एक शाम भर बातें

व्यंगात्मक उपन्यास : द्धितीय भाग ->

इससे पहले कि सायरा का अगला पिछला इतिहास दोहराया जाता, सायरा ने गाना शुरू कर दिया; पृष्ठभूमि की फुसफुसाहटें पार्श्व संगीत में तब्दील हो गईं।

‘तंग आ चुके हैं कश्मकशे ज़िंदगी से हम, ठुकरा न दें जहां को कहीं बेरुखी से हम, तंग आ चुके हैं,’

 

सायरा की दर्द भरी आवाज़ ने अपने दुश्मनों में भी संजीदगी बांट दी थी; हर तरफ़ एक सन्नाटा छा गया। ग़ज़ल ख़त्म होने से पहले ही गिरगिट वाह-वाह करता हुआ ज़ोर-ज़ोर से तालियां पीटने लगा कि जैसे उसे कोई इनाम मिलने वाला हो।

कानाफूसी एक बार फिर सरसरा उठी; मेहमानों की सवालिया निगाहें फ़न उठाए सायरा से मुखातिब थीं।

 

‘सायरा जी, क्या समां बांधा है आपने; तारीफ़ के लिए हमें कोई अल्फ़ाज़ नहीं मिल रहे। सचमुच, आपको तो प्रोफ़ेशनली गाना शुरू कर देना चाहिए,’ गिरगिट बड़ी आत्मीयता से बोला, ‘मेरा एक दोस्त है, रिकार्ड बनाता है, आप कहें तो उससे बात करूं?’

 

‘राजेश साहब, दिलजोई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया, हम तो सिर्फ़ शौकिया गाते हैं,’ गिरगिट की इस ख़लल से सायरा ख़ासी परेशान थी; तिस पर मंजूषा की बात भी उसके कान में भी पड़ चुकी थी।

‘सुभान अल्लाह, बहुत खूब…’ हसन भी अपना दिल थामें खड़ा था किन्तु सायरा नहीं चाहती थी कि रंजीत उन्हें फिर बात करते हुए देखे।

‘भाई जान, माफ़ कीजिएगा, हमें नौकरी के सिलसिले में ज़रा रंजीत से अकेले में बात करनी है,’ सायरा ने ‘भाई-जान’ तनिक ज़ोर से कहा था ताकि रंजीत और गिरगिट सुन लें। हसन की ओर घूम कर वह फुसफुसाई, ‘इंशा अल्लाह, आपसे फ़ोन पर बात होगी,’ सायरा के इस एक जुमले से हसन को मानों तसल्ली हुई कि वह उससे ख़फ़ा नहीं थी।

‘मुतमइन रहिए, न खुलेगा कभी राज़, जो राज़ से वाकिफ़ है, दीवाना है।’ आप कभी हमारे ग़रीबखाने पर तशरीफ़ लाएं,’ सायरा और हसन को गुफ़तगु में डूबा देख आपा ने खुदा का शुक्र अदा किया और अजमेर शरीफ़ जाकर फूलों की एक चादर चढ़ाने का अपना कौल मन ही मन में दोहराया।

‘मोहतरमा, आपने तो सबको सचमुच सीरियस कर दिया, अब हो जाए कोई फड़कती हुई चीज़,’ सायरा और हसन को फुसफुसाते देख गिरगिट ने अपनी टांग अड़ाई। उसकी इस नामाकूल हरकत पर कई चेहरों पर नाराज़गी के भाव दिखाई दिए पर वह कुत्ते के पिल्ले सा सायरा को बेहयाई से निहार रहा था।

‘माफ़ कीजिएगा,’ कहती हुई सायरा उठ कर मिश्रा जी के पास जा खड़ी हुई।

 

‘परछाइयों से पीछा छुटाना चाहती हो तो, सायरा, अपना चेहरा हमेशा सूर्य की ओर रखो।’ मिश्रा जी ठीक ही कह रहे थे इन लोगों में उठने बैठने से वह सिर्फ ज़ख़्मी होती रहेगी।

‘न नशेमन है न है शाखे-नशेमन, मज़ा तब है करे अब कोई बर्बाद मुझे,’ सायरा ने आँखें झपका कर मिश्रा जी की हिदायत के लिए शुक्रिया के बहाने एक शेर पढ़ा तो वह भाव-विभोर हो उठे।

‘वाह, क्या बात कही है, भई वाह,’

‘हमारी फज़ीहत सरे बाज़ार हो चुकी है, मिश्रा साहब, एक अदद ज़िंदगी बची है जिसे दाँव पर लगाने जा रही हूँ, देखिए क्या दाम मिलता है। ख़ैर, अर्ज़ किया है के ‘उस पार उतरने की उम्मीद बहुत कम है, कश्ती भी पुरानी है तूफ़ा को भी आना है,’उस पार उतरने की, उम्मीद बहुत कम है
कश्ती भी पुरानी है, तूफ़ाँ को भी आना हैउस पार उतरने की, उम्मीद बहुत कम है
कश्ती भी पुरानी है, तूफ़ाँ को भी आना हैउस सायरा की बेबाकी के सदा से कायल थे मिश्रा जी; वह जान भी मांगती तो वह बेहिचक उस पर न्योछावर कर देते पर इस वक्त सायरा को किसी की जान या मुहब्बत की नहीं, धनो-दौलत की दरकार थी।

सायरा रेस्टरूम के दरवाज़े तक भी नहीं पहुँची थी कि उसने वायु को कहते हुए सुना।

‘हमें तो आज तक यई नई पता था के सायरा जेल में थी! पुअर थिंग, हुआ क्या? कब छूटी? कैसे छुटी?’ वायु सबसे ऐसे पूछती फिर रही थी कि जैसे उसे सायरा से सचमुच बहुत सहानुभूति थी।

‘अरे, सारी दुनिया जानती है, जाने आपको कैसे पता नहीं चला, वायु जी, उसने अपने हज़बैंड का मर्डर कर दिया था; अच्छा हुआ बेचारी छूट गयी,’ मंजूषा ने गीली माचिस पर फिर से तीली रगड़नी चाही।

सायरा तिलमिला उठी; अदालत ने तो बरी कर दिया था पर दुनिया के इस कटघरे में क्या उसे ताउम्र खड़े रहना होगा?

‘सायरा ने जो भी किया सेल्फ-डिफैंस में किया, यह साबित हो चुका है,’ सुमित ने ‘सेल्फ-डिफैंस’ पर ज़ोर देते हुए कहा। वायु की सिंथेटिक साड़ी का पल्ला कंधे के बजाय उसकी गोद में पड़ा था।

‘असल में केस मैन्टल-डिसऔर्डर का था और उसे बरी भी इसी बिना पर किया गया है,’ राजीव ने सुमित को दुरुस्त किया।

‘फिर तो उसका साईकाएट्रिक इलाज चल रहा होगा?’ मंजूषा ने एक बार फिर चिंगारी को फूंका। तभी मोहन वहाँ आ पहुंचे, जो सायरा के घोर हिमायती थे।

‘बात दरअसल यह है के यहाँ की पुलिस बिलकुल नाकारा है। अगर वो समय पर चेत जाती तो यह हादसा होता ही नहीं। वे उसे यह कह कर टालते रहे के यह उनका घरेलू मामला था और जब अनजाने में ह्त्या हो गयी तो आए ‘जूथप  जूथ,’ मोहन के अनुमोदन में मोहिनी भी अपना सिर ज़ोर-ज़ोर से हिलाने लगी। ‘जूथप जूथ’ ने एक ऐसा शब्द-चित्र प्रस्तुत किया कि मेहमानों के दिलो-दिमाग़ में बन्दर कूदने फांदने लगे; बोरियत कुछ कम हुई।

‘मरा दफ़ा हुआ, कूड़ा कहीं का। ऐसे आदमी का मरा क्या जीना और क्या मरना? मैं तो कैती हूँ के मरी बला टली,’ इससे पहले की मेहमानों के दिमाग़ कल्पना की ऊंची उड़ान भरने लगते, मोहिनी के ‘कूड़ा’ और ‘मरे’ शब्द मेहमानों को वापिस वास्तविक दुनिया में ले आए।

‘असल बात तो भई हम बताते हैं आपको, मोहिनी बी। सायरा का बद्ज़ौक खाविंद आबिद धंधा करवाने के लिए ही उन्हें विलायत लाया था, खुदा ना ख़ास्ता, वह राज़ी नहीं हुईं, होतीं भी कैसे, बड़े ज़हीन ख़ानदान से हैं वो।’ मोहन और मोहिनी के बीच खड़ी आपा फुसफुसा कर बोलीं मानो कोई बड़ा राज़ खोल रही हों।

‘कोई मुझे बता रहा था कि एक दफ़ा आबिद ने दीवार से मार मार कर बेचारी का सिर फोड़ डाला था,’ मंजूषा ने अफ़वाहों का सहारा देकर बात-बेल को महफ़िल पर टिका दिया।

‘सायरा इज़ सच एन एंजल, उस क्राफ्टी आबिद के झांसे में जाने कैसे आ गई,’ मीता ने कहा; आपा को देखकर उसके लहज़े में सायरा के लिए हमदर्दी उतर आई थी।

‘भई हम तो सायरा बीबी की हिम्मत की दाद देते हैं, उनकी जगह कोई और होता तो ख़ामोश पिटा करता, जैसे के हमारे इंडिया और पाकिस्तान में अक्सर होता रैता है,’

‘शेख़ सादी ने कहा था कि हीरा धूल में भी गिर जाए तो हीरा ही रहता है किंतु धूल आकाश पर चढ़ने के बाद भी धूल ही रहती है,’ मिश्रा जी बोले। किसी को उनका आशय समझ में नहीं आया; सायरा धूल थी अथवा हीरा? खैर, मिश्रा जी की अहमकाना टिप्पणियों के लिए किसे फुर्सत थी?

‘अब तो अपने देश की मरी लड़क़ियां भी बाहर जाने से पहले मरा सौ बार सोचती हैं,’ मोहिनी ने मोहन की ओर देखते हुए कहा, जो उन्हें सदा की तरह आदर से निहार रहे थे।

‘आने वालियां तो अब भी मौक़ा नहीं चूक रहीं,’ बेहाल वायु के पल्ले ने कन्धे पर टिके रहने से साफ़ इंकार कर दिया; गोद में पड़ा वह अपनी किस्मत को रो रहा था और ब्लाउज़ के लो-नेक में से बासी करेले सी उसकी छातियाँ मेहमानों में वितृष्णा पैदा कर रही थीं।

‘मरी वही जिन्हें अपने देश में भी कोई मरी घास नहीं डालता?’ मंजूषा को घूरते हुए मोहिनी बोली तो मोहन ने सिर हिला कर उसका अनुमोदन किया।

‘यहाँ भी कौन पूछता है उन्हें? लोग इंडिया और पाकिस्तान से बहुएं लाकर उनकी कैसी बेक़द्री करते हैं, बेचारी न इधर की रहती हैं न उधर की,’

‘ऐ मैं तोसे कऊं, मोईनी, सादी-ब्याह तो सब ऊपर से तै होकर आते हैं, बेचारी सारा के भाग में राम जी ने यई लिखा था,’ जिया बोलीं, जो रेस्टरूम के ख़ाली होने के इंतज़ार में वहाँ ठिठक गयी थीं। वह आपा को दिखाना चाह रही थीं कि उन्हें सायरा से सहानुभूति थी जबकि असलियत यह थी कि वह और पुष्पा मौसी सायरा को ‘कुलच्छनी’ और ‘बेलच्छनी’ जैसे शब्दों से अलंकृत करती रहती थीं।

‘जो भी कहो, मर्द की ह्त्या करने के लिए लोहे का कलेजा चईए, लोहे का,’ सोमा बोली।

‘हमें तो कोई ये बताए कि उसे हत्या करने की ज़रूरत क्या थी? आबिद को छोड़ देती तो काउन्सिल वाले रैने को उसे घर दे देते,’ एक नया गुट तैय्यार हो गया था जो सायरा के इतिहास के बारे में जानने का इच्छुक था। जो मेहमान सब जानते थे, वे वहाँ से यह सोचते हुए उठ गए कि ऐसे थर्ड-क्लास लोगों के साथ बैठने का क्या फ़ायदा?

राजीव और मंजूषा सरकते हुए जोशी-सर के नज़दीक पहुंचे ही थे कि देखा मकरंद उनका परिचय सुमित से करवा रहा था। जोशी-सर सुमित से बड़े ज़ोरो-ख़रोश से मिले और काफ़ी देर तक वे आपस में राजनीति पर बातें करते रहे। तभी गिरगिट को मिलवाने हेतु मोहन वहाँ चले आए। हाथ बांधे और सिर झुकाए गिरगिट भी एक ब्रैंड-न्यू डायलौग की डिलीवरी के लिए तैयार था किन्तु जैसे ही मोहन ने जोशी-सर को गिरगिट का परिचय दिया, जोशी-सर ने आँखों ही आँखों में उसके ऐसी एक दुलत्ती झाड़ी कि वह बुरी तरह खिसिया गया।

‘भैय्या, हम ठहरे मामूली मुफ़लिस मज़लूम लोग, सुमित की बात और है, वह पॉलिटिक्स में है,’ घड़ियाल ने रोते हुए गिरगिट को सांत्वना दी जबकि वह स्वयं जोशी-सर से हाथ मिलाने के लिए आकुल-व्याकुल था।

राजीव और मंजूषा, जो यह तमाशा देख रहे थे, बिदक गए। मंजूषा का ध्यान बंटाने की ख़ातिर राजीव ने बात बदल दी।

‘मीता इज़ वन स्मार्ट वूमन, एक ही बार में उसने इतने सारे अधिकारियों को डिनर पर बुला लिया, अब उसका हर काम आराम से घर में बैठे हो जाएगा,’ राजीव ने कहा तो मंजूषा ने बसंत और मेनका का मज़ाक उड़ाना तुरंत बन्द कर दिया। यह बात उसकी मोटी बुद्धि में क्यों नहीं आई? उसे भी तो पासपोर्ट पर अपना सर-नेम बदलवाना था। चाहे जैसे भी हो, जोशी-सर को उसे डिनर के लिए बुलाना आवश्यक था। जोशी-सर उसकी ओर बार-बार देखते भी रहे थे; मंजूषा ने कमान साध ली। राजीव की हिम्मत जवाब दे गयी थी किन्तु मंजूषा वहीं ठहर गयी; शिकारी का शिकार करने का मज़ा कुछ और ही था।

‘सरकारी लोगों की न तो दोस्ती भली और न ही दुश्मनी; इनसे जितना दूर रहो उतना अच्छा,’ मोहन और गिरगिट भारत सरकार के अधिकारियों की धज्जियां उड़ाने लगे और घड़ियाल एक बार फिर प्रभा की ओर चल दिया, जो वाल्ट डिज़नी की बाम्बी सी सकुचाई हुई एक कोने में गुमसुम बैठी थी। मुश्किल से हाथ लगा शिकार, वह भी भोला और कमसिन; घड़ियाल भला कहां छोड़ने वाला था? आंसू उसके अचूक अस्त्र थे।

‘किसी का दु:ख सुनने से आपका तो कुछ बिगड़ नहीं जाएगा, मन पर रखा मेरा बोझ ज़रूर हल्का हो जाएगा पर यहां किसी को क्या पड़ी है, सब खुदगर्ज हैं, सारी दुनिया ही सैल्फ़िश है। जब नौलखा जैसा दोस्त ही दग़ा दे गया तो औरों से क्या गिला?’ यदि हिम्मत करके अथवा अनजाने में कोई महिला घड़ियाल का रोना सुनने से इनकार कर दे तो वह हल्के से बरस भी पड़ता था।

‘अइ अइ ओ, आइ यम व्हैरी सॉरी जी,’ दोहराते हुए थक चुकी थी प्रभा, जिसके लिए यहाँ सब कुछ नया था; यह शहर, ये लोग, ये शामें, ये बातें और घड़ियाल के वे आंसू, जो उसने क्रिस्टल के कटोरे में से एक चुल्लू भर पानी लेकर आंखों और गालों पर चिपड़ लिए थे। टीशू के अभाव में अपने हाथ झटका कर सुखाते हुए कुछ छींटे प्रभा की कांजीवरम की साड़ी पर भी आ गिरे तो वह घबरा उठी। उसकी सास उसे पहले ही हिदायत दे चुकी थी कि लंदन में ड्राइक्लीनिंग कराने का ख़र्चा एक नई साड़ी लेने के बराबर था, ‘अइ अइ ओ।’

इला ने सोचा कि एक सामान्य व्यक्ति की तरह व्यवहार करे तो घड़ियाल के भविष्य की संभावनाएं सुधर सकती थीं पर उसने तो राजीव द्वारा दिए गए अपने उपनाम का उसने कभी विरोध नहीं किया। मोटी चमड़ी थी उसकी, असर हो भी तो कैसे? उसकी आंखें नाक से कहीं ऊंची थीं और माथा छोटा, तिस पर बालों से आधा ढका, भ्रम होता था कि उसकी आंखे कहीं सिर पर ही तो नहीं लगी थीं। गिरगिट की तरह, उसका भी आकस्मिक आक्रमण अधिकतर महिलाओं पर ही होता था; जिनके इर्द-गिर्द वह मंडराता रहता था।

इला का मन हुआ कि जाकर प्रभा को घड़ियाल के चंगुल से निकाल ले पर स्वयं अपने फंस जाने के डर से वह ठिठक गई। वह यह भी सोच रही थी कि प्रभा को यहां के माहौल का अनुभव जितना जल्दी हो जाए, उतना ही अच्छा था। तीन साल तो गुज़ारने ही थे उसे लन्दन में जब तक सापलू का तबादला किसी और देश में नहीं हो जाता। प्रभा को उसके भाग्य के सहारे छोड़, इला सुधाकर मिश्रा और हसन  के पास आकर निधड़क बैठ गयी। इस कोने से सारे कमरे की गतिविधियों पर निर्विघ्न नज़र रखी जा सकती थी क्योंकि मिश्रा जी के पास फटकने की जुर्रत किसी में नहीं थी। व्हिस्की का एक गिलास थामें वह निर्विकार भाव से चुपचाप बैठे थे; मानों दुनिया से बेख़बर, गूढ़ सत्य गुनते वह कहीं गहन जंगल में विचर रहे हों। सिवा एक ‘हेलो, हाउ आर यू?’ अथवा ‘बाय’ के उनसे कोई बात नहीं करता। उन्हें भी किसी व्यक्ति या किसी चीज़ में कोई रूचि नहीं रही थी। हाँ, कभी कभार उनके मुखारविंद से कहावतें, लोकोक्तियाँ और महान विचारकों के उद्धरण बरबस टपकने लगते थे, जो आम जनता की समझ से परे होते थे अथवा वे समझते-बूझते उन्हें नज़रंदाज़ कर देते थे क्योंकि मिश्रा जी की खरी बातें उनकी बर्दाश्त से बाहर थीं।

‘नो थैंक यू, बगुला भगत से मैं दूर ही रहना चाहता हूँ, मुझे अभी वैराग्य नहीं लेना,’ इला के अनुरोध के बावजूद, राजीव ने एक बार यह कहकर मिश्रा जी से बात करने से साफ़ इनकार कर दिया था।

मिसेज़ मिश्रा, जिनकी मृत्यु दो वर्ष पूर्व हो चुकी थी, मीता की अच्छी सहेली थीं और इसीलिए, अब उसे न चाहते हुए भी, मिश्रा जी को दयापूर्वक हर पार्टी में शामिल करना पड़ता था। मिश्रा जी को यदि किसी से सहानुभूति थी तो वह हसन था, जिसे आपा कष्ट देने पर तुली थीं। आपा के डर के मारे वह बेचारा भी उनके पास चुपचाप आकर बैठ गया था हालांकि आपा की नज़रों के दायरे से बाहर रहना हसन के लिए नामुमकिन था।

आपा की ज़िंदगी का मक़सद ही था यह देखना कि हसन किससे, क्या और क्यों बात कर रहा था। इशारे से उसे बताना कि बहुत हो गया, अब बस करे, दाएं अथवा बाएँ घूमे, किसी और से दुआ-सलाम करे, क्या कहे और क्या कहना जायज़ नहीं था। हसन का तलाक हो चुका था जो कि लाज़िमी था। आपा खुद भी गैर-शादीशुदा थीं या कहिए कि कौन माई का लाल उनसे निकाह पढ़वाने का ख़तरा मोल लेता?

यकायक इशारे से आपा ने हसन को सायरा की तरफ़ नज़रे-इनायत फ़रमाने का फ़रमान जारी किया। हसन से उम्र में आधी भी नहीं थी सायरा पर आपा की नज़र में ईश्क के लिए उम्र कोई मायने नहीं रखती। हसन के खिचड़ी बालों को वह ख़िज़ाब और जैल से लैस करवा कर लाई थीं कि न जाने कौन सी मुर्गी कहां फंसने को तैयार बैठी हो। हसन को कशमकश में देख आपा, जो जिया और अम्मा के पास बैठी पान लगा रही थीं, गिलौरी मुंह में दबाए सायरा की ओर बढ़ीं।

‘तुम्हें अगर सायरा और आपा को कम्पेयर करना हो तो कैसे करोगी?’ सायरा और आपा को देखते हुए राजीव ने मंजूषा के कान में फुसफुसा कर पूछा।

‘इम्पॉसिबल, तुम्हीं बताओ,’ मंजूषा इतराई।

‘एक बेहतरीन और नाज़ुक पशमीने का दुशाला जो एक छोटी सी अंगूठी में से रेशम सा फिसल निकले।’

‘ये तो हुईं आपा, वाट एबाउट सायरा?’ राजीव से सायरा की तारीफ़ सुनकर पर मंजूषा के तन-बदन में आग लग गयी थी किन्तु बड़ी अदा से उसने अपनी जलन को मज़ाक में ढाल दिया।

‘हा हा, वेरी फ़न्नी। एनी वेज़, आपा एक सस्ती और कई बार धुली हुई सूती धोती जैसी लगती हैं, जिसे बिना फटकारे सुखा दिया गया हो,’ राजीव ने अपनी बात पूरी की और फिर वे दोनों ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे।

‘लाहौलविलाकुव्वत, ऐसी बेतहाशा हंसी खुदा न खास्ता किस खुशी में? इंशा अल्लाह, हमें भी तो अपनी गुफ़त्गू में शरीक़ कीजिए?’ एक सवालिया नज़र मंजूषा और राजीव पर डालते हुए आपा पल भर को वहीं ठिठक गईं। वे दोनों सकपका गए। खैर, यह तो उनकी खुशकिस्मती थी कि आपा बेज़ार थीं सायरा की खैर-ख़बर लेने के लिए; वह बात को तूल दिए बिना आगे बढ़ गईं।

सायरा ने कनखियों से आपा को अपनी ओर आते देख लिया था; धूर्त, घाघ, कपटी, मक्कार जैसे लफ्ज़ सायरा के दिमाग में रिंगा-रिंगा-रोज़ेज़ ख़ेलने लगे।

‘लाहौलविलाकुव्वत, सायरा बीबी, आप तो भई ईद का चांद हो गईं। ऐसी भी क्या बेरुख़ी? हम तो दुआ सलाम से भी गए।’कमर पर हाथ रखे और गर्दन मटकाते हुए आपा ने सायरा से जवाब की दरयाफ्त की; मालकिन की तरफ़दारी लेते हुए उनके झुमके भी ज़ोर-ज़ोर से हिलने-डुलने लगे। सायरा के सामने यकायक एक चित्र उपस्थित हुआ – झुमकों से सुसज्जित और खून में डूबे हुए आपा के कान सफ़ेद कालीन पर लुढ़क रहे थे।

‘…वालेकुम सलाम, आपा, ऐसी कोई बात नहीं है। हम तो फ़क़त एक नौकरी की तलाश में मसरूफ हैं,’ झुमकों से अपनी नज़र बचाते हुए सायरा ने बेचारगी से कहा।

‘नौकरी-वौकरी भी इंशा अल्लाह मिल ही जाएगी, सायरा बीबी, हसन से पूछिए शायद उनके दफ़्तर में कोई जगह ख़ाली हो,’

‘कहां आपा, हमें तो कोई नौकरी देकर राज़ी नहीं। जहां भी जाते हैं, हमारी बदकिस्मती हमसे पहले ही वहाँ पहुँच जाती है।’ सायरा सचमुच उदास हो उठी।  सिर छिपाने और पेट भरने के लिए उसे एक अदद नौकरी की ज़रूरत थी किन्तु पदाधिकारी उससे कुछ और ही चाहते थे; वह मर्दों के भोग-विलास की वस्तु बन कर नहीं रह जाना चाहती थी।

‘वो बात नहीं सायरा बीबी, आपके दामन पर जो दाग़ लग गया, वो तो अब तभी छुटेगा जब आप हम जैसे ख़ैर-ख़्वाहों के बीच बैठेंगी उठेंगी,’

‘जी आपा, आपने बजा फ़र्माया,’ इससे पहले कि आपा उसे कुछ और खरी-खोटी सुनातीं, सायरा ने सोचा कि उसका ख़ामोश रहना ही बेहतर था। वह उन्हें ख़ूब अच्छी तरह से जानती थी; उनकी अपनी रहगुज़र तो सोशल-सिक्योरिटी के पैसों पर होती थी। चली थीं ख़ुद को उसका ख़ैर-ख्वाह मुकरर्र करने।

‘नीच्ज़े ने कहा है कि जो दुःख-दर्द हमें मार नहीं सकते, वो हमें मज़बूत अवश्य बना देते हैं।’ सायरा के जख्मों पर मरहम रखते हुए मिश्रा जी वहाँ से गुज़र गए।

‘च..च..च.., बीवी के इंतकाल ने बेचारे को दीवाना बना दिया है,’ नाक भौं सिकोड़ते हुए आपा बोलीं। एकाएक उनकी नज़र सायरा की लखनवी कुर्ती पर पड़ी।

‘भई, ये कुर्ती तो माशा अल्लाह आप पर क्या खूब जंच रही है; इस्लामाबाद से मंगवाई है क्या?’

