।

‘सभी जानते हैं मैं जिन वजहों की मैं बात कर रहा हूं; यहां बुज़ुर्ग लोग बैठे हैं, नहीं तो मैं खुल्लम खुल्ला…,’ करन रायज़ादा ने आपा, अम्मा और जिया की ओर देखते हुए कहा; एकाएक उसे अपने बचाव की ज़रूरत महसूस हुई।

‘साले, दूसरों के मामले में टांग अड़ाने से पहले भैंचो अपने ग़रेबां में तो झाँक लिया होता।’ रंजीत को भी दुनिया भर की ख़बर थी। सबकी नज़र सुरभि पर जा टिकी, जो घबरा कर सुरेन्द्र से घर चलने का आग्रह रही थी किन्तु वह रंजीत के नज़दीक रखी एक कुर्सी पर जम कर बैठ गया जैसे वह आज बात की तह में जाकर ही रहेगा।

‘बड़े भाई, साफ़ सी बात है, जो लोग शीशे के घरों में रहते हैं उन्हें दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिए।’ गिरगिट ने मुड़ कर सुरभि की ओर देखते हुए कहा तो करन भड़क उठा।

‘ज़ुबान संभाल कर बात कर, ऐसा दूंगा उल्टे हाथ का कि रंग बदलना भूल जाएगा,’

‘तेरी बीवी ने दिया होता न एक उलटे हाथ का तो तुझे दिन में तारे नज़र आ जाते,’ गिरगिट कहाँ चुप रहने वाला था; भरी सभा में करन ने उसकी बेइज्ज़ती की थी।

‘तेरी तो…’ करन ने गिरगिट का गला पकड़ लिया।

दो बलिष्ठ हाथों से गिरगिट और करन को एक दूसरे से अलग करते हुए टयाल साहब की स्थूल काया बीच में चट्टान सी आ खड़ी हुई, जिसके आरपार देखना असंभव था।

‘ओनली इफ़ आई हैड ऐ गन,’ करन ने गिरगिट, रंजीत और सुरेन्द्र की ओर बारी बारी देखते हुए गुस्से में कहा।  चित्रा और सुमित उसे समझाते-बुझाते हुए अन्दर ले जाने का प्रयत्न कर रहे थे।

 

क्रमशः

 

- दिव्या माथुर

दिव्या माथुर 1984 में भारतीय उच्चायोग से जुड़ीं, 1992-2012 के बीच नेहरु केंद्र में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी रहीं और आजकल भारतीय उच्चायोग के प्रेस और सूचना विभाग में वरिष्ठ अधिकारी हैं। रौयल सोसाइटी की फ़ेलो, दिव्या वातायन कविता संस्था की संस्थापक और आशा फ़ाउंडेशन की संस्थापक सदस्य हैं।

कहानी संग्रह - आक्रोश (पद्मानंद साहित्य सम्मान, हिन्दी बुक सैंटर, दिल्ली), पंगा और अन्य कहानियां (मेधा बुक्स, दिल्ली), 2050 और अन्य कहानियां (डायमंड पौकेट बुक्स, दिल्ली) और हिन्दी@स्वर्ग.इन (सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली)।

अँग्रेज़ी में कहानी संग्रह (संपादन) – औडिस्सी: विदेश में बसी भारतीय महिला कहानीकारों की कहानियां (स्टार पब्लिशर्स), एवं आशा: भारतीय महिला कहानीकारों की कहानियां (इंडियन बुकशैल्फ़, लन्दन)।

कविता संग्रह - अंतःसलिला, रेत का लिखा, ख़्याल तेरा, चंदन पानी, 11 सितम्बर, और झूठ, झूठ और झूठ (राष्ट्रकवि मैथलीशरणगुप्त सम्मान)।

अनुवाद - मंत्रा लिंगुआ के लिए बच्चों की छै पुस्तकों का हिंन्दी में अनुवाद : औगसटस और उसकी मुस्कुराहट; बुकटाइम, दीपक की दीवाली; चाँद को लेकर संग सैर को मैं निकला; चीते से मुकाबला और सुनो भई सुनो। नैशनल फ़िल्म थियेटर के लिये सत्यजित रे-फ़िल्म-रैट्रो के अनुवाद के अतिरिक्त बी बी सी द्वारा निर्मित फ़िल्म, कैंसर, का हिंदी रूपांतर। इनकी रचनाओं का भी विभिन्न भाषाओं में अनुवाद।

नाटक : Tête-à-tête और ठुल्ला किलब का सफल मंचन, टेलि-फ़िल्म : सांप सीढी (दूरदर्शन)।

सम्मान/पुरस्कार : भारत सम्मान, डॉ हरिवंश राय बच्चन लेखन सम्मान, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त प्रवासी भारतीय पुरस्कार, पदमानंद साहित्य सम्मान, प्रवासी हिन्दी साहित्य सम्मान, आर्ट्स काउंसिल औफ़ इंगलैंड का आर्टस एचीवर पुरस्कार, चिन्मौय मिशन का प्रेरणात्मक व्यक्ति सम्मान, इंटरनैशनल लाइब्रेरी ऑफ़ पोइटरी द्वारा पुरस्कृत कविता, बौनी बूंद ‘Poems for the Waiting Room’ परियोजना में सम्मलित, ‘दिव्या माथुर की साहित्यिक उपलब्धियाँ’ नामक स्नातकोत्तर शोध निबन्ध, ‘इक्कीसवीं सदी की प्रेणात्मक महिलाएं’, ‘ऐशियंस हू ज़ हू’ और विकिपीडिया की सूचियों में सम्मलित।

संप्रति : भारतीय उच्चायोग, लंदन, में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी।

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