‘शुक्रिया आपा, आजकल लन्दन में क्या नहीं मिलता? ईलिंग-रोड से खरीदी थी,’ न चाहते हुए भी सायरा साफ़ झूठ बोल गयी। अगरचे कह देती कि फूफी ने करांची से भिजवाई थी तो आपा उन्हें झट फ़ोन पर परेशान करने लगतीं कि उन्हें भी हसन की होने वाली दुल्हन के लिए बिलकुल ऐसी ही कुर्ती चाहिए थी। फूफी बेचारी भिजवा भी देतीं तो आपा उसकी क़ीमत देना भी गवारा नहीं समझतीं।

‘ओह, हम इसी जुम्मे को ईलिंग रोड जा रहे हैं, कौन सी दुकान से ली थी आपने?’ आपा उसे ऐसी आसानी से छोड़ने वालों में से नहीं थीं?

‘पोपट-स्टोर के सामने जो कृष्णा साड़ी स्टोर है न, आपा, उसी के बाहर एक साहब पटड़ी पर बैठे लखनवी कढ़ाई का तमाम सामान बेच रहे थे, उन्हीं से खरीदी।’

‘ओह! ज़रूर चोरी का माल होगा। देखें वह जनाब अब कब दुकान सजाते हैं। आपको कभी दिख जाएं, सायरा बीबी, तो हमारे लिए भी एक ऐसी ही कुर्ती ज़रूर ले लीजिएगा, जो भी रंग आपको जंचे,’

‘जी आपा, और साइज़?’

‘बस अपने ही साइज़ की ले लीजिएगा।’ आपा के चेहरे पर एक कातिलाना मुस्कराहट आई और गयी, उन्होंने जाल फेंक दिया था।

‘जी आपा,’ इसके पहले कि आपा एक मर्तबा फिर हसन से उसके निकाह का ज़िक्र करतीं; सायरा वहाँ से हट जाना चाहती थी।

‘खैर, अभी रस्ते में हम आपके ही सिलसिले में बात करते हुए आ रहे थे। हसन कह रहे थे कि बड़े दिनों से सायरा नज़र नहीं आईं, ठीक तो हैं? देखिए, तिरछी नज़र से वो अब भी आप ही को निहार रहे हैं। भई ऐसी भी क्या बेरुखी? आप ही जाकर उनसे दुआ-सलाम कर लीजिए,’ कहते हुए आपा ने सायरा को हसन की ओर ठेल ही दिया।

‘बेक़स पे करम कीजिए सरकारे मदीना,’ मन में दोहराते हुए सायरा ने एक लम्बी उसांस ली; एक तरफ़ कुआं था तो दूसरी और खाई।

सायरा के इस्तकबाल के लिए हसन की कमर कई बार लचकी और वह अपनी ज़ुल्फ़ें संभालने में मुब्तिला हो गया। इसके पहले कि सायरा उस तक पहुँचती, घड़ियाल और गिरगिट ने उसे आधे रास्ते में ही रोक लिया।

‘माशा अल्लाह, आज तो आप बिलकुल सायरा बानो लग रही हैं।’ घड़ियाल ने रोते हुए तारीफ़ की।

‘बड़े भाई, इनकी ड्रेस भी तो ग़ज़ब की है; क्या जंच रही है इन पर, चश्मे बद्दूर,’ गिरगिट ने एक नया पैंतरा आज़माया।’ आपा कलपने लगीं कि ये अलफ़ाज़ हसन के मुंह से क्यों न फूटे।

‘हसन तो ठीक है, सायरा जी, आप ज़रा आपा से बचकर रहिएगा।’ घड़ियाल करीब आकर सायरा के कान में फुसफुसाया; गिरगिट ने भी अपना सिर हिला कर घड़ियाल की बात का समर्थन किया।

‘कैसे बेअदब लोग हैं, एक ज़हीन ख़वातीन को क्या ऐसे हैरान किया जाता है?’ आपा मन ही मन बिफर उठीं।

‘हमें उनसे क्या लेना देना?’ सायरा ऐसे बहुत से लोगों को जानती थी जो अपना उल्लू सीधा करने की ख़ातिर उसे दूसरों के खिलाफ़ भड़काते रहते थे।

 

‘तजुर्बा नहीं है न आपको, सायरा जी, इस कमबख्त ज़माने का…’ इसके पहले कि रोनी सूरत घड़ियाल अपनी पत्नी का राग अलापता, गिरगिट ने बात संभाल ली।

 

‘हसन की पहली बीवी भी आपा से परेशान होकर घर छोड़ गई थी। हम बुराई नहीं कर रहे; आपको आगाह करना हम अपना फ़र्ज़ समझते हैं।’ गिरगिट ने अपनापन जताते हुए कहा और घड़ियाल ने बड़ी संजीदगी से उसका समर्थन किया। सायरा को हंसी आ गयी, क्या-क्या नहीं सहा था उसने इन दो बरसों में?

 

सायरा में साहस की कमी नहीं थी पर इस वक्त  दो-दो हमलावर एक साथ उस पर हावी थे। पिछली ही क्रिसमस पार्टी में घड़ियाल ने हौली की टहनी तले उसे अपने आलिंगन में लेकर चूमने की कोशिश की थी; इस नामुराद को ज़रा भी तो शर्म नहीं।

 

तभी आपा ने आंखें तरेर कर फिर एक फ़रमान जारी किया कि हसन सायरा से मुखातिब हों; हसन की कमर और गर्दन ने लचक कर हामी भरी। सायरा ने हसन को अपनी ओर आते देखा तो समझ गई कि यह फ़रिश्ता उसे बचाने ही ज़मीन पर उतरा था।

‘आदाब क़ुबूल कीजिए, मोहतरमा, कैसे मिजाज़ हैं आपके?’ एक हाथ से अपने बाल संभालते हुए हसन की कमर और गर्दन रूसी गुड़िया की तरह मटकने लगी।

‘आदाब, बस गुज़र रही है। एक ज़माना हुआ आपसे मिले…’ सायरा ने बेचारगी से गिरगिट और घड़ियाल की ओर देखते हुए कहा, जिन्हें लग रहा था कि हसन ने आकर उनकी और सायरा की बातों में दखलन्दाज़ी की थी। आपा को अपनी ओर आते देख, घड़ियाल वहाँ से फूट लिया।

आपा ने ठान ली कि कबाब में से इस दूसरी हड्डी को भी वह निकाल कर ही दम लेंगी।

‘लाहौलविलाकुव्वत, क्या नाम है आपका क़िबला? खुदा आपकी उम्रदराज़ करे, कमबख्त हमारी याददाश्त कभी-कभी ऐन वक्त पर दग़ा दे जाती है। इंशा अल्लाह, याद आया, गिर…’

‘नाचीज़ को लोग राजेश, राजेश मलिक कहते हैं, आपा। मैं मैक भाई साहब का फर्स्ट कज़िन हूँ, उनके ताऊ जी का बेटा,’ बड़े नाटकीय ढंग से गिरगिट ने सीने पर अपना एक हाथ रख कर सिर को झुकाते हुए अपना परिचय दिया, ‘आपको शायद याद हो, बुलबुल की बर्थ-डे पार्टी पर मुलाक़ात हुई थी आपसे,’

‘वाह, आपके वालिदैन ने माशा अल्लाह क्या हसीन नाम दिया है आपको। इसके मायने क्या होते हैं?’ बातों में उलझा कर आपा गिरगिट को एक दूसरे कोने में ले गईं ताकि हसन सायरा से बेतकुल्लफ़ होकर बात कर सके किन्तु उनकी आँखें अब भी सायरा और हसन पर ही टिकीं थी।

‘अच्छी जोड़ी रहेगी,’ गिरगिट ने एक बार फिर रंग पलटा। एकाएक आपा को लगा कि गिरगिट के मन में हसन के लिए बैर नहीं था।

‘आपके मुंह में घी शक्कर, बरख़ुर्दार। अगरचे हसन और सायरा राज़ी हो जाएं तो अजमेर-शरीफ़ जाकर अलहमदूलिल्लाह हम फूलों की चादर चढ़ाएंगे,’ अपना राज़ उगल कर आपा इत्मिनान से जिया और अम्मा के पास जा बैठीं और सपनों के महल खड़े करने में जुट गईं।
‘आपकी नौकरी का कोई बन्दोबस्त हुआ क्या? आप चाहें तो हम अपने दफ्तर में बात चलाएं,’ इसके पहले कि सायरा हसन के सवाल का जवाब भी दे पाती, गिरगिट उन दोनों के बीच वापिस आ पहुंचा। उनका आपस में घुलमिल कर बातें करना उसकी बर्दाश्त के बाहर था। इस बार वह अपने साथ रंजीत को भी खींचता हुआ ले लाया था, जो बेहयाई से सायरा को यूं घूर रहा था कि जैसे वह उसकी ख़रीदी हुई जागीर हो।

सीने में सैंकड़ों हसरतें दबाए हसन ख़ामोश हो गया। रंजीत मठरानी से यहां कोई पंगा नहीं ले सकता; फिर हसन तो उसका एक अदना सा कर्मचारी ठहरा। आपा ने हसन को मैदान छोड़ते देख लिया तो उसकी ख़ैर नहीं; उन्हें समझाना नामुमकिन था। हालात काफ़ी नाज़ुक हो उठे थे; हसन वहाँ से खिसक लेने की फ़िराक़ में था। सायरा ने हाथ से अपने माथे को छूते हुए रंजीत से आदाब किया ही था कि जोशी-सर ने उसे आवाज़ दी; सायरा से बिना कुछ कहे, रंजीत कंज़र्वेटरी की ओर बढ़ गया और सायरा रेस्टरूम की ओर, ज़ाहिर था कि वह हसन से गुफ्तगू जारी रखते हुए भी डर रही थी।

अपने बाल ठीक करता हुआ हसन मिश्रा जी से अपनी पराजय बांटने बैठ गया।

‘आजकल किसी को भी समझना बड़ा मुश्किल है। फिलौसफ़ी पढ़ाते मेरी उम्र निकल गयी; मैं अपने ही बेटों को नहीं समझ पाया। पत्नी की मृत्यु के बाद, मैं इतना अकेला हो गया हूँ…अपना दुःख किससे बांटू? बेटों को मुझसे फ़ोन पर बात करने की भी फुर्सत नहीं है, जब पैसों की ज़रुरत होती है तो वे मुझसे ई-मेल्स पर संपर्क करते हैं और मैं पैसे ट्रांसफर कर देता हूँ, बस यही रिश्ता रह गया है उनके और मेरे बीच,’ मिश्रा जी को इस पार्टी में ऐसा कोई शख्स नहीं मिला था जिससे वह निजी अथवा बौद्धिक बातें कर सकते।

मिश्रा जी की तन्हाई से कहीं बड़ी थी हसन की पेशोपश। उनसे क्या कहता कि सायरा उसके ही बौस की रखैल बनने के लिए राज़ी थी? शायद सायरा जानती थी कि हसन उसे महफूज़ रखने में नाक़ामयाब साबित होगा। मन ही मन, उसने खुदा से दिल से दुआ माँगी कि रंजीत उसे खुश रखे; उसे दग़ा न दे।

‘यूं देखा जाए तो, जनाब, यहाँ सभी तन्हाँ हैं, परेशान हैं।’ एक लम्बी सांस लेते हुए हसन ने अपने चारों ओर नज़र दौड़ाई, ‘इला, कुलभूषण, सोमा की माँ, प्रभा और वो, वो बेचारा वेनू, जिसकी जोशी-सर के दरबार में एक नहीं चल रही। और तो और, साहब, हमारी हाई और माइटी मेज़बान, वो तो बेचारी खुद से ही आजिज़ आ चुकी है…’

‘आप ठीक ही कह रहे हैं पर हमारे घनश्याम की शाम लगता है कई महीनों बाद रंगीन हुई है। शाम से वह अपनी आत्मकथा प्रभा को तीन कोणों से सुना चुका है।’ मिश्रा जी ने कहा तो दोनों के चेहरों पर एक मुस्कराहट आकर ठहर गयी।

‘अइ अइ ओ; अमको क्या करने का माँगता जी?’ पूछते  हुए प्रभा सोच रही थी कि कहाँ आकर फंसी; उसके लिए तो यहाँ सभी लोग बड़े अजीब थे।

प्रभा को सुनाने जैसा सुख घड़ियाल को भी जीवन में पहली बार मिला था क्योंकि प्रभा अपनी सारी इन्द्रियाँ उसी पर टिकाए थी। घड़ियाल को रंज था कि सांझ इतनी जल्दी क्यों बीत रही थी। बीच-बीच में उठ कर वह रसोई के चक्कर लगा आता था ताकि उसकी ऊर्जा बनी रहे। ऐसा नहीं था कि उसे अन्य मेहमानों में कोई रूचि न हो; उसकी एक आँख रह रह कर जोशी-सर और रंजीत की ओर घूम जाती थी क्योंकि रसोई से जो भी गर्म और ताज़ा खाना निकलता, सर्वप्रथम उन्हीं के पास ले जाया जाता। ऐसी स्थिति में वह झटपट वहाँ पहुँच जाता और प्लेट भर कर वापिस प्रभा के पास लौट आता। शिष्टाचारवश, वह प्रभा की तरफ़ प्लेट बढाते हुए पूछता कि उसे कुछ चाहिए तो नहीं और उसके सिर हिलाकर ‘न’ कहने पर झटपट खाने में जुट जाता ताकि मेहमानों और मेज़बानों को उसकी प्लेट सदा खाली ही दिखाई दे और वे सोचें कि उसे खाने की भी फुर्सत नहीं थी। वैसे भी एक नया प्लैटर आ जाने की स्थिति में उसकी प्लेट में जगह तो बनी रहनी चाहिए।

घड़ियाल के इन चक्करों के दौरान प्रभा भी कहीं और जाकर बैठ सकती थी किन्तु किस के पास? टीवी पर फुटबाल का मैच चल रहा था; जो केवल पुरुषों की बपौती था। वेनू, बसंत और मेनका को मिनिस्टर से फुर्सत नहीं थी; जिया, आपा और रंजीत से उसे डर लगता था। केवल सायरा और मंजूषा ही थीं जो आते जाते उसकी ओर एक मुस्कराहट फेंक देती थीं। सायरा को अकेला खड़ा देख प्रभा ने उससे बात करने की हिम्मत जुटाई ही थी कि वहाँ रंजीत आ टपका और सायरा को बैठक के एक कोने में ले गया जहां खिड़की के पास अभी-अभी दो कुर्सियां ख़ाली हुईं थीं। काफ़ी तादाद में मेहमान बाहर वाली बैठक में स्थानांतरित हो गए थे और एक दूसरे पर चढ़े बैठे सायरा के भूत, वर्तमान और भविष्य जैसे विषयों पर ज़ोर-शोर से बहस कर रहे थे।

‘ख़ाक पड़े इस बदज़ात रंजीत पर, सायरा बीबी पर न जाने क्या जादू डाल रखा है?’ रंजीत और सायरा को बातें करता देख आपा ने जिया से कहा।

‘ए मैं तोसे कऊं, आपा, कोई जादू-सादू नईं, यह सब पैसन का खेल है पैसन का; आज तुमारे हसन की लाटरी निकल आए तो देखना ये जा और वो जा,’

‘लाहौलविलाकुव्वत। आप ठीक फरमा रही हैं, जिया, हम तो इंशा अल्लाह सब जानते हुए भी सायरा को इज्ज़त बख्शने को तैयार हैं पर क्या करें, हसन एक मुलाज़िम ठहरे, वो भी इस मुएँ मरदूद के,’ आपा ने एक सर्द आह भरी।

‘मरे साउथहौल में इस कमबख्त की मरी अपनी इन्श्योरेन्स कम्पनी है, आपा, जिसमें मरे पचास-साठ लोग काम करते हैं,’ मोहिनी बोली।

‘भई, शहर में बड़ा दबदबा है रंजीत मठरानी का, कई ब्रिटिश मंत्रियों के बीच रोज़ का उठना-बैठना है,’ मोहन ने पत्नी के समर्थन में जोड़ा।

रंजीत के ठाठ-बाठ की चर्चा सुन कर सहसा बहुत से लोग रंजीत से बात करने के लिए उत्सुक हो उठे और न चाहते हुए भी रंजीत मेहमानों से घिर गया; सायरा को एक बार फिर वहां से खिसकना पड़ा।

‘मिस्टर रंजीत, आपकी कम्पनी को तो रिसेशन से कोई ख़तरा नहीं है न?’ मोहन ने पूछा; मोहिनी की मदमाती दृष्टि मेहमानों पर से होती हुई अपने पति पर आ टिकी; क्या लोगों का एहसास था कि उसके पति ने शहर की एक जानी मानी हस्ती से एक वाजिब सवाल पूछा था?

‘साले ये टोरीज़ भी न उल्लु के पट्ठे हैं। भैंचो, चोर हैं साले चोर, रिसेशन के बहाने फिर लूटेंगे साली जनता को,’ सरकार की आढ में वह अपनी कंपनी की बात गोल कर गया था। गिरगिट, मोहन और मकरंद रंजीत को घेरे खड़े थे; मीता, मोहिनी और वायु भी उसके निकट आ चुकी थीं; रंजीत की बेबाक़ी का मज़ा ही कुछ और था।

‘बड़े भाई ठीक फ़रमा रहे हैं, अब देखो कहां डाका पड़ता है,’

‘भैंचो, उन्हें तो कोई साला बहाना चाहिए, ओलम्पिक्स के बहाने क्या कम लूटा उन्होंने भैन्चो पब्लिक को,’

‘जनता के पास अब बचा ही क्या है देने को?’ मोहन ने पूछा तो मोहिनी ने अपने हाथ हिलाते हुए वही प्रश्न मूकाभिनय में दोहराया।

‘अब देखो भैंचो कैमरन किसके चूतड़ चाटता है।’

‘आजकल तो भई वह हमारे इंडिया पर डोरे डाल रहा है,’

‘ब्रिटिश सरकार की तो पौलिसीज़ ही दुनिया से निराली हैं,’ घड़ियाल ने, जो पीछे सोफ़े पर फैला हुआ था, रोते हुए स्वर में कहा।

‘तुम बिलकुल सही कह रहे हो, बड़े भाई, एक तरफ़ ये गधे इंडिया की तरक्की का गुणगान कर रहे हैं और दूसरी तरफ़ उसे भारी आर्थिक सहायता भी दे रहे हैं,’

‘भैन्चो देखा जाए तो महारानी की साली शपथ ले-ले कर साले फ़ौरनर्स उल्लु के पट्ठों का बेवकूफ़ बना रहे हैं।’ सोफ़े पर अधलेटे रंजीत ने अपनी टाँगे दो दिशाओं में फैलाते हुए कहा।

‘जो मर्द अपनी लेग्स ऐसे फैला कर बैठते हैं न, आई रियली रियली हेट देम,’ मंजूषा फुसफुसाई।

‘तो क्या यह औरतों का ही विशेषाधिकार है?’ राजीव ने पूछा तो मंजूषा को एकाएक समझ नहीं आया कि उसका मतलब क्या था।

‘नौटी बॉय,’ राजीव का कान खींचते हुए मंजूषा फुसफुसाई।

‘आप सही कह रहे हैं, रंजीत साहब, ये उन्हीं लोगों को पनाह दे रहे हैं, जो टेरोरिज़्म की ट्रेनिंग लेकर इन्हीं के सिर पर बम फोड़ने को तैयार हैं,’

‘इसमें भी इनकी कोई मरी चाल होगी। इनके जैसा मरा डिप्लोमैट तो न कोई हुआ है और न ही मरा कोई हो सकता है?’

‘डिप्लोमेसी से देश का पेट थोड़े ही भरता है, इनके अपने बूढों के पास बिल्स भरने और भर-पेट खाने तक के लिए पैसे नहीं है,’सुमित ने कहा।

‘यू आर सो राईट, सुमित, बेचारे बूढ़े सुबह-सुबह सुपर-स्टोर्स में जाकर बैठ जाते हैं ताकि हीटिंग के पैसे बचा सकें,’

‘कम से कम बूढों का ट्रैवल तो फ्री है,’

‘पर कमज़ोर और बीमार लोग क्या करें जो घर से बाहर भी नहीं निकल सकते?’

‘ऐसे ही लोग तो घर में हफ़्तों मरे पड़े सड़ते हैं, मरी बदबू की वजह से जब पड़ौसी काउन्सिल को ख़बर करते है तब कहीं जाकर…’

‘दिस इज़ अवर वेडिंग ऐन्निवर्सरी, और आप लोग डेड बौडीज़ की बात कर रहे हैं।’ कमर पर हाथ रखे मीता बोली तो लोग इधर उधर खिसकने शुरू हो गए।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, बऊ, हम बी सुबै से यई कै रऐ हैं के ऐसे खुसी के मौके पे कम से कम गनेस तो मनाय लो। कछु भजन-कीर्तन करो, नाचो, गाओ…’ जिया ने कहा तो मोहन-मोहिनी एक बार फिर उत्साहित हो उठे कि शायद अब उन्हें गाने बजाने का मौक़ा मिले।

‘मुझे तो यह समझ में नहीं आता कि चाहे कोई भी फंक्शन हो, इंडियंस के घर में हवन या पूजा पाठ क्यों होने लगता है?’ इसके पहले कि भजन-कीर्तन शुरू हो जाता, मंजूषा ने टोका।

‘इंडियंस की लाइफ़ में हास्य-व्यंग के लिए कोई जगह नहीं है,’ राजीव बोला।

‘वी डोंट नो हाउ टू एन्जॉय,’ मीता ने जोड़ा।

‘एन्जॉय करना तो कोई ब्रिटिश लोगों से सीखे। कोई मरे या कोई जिए, इनकी बला से, शराब की बोतलें खुलती रहनी चाहिएं, बस,’

‘हमारा अध्यात्म भी तो यही कहता है कि सुख दुःख में सम रहना चाहिए,’

‘मिश्रा जी, आपने आज तक किसी साले इन्डियन को भैन्चो खुश देखा है? जिसे देखो, साला रोता ही दिखाई देता है,’

‘ब्रिटिश लोग कभी नहीं रोते,’

‘ये लोग तो फ्यूनर्ल्स में भी ऐसे सज संवर कर जाते हैं कि जैसे किसी पार्टी में जा रहे हों,’

‘इनके तो भई मुर्दे भी ऐसे सजा सँवार कर कास्केट में लिटाए जाते हैं कि लगता है कि जैसे ब्यूटी स्लीप ले रहे हों,’

‘इसी को तो कहते हैं ब्रिटिश ह्यूमर,’ अपने पल्ले को संभालती हुई वायु बोली।

‘भैन्चो ब्रिटिश ह्यूमर का साला कोई जवाब नहीं। साली कैसी-कैसी भैन्चो बढ़िया कॉमेडीज़ बनाईं, हैं इन्होंने…

‘बड़े भाई, सोलह आने सच फ़रमाया आपने, ‘कैरी-आन’ की सारी की सारी फ़िल्में, ‘गुड लाइफ़’, ‘डैड्स आर्मी’…’

‘और वो ‘फ़-फ़-फ़-फ़ौल्टी ट..ट..टौवर्स! उसका तो कोई म-म-म-मुकाबला ही नहीं हो…,’ मकरंद ने उत्साहित होते हुए कहा।

‘मुझे तो ‘इंपॉर्टेन्स ऑफ बीइंग अर्नेस्ट’ और ‘सम मदर्स डू लाइक देम’ जैसी फ़िल्में पसंद आती हैं,’ मीता ने कहा तो जिया और आपा के बीच दृष्टि-विनिमय हुआ।

‘और इनके भैंचो राइटर्स भी तो कमाल के थे, बर्नर्ड शा और वो साला औस्कर वाइल्ड…’

‘देखा जाए तो हमारा साहित्य आध्यामिकता और दुःखान्तिकाय से भरा पड़ा है, विनोदप्रियता के लिए इसमें कोई स्थान नहीं।’ मिश्रा जी कुछ सोचते हुए बोले।

‘ऐसी बात नहीं है, बड़े भाई, इंडिया में भी एक से एक बेहतरीन कामेडीज़ बन चुकी हैं, ‘अंगूर’ और ‘खूबसूरत’ जैसी कितनी ही फ़िल्में…’

 

‘सब साली अंग्रेजी से चुराई गई हैं।’

 

‘बड़े भाई, चुराने में तो हम माहिर हैं।’

‘मरा हमने क्या चुराया है, राजेश? हमें तो मरी सदियों से मरा लूटा जाता रहा है,’ मोहिनी को गुस्सा आ गया।

‘बिलकुल, हमारे हीरे, मोती, जवाहरात…’

‘ओनली लास्ट वीक, कैमिला के टीचर्स अपने स्टूडैन्ट्स को टावर-ब्रिज घुमाने ले गए थे, वापिस आकर शी आस्कड मैक के इंडियंस अपना कोहेनूर वापिस क्यों नहीं मांगते?’ मीता ने बताया।

‘सुभान अल्लाह, मीता, तुम्हारी बेटी तो भई वाकई बहुत होशियार है,’

 

‘ऐ मैं तोसे कऊं, आपा, भला पोती किसकी है? ही ही ही..’ मुंह में पल्लू ठूंसे जिया उचकियां लेते हुए हंसने लगी।

 

‘सुना है कि ब्रिटिश सरकार अन्य देशों की कला-संस्कृति की धरोहर लौटाने के विषय में विचार कर रही है,’ मिश्रा जी बोले।

 

‘यू मस्ट बी जोकिंग, मिश्रा जी, आरंट यू?’ मीता ने कमर पर हाथ रखते हुए पूछा।

 

‘भैन्चो कभी सुना है किसी साले चोर को लूटा हुआ माल लौटाते हुए?’ रंजीत ने त्योरियां चढ़ाते हुए कहा।

 

‘प्लीज़, लेट अस टाक एबाउट समथिंग एल्स?’ इससे पहले कि गोरों की फिर शामत बजती, मीता जल्दी से बोली।

‘लाइक साला वाट?’ रंजीत ने पूछा तो एकाएक मीता को कुछ नहीं सूझा; अगर उसे मीता पसंद नहीं तो उसकी पार्टी में वह आया क्यों था?

‘बड़े भाई, फिल्मों और साहित्य की बात अभी पूरी कहाँ हुई?’

‘नया कहने को क्या है? बी.बी.सी वाले पुरानी कामेडीज़ और फ़िल्मों के बैस्ट सीन्स दिखा-दिखा कर हमारा उल्लू बना रहे हैं।’

‘अच्छी फ़िल्में बनाने के लिए पैसा चाहिए, जो इनके पास अब बचा नहीं,’

‘है तो सब कुछ, पर इन्हें अपनी जेबें भरने से फुर्सत मिले तब न,’

‘टीवी लाईसैंस के डेढ़-डेढ़ सौ पौंड्स के अलावा मुख्तलिफ़ चैनल्स के चार्जेस देकर भी देखने को कुछ नहीं मिलता, दुनिया भर का कूड़ा हमें परोसा जा रहा है,’

‘बी.बी.सी में तो भई बन्दर-बाँट है, बड़ी-बड़ी पेंशन्स और मुआवज़े लेकर अधिकारी फूट लेते हैं,’

‘बी.बी.सी में तो भैन्चो बिलियंस का घोटाला है और साला कोई कहने-सुनने वाला नहीं है,’

‘बड़े भाई, पब्लिक तो चुपचाप टीवी के सामने बैठी फ़िश-एण्ड-चिप्स खाके मुटा रही है, उनकी बला से,’ मेहमानों के पेटों में भी अब चूहे कूद रहे थे; दोनों वक्त मिल रहे थे और भोजन का कहीं अता पता नहीं था।

‘यह भी इनकी डिप्लोमेसी है, सर्विसेज़ महंगी कर दी गयी हैं और खाना-पीना सस्ता ताकि लोगों के मुंह बन्द रहें,’ सुमित बोले।

‘बिलकुल, खा-खा कर शरीर ढीला पड़ जाएगा तो जनता विद्रोह नहीं कर सकेगी न,’

‘यही तो चाहती है सरकार कि जनता ऐसी मोटी हो जाए कि हिल-डुल भी न सके,’

‘तो ये कंट्री चलेगी कैसे?’

‘साली सीधी सी बात है, ये लोग भैन्चो पोलैंड और कोलम्बिया के साले सिटिज़नस को यूके में इसीलिए तो घुसाये चले जा रहे हैं,’

‘हमारे इंडियंस तो इनकी गंदगी उठाने से रहे, जिसे देखो वो लक्ष्मी मित्तल और अम्बानी बना घूम रहा है,’

‘क्यों न घूमें? बहुत कर ली हमने इनकी गुलामी,’

‘मेरे तो साले दोनों गार्डनरस गोरे हैं, सेक्रेटरी और हाउस-कीपर भैन्चो दोनों गोरी हैं। मेरे पड़-दादा रहे होंगे साले इनके गुलाम; अब मैं इन्हें अपने जूते की साली नोक पर रखता हूँ,’ एक टांग उठा कर अपने जूते की ओर इशारा करते हुए रंजीत बोला।

‘हमारी नैक्स्ट जैनरेशन नहीं उठाती इनकी गन्दगी।’

‘इंडियन बच्चों को तो जी पढ़ने से फुर्सत मिले तो बे काम की सोंचें,’ कुलभूषण ने अपनी कमर सीधी करते हुए कहा; फ़ुटबाल का मैच खत्म हो गया था शायद।

‘न जी न, इन्डियन पेरेन्ट्स को तो चाहे दो-दो शिफ्टों में खुद काम करना पड़े पर वे अपने बच्चों से कभी काम ढूँढने को नहीं कहेंगे,’ एकाएक वार्तालाप महिलाओं ने सम्भाल लिया था।

‘यह कोई अच्छी बात तो है नहीं…’ इला बोली।

‘अच्छी ही बात होगी, इला, इंडियन बच्चे अब इस कंट्री की ऊंची-ऊंची पोस्टों पर बैठे हैं,’

‘अमरीका में तो सुना है कि प्रेज़ीडेंट ओबामा ने कई इंडियन्स को अपना एड्वाइसर्स बना रखा है, हर काम उन्हीं के मशवरे से होता है,’वायु ने कहा।

‘अपने डेविड कामरान को भी मिश्रा साहब और इला बीबी जैसे अनुभवी लोगों से मशवरा लेना चाहिए…’ आपा ने ताना मारा।

‘आपा, मसला चाहे कोई भी हो, अपने रंजीत भाई से बड़ा एडवाइज़र उन्हें दिया लेकर ढूंढने पर भी नहीं मिलेगा, ख़ासतौर पर हाउसिंग और एजुकेशन जैसे…’ गीदड़ ने रंजीत के कन्धों को दबाते हुए मस्का लगाया।

मीता और मकरंद एकाएक दरवाज़े की ओर लपके जहां अमृत और कुलदीप कपूर, एक बड़ा सा पैकेट थामे थके-थके से खड़े थे।

‘हैलो हैलो जी, किदां? मुबारकां-शुमारकां, तुस्सी तो पैल्ले ए फड़ो,’ पैकेट मीता को थमाते हुए कुलदीप ने जैसे बोझ अपने सिर से उतार दिया हो।

‘अन्दर तो आओ, कुलदीप, अमृत, तुम लोगों ने इतनी देर कहाँ लगा दी?’ ज़री की भारी साड़ी में लिपटी और दहेज में आए गहनों से लदी अमृत का मेक-अप रहित चेहरा एक अजीब सा सम्मिश्रण था। सीधा-सादा कुलदीप भी ढीली-ढाली पैंट, आधी बाहर निकली कमीज़ और अस्त-व्यस्त पगड़ी पहने था। पुरुष वर्ग कुलदीप बनाम ‘कुल्ले’ के आगमन से प्रमुदित था; गुटों में कुछ हेर-फेर हुआ।

मीता ने जल्दी से टूटे-फूटे समोसों और इडलियों को बीन कर एक प्लेट की शक्ल सुधारी और झटपट पहुंच गई कुलदीप और अमृत के पास, मन को समझाती हुई, ‘अब कोई इतनी देर में आएगा तो स्टार्टरस का तो यही हालत होगा। इन लेट-लतीफ़ों की वजह से ही मैंने मेन-कोर्स को अब तक रोके रखा है।’

‘कुलदीप, अमृत, व्हाट हैपंड भई? समोसे और इडलियाँ मैंने स्पैशियली तुम्हारे लिए ही सेव करके रखे हैं,’ मीता ने प्लेट उन दोनों के चेहरों के बिल्कुल करीब घुमाते हुए कहा ताकि वे ठीक से देख न सकें कि समोसे कैसे सिकुड़े और दबे-पिटे थे।

‘मीता पैंजी, हुन्न त्वानूं की दसिए, ट्रैफिक एन्ना वड्डा सी, फर्स्ट गियर विच गड्डी चलांदे मेरा तो फुट ई आक्कड़ गया,’ अपनी टाँगे दबाते हुए अमृत बोली। उसने मीता को इशारे से समोसे की प्लेट मेज़ पर रख देने की फ़रियाद की।

‘ओ हो, इ..इ..स समय तो ट..ट..ट.ट्रैफिक ठीक हो जाना च..च..च..चहिए था,’ मकरंद ने कुलदीप के पास बैठते हुए सहानुभूतिपूर्वक पूछा।

‘हैंगर-लेन दा ओहोइ रफड़ा, असां ते कुज वेख्या नईं पर लोक्की पए कैन्दे सी के सुबेरे सुबेरे कोई एक्सीडैन्ट होया सी, ड्रिंक्स-ड्राइविंग वर्गा,’ कहते हुए कुलदीप ने एक बड़ी सी अंगड़ाई ली, उसकी कमीज़ की बगलों में पसीने के बड़े-बड़े पीले धब्बे देखकर कई लोगों को, विशेषतः महिलाओं को, लगा कि कहीं उन्हें उल्टी ही न हो जाए।

‘क्या लोगे कु..कु..कु..कुलदीप, अ..अ..अमृता जी आप क..क..क्या लेंगी?’ मीता के धक्का देने पर मैक को झेंपते हुए उठना ही पड़ा जबकि मीता ने उससे वादा किया था, ‘मैक डार्लिंग, मैंने ऐसा इंतजाम किया है कि आपको हाथ भी नहीं हिलाना पड़ेगा।’

‘पाई साब, तुस्सी तो सान्नू दोन्या नूं औरेंज-जूस ही दवो, जांदी वारी एन्ना नू ड्राइव करनी हैगी,’ अमृत ने अपना फ़ैसला सुना दिया।

‘अरे कुल्ले यार, साले एक बियर तो पी भैन्चो हमारे साथ,’ रंजीत ने कुलदीप को अपनी जफ्फी में भरते हुए कहा।  कुलदीप की बगलों के पीले धब्बों और रंजीत की व्हिस्की की बदबुएँ आपस में टकराईं और मेहमानों के मध्य बिखर गईं; महिलाओं के नथुनों पर टिशूज़ सुसज्जित हो गए।

‘छड्ड यार, अबी तो बस एक कोक ही चलेगी,’ कुलदीप ने रंजीत को इशारे से चुप रहने को कहा क्योंकि अमृता रंजीत को ऐसे घूर रही थी कि जैसे उसे कच्चा चबा जाएगी।

‘कोक पीन नाल पैले अपनी तोंद जरूर देख लइओ,’ अमृता ने ताना कसा; लगभग सभी मेहमानों की दृष्टि कुलदीप के बाहर निकले हुए पेट पर आ टिकी।

‘ऐसा पेट तो एक प्रैगनैंट औरत के नौवें महीने में भी नहीं होता,’ मंजूषा राजीव के कान में फुसफुसाई।

‘भैंचो, साले एक एक्सीडैन्ट से डर गया, कुल्ले?’अमृता और अमृता की गुस्से को पूरी तरह से नज़रंदाज़ करते हुए रंजीत ने कुलदीप को एक बार फिर ललकारा किन्तु अमृता सचेत थी; उसने पति की एक बार फिर से पूरी तहकीकात की कि कहीं रंजीत की बातों का उस पर कोई असर तो नहीं हुआ। कुलदीप भी कोई कच्ची गोलियां नहीं खेला था, रंजीत की ओर पीठ किए वह मकरंद से बात करने लगा।

रंजीत सोफ़े पर भद्दे तरीके से फैला हुआ था, उसके हाथ में व्हिस्की का गिलास बिल्कुल उल्टा हो चला था और मीता को फ़िक्र थी कि उसकी नई कार्पेट कहीं ख़राब न हो जाए; आते-जाते वह उसका गिलास सीधा कर रही थी।

‘लीजिए, आपकी कॉफ़ी,’ सायरा ने रंजीत के हाथ में एक मग काली कॉफ़ी पकड़ा दी और उसके हाथ से गिलास लेकर प्रिया को थमा दिया। वह नहीं चाहती थी कि रंजीत की कुछ और भद्द पिटे। महिला-मेहमानों के चेहरों पर संगुप्त मुस्कुराहटों का आदान प्रदान हुआ तो सायरा वहाँ से हट गयी।

‘लगता है के रंजीत ने सायरा के लिए एंगेजमेंट-रिंग खरीद रखी है,’ वायु बोली।

‘उनकी देखभाल तो सायरा कुछ ऐसे ही कर रही है,’

‘लाहौलविलाकुव्वत, वायु बी, खरीद-फरोख्त के बारे में, इंशा अल्लाह, कुछ हमें भी तो बताइए,’ एंगेजमेंट-रिंग की बात सुन कर आपा के कान खड़े हो गए।

‘आपा, मैं तो मज़ाक कर रही थी। बहुत दिनों से न किसी की सगाई हुई है और न ही शादी, मैं तो बोर हो गयी,’

‘वायु बी, इस देश में तो अब ब्याह-शादी के बिना साथ रहने और बच्चे पैदा करने का रिवाज़ हो गया है,’ आपा ने रंजीत की ओर देखते हुए कटाक्ष किया। इन दिनों, जहां एक ओर रंजीत और सायरा तो दूसरी ओर जूली और सुरूर, इन दो जोड़ों के चर्चे हर जुबान पर थे।

‘आपा, क्या किया जाए? घर बसाने की तो कोई तब सोचे कि जब उसे मॉर्गेज मिल जाए।’

‘एक बार की बात हो तो चलो कर लें शादी पर एक बड़ा खर्चा पर यहाँ तो पल पल में रिश्ते बनते टूटते रहते हैं,’

‘तो हूज़ फ़ाल्ट इज़ दैट?’ मीता ने पूछा।

‘मर्दों का, और किसका?’ बुलबुल ने कहा।

‘औरत की ख़ामोशी पर टिकी रहती थी घर-गृहस्थी, उसने जुबान खोली नहीं कि हुई तक़रार,’ वायु बोली।

‘बिलकुल, वो कब तक सहती रहती पुरुष के ज़ुल्म?’

यह विषय मर्दों के बीच कुछ जमा नहीं; ‘मधुशाला’ की आबादी में एकाएक इज़ाफ़ा हो गया। मर्द शराब के पैग पर पैग चढ़ा रहे थे किंतु ख़ुमार फलों का रस पी रही महिलाओं पर चढ़ रहा था।

‘घड़ियाल को देखो, नशे का अभिनय करते हुए वह प्रभा को छेड़ रहा है,’ सोमा ने राजीव का ध्यान प्रभा की ओर खींचा, जो सोफे के एक कोने में सिमटी चली जा रही थी।

‘मेहराज़ की पार्टी में भी इसने शर्मीला को छेड़ने की कोशिश की थी, वो तो कहो के गिरगिट ने नशे पर लानत-मलानत भेज कर उसे बचा लिया; नहीं तो मेहरा साहब इसकी ऐसी धुनाई करवाते कि महीनों बिस्तर से नहीं उठ पाता,’

‘ये दोनों ही महा बेशर्म हैं। एक फंसता है तो दूसरा झट बीच-बचाव करने पहुँच जाता है।’ कहते हुए इला प्रभा के पास जा बैठी, घड़ियाल ड्रिंक के बहाने वहाँ से झट उठ गया।

‘बड़े भाई, एक जोक हो जाए,’ गिरगिट कुलदीप के कंधे दबाते हुए बोला।

‘बिना जोक्स के पार्टी में मज़ा नहीं आता, कुलदीप भैय्या, प्लीज़, सुनाईए न कुछ अच्छे-अच्छे जोक्स,’ मंजूषा भी पास आ बैठी, जिया से चिपक कर उसे कुछ गर्माई मिली। इतनी सर्दी में भी उसने जॉर्जेट की साड़ी पहन रखी थी; पुरुषों की नज़रें उसके गोरे और गुदगुदे बदन से हटने का नाम नहीं ले रही थीं।

‘ओके, नया तां नई ए पर लो सुनो। ब्रिटिश रेल वालयां ने इग्लैंड और फ्रांस दे विच इक टनल खोदने वास्ते टैन्डर मंगे…,’ कुलदीप का मोबाइल फ़ोन चुटकुलों का भण्डार था; वह शुरू हो गया।

‘लाहौलविलाकुव्वत, हमें तो भई एक हरुफ़ भी समझ में नहीं आया। आप तो अच्छी ख़ासी उर्दू बोल लेते हैं, कुलदीप मियाँ, कुछ उर्दू में सुनाइए,’ आपा ने फ़रमान जारी किया।

‘उर्दू में नहीं, आपा, हिंदी में,’ वायु बोली।

‘हिंदी में नहीं, हिन्दुस्तानी में,’ सुमित ने कहा।

‘ओके जी ओके, यह जोक अब आप हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, हिन्दुस्तानी और पंजाबी पांच भाषाओं में सुनिए।’ कुलदीप ने ज़ोर से अपना गला खंखारा तो सब ख़ामोश होकर बैठ गए।

‘इंग्लैंड और फ़्रांस के बीच एक टन्नल खोदने के लिए सिंह-ब्रदर्स का टेन्डर फटाफट मंजूर हो गया। उन्हें इंटरवियू के लिए बुलाया गया। अफ़सर ने पूछा कि इतने कम समय में तुम्हारी कंपनी इतनी सस्ती टन्नल कैसे खोद सकती है?

‘इसमें क्या मुश्किल है, सर जी? एक साइड से मैं और दूसरी साइड से मेरा भाई टन्नल खोदना शुरू करेंगे और जब हम बीच में आकर मिलेंगे तो जी आपकी टन्नल तैय्यार।’ अफ़सर ने विस्मय में पूछा कि अगर दोनों बीच में आकर न मिल पाए तो? ‘सर जी, तब तो आपके बल्ले ही बल्ले, एक ही प्राइज़ में आपकी तो जी दो टन्नल्स ख़ुद गईं,’

ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ पिटने लगीं तो जिया अपना सिर खुजलाते हुए चिल्लाईं, ‘ए मैं तोसे कऊं, कुलदीपक, चुटकुला खतम हो गया के?’

‘लाहौलविलाकुव्वत, इन छोकरों के लतीफ़े तो भई हमारी समझ के बिलकुल परे हैं,’ आपा ने जिया से अपनी सहमति प्रकट की।

‘कुल्ले भई वाह, साले मज़ा आ गया, एक जोक भैन्चो और सुना,’

आपा ठसक के रंजीत और कुलदीप के बीच आ खड़ी हुईं कि कहीं कुलदीप फिर न शुरू हो जाए; रंजीत ने उन्हें अदावत से घूरा।

‘हसन मियाँ, ज़रा आप सुनाईए वो मच्छर वाला लतीफ़ा,’ आपा ने मेहमानों पर एक उचटती हुई नज़र डालते हुए हसन से गुज़ारिश की। हसन की कमर और गर्दन लचकीं और वह शुरू हो गया।

‘लीजिए, समाद फरमाइए। एक मच्छरनी और एक हाथी में इश्क हो गया।’ चुटकुला शुरू करने के बाद हसन ने अपने चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई; आपा की निगहबानी में सब ख़ामोश हो गए।

‘अर्ज़ किया है के मच्छरनी और हाथी में इश्क हो गया। लोग तरह-तरह की बातें बनाने लगे तो उन्होंने तय किया कि उन्हें निकाह कर लेना चाहिए। हाथी के घर वालों ने कहा कि ज़ात-बिरादरी की बात चलो जाने भी दें पर दुल्हन की कुछ तो शख़्सियत होनी चाहिए। मच्छरनी के घर वालों को भी एतराज़ था; उन्हें दूल्हे के दांत ज़रुरत से कुछ ज़्यादा ही बड़े लगे थे।’

‘भई वाह, क्या बात है,’ आपा ने ऐसे दाद दी कि जैसे शेरो-शायरी हो रही हो।

‘बड़े भाई, क्या बढ़िया जोक सुनाया,’ गिरगिट तालियाँ पीटने लगा,’

‘जोक तो पूरा हो जाने दीजिए, राजेश भाई,’ राजीव ने उसे खींच कर बैठा दिया कि चुटकुला अभी ख़त्म नहीं हुआ था।

‘आई नो, आई नो,’ कहते हुए गिरगिट झेंप कर अपनी बगलें झाँकने लगा।

‘प्लीज़ कैरी औन, हसन,’ मीता ने गिरगिट को रोष से देखते हुए हसन से निवेदन किया तो उसने एक बार फिर अपने बाल सँवारे, उसकी कमर स्वमेव लचक गयी।

‘जी मोहतरमा। एक दूसरा मच्छर, जो उस मच्छरनी से निकाह की ठाने बैठा था, बड़ा उदास हुआ। उसने मच्छरनी से पूछा कि भला उसमें ऐसी क्या कमी थी जो मच्छरनी को आउट-ऑफ़-कास्ट जाकर विवाह के लिए राज़ी होना पड़ा? मच्छरनी ने शर्मोसार होते हुए राज़ खोला कि मामला कुछ नाज़ुक था, वह हाथी के बच्चे की मां बनने वाली थी। खैर, उसने हाथी से निकाह पढ़वा लिया। सुहागरात की अगली ही सुबह मच्छरनी अल्लाह को प्यारी हो गयी।’

‘च च च, भई ऐसा क्या हुआ, हसन मियाँ?’ आपा ने अपने दोनों हाथ हवा में नचाते हुए पूछा।

‘हाथी रात को ‘गुडनाइट’ लगा कर…सोया…था,’ हसन से हँसे बगैर नहीं रहा गया और जब वह हँसा तो उसकी कमर भी नाचने लगी। आपा भी ज़ोर-ज़ोर से हंसते हुए मेहमानों पर हसन के चुटकले का असर नाप रही थीं, जो उन्हें कुछ ठंडा जान पड़ा।

‘हसन साहब, यह जोक मैंने कई साल पहले कहीं सुना था पर आपका अंदाज़े-बयां काबिले-तारीफ़ है,’ रही सही कसर घड़ियाल ने अपनी मरी हुई आवाज़ में पूरी कर दी।

‘कुल्ले, तेरे जोक्स का भैन्चो कोई मुकाबला नहीं पर साले जिया और आपा को भैंचो कुछ समझ नहीं आया। समझा जाके उन्हें, नहीं तो साले तेरा जीना हराम हो जाएगा,’ हसन और आपा को नज़रंदाज़ करते हुए रंजीत बोला। कुलदीप वहाँ से उठ कर झट जिया की टोली में जा बैठा; रंजीत के मुंह से निकलते हुए व्हिस्की के भभके उसे शराब के लिए लालायित कर रहे थे।

‘तो भाई आपने टरका दिया, कुल्ले को,’ राजीव ने रंजीत के करीब बैठने हुए पूछा।

‘अबे साले, बोर करता भैंचो अपने पुराने साले जोक सुना-सुना कर। साले तू अपनी बता, अकेले-अकेले तू भैंचो पीप-शो देखने सोहो गया था?’

‘भाई जी, वाइफ़ को साथ लेकर गया था,’ सीना तान कर राजीव बोला।

‘साली वाइफ़ हो तो इला जैसी। नहीं तो साली बीवियां सोहो का नाम भी सुन लें तो चार प्लेटें भैंचो रीज़न पूछे बिना तोड़ दें। साले, बता वहाँ देखा क्या?’

‘भाई, पैसे बर्बाद हुए बस और कुछ नहीं। वही सब, आजकल टीवी पर क्या नहीं दिखाया जाता? मेरे हिसाब से तो पीप-शोज़ देखने जाना पैसे बर्बाद करने वाली बात है।’

‘साली सायरा इधर ही आ रही है, फिर बात करते हैं। मेरे पीने पर वह मुझसे वैसे ही भैंचो नाराज़ रहती है,’

‘भाई, आर यू सीरियस एबाउट हर?’

‘अरे साले, अपन तो भैंचो आज़ाद पंछी हैं, आज साले इधर तो कल भैंचो फुरर, कोई साली ख़ुशी-ख़ुशी आती है तो भैन्चो हमारा क्या जाता है?’

‘आपको किसी तरह का कोई खौफ़ नहीं…,’

‘अरे यार, वो तो भैंचो एक एक्सीडैन्ट था, शी इज़ साली ए नाइज़ गर्ल,’

‘भाई, आजकल मुस्लिम्स बहुत फ़नैटिक हो रहे हैं; आपके नाम कहीं फ़तवा-वतवा न निकाल दें,’

‘साले, मैं कौन सा उससे भैंचो निकाह पढ़वाने जा रहा हूं?’

‘जस्ट बी काशस। वैसे, है तो बहुत ज़हीन और खूबसूरत, सभी की आँखें उसी पर टिकी हैं,’

‘अदब और रोमैंसिंग में साले इन लोगों का कोई मुकाबला नहीं, दैट्स वाए, हम साले फिसल जाते हैं, भैंचो सो ईज़िली,’

‘फिर ठीक है, शादी के लिए अपना रिलिजन बदलना ग़लत है,’

‘मैं तो साली शादी में बिलीव ही नहीं करता। साले हाफ़-बेक्ड लोग इन्हीं को मुबारक हों, जो भैन्चो अपना धर्म बदल कर शादी कर लेते हैं और फिर साला जीवन भर पछताते हैं।’

‘वैसे ऐसी बात नहीं है, भाई, कई इंटर-कास्ट मैरिजेस बड़ी सक्सेसफ़ुल…,’

‘साले सिंगल रहकर मस्त रहना अच्छा है के भैन्चो शादी करके ज़िंदगी भर की मुसीबत पालना? साले, मुझे छोड़, तू अपनी बता, खुल्लम खुल्ला मंजूषा के साथ चिपका है, इला न जाने तुझे कैसे बख्श देती है,’

‘उसे पता है कि मैं ‘ओनली वन-वूमेन-गाई हूँ,’

‘साले आई कांट बिलीव इट, भैन्चो तुझे कहीं इला ने इसलिए तो छूट नहीं दे रखी कि साला उसका अपना लफड़ा किसी और के साथ चल रहा है?’

‘क्या बात करते हैं आप भी, भाई? वो ऐसी है ही नहीं,’ राजीव ने कह तो दिया लेकिन उसके दिमाग़ में भी शक कुलबुलाने लगा; रिसर्च के सिलसिले में इला को रात-बेरात तो हो ही जाती है दफ्तर में।

‘इफ़ इला इज़ सो लिबरेटेड तो तू साले आनंदलोक की भैन्चो मेम्बरशिप क्यों नहीं ले लेता?’

‘भाई, अगर आप मुझे आनंदलोक की मेम्बरशिप दिलवा दें तो मैं आपका जीवन भर के लिए गुलाम बन जाऊंगा,’ रंजीत के कंधे दबाते हुए राजीव बोला।

‘साले बिना रेफरेंस के वहाँ भैन्चो एक परिंदा भी पर नहीं मार सकता और साली नो हैंकी-पिंकी, मंजूषा को साली बीवी बना कर ले जाने की तो नहीं सोच रहा?’

‘नो वे, क्या सचमुच वहाँ हज़बैंड-वाइफ़ स्वाप किए जाते हैं?’

‘साली पर्चियां डाली जाती हैं, जिसके हिस्से जो आ जाए, नो चौइस, सब कुछ भैन्चो सीक्रेट होता है,’

‘विक्की की वाइफ़ का किस्सा सुना था मैंने, हैरी ने उसके हाथ-पाँव बाँध कर काफ़ी मारा-पीटा,’

‘एवज में भैन्चो ने काफ़ी पैसा ऐंठ लिया उसने हैरी से,’

‘मस्ट बी रिस्की, भाई, किसी की वाइफ़ किसी के हज़बैंड के साथ पूरा वीकेंड…’

सायरा को नज़दीक आया देख राजीव चुप हो गया। उसका आख़िरी जुमला सुनकर सायरा का कलेजा मुंह को आ गया; कहीं वे दोनों उसी के बारे में तो बात नहीं कर रहे थे?

‘तो आप यहां राजीव भाईजान से गुफ्तगू कर रहे हैं और एक हम हैं कि कब से आप ही को ढूंढ रहे हैं,’ सायरा ने मन की बात ज़ाहिर नहीं होने दी।

‘चल साले फूट यहां से, अपन को सायरा से कुछ साली सीक्रेट बातें करनी हैं,’ अपनी एक आँख दबाते हुए रंजीत ने राजीव को वहाँ से उठकर जाने का इशारा किया। यकायक सायरा को लगा कि जैसे रंजीत उसे प्रोपोज़ करने जा रहा था। इंशा अल्लाह, इस ख़ास बात के लिए उसने मीता की पार्टी को ही क्यों चुना?

‘नहीं, नहीं, राजीव जी, ऐसी कोई ख़ास बात नहीं…’ शर्मसार सायरा की बात बीच में ही छूट गई।

‘इट्स औल राईट, सायरा जी,’ कहता हुआ राजीव वहाँ से उठ कर चल दिया। सायरा को रंजीत की बस यही अदा पसंद नहीं, क्या सोचेगा राजीव?

अपमानित सा राजीव बिना आगे-पीछे देखे मुड़ा ही था कि मिश्रा जी से जा टकराया।

सोमरसेट मोघम का कहना है कि जब आप अपने मित्रों का चयन करें तो चरित्र के स्थान पर व्यक्तित्व को न चुनें।’ राजीव को मिश्रा जी की बिन-माँगी सलाह बिलकुल पसंद नहीं आई पर मिश्रा जी अपनी आदत से मजबूर थे। अधिक कुछ कहे सुने दोनों दो दिशाओं में चल दिए।

सायरा को रंजीत की तरफ़ जाते देख आपा बड़बड़ाने लगीं, ‘लाहौलविलाकुव्वत, हसन मियाँ भी न बस एन वक्त पर ग़ायब हो जाते हैं,’ बलि का बकरा न जाने कैसे कसाई के सामने ख़ुद ही आ खड़ा हुआ।

‘लाहौलविलाकुव्वत, मियां ज़रा अपने दीदे तो खोल के रखिए,’

‘या खुदा, आपा, अब ऐसा क्या हो गया?’

‘मियां, चिड़िया उड़ने को है और आप दाना जेब में रखे घूमे रहे हैं,’

‘तो आपा हम क्या करें?’ रंजीत और सायरा की तरफ देखते हुए हसन ने मायूसी से पूछा।

‘लाहौलविलाकुव्वत, आपसे कभी कुछ हुआ है जो अब होगा? आपको तो खाना रकाबी में सजा मिल जाना चाहिए, बस। मियां ज़रा कभी आप खुद भी तो ज़हमत उठाया कीजिए,’

‘तो क्या आप चाहती हैं के हम रंजीत से दो-दो हाथ करें?’

‘ज़रूरत पड़े तो इसमें हर्ज़ ही क्या है? सायरा बीबी को एहसास तो हो कि उनके लिए कोई अपना सर क़लम करवाने को भी तैय्यार है,’

‘आपा, मियाँ बीवी राज़ी तो क्या करेगा काज़ी?’ लग रहा था कि ग़फ़लत में हसन ने हथियार डाल दिए थे।

‘हमें खौफ़ है के ये कमबख्त रंजीत कहीं सायरा की कमअक़ली और कमज़र्फ़ी का फ़ायदा न उठा ले,’

‘जो खुदा को मंज़ूर। वैसे आपा, रंजीत बुरा इंसान नहीं है,’

‘आप भी कैसी अहमकाना बातें करते हैं, मियाँ? एक मुसलमान औरत की अज़मत बद्ज़ौक क्या एक हिन्दू संभालेगा? गुस्से में आपा का मन हुआ कि हसन के चांटा रसीद कर दें, उनके झुमकों का इरादा भी नेक न था।

‘क्यों नहीं? आप ज़रा ग़ौर तो फरमाइए, दोनों में ख़ासी क़रीबियत है,’

‘लाहौलविलाकुव्वत, हमसे तो भई ये सब देखा नहीं जाता। लगता है के शर्मो-लिहाज़ को ताक़ पर रख कर आई हैं सायरा बीबी। खुदा ना ख़ास्ता, बस अब यहां से तशरीफ़ ले चलिए,’ ग़ुस्से में झूलते हुए आपा के झुमकों के पीछे-पीछे चल दिया हसन। वह जानता था कि यदि उसने सायरा की तरफ़ नज़र भी उठाई तो रंजीत उसकी आँखें नोच लेगा। इस वक्त भी, जबकि सायरा उसी से मुख़ातिब थी, रंजीत उसी को ही घूर रहा था।

‘बहुत देर कर दी आने में, हम तो आपकी उम्मीद ही छोड़ बैठे थे,’ सायरा ने रंजीत का ध्यान बंटाना चाहा।

‘अरे साला आता कैसे नहीं, भैंचो मीटिंग ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी,’

‘वीकेंडस पर भी मीटिंग? क्या कोई ख़ास मसला मद्देनज़र था?’

‘मैं साला ब्रेंट काउन्सिल में एडवाइज़र भी तो हूँ न। काउन्सिल के भैंचो सारे नोटिस उर्दु, पंजाबी, गुजराती, और साली बंगाली तक में छपते हैं पर हिंदी में नहीं, बस इसी बात को लेकर बात बढ़ गयी,’

‘आज आप अपना तक़िया-क़लाम कुछ ज़्यादा ही इस्तेमाल में ला रहे हैं। ख़ैर, सिर्फ़ आपके शोर मचाने से तो कुछ नहीं होगा। हम लोगों ने उर्दु की किताबें लाइब्रेरी में रखवाने के लिए जानते हैं कितना हल्ला मचाया था? डिमांड दिखाने के लिए एक-एक किताब के लिए क्यूज़ लगवाई गईं थीं तब कहीं जाकर उर्दु की किताबें लोकल लाइब्रेरीज़ में मंगवाई गईं। हिन्दी वालों ने ऐसा कुछ नहीं किया, उन्होंने तो हमारा साथ तक नहीं दिया,’

‘भारत की राजभाषा साली हिंदी है, तो इसमें भैंचो हल्ला मचाने वाली क्या बात है? ये साले अंग्रेज करेंगे भैंचो वही जो चाहते हैं पर मीटिंग्स बुलाकर साला डिसकस ऐसे करेंगे कि जैसे हमारा भला चाहने वाला इनसे बढ़ कर कोई और नहीं,’

‘असल मुद्दा तो, जनाब, यह है कि हिंदी मसौदे की डिमांड है ही नहीं। हमारे ख़याल से इसकी वजह यह है कि हिंदी-भाषी ज़्यादातर ऐफ़्लुऐंट और प्रोफ़ैशन्लस हैं; जुबान और सिक़ाफ़त जैसे मुद्दों के लिए उनके पास वक्त नहीं है या यह सब उनके लिए ज़्यादा मायने नहीं रखता।’

‘ख़ैर, तुम क्यों ये साले जूस का नाटक कर रही हो? लो कुछ साली प्योर माल्ट-वाल्ट,’ यह जानते हुए कि सायरा सही कह रही थी; रंजीत ने बात बदल दी।

‘आपने जनाब ग़ौर नहीं किया, आपा हमें कैसे घूर रही हैं? तिरछी नज़रों से मेहमान भी हम ही को देख रहे हैं,’

‘आइ थौट यू वर लिब्रेटड! खैर, उस साले हसन के साथ तो साली तुम्हारी बड़ी खिचड़ी पक रही थी?’

‘क्या बात करते हैं आप भी, रंजीत? गिर…राजेश से जान छुड़ाई तो हम आपा और हसन के बीच जा फंसे। हमें पता होता कि आप इतनी देर से तशरीफ़ लाएंगे तो हम भी देर में ही यहाँ पहुँचते। मेज़बान खुद परेशान हो रहे थे कि हम बिन-बुलाए मेहमान की तरह कैसे आ टपके?’

‘साला, हू केयर्स?’

‘जनाब, इस मजमें में मौजूद हर एक शख्स की निगाह हम पर गड़ी है,’ लोगों के लगातार घूरने से सायरा सचमुच परेशान हो चुकी थी।

‘साला एक्सक्यूज़ अस, विल यू?’ गुस्से में पलट कर कुछ मेहमानों की ओर देखते हुए रंजीत ने कहा तो सबकी मुंडियां यन्त्रवत दूसरी ओर घूम गईं किंतु उनके कान अब भी रंजीत और सायरा की बातों पर ही टिके थे।

‘साला कुछ और काम-धाम नहीं है भैंचो इन्हें,’

‘ओह रंजीत, खुदाया खुद पर इख़्तियार रखिए, बहुत पी ली है आज आपने,’

‘सो व्हाट? खैर, देखो मैं तुम्हारे लिए क्या लाया हूँ,’

‘या अल्लाह, आज क्या हमारी सालगिरह है जो आप हमारे लिए तोहफ़ा लाए हैं?’ सायरा को तो एक अदद अंगूठी की तमन्ना थी पर रंजीत ने अपनी जेब से निकाल कर एक लिफ़ाफ़ा सायरा को पकड़ा दिया, जिसमें से दो एयर-टिकेटस झाँक रहे थे।

‘ओह रंजीत, आपको इतना ख़र्च करने की क्या ज़रूरत थी? शुक्रिया, हमारी कब से तमन्ना थी पैरिस जाने की!’ लिफ़ाफ़े को अपने पर्स में सरकाते हुए सायरा बोली।

‘भैन्चो तभी तो लाया हूं, साली तैयारी कर लेना। फ़्राइडे की शाम को भैंचो हीथ्रो पर मिलना और फिर साला चार दिन का हनीमून,’

‘हनीमून, बिना निकाह के?’ अपनी निराशा छिपाते हुए सायरा ने आखिर पूछ ही लिया।

‘जानेमन, शादी के बाद तो साला एक हनीमून होता है, ऐसे-ऐसे भैंचो कई हनीमून तुम पर कुर्बान,’

‘ओह, तो आपके साथ निकाह पढ़वाने की बात हमें अपने दिलो-दिमाग़ से मुकम्मल तौर पर निकाल देनी चाहिए,’ सायरा ने एक अहम सवाल मज़ाकिया तौर पर पूछ लिया था।

‘सायरा, आई थौट यू आर फ़क्किंग स्मार्टर दैन दैट! क्या मैंने तुमसे कभी शादी का भैंचो वादा किया था?’ रंजीत झुंझला उठा।

‘नहीं, पर…’ कच्चे धागे को ज़रुरत से ज़्यादा खींच चुकी थी सायरा; कहीं टूट ही न जाए। इस मुकाम पर पहुँच कर इज्ज़त की ख्वाहिश रखना नामुमकिन था।

‘शादी में साला रखा ही क्या है, सायरा? एक निकाह से क्या भैंचो तुम्हारा दिल नहीं भरा जो अब साला दूसरा पढ़वाना चाहती हो?’ मसला नाज़ुक था, रंजीत की आवाज़ मखमली हो उठी।

‘वो बात नहीं, रंजीत,’ माला सी टूट कर बिखरती हुई सायरा पर बेतहाशा उदासी छा गयी, बस अब उससे और जद्दोजहद नहीं हो पाएगी।

‘तो फिर साला सोच लो, माई ऑफ़र इज़ ओपन,’ रंजीत का मन हुआ कि उसे अपने सीने से लगा ले पर वह ऐसा कोई वादा करने को तैयार न था जिसे वह अंजाम न दे सके।

‘हमारी बस एक ही इल्तजा है आपसे,’ कहते हुए सायरा की आँखें भर आई थीं।

‘बोलो जानेमन, कहो तो सीने से साली जान निकाल कर रख दूं तुम्हारे भैंचो क़दमों में,’

‘आप हमें किसी और के आगे नहीं परोसेगें। हम भी कोशिश करेंगे कि सिर्फ़ आप ही हमारे घर की रौनक रहें,’

‘साली तुम्हारी मर्जी, सिर्फ़ मुझसे तुम साला कितना बना पाओगी?’

यह क्या कह डाला रंजीत ने? सायरा का दिल दहल उठा। अब भी वक्त था, उसे पीछे हट जाना चाहिए पर उसके आगे कुआं था तो पीछे खाई।

‘आप शायद बिज़नेस कर रहे हैं हमार साथ? औरत का घर एक बार उजड़ ज़ाये तो दोबारा बसना नामुमकिन है, लोगबाग़ बसने देंगे ही नहीं,’ सायरा की आंख से एक आंसु ढलक ही पड़ा। रंजीत भी द्रवित हो उठा किन्तु मौके की नज़ाकत तो मद्दे-नज़र रखते हुए उसने अपनी नज़र फेर ली। इस वक्त वे गले मिल लेते तो सारे गिले-शिकवे दूर हो जाते, इन बेरहम बातों से दो चार नहीं होना पड़ता।

‘ये जिंदगी साली बड़ी कुत्ती चीज़ है, जानेमन। खैर, डील और नो डील?’ अपना रूमाल सायरा को पकड़ाते हुए रंजीत ने ख़ामोशी को तोड़ा।

‘ठीक है, तो ये डील सिर्फ़ हमारे और आपके बीच में ही रहेगी,’ दोनों की नज़रें मिलीं।

‘मुझसे साला ज़्यादा एक्सपैक्ट नहीं करना सायरा, आई वार्न यू,’ मुस्कुराते हुए रंजीत बनावटी गुस्से में बोला।

‘यूं तो हमारी जरूरतें कुछ ज़ियादा नहीं, रंजीत, आप नुकसान में नहीं रहेंगे ये हमारा वादा है,’

‘सायरा, साली शादी एक ऐसा बंधन है, जिसे जोड़ने-तोड़ने में भैंचो लाइफ़ बर्बाद हो जाती है। हम न तो एक दूसरे पर साला बोझ बनेंगे, न ही साले एक दूसरे के भैंचो रस्ते में ही आएंगे, क्यों क़ुबूल है?’

‘रंजीत हमें सब क़ुबूल है,’ क़ुबूल करना ही पड़ा सायरा को, बच निकलने का बस यही एक रास्ता था। सूदखोर और तकाज़ेदार उसके दरवाज़े पर खड़े थे।

‘साला ऐसा क्यों लग रहा है कि आई एम लूजिग़ दि गेम आलरैडी? चियर्स एनिवे। ये साली आपा कटखनी बिल्ली की तरह अब मुझे घूर रही हैं,’

‘हसन से निकाह पढ़वा कर हमें इज़्ज़त बख़्शना चाहती हैं आपा,’

‘साले लंगूरों ने कभी अपनी शक्लें शक्ल देखी हैं भैंचो शीशे में?’ रंजीत का मन हुआ कि वह हसन और आपा के सिर आपस में टकरा दे।

‘देखो रन्जीत, पार्टी में किसी किस्म की बेअदबी नहीं होनी चाहिए, प्लीज़ फ़ार माई सेक?’

‘तुम साले इन चूज़ो से इतना क्यों डरती हो?’

‘जब तक था दम, न दबे आसमान से हम, जब दम निकल गया तो ज़मीं ने दबा लिया। हमारे आसपास कोई भी हादसा क्यों ना हो, इल्ज़ाम हम ही पर आता है, प्लीज़ बात नहीं बढ़ाइएगा,’

‘साला, तुम्हें कोई आंख उठा कर तो देखे…,

‘आपको हमारे सर की क़सम, रंजीत, कोई फ़साद मोल नहीं लीजिए। आपके सामने नहीं तो आपके पीछे, ये लोग मुलज़िम तो हमें ही ठहरायेंगे न? इस पार्टी में भी आपने कहा तो चले आये, अब हम चलते हैं। आप भी कोई बहाना बना कर निकल आइएगा, घर पर मिलते हैं।’

‘तुम कहती हो तो साला ठीक है, नहीं तो भैंचो इन लोगों से बायॅ करने का भी साला मन नहीं है,’

‘मेज़बान का शुक्रिया अदा करके और सबसे अलविदा कह कर ही निकलिएगा, प्लीज़,’ सायरा ने एक बार फिर दोहराया हालांकि वह जानती थी कि उसके वहाँ से जाते ही रंजीत सब भूल जाएगा। फिर भी, जिस तवज्जो और हिफ़ाजत की उसे तवक्को थी, वह उसे सिर्फ रंजीत ही दे सकता था।

‘अब तुम एक नेक बीवी की साली एक्टिंग तो करो नहीं।’ मुस्कुराते हुए बोला

‘आप से तो हमें एक नेक शौहर की एक्टिंग की भी उम्मीद नहीं,’ सायरा ने एक बार फिर मौके का फ़ायदा उठाना चाहा।

‘गिरगिट और उसकी पार्टी साली इधर ही चली आ रही है; साला ख़ुदा जाने क्यों?’ रंजीत एक बार फिर सायरा की बात को नज़रन्दाज़ करने में कामयाब को गया।

‘रंजीत, प्लीज़ ख़ुदा को तो कम से कम बख़्श दीजिए, खुदा-हाफ़िज़,’ सायरा मुस्कुराती हुई उठ खड़ी हुई तो मिश्रा जी से जा टकराई।

‘चाणक्य का कहना है कि अपने से कम या अधिक हैसियत के लोगों से मित्रता नहीं करनी चाहिए। ऐसी मित्रता आपको कभी कोई प्रसन्नता नहीं देगी।’ मिश्रा जी ने एक बार फिर सायरा को सावधान किया; हामी में अपना सिर हिलाते हुए वह सोच रही थी कि मसला दरअसल उसकी ख़ुशी और नाख़ुशी का तो था ही नहीं, मसला था बची खुची अस्मत को बचाए रखने का।

अभी सायरा दरवाज़े तक पहुँची ही थी कि शमीम अपनी बेटी आयशा, दामाद रिचर्ड और भांजे मंज़ूर के साथ कार से उतरी। उन्हें देख कर सायरा दबे पाँव वापिस हो ली। हसन भी उन सबकी आड़ में अन्दर चला आया; सोचा था कि वह सीधा मधुशाला में जा बैठेगा और रंजीत के साथ अपने ताल्लुकात सुधारने की कोशिश करेगा लेकिन सामने खड़ी आपा की आंखें लावा बरसा रही थीं। हसन खुद को आपा की अदावत के लिए तैयार कर ही रहा था कि शमीम और मंज़ूर से बचने के लिए आपा जल्दी से जिया के पास जा बैठीं। हसन की कमर और गर्दन खुशी से लचकीं और वह अपने सब रंजो ग़म भुलाकर दोस्ती का हाथ बढ़ाने की ग़रज़ से रंजीत के पास जा बैठा; आख़िर यह उसकी नौकरी का सवाल था। एक उम्मीद सी बंध गई थी उसे कि आपा अब उसे सारी शाम परेशान नहीं करेंगी। वह मंज़ूर से भी दूरी बनाए रखना चाहता था, जिसे इस वक्त शमीम लोगों से मिलवा रही थी।

‘मियाँ-बीवी को शादी की सालगिरह इंशा अल्लाह भौत-भौत मुबारक हो, ख़ुदा आपको खुशियाँ बख्शे और सौ सौ साल सलामत रखे,’ शमीम ने मीता को गले लगाकर उसके दोनों गालों को चूमते हुए कहा। मीता नए मेहमानों का मुआयना कर रही थी; सब के सब ख़ाली हाथ थे किन्तु शमीम के गोरे दामाद को देख कर उसे कुछ तसल्ली हुई। सुरूर और जूली भी आ जाते उसकी इस पार्टी में चार गोरे मेहमान होते; लूसी चाहे एक नौकरानी ही क्यों न हो, थी तो गोरी ही न, ‘जय माता दी।’

‘शमीम बाजी, भई, वाट हैपंड? इतना लेट कैसे हो गईं? अब घर वाले ही इतनी देर से आएँगे…’ मीता ने अपना वही रटा-रटाया संवाद दोहराया।

‘मीता बाजी, हम लोग तो कब के तैय्यार बैठे थे; मंज़ूर की ट्रेन किंग्स-क्रौस पर पूरा एक घंटा लेट पहुंची।’ पर्स में से एक लिफ़ाफ़ा निकाल कर मीता को थमाते हुए शमीम बोली, ‘हमारी तो भई कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था, मीता बाजी, कि आपके लिए क्या तोहफ़ा लाएं…,’

‘आंटी, अम्मीं को हमने ही मशविरा दिया के आपको जौन-लुईस के वाउचर्स दे दें, आपको जो पसंद आए आप खुद ही खरीद लीजिएगा,’ आयशा ने शमीम की बात पूरी की।

‘दिस इज़ रियली वेरी थॉटफुल औफ़ यू, आयशा, बट, शमीम बाजी, इसकी ज़रुरत क्या थी?’ मीता और शमीम दोनों एक दूसरे को ‘बाजी’ कह कर बुलाती थीं क्योंकि अपने को उम्र में बड़ा मानने के लिए दोनों तैय्यार न थीं।

मीता ने माँ शेरां वाली को धन्यवाद दिया कि शमीम कोई बेकार का तोहफ़ा लेकर नहीं आई थी, जो न रखते बने न फेंकते। क्रिसमस पर शमीम लाल-सुनहरी शनील के कुशन-कवर्स लेकर चली आई थी, जो मीता ने चुपचाप पड़ौसन सोमा को टिका दिए थे। उसे स्वीकार करना पड़ा कि आजकल के युवा बड़े व्यावहारिक हैं किन्तु वाउचर्स थे कितने पाउन्ड्स के? तीन-तीन फैमिलीज़ भी आई थीं; शमीम, आयशा-रिचर्ड और मंज़ूर; तीनों ने ही मिल कर वाउचर्स खरीदें होंगे; काश कि वह लिफ़ाफ़ा खोल कर देख पाती किन्तु इस वक्त तो एक गोरा उसके सामने था और वह उसके आलिंगन में बंधने के लिए लालायित थी।

‘वेलकम टु अवर हम्बल अबोड,’ मीता ने कहा तो रिचर्ड ने अपना सिर हिलाकर अभिवादन स्वीकार कर लिया। रिवाज़ के मुताबिक़, मीता को आलिंगन में लेकर चूमने और मकरंद से हाथ मिलाकर निमंत्रण के लिए ‘थैंक यू’ कहने के बजाय रिचर्ड अपनी नवविवाहिता आयशा को चूम रहा था, जिसका गिला मीता को जीवन-पर्यन्त रहेगा।

‘दावतनामें के लिए दिली शुक्रिया, मोहतरमा। शादी की सालगिरह आपको बहुत बहुत मुबारक हो।’ मंज़ूर ने बड़े अदब से मीता का हाथ चूमते हुए कहा; मीता की घोर निराशा प्रसन्नता में बदल गयी क्योंकि मंज़ूर ‘ऑलमोस्ट अँगरेज़’ जैसा दिखाई दे रहा था।

‘मैक डार्लिंग, जल्दी से कैमरा लाओ,’ मंज़ूर और रिचर्ड के बीच में खड़े होकर जब तक मीता ने दो-चार फ़ोटोज़ नहीं खिंचवा लीं, उसे चैन नहीं पड़ा। तभी मोहिनी ने आकर मकरंद से अपनी और शमीम की एक फोटो लेने के लिए कहा।

‘मैक डार्लिंग, कैमरा मुझे दो और लूसी से कहो कि जल्दी से रिचर्ड के लिए टोमेटो कैच-अप ले कर आए,’ मीता ने मकरंद के हाथ से कैमरा लेकर मोहिनी और शमीम की फ़ोटो लेने के लिए झूठमूठ कैमरा क्लिक कर दिया; ऐसी बेकार की फ़ोटोज़ से कैमरा ओवरलोड हो गया तो? अभी को केक भी नहीं कटा है। फ़ोटोज़ चाहिएं तो लोगों को अपना कैमरा लेकर आना चाहिए!

‘मीता बाजी, टोमैटो कैच-अप की कोई ज़रुरत नहीं, हमारे रिचर्ड को हरी चटनी बहुत पसन्द है,’

‘अरे वाह, तुमने तो एक गोरे को भी इंडियन बना लिया,’

‘कितनी अजीब बात है न, मीता बाजी? एक हमारी आयशा है, जिसे मिर्च-मसाला हज़म नहीं होता और दूसरी तरफ़ आप कितना भी मसालेदार सालन पका लीजिए, मजाल है कि रिचर्ड के मुंह से एक ‘सी’ भी निकल जाए,’

‘रिचर्ड, प्लीज़ ट्राइ दीज़ समोसाज़, आइ हैव प्रिपेयर्ड देम माइसेल्फ़,’ मीता को आशा ही नहीं पूरा विश्वास था कि समोसा देखकर रिचर्ड चहक उठेगा क्योंकि अधिकतर अँगरेज़ों को समोसे बहुत अच्छे लगते हैं।

‘थैंक्स मीता, इफ़ यू डोंट माइंड, आइ विल गो स्ट्रेट टु दि मेन कोर्स,’ मीता के मरगिल्ले समोसे देख कर रिचर्ड बोला तो मीता चिढ़ गयी; छोटे-बड़े का लिहाज़ ही नहीं है इन गोरों को। किसी इंडियन लड़के की हिम्मत नहीं होती कि उसे ‘मीता’ कह कर पुकारता।

‘मीता साहिबा, अब ये समोसे-वमोसे खाए न तो हम सब की ऐपेटाइट ख़त्म हो जाएगी। अल्हमदुलिल्लाह, हम भी अब सीधे दस्तरखान पर ही बैठेंगे, क्यों ख़ाला?’ मंज़ूर बोला।

‘चलिए, समोसे रहने दीजिए, काजू-किशमिश तो चलेगी न, भाई-जान, क्यों शमीम बाजी?’ कह कर मीता ने मेज़ की और नज़र डाली तो उसका दिल बैठ गया; ड्राई-फ्रूट की ट्रे ही नदारद थी। उसकी इतनी महंगी रॉयल-डौलटन की ट्रे कहाँ जा सकती थी? कहीं गिरगिट ने उसे ठिकाने तो नहीं लगा दिया? वही खा रहा था काजू। उन्होंने मैक डार्लिंग को इशारा किया तो वह ट्रे ढूँढने के बहाने वहाँ से खिसक लिए।

‘अब रहने भी दीजिए, मीता बाजी, जानती हैं काजू में कितना ज़्यादा कोलेस्ट्रोल होता है?’ शमीम बोली किन्तु मीता का ध्यान कहीं और बंटा देख वह मंज़ूर से बोली, ‘चलिए मंजूर, आपको जिया, आपा और हसन से भी मिलवा दूं,’

‘अरे, इन साहब से तो मुलाक़ात है हमारी, ख़ाला। हसन की बीवी के पहले खाविन्द की बहन निख़त हमारे साथ लखनऊ में पढ़ती थीं,’

‘व्हाट? हसन इज़ मैरीड? इज़ ही ऐ डिवोर्सी नाउ?’ काजू-किशमिश की ट्रे को भुला कर मीता ने अपनी हैरत-भरी आँखें मंजूर पर टिका दीं; ऐसा कैसे हो सकता है कि किसी ने उन्हें अब तक इस तथ्य की जानकारी नहीं दी?

इसी बीच, मकरंद ख़ाली हाथ लौट आए थे और घड़ियाल उनके साथ था

‘भाभी जी, वरी नौट, आपकी रॉयल डौलटन की ट्रे कन्ज़र्वेटरी में सही सलामत रखी है, आपके स्पेशल गेस्ट्स फ्लाश खेलते हुए बादाम और काजू-किशमिश चुग रहे हैं। आप कहें तो मैं ट्रे यहाँ ले आऊँ,’ रोनी सूरत घड़ियाल ने पूछा।

‘रहने दो, घनश्याम। मैक डार्लिंग, ज़रा एक प्लेट में काजू किशमिश इन लोगों के लिए भी निकाल दीजिए, प्लीज़। सौरी मंज़ूर, आप क्या कह रहे थे?’ मीता ने मंज़ूर पर अपनी निगाह टिका दीं। मकरंद अपनी जगह से हिले भी नहीं; उन्हें पता होता कि ड्राई-फ्रूट कहाँ रखे हैं तो न वह लाकर देते।

‘अब आपसे क्या छिपाना, मोहतरमा। निख़त हमारे साथ पूरे दो साल घूमती-फिरती रहीं और जब निकाह की नौबत आई तो उन्होंने न्यू-यौर्क के एक रिटेलर को चुना,’

‘इन औरतों का कोई भरोसा नहीं, भाई-जान। किसी और की क्या कहूं, मेरी अपनी बीवी मेरे जिगरी दोस्त के साथ भाग गई…,’ घड़ियाल का रोना एक बार फिर शुरु हो गया।

‘इन हसीनाओं को तो साहब सौ खून माफ़ हैं और जफा का इलज़ाम हम मर्दों पर आता है,’ मंज़ूर ने घड़ियाल के कंधे पर हाथ रखते हुए अफ़सोस जताया।

‘ख़ैर, आप अपना न्यू-यौर्क में ही कुछ चक्कर क्यों नहीं चलाते? इंग्लैण्ड में क्या रखा है? पहले प्यार की ख़ातिर तो कुछ भी किया जा सकता है, आप वहीं कुछ जमाओ,’ घड़ियाल ने राय दी।

‘अरे साहब, निख़त तो ख़ुद ही नहीं जम पाईं वहाँ। पिछले महीने ही तो आईं थीं लखनऊ। बता रही थीं कि उनके मियां रिटेलर-वीटेलर नहीं हैं, एक फैक्टरी में काम करते हैं,’

‘ओह, बेचारी के तो मरे भाग्य ही फूट गए,’

‘आजकल किस पर भरोसा किया जा सकता है, भाई-जान? किसी और की क्या कहूं, मेरी तो अपनी…’ इसके पहले कि घड़ियाल अपना रोना तिहराता; मोहिनी ने उसकी बात में ही काट दी।

‘कहीं दूर क्यों जाओ, अपने कुमार्स को ही लो। अमृतसर से मरी सीधी-सादी बहू ले आए। मरा एक ख़त तक नहीं लिखने देते बेचारी को अपने मायके। मरा सारा दिन दुकान में काम करवाते हैं और सुबह-शाम घर का मरा चौका-चुल्हा और मरी सफ़ाई,’

‘आपने बजा फरमाया, मोहिनी बीबी, आप तो जानती ही होंगी, रविन्द्र ने ईस्ट-हैम में एक दूसरी औरत भी रखी हुई है।’ शमीम ने बताया।

‘हाँ, हमने भी सुना था। परसों मैं मरे कुमार-स्टोर में शौपिंग के लिए गयी थी, मरी जीतो को मैं पहचान भी नहीं पाई, हड्डियों का मरा ढांचा बन कर रह गयी है,’

‘अगर आप सब लोग उसे जानते हैं तो भैंचो उसकी हैल्प क्यों नहीं करते? कम से कम उसके साले घरवालों को लिख ही दें कि आकर साला उसे वापिस इंडिया ले जाएं,’ रंजीत ने उन सबकी ख़बर ली।

‘बड़े भाई, हम सब पैसे इकट्ठे कर के उसके जाने का अरेंजमैंट कर भी दें तो वह जाने को राज़ी नहीं होगी,’ मोहन बोले।

‘मरे गाँव वाले तो एक तरफ़, उसके मरे पीहर वाले ही उसका मरा जीना हराम कर देंगे;’

‘कोई जाके बता दे उसे कि यह साला ब्रिटेन है, इंडिया नहीं। इस ज़माने में किसी को ज़ुल्म सहने की साली ज़रूरत नहीं है; पढ़ी-लिखी हो तो मैं उसे अपने दफ्तर में भैन्चो नौकरी दे सकता हूँ, काऊन्सिल का साला घर दिलवा सकता हूँ,’ रंजीत का नशा उतार पर था; शराब की तलब उठ रही थी किन्तु बार के बिलकुल नज़दीक बैठी सायरा और मंजूषा गप्पे लगा रही थीं।

‘हाउ नाइज़ औफ़ यू, मिस्टर रंजीत। इस ज़माने में कौन किसी के लिए कुछ सोचता है?’ किन्तु मीता की तारीफ़ का भी रंजीत पर कोई असर नहीं हुआ।

‘रंजीत जी, आप उसे मरी नौकरी दे देंगे तो जीतो की मरी ज़िंदगी बन जाएगी। मैं और मिक जीतो को मरा खुद आपके पास लेकर आएंगे,’  मोहिनी ने कहा तो मोहन ने अपना सिर हिला कर हामी भरी।

‘दैटस नाइज़, मोहिनी, तुम और मिक कुमार्स के अच्छे फ्रेंड्स भी तो हो…’ मीता ने मन ही मन सोचा कि बड़े आए हैं जीतो को रंजीत से मिलवाने वाले, रंजीत के दफ्तर अगर कोई जाएगा तो वह मीता होगी।

‘भाभी जी, ज़रा देखिए तो सही कौन आया है, निगम फ़ैमिली द ग्रेट,’ द्वार पर से गिरगिट ने चिल्ला कर कहा ताकि सब सुन लें। मीता, वायु, मोहिनी आदि कई मेहमान मुख्य द्वार की और लपके। नैन्सी ने गिरगिट को अपना मेक-अप से सुसज्जित गाल चूमने का अवसर नहीं दिया कि कहीं उसका मेक-अप न बिगड़ जाए।

‘हाय नैन्सी दीदी, हाय जीजा जी, वेलकम, मोस्ट वेलकम, कम इन। औल्वेज़ लेट-लतीफ़। और हमारी बुलबुल कहाँ है?’ मीता प्रसन्न होते हुए बोली।

इस बार की ‘हाय-हाय’ और पुच-पुच का रंग ही अलग था क्योंकि मकरंद की बड़ी बहन नैन्सी और उसके पति नरेश निगम के हाथों में बड़े आकार के दो उपहार थे। नरेश ने गुलाबी और सफ़ेद फूलों का एक जम्बो-साइज़ का गुलदस्ता मीता को थमाया तो नैन्सी ने उस बूके से कहीं बड़ा एक खूबसूरत पैकेट मैक को पकड़ाया। मीता को आज पहली बार महसूस हुआ कि आज उसकी वेडिंग-एनिवर्सरी थी।

तभी द्वार पर बुलबुल प्रकट हुई, जिसके हाथ में एक सुनहरी पिल्ला था, जो गुलाबी रंग की छोटी सी जैकेट पहने था; उसके कानों के ऊपर गुलाबी रिबंस बंधे थे और गले में चांदी की मोटी चेन थी, जिस पर लिखा था, ‘प्रिन्सेज़ डायना’।

मीता घबरा उठी कि निगम्स यह तोहफ़ा कहीं हैरी और कैमिला के लिए न लाए हों, जो एक पिल्ले के लिए महीनों से ज़िद कर रहे थे। पिल्ला ख़रीद लाना बहुत आसान था; उसकी देखरेख नामुमकिन नहीं तो कठिन अवश्य थी। ट्रेनिंग के अलावा उसका गू साफ़ करना, नहलाना और समय से टीके लगवाना; कौन करेगा यह सब? मकरंद तो कुत्ते को सुबह शाम घुमाने के लिए भी राज़ी नहीं होंगे।

‘हाय मीता आंटी, हाय मैक अंकल, हैप्पी एनिवर्सरी,’ बुलबुल ने मीता और मकरंद को चूमते हुए कहा। फूलों और उपहार के मुताबिक, चुम्बनों और आलिंगनों का सिलसिला स्पष्टतः काफ़ी देर तक चला। नैन्सी और नरेश चमचमाते उपहारों और बुलबुल की कुतिया से सभी मेहमान अभिभूत थे।

‘मीता, आज की देर का सेहरा प्रिंसेस डायना पर। बुलबुल इसे सुबह मेफेयर-सैलून ले गयी थी और पूरे ढाई घंटे में लौटी। कितनी सुन्दर लग रही है न हमारी प्रिंसेस डायना?’

‘ओ माई गौड! हाउ ब्यूटीफुल!’ मीता ने चैन की सांस ली कि प्रिंसेस डायना तोहफ़ों में शामिल नहीं थी।

‘बुलबुल, तेरा कुत्ता तो सचमुच बड़ा प्यारा है, हेलो क्यूटी-पाई,’ गिरगिट बोला।

‘राजेश अंकल, यह प्यारा नहीं, प्यारी है,’ बुलबुल ने टोका।

‘क्या मैं इसे होल्ड कर सकती हूँ, बुलबुल?’ कहते हुए मंजूषा ने प्रिंसेस डायना को अपनी गोद में ले लिया। बाहर वाली बैठक प्रिंसेस डायना और उसके प्रशंसकों से भर गयी, जहां से जब तब लम्बी-लम्बी उसांसों के साथ ‘हाउ ब्यूटीफुल,’ हाउ क्यूट,’ ‘सिम्पली डिलीशियस,’ जैसे संबोधन सुनाई दे रहे थे तो अन्दर वाली बैठक में पालतू जानवरों के खर्चों पर बहस छिड़ी थी।

‘कुत्तों को मरा पालना क्या आसान है? एक बच्चे जितना खर्चा होता है इन मरों पर,’

‘कहीं ज़्यादा, मोहिनी, आजकल जो ये सैलून खुल गए हैं न कुत्ते-बिल्लियों के, जानती हो कितना चार्ज करते हैं? बुलबुल आज पूरे सौ पाउंडस खर्च कर के आई है प्रिन्सेज़ डायना पर,’ अवाक खड़े दर्शकों को नैन्सी ने बताया।

‘खर्चे के अलावा उनकी रिस्पोंसिबिलिटी क्या कम होती है, नैन्सी जीजी? हमारे पास तो दो-दो कोर्गीज़ हैं, कहीं बाहर जाना हो तो दस बार सोचना पड़ता है,’ वायु भला कहाँ पीछे रहने वाली थी।

एकाएक मीता को कैमरे का ध्यान आया; प्रिन्सेज़ डायना के फ़ोटोज़ से उसके एलबम में रौनक आ जाएगी। मीता ने सुबुद्धि के लिए शेराँ वाली माँ को मन ही मन धन्यवाद दिया और फ़ोटोज़ की ख़ातिर, एक बार फिर उपहारों का आदान प्रदान हुआ। एक पूरा फ़ोटो-सेशन प्रिन्सेज़ डायना को समर्पित था। मेहमान कुलबुला उठे कि उनके मुकाबले में एक कुतिया को प्राथमिकता दी जा रही थी।

इसी समय सुमित वर्मा की बहन चित्रा और उसका पति करन रायज़ादा भी आ पहुंचे।

‘आज ये मरे अपने कुनबे को कहाँ छोड़ आए?’ मीता और मकरंद की ओर देखते हुए मोहिनी ने तंज किया। सुमित और वायु को कोई आमंत्रित करता तो सुमित के माँ-बाप, बहन-बहनोई और छोटी बहन किशमिश भी साथ चले आते थे इसलिए बहुत से लोगों ने उन्हें बुलाना ही बंद कर दिया था।

‘हाय भैय्या-भाभी, हैप्पी ऐनिवर्सरी,’ कहते हुए चित्रा मकरंद के गले में झूल गयी। मकरंद से हाथ मिलाकर करन ने एक बड़ा सा पैकेट मीता के हाथ में पकड़ा दिया, काफ़ी भारी था; वाइन-ग्लासेज़ ही होंगे; वेम्बली सन्डे-मार्केट में दस-दस पाउन्डस में बड़े अच्छे वाइन-ग्लासेज़ मिल जाते हैं। चलो कोई बात नहीं, क्रिसमस में देने-लेने के काम आएँगे।

‘अरे क…क…करन, मम्मी-पापा और क…क…किशमिश को नहीं लाए?’ मकरंद ने निश्छलता से झेंपते हुए पूछा था किन्तु करन और चित्रा को लगा कि उन पर तंज किया गया था।

‘मैक भाई साहब, आज वे लोग कहीं और इन्वाइटड हैं पर उन्होंने आपके लिए ढेर सी शुभ कामनाएं भेजी हैं,’ करन की जगह चित्रा ने जवाब दिया, जिसके चेहरे पर फ़ाउन्डेशन और पाउडर बहुलता में थुपे थे।

‘चित्रा इज़ लुकिंग ‘फ़ेयर एंड लवली,’ राजीव ने मज़ाक में कहा।

‘हाउ एम्बैरसिंग! सांवली स्किन पर उसे डार्कर फ़ाउन्डेशन लगानी चाहिए,’ मंजूषा फुसफुसाई।

‘हमारे भैय्या-भाभी कहाँ हैं? मंजूषा और राजीव को फुसफुसाते हुए देख चित्रा ने मुड़कर मीता से पूछा ही था कि सुमित और वायु प्रिन्सेज़ डायना को गोद में लिए बैठक में आए।

‘ओ माई गौड, ये डौग्गी आपने कब खरीदा, भैय्या-भाभी?’ चित्रा ने प्रिन्सेज़ डायना को सहलाते हुए पूछा।

‘ये है प्रिन्सेज़ डायना, बुलबुल के सामने कहीं इसे डौग्गी मत कह देना,’ नैन्सी ने चेतावनी दी।

‘चित्रा और नैन्सी दोनों को ही एक अच्छे ब्यूटिशियन की सख्त ज़रूरत है,’ मंजूषा राजीव के कान में फुसफुसाई।

‘किन्तु यह सलाह उन्हें कौन दे और कैसे दे? वैसे भी, ऐसे नमूने न हों तो पार्टीज़ कितनी नीरस हो जाएँ,’ राजीव बोला।

राजीव और मंजूषा के पीछे से गुज़रती हुई जिया को उनकी बात समझ में नहीं आई तो वह और भी परेशान हो गईं; दोनों एक दूसरे के कान में न जाने क्या फुसफुसाते रहते हैं। बेटी-दामाद और नातिन दुनिया भर में अपने कुत्ते की नुमाइश करते फिर रहे थे; उन्होंने जिया से अब तक ‘जय राम जी की’ तक नहीं की थी। उनके लिए किसी को फुर्सत नहीं थी, तभी तो उन्हें अपने सिंहासन से उठना पड़ा। उनकी सहेली पुष्पा का कहीं अता-पता न था और आपा, आपा की भली चलाई, उन्हें हसन और सायरा से निजात मिले तब न बैठें जिया के पास।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, बुलबुल, नेक अपना पिल्ला हमें बी तो दिखा,’मुंह फुलाए हुए जिया ने कहा तो बुलबुल के साथ प्रिन्सेज़ डायना के दीवाने भी जिया की ओर चल दिए। जिया को बहलाने के लिए मैक उनके फ़ोटोज़ लेने लगे। लोगों से घिरी जिया अब अपनी पूरी फॉर्म में थीं।

‘ये कुत्ता नहीं कुतिया है, नानी, और इसका नाम है डायना,’

‘ऐ मैं तोसे कऊं, बुलबुल, भला डायन बी कोई नाम हुआ?’

‘डायन नहीं नानी, डायना, प्रिंस चार्ल्स की वाइफ़ थी न डायना,’ बताते हुए बुलबुल ने डायना को जिया की गोदी में बैठा दिया; एकाएक जिया उछल के खड़ी हो गईं; डायना ज़मीन पर जा गिरी। जिया को कुत्तों से बड़ा डर लगता था किन्तु डायना के साथ फ़ोटो खिंचवाने का लोभ भी वह संवरण नहीं कर पा रही थीं।

‘अरे रे रे, डायना को कहीं चोट नहीं आई, पुअर थिंग?’ सहानुभूतिपूर्ण आवाजें पूरे घर में जंगल की आग सी फ़ैल गईं, डायना के थूथन को चूमते हुए बुलबुल उसे सीने से लगाए बच्चे की तरह झुला रही थी। पूरा घर डायना के लिए व्यथित था; जानवरों के अच्छे डाक्टर्स के फ़ोन नंबर गूगल-सर्च पर ढूंढें जा रहे थे। एक पिल्ली को जिया से अधिक तवज्जो दी जा रही थी।

‘अरे मैं कऊं, वायु की ननद-नंदोई बी आने वाले थे न, उनका का भया?’ जिया ने बाद बदलने की ग़रज़ से पूछा।

‘सब आ गए, नानी। आप क्यों फ़िक्र कर रही हैं?’ बुलबुल ने झुंझलाते हुए जवाब दिया।

‘अरे, इस काले चश्में के मारे हमें कछु साफ नाय दीखता, बरसों बाद एक जग्गे इकट्ठे हुए हैं सब। बेटा मकरंद, जरा एक फोटू तो निकाल हम सबकी, न जाने फिर कब मिलना होवे?’ जिया ने ट्रम्प फेंकी; अपनी चुटिया और धोती को सीधा किया; तब तक उनके बेटी-दामाद और बुलबुल सब उनके पास आ बैठे। एक लंबा फ़ोटो-सैशन हुआ।

‘अरे मैं कऊं, बेटा मकरंद, अपने बड़े भाई-भाभी को भूल गया क्या? अरे कोई मोइनी-मोन को तो ढूंढ के लाओ,’ मिक और मोहिनी तो इसी इंतज़ार में थे कि उन्हें कोई बुलाए। वे लपकते हुए आए किन्तु किन्तु वायु और नैन्सी ने उन्हें अपने मध्य खड़ा नहीं होने दिया। मन मसोस कर उन्होंने दो हाशियों पर खड़े होकर अपनी फ़ोटो खिंचवाई।

मीता की ग़ैरहाज़िरी और मैक की सह्रदयता का फ़ायदा उठाते हुए, कई अन्य मेहमानों ने भी जिया के आसपास खड़े होकर फ़ोटोज़ खिंचवा लीं।

‘मैक, मीता को तो बुला लेते, फैमिली-फ़ोटो हो गयी और मीता नदारद है,’ नैन्सी को नेवले की तरह अपना सिर घुमाकर इधर-उधर देखते हुए राजीव की हंसी छूट गयी।

‘नैन्सी सलाद की प्लेट के बीच में सजाए गए आलू के पुतले सी लग रही है, मंजु,’ राजीव ने शरारतपूर्वक कहा तो मंजूषा के चहेरे पर भी एक गुस्ताख़ मुस्कराहट फ़ैल गयी।

‘ओह राजी, क्या कॉम्बिनेशन है! काली मिर्च सी गोल-गोल छोटी आँखें, महीन हरी मिर्च सी भंवे, गालों पर चुकंदर के रंग की रूज, होंठों पर काली गाजर के रंग की लिपस्टिक, पलकों पर फ़िरोज़ी मस्कारा और फ़िरोज़ी आईशैडो,’ मंजूषा ने जब प्यार से राजीव को ‘राजी’ कह कर पुकारा तो वह चौंक गया हालांकि यह परिपाटी उसने स्वयं चलाई थी जब कुछ ही क्षण पहले उसने मंजूषा को ‘मंजु’ के नाम से सम्बोधित किया था पर उसकी मंशा मंजूषा के लम्बे नाम को सिर्फ़ संक्षिप्त करना भर थी।

‘और नैन्सी का जूड़ा देखा तुमने, मंजूषा? अपने चार-फुटे क़द को बढ़ाने के लिए सिर के बिलकुल टॉप पर टिका है…,’ बिना अधिक समय गंवाए, राजीव ने अपनी गलती को सुधार लिया; किसी ने सुन लिया होता तो उसका मज़ाक उड़ाया जाता।

‘और वो आर्टिफीशियल फूल, जो गिठ-मुठिया के शिखर पर झंडे सा लहरा रहा है,’

‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ?’ राजीव को हरिवंशराय बच्चन की एक पंक्ति याद आ गयी। हालांकि मंजूषा को राजीव का आशय बिलकुल समझ नहीं आया था पर उसे मुस्कुराता हुआ देख वह भी हंसने लगी। दोनों को हंसता देख नैन्सी पलट कर उन्हीं की और चली आई; दोनों एकाएक चुप हो गए।

‘भई कुछ हम से भी तो शेयर कीजिए। राजीव कोई जोक सुना रहे थे क्या?’ नैन्सी नहीं जानती थी कि उनके मज़ाक का सबब वह खुद थी।

‘आपने आने में इतनी देर क्यों लगा दी, नैन्सी जीजी? वी मिस्ड यू,’ राजीव ने बात बदलते हुए पूछा।

‘महापुरुष ज़रा देर में ही तशरीफ लाते हैं,’ अपनी ठिगनी गर्दन को कुछ ऊंचा उठाते हुए नैन्सी ने मंजूषा की ओर कौतुहल से देखा।

‘यह मंजूषा हैं, कुलभूषण को तो आप जानती ही हैं, उसकी वाइफ़,’ राजीव ने परिचय दिया।

‘लीजिए आपसे भी कहीं बड़े महापुरुष आ पहुंचे, अपनी जूली के साथ,’ मंजूषा के मुंह में मानो किसी ने एक खट्टे संतरे की फांक रख दी हो; रस से उसका मुंह सरोबार था। नैन्सी का चेहरा लटक गया कि उसके हिस्से की तवज्जो बस इतनी भर थी।

‘अब तो बस ‘सुरूर साहब,’ ‘सुरूर साहब’ होगी; वो मेयर औफिस में एक ऊंची पोस्ट पर जो हैं,’ नैन्सी बता ही रही थी कि मीता, झेंपते हुए मकरंद को अपने पीछे लगभग खींचते हुए दरवाज़े पर जा पहुँची।

‘कम इन, कम इन, सुरूर साहब, मोस्ट वैल्कम। हेलो जूली, कम इन प्लीज़, दिस वे,’ सुरूर और जूली के क़दमों में बिछने को आतुर थी मीता; मैक की झेंप भी अपनी चरम सीमा पर थी। मीता ने सोचा कि सुरूर यदि खाली हाथ चला आया तो क्या हुआ? वह मेयर-ऑफिस से था और उससे भी बड़ी बात यह थी कि एक गोरी उसके साथ थी; ‘शेरा माँ तेरी सदा ई जय,’ मीता की पार्टी में शहर के लगभग सभी विशिष्टगण शामिल थे। क्या हुआ जो उसने विद्वज्जन और लेखकों को इस पार्टी में शामिल नहीं किया, जैसा कि राजीव ने सुझाया था। उसकी महंगी शराब ठिकाने लगाने और खाली-पीली बोर करने के सिवा वे और क्या कर सकते थे?

‘ऐ मैं तोसे कऊं, आपा, इनके मूं पै देखियो एक सिकन बी नाय है,’ जिया ने नाक सिकोड़ते हुए कहा। सारी भीड़, जो उन्हें घेरे खड़ी थी, एकाएक तितर बितर हो गयी थी।

‘लाहौलविलाकुव्वत। शर्मो-हया तो बाज़ वक्त लोग ताक पर रख कर आते हैं,’ आपा के झुमकों ने ज़ोर से हिल कर अपनी भी रजामंदी ज़ाहिर की और एक बार फिर शुरू हुआ ‘छि छि फू फू’ का सिलसिला, फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि इस बार निशाने पर थे सरूर और जूली। मंजूषा और सायरा को अब सब बिसार चुके थे।

‘इंशा अल्लाह, साथ ही रह रहे हैं, कोई गुनाह तो नहीं कर रहे,’ हसन से नहीं रहा गया, वह सुरूर का जिगरी दोस्त जो ठहरा।

‘लाहौलविलाकुव्वत मियां, हमें तो लगता है कि आप भी यही ग़ुल खिलायेंगे,’ आपा के झुमकों ने ज़ोरों से हिलकर हसन के गाल पर जैसे एक करारी चपत लगा दी। अपनी ज़ुल्फें सम्भालता हुआ वह वहां से झट खिसक लिया; कमर की लचक बता रही थी कि आपा का उसे सब के बीच यूं टोकना बिल्कुल बर्दाश्त नहीं हुआ था।

‘किसी की बीवी को मरा अपने घर बिठाल लेना मरा गुनाह नहीं तो और मरा क्या है? मरा आप मुझे बताइए?’ मोहिनी ने अपने हाथ नचाते हुए पूछा।

‘बिलकुल सही फ़र्माया आपने, मोहिनी बी, मर्दों के लिए तो और भी आसान हो गया, अब तो वे तीन बार तलाक़ कहने से भी निजात पा गये,’

‘पर आपा, शादी-शुदा औरतें जब खुद ही पराए मर्दों के साथ घूमने लगें तो किसे दोष दें?’ वायु भी जिया और आपा के पास आ बैठी।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, इन गोरियन को कौनो सरम नाय है,’ अपनी धोती का पल्लु मुंह में ठूंसते हुए जिया बोलीं।

‘गोरियों को मरा छोड़िए, जिया, अपनी ही छम्मक्छल्लियों की मरी करतूत देख लीजिए,’ मोहिनी का इशारा मंजूषा की ओर था जो इस वक्त राजीव से घनिष्टता से बतिया रही थी।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, मोईनी, इस कंट्री में क़ायदा कानून तो अब कछु बचा नाय,’

‘जिया, कायदा-क़ानून मरा क्या कर लेगा? मरा घूमो हाथ में हाथ डाले मरे सरे आम, दोनों शादीशुदा हैं,’

‘साले क़ायदे-कानून के नाम पर लोग दूसरों के मामलों में भैंचो टांग अड़ाने का साला मौका ढूंढते रहते हैं,’ दो ताज़े पैग्स चढ़ाने के बाद रंजीत की गालियों में जैसे बाढ़ आ गई थी।

‘…मैं तोसे कऊं, रंजीत, ग्यानी ध्यानी पंडितों ने सादी ब्याह के नेम धरम कछु सोच समज के ई बनाए होंगे, के नईं?’

‘इन्हीं साले पंडितों की वजह से ही तो साले हमारे समाज की भैंचो ये हालत हो गई है,’ रंजीत ने आपा की बात को बीच में ही काट दिया।

‘हय राम!’ जिया को मानो काटो तो खून नहीं; उन्होंने अपना पल्लु एक बार फिर अपने मुंह में ठूंस लिया।

‘लाहौलविलाकुव्वत, आपको तो इंशा अल्लाह यह भी नहीं मालूम, मियां, के नशे में आप बेजा फ़र्मा रहे हैं,’ आपा के झुमके ज़ोर-ज़ोर से हिलकर रंजीत के प्रति उनकी नफ़रत का इज़हार कर रहे थे। तभी अपनी मुंडी हिलाते हुए मोहन आपा के आगे आ खड़े हुए।

‘आपमें से कोई मुझे बता सकता है कि इण्डिया में मर्द आम तौर पर किसी ग़ैर की बीवी पर हाथ डालने की जुर्रत क्यों नहीं करते? ऐसा कैसे और क्योंकर संभव है?’ मेहमानों की ओर एक प्रश्न उछालते हुए मोहन ने अपनी दृष्टि चारों ओर दौड़ाई। जिया अपने मुंह-बोले बेटे को सस्नेह निहारने लगीं। मोहन को जब कोई जवाब नहीं मिला तो उन्होंने मेहमानों को एक मौक़ा और दिया।

‘बताइए, बताइए,’ मोहिनी ने पति को सगर्व देखा, जो आसाराम बापू की तरह मंद मंद मुस्कुरा रहे थे।

‘क्योंकि हमारा समाज टिका है सनातन धर्म पर,’ मोहन ने अपनी बात पूरी की। ग़लत कहा या सही, मोहिनी के पति ने कहा था; किसकी मजाल थी कि उनसे बहस करता? वे भूल गए थे कि रंजीत वहाँ खड़ा था, जिसे कमतर समझना मोहन की भारी भूल थी।

‘साली आपकी बीबी को तो सुरूर भगा के नहीं लाया जो भैंचो आपको तकलीफ़ हो रही है?’ रंजीत का ऊंचा तगड़ा किंतु नशीला शरीर कुछ अकड़ कर सीधा खड़े रहने के प्रयत्न में था।

‘साली ज़बान संभाल के बात कीजिए, रंजीत साहब,’ मोहन गुस्से में रंजीत की और बढ़ा।

‘मरा मुझे भगा ले जाने के लिए मुए को मरे सात जन्म तो लेने ही पड़ेंगे,’ मोहिनी ने हँसते हुए कहा और दोनों हाथ फैलाए पति और रंजीत के बीच में आ खड़ी हुई।

‘ऐ मैं तोसे कऊँ, मोईनी, सात जनम के बाद का तू चल देगी सरूर के संग, ही ही ही ही?’ जिया की उचकियों जैसी हंसी पर मेहमान हंसने लगे।

उसी समय जूली, जो मेहमानों से हेलो करने के लिए उधर आ निकली थी, उन्हें हंसता हुआ देख ठिठक गयी। उसे देखते ही सबको सांप सूंघ गया। जिया ने अपनी धोती का पल्लू मुंह में ठूंस लिया और आपा अपना पानदान खोलकर बैठ गईं।

‘जूली डियर, डोंट बौदर अबाउट देम। टेल मी वाट ड्रिंक वुड यू हैव?’ मीता बौखलाई हुई जूली की बांह पकड़ कर उसे एक ओर ले जाते हुए बोली। जूली ने एक मुसी-मुसाई फ्रॉक पहन रखी थी कि जैसे वह बिस्तर से उठकर सीधी चली आई हो जबकि सुरूर बड़े सलीक़े से तैयार होकर आए थे। उम्र में वह जूली से कहीं बड़े लग रहे थे, शायद इंदिरा गांधी जैसी सफ़ेद बालों की एक लट की वजह से।

‘फ़ोटोज़ लूं क्या मीता डार्लिंग?’ जेब में से कैमरा निकालते हुए मैक ने पूछा।

‘हाउ नाइज़ ऑफ यू, डार्लिंग,’ कहते हुए मीता सुरूर और जूली के बीच में खड़े होकर मुस्कुराने लगी।

‘मैक डार्लिंग, यू नो न वाट ड्रिंक सुरूर साहब लाइक्स,’ मीता ने अपनी बाईं आँख दबाते हुए पति से उन दोनों को बार की तरफ़ ले जाने के लिए आग्रह किया। जूली की कमर पर हाथ रखे सुरूर मकरंद के पीछे चल दिए, जो इस वक्त बाकायदा झेंप रहे थे क्योंकि सारे मेहमानों की नज़रें उनका पीछा कर रही थीं।

‘लाहौलविलाकुव्वत, मुआँ सरे आम मेम की कमर पे हाथ रखे है, शर्मों-लिहाज़ तो गया जहन्नुम में,’

‘जिया, मैं तो कैती हूँ के मीता को ऐसे लोगों को मरी पार्टी में बुलाने की मरी ज़रुरत क्या थी?’

‘भाइयों और बहनों, जिसका दंगा-फ़साद करने का इरादा हो, वो बाहर गार्डेन में चला जाए, प्लीज़,’ अपने दोनों हाथ ऊपर की ओर उठा कर गिरगिट बड़प्पन दिखाते हुए बोला। लगभग समाप्त हो चली रार को उसने एकाएक फिर भड़का दिया। मन में तो उसके लड्डू फूट रहे थे कि अब आएगा असली मज़ा इस पार्टी का।

‘लाहौलविलाकुव्वत, चलिए हसन मियां। हमसे तो भई ये बद्तमीज़ियाँ बर्दाश्त नहीं होतीं,’ पानदान संभाले आपा उठ खड़ी हुईं कि जैसे वह वहाँ से सचमुच चले ही जाना चाहतीं थीं।

‘ए मैं तोसे कऊं, आपा, तुम बी कैसी बात करो हो? नेक बैठो हियां म्हारे धोरे। तुम तो हमें एक और पान खिलाओ,’ जिया ने उन्हें खींच कर अपने पास बिठा लिया, मुंह बिचकाती हुई आपा बेमन से पान लगाने बैठ गईं। सरौते से छलिया कतरते उनकी निगाह इधर-उधर घूमती हुई जिस-तिस से पूछ रही थी कि तहज़ीब का ठेका क्या सिर्फ़ उन्होंने ही ले रखा था?

‘आपा और हसन जाएँगे तो हम भी नहीं ठहरने वाले,’ मोहन से बर्दाश्त नहीं हुआ; उनके बीच-बचाव के बगैर ही ख़तरा टला जा रहा था।

‘मिक भाई साहब, लेट अस नॉट डिस्ट्रोय मैकस पार्टी,’ मंजूषा कुछ ऐसे बोली कि जैसे वह शान्ति बरकरार रखना चाहती हो जबकि इस नाटक की निर्माता निर्देशक वह स्वयं थी।

‘मंजूषा, मैक को तो ये मरा अपना छोटा भाई मानते हैं, मरा हम क्यों डिस्ट्रोय करेंगे मरी इनकी पार्टी?’ मोहिनी ने हाथ नचाते हुए मंजूषा को आड़े हाथ लिया।

‘लाहौलविलाकुव्वत, मोहिनी बी, हमें भी क्या ज़रुरत है किसी के फटे में पाँव अड़ाने की?’ चारों ओर घूमती हुई उनकी नज़र के साथ-साथ आपा का सरौता तेज़ी से चलने लगा; वह अपने दुश्मनों को ढूंढ ढूंढ कर काट डालना चाहती थीं।

‘बिलकुल, आप ठीक कह रही हैं, आपा। जब मेज़बानों को ही कोई तकलीफ़ नहीं है तो हम कौन होते हैं शिकायत करने वाले?’ कंधे उचकाते हुए मोहन बोले।

‘मिक साहब, यह हमारा निजी मामला है पर फिर भी आपमें से किसी को हमारे सम्बंधों पर एतराज़ है तो हम यहाँ से चले जाते हैं,’ बियर का गिलास हाथ में थामें सुरूर मेहमानों के मध्य आकर बड़ी शालीनता से बोले। उनका दूसरा हाथ अब भी जूली की कमर पर था, जो लाल शराब पीते हुए सबके चेहरों को पढ़ने के प्रयत्न में थी, उसे समझ नहीं आ रहा था कि माजरा क्या था।

‘क..क..क..कोई कहीं नहीं जाएगा, आपा और ट..ट..ट..टयाल साहब की तरफ से म..म..मैं आपसे म..म..माफ़ी मांग लेता हूं,’ पसलियों में मीता की कोहनी चुभी तो हाथ जोड़ कर मैक झेंपते हुए वहाँ आ खड़े हुए।

‘मेरी तरफ़ से माफ़ी मांगने की कोई ज़रूरत नहीं है, मैक।’ जिया और आपा को अपनी हिमायत में सिर हिलाते देख, मोहन का भारी-भरकम शरीर कुछ और फैल गया।

‘मरी माफ़ी मांगे इनकी जूती, इन्होंने कुछ ग़लत कहा तो मरा कोई मुझे बताए?’ मोहिनी ने हाथ और आँखें नचा-नचा कर अपने आसपास जुटे मेहमानों को समर्थन के लिए ललकारा। मोहन के भारी-भरकम शरीर को लोग अब तक झगड़े रुकवाने के लिए काम में लाया करते थे किन्तु जब वह स्वयं ही बात बढ़ाने को आतुर हों तो क्या किया जा सकता था?

आंखों ही आंखों में मीता और मकरंद उनसे चुप रहने की विनय कर ही रहे थे कि रंजीत अपने क़दमों को साधता हुआ उनके पास आ खड़ा हुआ।

‘ये लोग भैंचो कभी नहीं सुधरेंगे। मेहमानों को इकट्ठा करके साली बुराईयां और चुगलियां करना ही इनके लिए साली पार्टी है,’ अपने बाएँ हाथ की एक उंगली से मेहमानों की तरफ संकेत करते हुए रंजीत ने कहा।

‘हय राम, मैं तोसे कऊं, जे कलजुग नईं तो और का है?’

‘लाहौलविलाकुव्वत! क़यामत का दिन बस अब दूर नहीं, जिया,’

‘आ शूँ जमानो आव्यो छे?’

‘छोड़ो न रंजीत, चलो ताश खेलते हैं,’ राजीव रंजीत को घसीट कर कंज़र्वेटरी में ले जाने का प्रयत्न कर रहा था, जहां इस घटना से बेखबर जोशी-सर एंड पार्टी तन्मयता से फ्लैश खेलने में व्यस्त थे।

‘जा यार, यहाँ से जा। जूली को साले रीजेन्ट्स पार्क में ले जा। कम से कम वहाँ भैंचो फूल और पत्ते तो साले ताने नहीं मारेंगे,’ नशे की हालत में भी रंजीत ने एक तीर छोड़ ही दिया जो मीता और मैक के दुर्भाग्यवश सही निशाने पर जा लगा। जूली के मुंह से लगे हुए शराब के गिलास को ज़बर्दस्ती हटा कर सुरूर ने मेज़ पर रख दिया।

‘गुड बाय मैक, मीता, थैंक्स फॉर एवरीथिंग,’ सुरूर ने जूली को उसकी जैकेट पकड़ाते हुए कहा।

‘जिगर का एक शेर है, तेरी महफ़िल तेरे जलवे फिर तकाज़ा क्या ज़रूर? ले उठा जाता हूँ ज़ालिम ले चला जाता हूँ मैं,’ कहते हुए हसन भी सुरूर और जूली के पीछे-पीछे हो लिया।

‘फॉर गौडस सेक, डोंट गो, जूली, प्लीज़ स्टॉप, सुरूर साहब, एट लीस्ट, खाना तो खाकर जाइए,’ उन दोनों की मिन्नत करने के साथ-साथ मीता मन ही मन माँ शेराँ वाली से प्रार्थना कर रही थी कम से कम उसके गिने चुने गोरे मेहमानों को रोके रखें; अन्यथा उसकी पार्टी का स्टैण्डर्ड गिर जाएगा।

‘मीता डार्लिंग, इ..इ..इनके लिए क..क..कुछ खाना ही प..प..पैक…,’ पति-पत्नी के लाख रोकने के बावजूद, सुरूर साहब जूली का हाथ थामें बाहर निकल गए।

‘लुक व्हाट यू हैव डन?’ मोहिनी और मोहन की ओर ग़ुस्से में देखती हुई मीता सुरूर और जूली के पीछे दौड़ी।

‘मरा शुक्र मनाओ कि आज कोई अपने बच्चों को नहीं लाया, वे यह सब देखते तो मरा उन पर कितना बुरा असर पड़ता?’ मोहिनी ने हठपूर्वक कहा।

‘बच्चे क्या मिट्टी के पुतले हैं? वो हमसे कहीं अधिक चंट और चुस्त हैं और फिर आजकल टीवी पर वो क्या कुछ नहीं देखते? सैक्स-एजूकेशन यहां दस साल के बच्चों को  दे दी जाती है,’ अपने ढलकते हुए पल्लु को सम्भालते हुए वायु बोली।

‘पिछले ही हफ्ते की तो बात है, चौदह साल के एक लड़के ने अपनी ही टीचर को रेप दिया…’ अपनी आंखें गोल-गोल घुमाती हुई नैन्सी ने अपनी बात बीच में ही छोड़ दी।

‘ब्रैडफोर्ड में तो एक छै साल के बच्चे ने, नैन्सी जीजी, ज़रा सी बात पर अपने ही माँ-बाप को जेल भिजवा दिया,’ अपने पल्ले को कंधे पर संभालती हुई वायु बोली। मकरंद की दोनों बहनों ने ठान ली थी कि वे मोहन और मोहिनी को सबक़ सिखा कर ही दम लेंगी।

‘हय राम, मैं तोसे कऊं, आपा, जे कलजुग नईं तो और का है?’

‘क़यामत है क़यामत, जिया,’

‘बहुत ही घ..घ..घटिया परिवारों से आते हैं ये ब..ब..बच्चे, घ..घ..घैट्टोज़ में रहने की व..व..वजह से इनकी स..स..सोहबत ग..ग..ग़ुंडे-ब..ब..बदमाशों से रहती है, क्यों इला जी?’ मकरंद ने क़रीब से गुज़रती हुई बाल-विशेषज्ञा इला से पूछा तो सारे चेहरे इला की ओर ही घूम गए।

‘मकरंद जी, यह एक बड़ा पेचीदा मसला है…’ इला इस बहस में नहीं पड़ना चाहती थी और अच्छा ही हुआ कि मोहिनी ने उसे बीच में ही टोक दिया।

‘मरा मसला तो बस इतना है, इला, कि आजकल के मां-बाप शाम से ही मरे पबों में जा बैठते हैं, इनकी मरी बला से बच्चे गंदी विडियो देखें, मरी सिगरेट पियें या मरी ड्रग्स लें। हमारे बच्चे भी मरे इन्हीं को देख-देखकर बिगड़ रहे हैं,’

‘तो वे करें भी क्या? सरकार पिछड़े इलाकों में बसे ग़रीब और कम पढ़े-लिखे लोगों को कोई मदद नहीं देती, मनोरंजन तो रहा एक तरफ, उनके बच्चों को पौष्टिक आहार तक नसीब नहीं होता…,’ न चाहते हुए भी इला इस बहस में कूद पड़ी।

‘मुझे याद है कि सन 1985 तक स्कूल में सभी बच्चों को दूध और दोपहर का पौष्टिक खाना मुफ़्त में मिला करता था। माँ-बाप को बच्चों के खाने-पीने की कोई परवाह नहीं थी। अब तो बच्चों को पैसे देकर भी टोस्ट एंड बीन्ज़ या तला हुआ चिकन खाने को मिलता है,’ सुमित बोले।

‘अरे मैं तोसे कउं, इल्ला, म्हारे टैम में कित्तों को फल दूध मिलै था? म्हारे बच्चे तो चोर डाकू नाय बन गए।’ जिया के तर्क में दम था।

‘जिया, बात इंगलैंड की हो रही है, भारत की नहीं। यहां इन ग़रीब युवाओं के मनोरंजन के साधन हैं चोरी, डकैती और चाकूबाज़ी और फिर जब इन्हें जेलों में ठूंस दिया जाता है तो वहां उन्हें ग़ुंडागिरी की पूरी ट्रेनिंग भी मिल जाती है। ऐसे वातावरण में पले बच्चों से हम क्या आशा रख सकते हैं?’

‘आजकल तो बच्चों को सेफ़ रखना ही इतना मुश्किल हो गया है कि डीसेंट लोग बच्चे पैदा करने में डर रहे हैं,’ नरेश ने कहा।

 

‘बिलकुल, फ़ेसबुक और ट्विट्टर की वजह से क्राइम्स दस गुना बढ़ गए हैं, बदमाश बच्चों को फेसबुक और ट्विट्टर के ज़रिए ग्रूम करते हैं,’ सुमित ने कहा।

 

‘अकेले एक मानचैस्टर में पुलिस ने 115 लोगों को ग्रूमिंग के लिए चार्ज किया था जबकि न जाने कितने पुलिस की गिरफ़्त से बच निकले होंगे,’

‘पुलिस क्या-क्या करे? सबके ई-मेल्स और फेसबुक एकाउंट्स का सर्वेलैंस क्या आसान है। पैरेंट्स को ही रिस्पौन्सिबल होना होगा,’ इला ने कहा।

‘शुक्र है कि इंडिया अभी इस गंदगी से बचा हुआ है,’

‘वहाँ तो मर्दों को बलात्कार से फुर्सत मिले तब न,’

‘दिल्ली में इतना बड़ा काण्ड हो गया, दुनिया दिल्ली को रेप-सिटी कह रही है पर आज भी इंडियन अधिकारी और पौलिटिशियंस अपनी गद्दियाँ संभाले बैठे हैं,’

‘इंग्लैण्ड में तो जिम्मी सैविल की डेथ के बाद भी पुलिस उसके दोस्तों और बीबीसी के अधिकारियों के पीछे पड़ी है,’

‘संसार में बलात्कार कहाँ नहीं होते? अपराधियों को पकड़ा जाता है, उन पर मुकदमें चलाए जाते हैं और जन-जीवन सामान्य रूप से चलता रहता है। दिल्ली में एक बलात्कार होता है तो पूरे इंडिया की लड़कियों को पर्दा ओढ़ा कर घर में कैद कर दिया जाता है,’ नरेश बोले।

‘तो क्या करें? जब पुलिस और सरकार से कोई उम्मीद न हो तो जनता को अपनी सुरक्षा के लिए ख़ुद ही क़दम उठाने होंगे,’

‘जब तक अपराधियों के हाथ पाँव काट कर सरेआम सूली पर नहीं लटकाया जाएगा, हालात बद से बदतर होते चले जाएंगे,’

‘अब और क्या बचा है होने को? इंडियन क्रिमिनल्स भी अब सेडिस्ट्स हो गए हैं, कैसी कैसी जघन्य हत्याएं सुनने में आ रही हैं कि रोंगटे खड़े हो जाते हैं,’

‘सैक्स-एडूकेशन के अभाव में यही होगा, लम्बे समय तक दबाई गई यौन इच्छाओं का भयंकर परिणाम होता है,’

‘कुछ भी हो, इस एक काण्ड ने औरत की तरक्की को पचास-साठ साल पीछे धकेल दिया है,’

‘मेरे कई फ्रैंड्स ने इंडिया जाना कैंसल कर दिया है,’ बुलबुल ने कहा

‘ऐ मैं तोसे कऊं, बुलबुल, ये सब टीवी और फिल्मों का किया धरा है।’

‘इंशा अल्लाह, जिया, लाख टके की एक बात फ़र्माई है आपने,’ आपा बोलीं।

‘भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि इंडिया में ‘ईस्ट-एंडर्स’ और ‘कोरोनेशन-स्ट्रीट’ जैसे सीरियल्स नहीं हैं जिन्हें यहाँ हर शाम पूरा का पूरा परिवार इकट्ठा बैठ कर देखता है। बाप का बेटी से और बहु का ससुर से ईश्क, पीडोफ़ाइल्स, लैस्बियन और ‘गे’ लोगों के सैक्स सीन्ज़, क्या नहीं दिखाया जाता यहां के चैनल्स पर?’

‘हय राम!’

‘आ शूँ जमानो आव्यो छे?’

‘लाहौलविलाकुव्वत, क़यामत का दिन अब दूर नहीं, जिया।’

‘मरे इंडिया के सीरियल्स कौन से अच्छे हैं, वहां भी अब मरा यही सब हो रहा है, पत्नी ने मरे पति को ज़हर दे दिया, सास ने बहु को मार डाला,’

‘अमेरिका में तो ऐसी-ऐसी वाएलैंट फ़िल्में बन रहीं हैं कि आपके रोंगटें खड़े हो जाएं, टॉर्चर ऐसी डीटेल में दिखाया जाता है कि…’

‘बड़े भाई, इन्हीं फ़िल्मों का असर है कि आज इंग्लैण्ड में सरेआम एक आदमी पर पेट्रोल छिड़क कर जला दिया जाता है, बाज़ार में एक बेक़सूर औरत का सिर धड़ से अलग कर दिया जाता है…,’

‘पीडोफ़ाइल्स और क्रिमनल्स को जेलों से जनता के बीच छोड़ दिया जाएगा तो यही होगा। हममें से कितनों को पता है कि हमारी बगल में कौन रह रहा है, क्या कर रहा है?’

‘लाहौलविलाकुव्वत, बेहद खौफ़नाक वक्तों से गुज़र रहे हैं हम लोग,’

‘ऐ मैं तोसे कऊं आपा, यई तो घोर कलजुग की निसानी है,’

‘आ शूँ जमानो आव्यो छे?’

‘सब चोर हैं चोर, ऊपर से लेकर नीचे तक।’

‘बैंकों को ही देख लो कैसी धांधली मचा रखी है। बजाय उन्हें सज़ा देने के, सरकार उन्हें सहायता दे रही है,’

‘ये सब भैंचो इन सबकी मिली भगत है। बैंकों के साले चेयरमैंज़ और प्रैज़ीडैंट्स बन कर इन साले पौलिटीशियंस ने ही भैन्चो बैंको को डुबोया और ऊपर से साले हम टैक्स-पेयर्स का पैसा भैन्चो हमारी ही सहायता करने के बहाने उन्हें दे दिया, वो भी हमसे साला बिना पूछे,’ रंजीत वापिस आ बैठा था और सचेत लग रहा था, सायरा की काली कॉफ़ी अपना असर दिखा रही थी।

‘बड़े भाई, हमारा वो पैसा भी तो डकार गए। जनता तो अब भी ग़रीब और बेघर है, बैंक्स मॉर्गेज देने को राज़ी नहीं हैं और किराए बढ़ते चले जा रहे हैं,’

‘जनता भी तो बेवकूफ़ है, इससे तो चुपचाप बैठे कर जुगाली करवा लो या फिर क्यू में खड़े होकर अख़बार पढ़वा लो।’

‘और वाट अबाउट मीडिया? दे आर नौट हेल्पिंग अस आईदर,’ मीता बोली, जो सुरूर और जूली को विदा करके काफ़ी देर में लौटी थी और कोई ख़ास बुरे मूड में भी नहीं थी।

‘वो भी तो सरकार के पिट्ठू हैं,’

‘बड़े भाई, ऐसी बात नहीं है, बीबीसी के बड़े-बड़े प्रेसेंटेर्स तक की ऐसी की तैसी कर दी उन्होंने। इंडिया में होते तो दे लेकर साफ़ छूट जाते,’

‘पर होगा क्या, हमारे आपके पैसों से सालों मुकदमें चले चलेंगे, कुरेद-कुरेद कर सच्चाई का पता लगाया जाएगा और परिणाम ढाक के वही तीन पात,’ मिश्रा जी बोले।

‘इंग्लैण्ड तो बस अब डूबने को है। मैं तो सुमित से कैती रैती हूं कि इण्डिया वापिस चलो, अबी बी क़ुछ नईं बिगड़ा है पर मेरी कोई सुने तब न,’ सुमित की तरफ़ देखते हुए वायु बोली, जो आराम से कन्जर्वेटरी में बैठे फ़्लैश खेल रहे थे।

‘इण्डिया में भी अब क्या बचा है, वायु, रोज दंगे फसाद, कर्फ्यू, हड़तालें, नब्बे प्रतिशत नम्बर लाकर भी बच्चों को अच्छे स्कूल्स और कौलेज्स में एडमिशन्स नहीं मिलते,’

‘और बच्चों को मरा पेट काट कर किसी तरह पढ़ा-लिखा भी दें तो उन्हें मरी नौकरियां नहीं मिलतीं,’

‘इंडिया में ब्राइब्स देकर कुछ भी कराया जा सकता है, मोहिनी, तबादले से लेकर किसी की ह्त्या तक,’

‘सब करप्ट हैं, ऊपर से लेकर नीचे तक,’

‘मायावती को ही देख लो, उसने अपने घर के बाहर ही हैलीपैड बनवा लिया है, कोई पूछे कि उसके पास इतना पैसा कहाँ से आया?

‘पौलिटिशियंस की नाक तले उसने लखनऊ और दिल्ली में अपनी और अपने रिश्तेदारों की मूर्तियाँ लगवा लीं, किसी से कुछ नहीं हुआ,’

‘हुआ कैसे नहीं, लोगों के शोर मचाने पर मूर्तियों पर गिलाफ चढ़ा दिए गए,’

‘जो मौक़ा मिलते ही उतार दिए जाएंगे,’

‘बड़ी स..स..सीधी सी बात है, हम ल..ल..लोगों के ल..ल..लायक नहीं रह गया है इ..इ..इन्डिया,’ घूम फिर कर बात वहीं आ पहुँची थी।

‘बेचारे अन्ना हज़ारे बैठे थे मरे अनशन पर, सोचा था कि हमारा इंडिया मरा सुधर जाएगा पर मरे पोलिटिशियंस और सरकार ने बेचारे का कैसा मरा उल्लू बनाया?’

‘अरे दूर क्यों जाते हो, अपने नैन्सी और नरेश से ही पूछ लो, ये लोग दो बार इंडिया जाकर ट्राइ कर चुके हैं। पूछो इनसे? दफ़्तरों के कितने चक्कर लगाए इन्होंने, अब तक इन्हें न गैस मिली न फ़ोन,’

‘ये ब्राइब देकर जो राज़ी नहीं थे। ख़ैर, हमने तो भई बहुत भुगत लिया और अब तो मैं डंके की चोट पर कहना चाहती हूं कि बच्चों को इन्डिया ले जाना उन पर ज़ुल्म ढाना है ज़ुल्म,’ नैन्सी ने अपनी गर्दन को ऊंचा उठाते हुए घोषणा की।

‘पर नैन्सी दीदी, चौहान साहब भी तो अपने बच्चों को इंडिया ले गए थे, वे तो भई बहुत ही अच्छे निकले,’ अपने पल्लू को कंधे पर सम्भालते हुए वायु बोली।

‘चौहांस की भी कोई लाइफ़ है? फ़िफ्टीन इयर्स से चौहान साहब यहां अकेले पड़े हैं, मिसेज़ चौहान और बच्चे इन्डिया में,’ आयशा बोली।

‘कमाई पौंड्स में और खर्चा रुपयों में, बैस्ट औफ़ बोथ वर्ड्स,’

‘ज़िन्दगी में पैसा ही तो सच कुछ नहीं होता, फ़ैमिली बड़ी…,’

‘सौ की बात एक बात, चिल्ड्रन को लायक बनाने के लिए सैक्रिफाइज़ देनी पड़ती है, आयशा। मार्क माई वर्ड, ओल्ड ऐज में इन्हीं के बच्चे विल लुक आफ्टर दैम।’ मीता ने मकरंद की ओर देखते हुए कहा, जो सिर और गर्दन हिला कर पत्नी का ज़ोरदार समर्थन कर रहे थे।

‘कहाँ भाभी जी, यहां के बच्चे तो मदर्स और फ़ादर्स-डे पर ग्रीटिंग-कार्ड भेज कर समझते हैं कि उन्हें ओबलाइज कर रहे हैं,’ रोनी सूरत घड़ियाल बोला।

‘हुन ते बच्च्यां नुं कार्ड्स बाई करन दी भी लोड़ नईं रई, ई-मेल्स जिंदाबाद,’

‘अमृत जी, यहाँ के बच्चों को फ़ुर्सत ही कहां मिलती है? हमारे ज़माने में पढ़ाई-लिखाई के सिवा करने को था ही क्या? अब टी.वी, विडियो गेमस, टेबलेट्स, क्लब्स, कौम्पेटीशंस और कंसर्ट्स; उन बेचारों को तो खाने-पीने और सोने की भी फ़ुर्सत नहीं है,’

‘ए मैं तोसे कऊं, म्हारे हरि और कमला का बी यई हाल है, आज सुबे से हमने उनकी सिकल बी नाय देखी,’ जिया ने शिकायत की तो मीता ने उन पर एक कठोर दृष्टि डाली; कम से कम बच्चों के नाम तो ठीक से लेंतीं और इस विषय को छेड़ने की उन्हें क्या आवश्यक्ता थी?

‘हां मीता, बच्चों को कहां छिपा रखा है भई?’ एक साथ कई मेहमानों ने हैरी और कैमिला से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की।

‘ए मैं तोसे कऊं, बऊ, हरि और कमला को थोड़े टैम के लई नीचे बुलाओ, सब से नेक जै राम जी की तो कल्लें,’

‘वाट टु डू? उनके ‘ए’ ओर ‘ओ’ लेवल्स के एग्ज़ाम्स चल रहे हैं। पुअर किडस, दे सो वांटेड टु मीट यू औल, यू नो,’

‘अरे भई मीता बाजी, एक आध घंटे के लिए तो उन्हें भी ब्रेक मिलना चाहिए न? उन्हें देखे हुए एक ज़माना बीत गया, बुलाइए न उन्हें नीचे,’ शमीम ज़िद पर अड़ गयी।

‘आज तो उनके मम्मी-पापा की वेडिंग-एनिवर्सरी है, मीता, उन्हें भी थोड़ी सी मौज-मस्ती करने दो,’ नैन्सी ने भी ज़ोर देकर कहा।

‘श्योर श्योर, मैक डार्लिंग, ज़रा आस्क देम टु कम डाउन थोड़ी देर के लिए, प्लीज़। यू नो, कैमिला को स्कूल से एक प्रॉजेक्ट मिला है, कार्नर शॉप्स और सुपर-मार्केटस के प्राईसेज़ कम्पेयर करने के लिए,’

‘अरे, तो वह कुलभूषण से क्यों नहीं मिली? ये तो एक चुटकी में उसे सब समझा देते,’ मंजूषा ने चुटकी बजाते हुए कहा पर मीता ने उसकी बात शायद सुनी ही नहीं; वह तो तिकड़में भिड़ा रही थी कि बच्चों को नीचे बुलाने से कैसे रोका जाए।

सिवा मीता के, कोई भी महिला-मेहमान मंजूषा से बात करने को राज़ी नहीं थी। असल में तो सायरा और मंजूषा दोनों ही महिला-मेहमानों के लिए एक ख़तरा बनी हुई थीं, न जाने कब किसका पति उनमें से एक पर फिसल जाए।

‘भाभी जी, आपके तो दोनों ही बच्चे बहुत मेहनती हैं, यू आर वेरी लक्की,’ गिरगिट ने बच्चों की बात फिर छेड़ दी।

‘येस, गौड इज़ ग्रेट। पुअर कैमिला प्रोजेक्ट को लेकर इतनी बिज़ी है कि वाट टु डू?’ मीता ने अपनी बात एक बार फिर दोहराई और मन ही मन गिरगिट को कोसा कि कमबख्त तभी बोलता है जब उसे चुप रहना चाहिए।

‘यहाँ के अध्यापक ऐशियन बच्चों को ऊल-जलूल बातों और उपक्रमों में उलझाकर पिछड़वा देते हैं ताकि गोरे बच्चे क्लास में आगे रहें,’ मिश्रा जी एकाएक बोले।

‘आप ठीक कह रहे हैं, मिसरा जी, हमारी बुलबुल जब ‘ओ’ लेवल्स कर रही थी तो उसकी टीचर ने उसे मैथस के लोअर-लेवेल में बैठा दिया जबकि वह मैथस में ब्रिलिएंट थी। नरेश ने जब कम्प्लेन की तो बिलकुल आख़िरी वक्त पर उसकी प्लेसमेंट अप्प-लैवल में कर दी गयी। अब आप ही बताइए कि दो हफ़्तों में बच्ची कितनी तैय्यारी कर सकती थी?’

‘और जब उसे मैथ्स में ‘सी’ मिला तो कहने लगे कि देखा हमने इसे लोअर-लेवेल में ठीक ही प्लेस किया था,’ नरेश भुनभुनाए।

‘ये सब इन कपटी गोरों की चालें हैं। हम में से कितनों को पता है कि स्कूल्स में रियली होता क्या है?’ ईज़ी-चेयर पर अपने को ठीक से जमाते हुए मोहन ने नरेश का समर्थन किया।

‘जब साले पैरेंट्स से स्कूल के भैन्चो एडमिनिस्ट्रेशन में जुड़ने को कहा जाता है तो साला कोई जाता नहीं फिर साली शिकायत करते हैं कि स्कूल्स में भैन्चो होता क्या है?’ रंजीत जैसे सोते से जाग उठा था।

‘मीटिंग्स में जाकर क्या भाड़ झोंकें, रंजीत साहब? टीचर्स बच्चों की तारीफ़ों के पुल बांधते रहते हैं; रिपोर्ट्स में हमेशा ‘वैरी गुड’, ’एक्सेप्शनल’ और ‘ब्रिलिएंट’लिखते हैं और जब रिज़ल्ट आता है तो उन्हें ‘बी’या ‘सी’मिलता है, पैरेंट्स इतने कन्फ्यूज़ड हो जाते हैं कि…’

‘रंजीत जी, आप तो ब्रेंट-काउन्सिल की एडवाइज़री में भी हैं, आप ही बताइए कि यह घोटाला है क्या?’

‘सारा साला घोटाला आप लोगों के भैन्चो दिमाग़ों में है, आजकल ढेरों एशियन बच्चे भैन्चो एग्ज़ाम्स में टॉप कर रहे हैं, वे साले क्या टीचर्स के साले सगे हैं?’

‘टैगोर ने एक बार कहा था, और कितना सही कहा था कि उच्चतम शिक्षा वह है जो हमें महज जानकारी ही नहीं देती बल्कि बच्चों को सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ सद्भाव सिखाती है, मिश्राजी बोल उठे।

‘आप सद्भाव की बात कर रहे हैं, मिश्रा जी, यहाँ तो टीचर्स अपनी जान ख़तरे में डाल कर पढ़ाते हैं।’

‘लन्दन और ब्रैडफर्ड के कुछ इलाके तो सचमुच ख़तरनाक हैं।’

‘और जहां तक सिलेबस की बात है, जिस सिलेबस को टोरीज़ पसंद करते है, उसी सिलेबस को लेबर पार्टी ख़ारिज कर देती है,’

‘आप दो मुख़्तलिफ़ पार्टीज़ की बात कर रहे हैं, यहाँ तो एक ही पार्टी के अन्दर कमाल का विरोधाभास है, एक तरफ सरकार विदेशी छात्रों को ब्रिटेन छोड़ कर चले जाने का नोटिस दे रही है तो दूसरी ओर बौरिस जॉन्सन दुनिया भर के स्टुडेंट्स को यहाँ आकर पढ़ने का न्योता देता फिर रहा है,’

‘विदेशी छात्रों के बल पर ही तो इनके स्कूल और यूनिवर्सिटियां चल रही  हैं,’

तभी गिरगिट, जो ताज़ी हवा खाने के बहाने बाहर चला गया था, घर में वापिस लौटा और अपने हाथ हवा में लहराते हुए ऊंची आवाज़ में चिल्लाया।

‘बामुलाहिज़ा, होशियार, अब आपके सामने एक ख़ास जोड़ा तशरीफ़ ला रहा है। मीता भाभी, अगर आपने सब से ज़्यादा देर से आने वाले मेहमानों के लिए कोई एवार्ड रखा है तो जल्दी से लेकर दरवाज़े पर आइए,’

मकरंद का हाथ खींचती हुई मीता द्वार की ओर लपकी कि शायद लास-एन्जेलस से उसके नन्द-नंदोई, वर्षा और जुगल, आ पहुंचे थे। मेहमानों के लिए भी यह विषयांतर ताज़ी हवा का एक झोंका साबित हुआ। उनके सिर मियर-कैटस की तरह दाएं-बाएँ घुमाने लगे।

‘हेलो सुरभि, तो तुझे समय मिल गया आने का? हेलो सुरेन्द्र, हाउ आर यू?’ अपनी निराशा छिपाते हुए मीता ने कृत्रिम शिकायत के स्वर में अपनी सहेली और उसके पति का स्वागत किया। सुरेन्द्र के हाथ में एक सस्ता सा गुलदस्ता मीता देख ही चुकी थी, जो सेंस्बरीज़ में शाम के वक्त एक तिहाई दामों पर मिल जाता है; सोचा होगा कि देर में पहुंचेंगे तो उस पर किसी का ध्यान नहीं जाएगा।

‘मीता, मैक, शादी की सालगिरह तुम्हें बहुत बहुत मुबारक हो,’ सुरभि ने मैक और मीता को बारी-बारी चूमते हुए कहा। सुरेन्द्र ने झेंपते हुए गुलदस्ता मीता को चुपचाप थमा दिया। काश कि वह जानता कि गिरगिट उनके आगमन की ऐसी ज़ोर-शोर से घोषणा करेगा तो न केवल वह कोई अच्छा सा उपहार लेकर आता, ठीक से ढंग के कपड़े पहन कर भी आता।

‘मीता, तुझे तो पता ही है न कि सोनिया के ‘ए’ लेवल के एग्ज़ाम्स चल रहे हैं। सुरेंद्र उसे पढ़ाने क्या बैठे कि समय का ध्यान ही नहीं रहा। सोनिया को इन्होंने बस एक घंटे का ब्रेक दिया है, हैं न सुरेन्द्र?’

‘लोगों ने ब्रिटिश नागरिकता तो झटपट क़ुबूल कर ली पर उनसे अब तक समय की पाबंदी नहीं सीख पाए।’ सुमित बोला।

‘दे आर वेरी स्मार्ट एंड प्रैक्टिकल, सुमित, समय पर पहुँच कर हमारी तरह बोर तो नहीं हुए,’

‘मियाँ-बीवी ने मैचिंग जॉगिंग-सूट्स पहने रखे हैं, हमारी तरह फॉर्मल कपड़ों में परेशान तो नहीं हो रहे,’ वायु फुसफुसाई।

‘गुड आइडिया, मैं भी अपनी अगली पार्टी की ड्रेस-थीम स्विमिंग-कॉस्ट्यूम्स रखूंगा, कैसा रहेगा, सुमित?’ राजीव ने पूछा।

‘मुझे लगता है, राजीव, तुम्हारी पार्टी में तौलिया लपेटे मर्द ही पहुंचेगे,’ वायु बोली।

‘क्यों, लन्दन में बिक्नीज़ का अकाल पड़ गया है क्या?’ मंजूषा ने हँसते हुए पूछा। उन्हें हंसी-मज़ाक करते हुए देख मीता जान गयी कि वे सब सुरभि-सुरेन्द्र के जॉगिंग सूट्स और फूलों का मज़ाक उड़ा रहे थे।

‘लोगों की इमैजिनेशन पर क्या पिस्सू पड़ गए हैं, मैक डार्लिंग?  एक गूगल-सर्च से ही ढेर सारे आइडियाज़ मिल जाते।’ मीता ने झुंझलाते हुए पति से पूछा

‘म..म..मीता डार्लिंग, व..व..वाट ड..ड..डिड यू एक्स्पेक्ट? यू.के. में र..र..रिसेशन चल र..र..रहा है,’ मकरंद की झेंप में समझदारी का मिश्रण था।

‘आई डिडन्ट नो, मैक डार्लिंग, के इंग्लैण्ड की इकॉनमी इतनी डाउन है,’ मेहमानों में दिखावटी मुस्कराहट बांटती हुई मीता फुसफुसाई और बिना ‘थैंक-यू’ कहे गुलदस्ता लूसी की ट्रे में रख दिया जो वहाँ सॉफ्ट-ड्रिंक्स लेकर खड़ी थी। लूसी को निर्देश दिया गया था कि जब भी कोई नया मेहमान घर में घुसे, वह सब काम छोड़ कर मीता के पीछे आकर खड़ी हो जाए। उपहार ग्रहण करने के पश्चात, चूमा-चाटी और धन्यवाद ज्ञापन के दौरान, लूसी को वह उपहार जल्दी से जल्दी ऊपर शयन-कक्ष में पहुंचा कर वापिस आना होगा, नहीं तो मेहमानों के तांते से निबटना मुश्किल हो जाएगा। फिर, भीड़ में उपहारों का इधर उधर हो जाना भी संभव था। मीता की आशा के विपरीत, उपहार तो कुछ ऐसे ख़ास आए नहीं थे, निरे फूल ही फूल थे, जिनका अचार भी तो नहीं डाला जा सकता। मेहमान एक बार फिर अपने-अपने गुटों में लौट कर संसार के अहम मुद्दों पर बहस करने लगे।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, सूरबी, नेक इदर तो आ, तूने इत्ती देर कहाँ कर दी?’ जिया की एक ही हांक पर सुरभि और सुरेन्द्र मन ही मन शुक्र मनाते हुए उन्हीं के पास जाकर बैठ गए।

‘जय राम जी की, जिया, आप तो जानती ही हैं कि बच्चों के इम्तहान चल रहे हैं और फिर हम दोनों इतवार को व्रत रखते हैं, सोचा कि व्रत खोल कर ही आएं,’ सुरभि ने जिया को गले लगाकर चूमा ही था कि आपा भी आ गईं, सुरभि को उन्हें भी चूम कर निहाल करना पड़ा।

‘मैं तोसे कऊं, सूरबी, म्हारे हियाँ दो दो काम वालियां बेकार में आगे पीछे डोल रई हैं, तुमारे लिए बरत का खाना बनाय देतीं तो का इनके हाथ पैर घिस जाते? वइसे, इतवार के बरत में गुड़ और दलिया ई तो खाया जावे है, के नईं?’

‘जिया, भई हिन्दुओं के व्रत भी बड़े आसान होते हैं, सूरज ढला भी नईं के खाना पीना शुरू, हमारे यहाँ तो रमज़ान के दिनों में पानी पीना भी हराम है,’ आपा अपनी टांग अड़ाए बगैर कैसे बाज़ आतीं?

‘मैं तोसे कऊं, आपा, तुमारे रोज़े कौन से मुस्किल होवे हैं? सुबै सुबै पेट बर के सैरी (सहरी), इफ्तार के बाद सैरी, फेर…,’ जिया का करारा जवाब सुनकर आपा ने वहाँ से उठ जाने में ही अपनी खैर समझी।

‘रोज़े खुलने पर मुसलमान लोग खजूर से लेकर रोड़े-खरोड़े और तीतर बटेर से लेकर मुर्ग-मछली तक कुछ नहीं छोड़ते,’ नरेश बोले।

‘तुम बिलकुल ठीक कह रहे हो, नरेश, तभी तो रमज़ान के दिनों में बीमार मुसलमानों से हॉस्पिटलस भरे रहते हैं,’ सुमित ने अपनी सम्मति दी।

‘ख़ाली पेट को एक दम से इतना भर लेंगे तो और क्या होगा?’

‘सारा दिन पानी न पीने से मामला और भी उलझ जाता है,…’

जिया ने हाथ के इशारे से अपने दामादों से चुप हो जाने का इशारा किया क्योंकि वह आपा को नाराज़ नहीं करना चाहती थीं, जो वापिस आ चुकी थीं।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, सूरबी, पुस्पा मौसी बता रई थी के तुम लोग पेरिस गूमने गए थे,’

‘बच्चियां फ्रेंच पढ़ रही हैं न, जिया, हमने सोचा कि फ्रांस जाएंगे तो उनका एक तरह से टेस्ट हो जाएगा,’

‘ऐ मैं तोसे कऊं, सूरबी, बच्चियन को आइ-फिलटर बी लेके गयी के नाय?’ जिया ने जिज्ञासावश पूछा।

‘हां जिया, आइफ़िल-टौवर क्रिस्मस की लाइटस में ऐसी जगमगा रही थी कि बस पूछिए नहीं, हैं न सुरेन्द्र?’ सुरेन्द्र ने स्वीकृति में अपना सिर हिला दिया।

‘और वो लूबर? मां डोना की पैन्टिंग?’ ताज-टूर्स द्वारा प्रायोजित ओवर-सिक्सटी के एक ग्रुप में जिया और पुष्पा मौसी अभी पिछले ही साल पैरिस घूम कर आई थीं।

‘सुरभि, डिड दि किडस प्रैक्टिस देयर फ़्रेंच?’ मीता ने जिया की बात काटते हुए पूछा ताकि जिया कहीं और बेवकूफ़ी भरे प्रश्न न पूछ बैठें।

‘हम तो वहां पहुंचते ही इतना परेशान हुए कि सुरेन्द्र कहने लगे कि बस अभी वापिस लन्दन चलो, हैं न सुरेन्द्र?’ एकाएक सुरभि परेशान लगने लगी।

‘लाहौलविलाकुव्वत, भई ऐसा क्या हुआ, सुरबी बीबी?’

‘ट्रेन से उतर कर हमने कम से कम दस लोगों से पूछा कि हमें होटल का रास्ता बता दें पर कोई जवाब देकर राज़ी नहीं था, हैं न सुरेन्द्र?’ बजाय ‘हाँ’ में सिर हिलाने के सुरेन्द्र घूर रहा था करन को, जो सुरभि को देखते ही जिया के पास आ बैठा था।

‘हेलो सुरभि, कैसी हो? बच्चियां कैसी हैं?’ करन ने धीरे से पूछा किन्तु सुरभि को तो करन की ओर देखना भी गवारा न था।

‘फ्रांस में अंग्रेज़ी बोलो तो लोग चिढ़ जाते हैं,’

‘लाहौलविलाकुव्वत, जिसे फ्रांसीसी जुबान न आती हो तो वो क्या करे?’

‘ऐ मैं तोसे कऊं, सूरबी, वहाँ बच्चियन की भासा काम नाय आई के?’

‘उन लोगों का फ्रैंच एक्सैन्ट बहुत ही काम्पलिकेटड था, जिया। न किसी को इनकी फ्रैंच समझ आई और न ही उनकी फ़ैंच इनके पल्ले पड़ी, हैं न सुरेन्द्र?’

‘इसमें बच्चियों का क्या कुसूर, सुरभि? यू नो, मैंने भी स्कूल में फ्रेंच सीखी थी, मेरी ज़ुबान कम्बख्त पलट कर ही नहीं दी, फ्रेंच लैंगुएज है ही ऐसी।’ सुरेंद्र की जगह करन ने जवाब दिया।

‘बड़े भाई, हिंदी जानने वाले विदेशी भी जब भारत जाते हैं तो यही कहते हैं उन्हें इंडियंस का एक्सैन्ट समझने में मुश्किल होती है,’

‘इंडिया में तो हर चार कोस पर पानी और आठ कोस पर बोली बदल जाती है,’

‘पर कम से कम इंडिया में आप किसी एक से रास्ता पूछिए, दस जने दौड़े आएँगे और चाहे ग़लत-सलत ही बताएं पर रास्ता बताने को सभी तैयार मिलेंगे,’

‘मरी फ्रैंच सीखने का फिर मरा फ़ायदा क्या हुआ?’ मोहिनी ने झल्लाते हुए पूछा।

‘साला एक बार पैरिस जाने से तो फ्रेंच आने से रही, तभी तो साले स्कूल वाले स्टुडैंटस को हर साल भैन्चो प्रैक्टिस के लिए फ़्रांस भेजते हैं,’ खुंदक भरी आवाज़ में रंजीत बोला। मोहिनी अपने दांत पीस कर रह गयी।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, सूरबी, किसी इन्डियन टोर के संग जाती तो तुम लोगन को कोई पिराबलम नाय होती; हिंदी अउर गुजराती दोनों भासाओं में…,’

‘अरे, कोई सुरभि को भी तो अपनी बात पूरी कर लेने दो,’ करन ने झल्ला कर कहा। सुरभि ने सुरेन्द्र की ओर इस आशय से देखा कि बात की बाग़डोर अब उसे संभाल लेनी चाहिए किन्तु वह ख़ामोश रहा।

‘लाहौलविलाकुव्वत, हम तो भई ऐसी कंट्री में कभी कदम भी न रखें,’

‘सुरभि, बच्चियों को तुम मेंडेरिन, स्पैनिश या जर्मन सिखाओ तो वे ज़्यादा फ़ायदे में रहेंगी,’ सुमित ने सलाह दी।

‘बीबी, हम तो जर्मनी गए थे, हमारी फूफी रहती है न वहाँ कोलोन में। ऐसा रख-रखाव के क्या बताएं। आप कोई ग़लत कदम उठा लीजिए तो जब तक पुलिस न आ जाए, वहां का एक बच्चा भी आपका हाथ थामें खड़ा रहेगा। और एक मज़े की बात बताएं आपको, जिया, शनिश्चर के अलावा वहाँ आप कपड़े धोकर बालकनी में नहीं सुखा सकतीं, आपके घर में फट सरकारी नोटिस आ जाएगा,’

‘हय राम, हम तो देखियो अपनी बंडी-चड्डी हर सुबै धोवे हैं…,’ जिया फुसफुसाईं।

‘जो लोग सैटरडेज़ को काम करते हैं, वो तो बेचारे गए काम से,’

‘वैसे जर्मन लोग हैं बहौत भले। एक दफे हम ग़लत जगह से सड़क पार करने लगे तो एक ड्राईवर हमारे लिए लारी रोककर खड़ा हो गया,’

‘वहां इंडियंस बहुत कम हैं न, इसलिए हमारी थोड़ी बहुत इज़्ज़त बाक़ी है,’

‘आबादी तो भई फ़्रांस की भी कौन सी ज़ियादा है,’

‘ऐसा मरा बर्ताव करेंगे तो मरा कौन जाएगा वहां?’

‘दे डोन्ट वांट फ़ौरनर्स, फ्रेंच तो अंग्रेजों से हेट करते हैं,’ मीता ने बताया।

‘लाहौलविलाकुवात, गोरे होकर गोरों से नफ़रत?’

‘तो अंग्रेजों की ही कौन इज़्ज़त करता है? किसी भी कन्टरी में चले जाओ, सभी अंग्रेज़ों का मज़ाक उड़ाते हैं। अपनी ढपली अपने राग वाली बात है, कोई सुने न सुने, बजाते रहो,’ नैन्सी बोली।

‘अंग्रेज़ तो अपने को ऐक्सैपश्नल समझते हैं, पूरे यूरोप ने यूरोज़ ऐक्सैप्ट कर लिए बट फ़ौर इंग्लैंड…’

‘अरे यूरोज़ को छोड़िए, मीता जी, सारे संसार में किलोग्राम और किलोमीटर्स चल रहे हैं पर ये लोग अब तक पाउंडस और मील के ज़माने में रह रहे हैं,’

‘तभी तो पाउंडस हमेशा स्ट्रौंग रहता है,’

‘वैसे सरकार ने तो कोशिश की थी पर बहुत से अंग्रेजों ने अपनी दुकानों में पाउंडस-बोर्ड्स हटाने से साफ़ इंकार कर दिया,’

‘बड़े भाई, इस लड़ाई में तो हमारे सुमित साहब भी उस बूचर-बरिस्फ़र के साथ खड़े थे, मैंने उनकी तस्वीरें लोकल पेपर्स में देखी थी,’ गिरगिट ने वर्मा साहब के कंधे दबाते हुए कहा।

‘वर्मा साहब ने ख़ूब नारे लगवाए थे के सरकार पहले सड़कों के पट्ट बदले, फिर दुकानदारों से कहे कि सामान पर किलोग्राम्स और लीटर्स के पट्ट लगाए। हमारे पास तो पेपर-कटिंग्स, फ़ोटोज़ और डाक्यूमेंट्स की एक मोटी फ़ाइल है,’ अपना पल्ला संभालते हुए वायु ने बड़े जोश से बताया।

‘प्लीज़ वायु जी, क्या आप मुझे वो फ़ाइल दिखा सकती हैं?’ गिरगिट गिड़गिड़ाया।

‘औफ़ कोर्स, जब आप चाहें,’ वायु को क्या पता था कि गिरगिट को तो सिर्फ वायु के घर का पता चाहिए था; मुफ़्त में चाय-नाश्ते और भोजन के लिए; वो भी कई कई बार।

‘हाउ अबाउट दिस सन्डे?’ गिरगिट यह मौक़ा हाथ से जाने नहीं देना चाहता था। सुमित ने वायु से गिरगिट को टाल देने का इशारा किया।

‘क्यों नहीं, राजेश भाई, पर आप तो जानते ही हैं, आजकल बच्चों के इम्तिहान चल रहे हैं,’

‘ठीक है, जब भी आप कहेंगी हाज़िर हो जाऊंगा,’ यकायक गिरगिट को एक और युक्ति सूझी, ‘बड़े भाई, अपनी नैक्स्ट प्रोटेस्ट में आप मुझे ज़रूर शामिल कीजिएगा, जब और जिस जगह आप कहेंगे मैं नारे लगाने पहुंच जाऊंगा। इस बार आपके साथ मेरी फ़ोटो ज़रूर आनी चाहिए अखबार में।’ गिरगिट अब सुमित के पीछे पड़ गया, जो लेबर पार्टी के सक्रीय कार्यकर्ता थे।

‘सुमित भाई, यह तो हमें मानना ही पड़ेगा कि रिडन्डैनसी के बाद, यू फाउंड ए परपज़ टु योर लाइफ़, आपकी जगह कोई और होता तो एम्प्लॉयमेंट बेनेफिट लेकर घर में बैठ जाता।’ गिरगिट ने ताली बजाते हुए सुमित की तारीफ़ की, कुछ एक तालियाँ और सुनाई दीं।

‘मरा ब्रिटिश टेलीकॉम कम्प्यूटराइज़्ड क्या हुआ, हजारों लोग मरे बेकार हो गए,’ इसके पहले कि सुमित तारीफ़ के लिए लोगों को धन्यवाद देता, मोहिनी बीच में कूद पड़ी।

‘इसीलिए तो चारों और जेबक़तरों की तादाद इतनी बढ़ गई है,’ मोहन बोले।

‘अरे, पिछले हफ्ते की ही तो बात है, मैं ऑक्स्फ़र्ड स्टेशन से बाहर निकली ही थी कि एक काला लड़का मेरे हाथ से मोबाइल फ़ोन छीन कर भाग गया, मुश्किल से नौ दस साल का होगा,’ नैन्सी ने कहा।

‘शुक्र है, नैन्सी, कि आपको कोई चोट-वोट नहीं आई, आज कल तो कुछ भी पॉसिबल है,’

‘मैंने मैट्रो में पढ़ा था कि इंग्लैण्ड में पंद्रह सौ लोग हिंसा के रोज़ शिकार होते हैं।’

‘ज़रूर होते होंगे साहब, संसार में चालीस बिलियन पौंउन्डस के हथियारों का लीगल धंधा होता है…,’ नरेश बोले।

‘बड़े भाई, नाजायज़ धंधे को छोड़ दें तो भी बन्दूक की दो-दो गोलियां हम सब के लिए हर साल बनाई जाती हैं’

‘लाहौलविलाकुव्वत, अल्लाह का हम पर करम ही होगा के ऐसे हालात में भी हमारी जानें सलामत है,’

‘मैं तोसे कऊं, आपा, अब तो हमें इकल्ले सड़क पर निकलने में बी डर लागै है,’

‘जिया, इन्हीं वजहों की बदौलत लोगबाग़ इस कंट्री को अपना वतन नहीं क़ुबूल कर पाते,’

‘तो मरा कैसे करें? एक तो मरी बेरोज़गारी ऊपर से कनपटी पर मरा तमंचा…’

‘ये गोरों की बस एक चाल है। नकली बेरोज़गारी दिखा कर ये लोग हमें वापिस भेज देना चाहते हैं।’ मोहन ने जोड़ा।

‘आप ठीक कह रहे हैं, मिक, काउन्सिल के घरों में रहने वालों को बीस-बीस हजार पाउन्डस दिये जा रहे हैं कि वे अपने देश लौट जाएं और वहाँ जाकर घर खरीद लें,’ नरेश ने बताया तो मोहन और मोहिनी ने अपने सिर ज़ोर-ज़ोर से हिला कर उनका समर्थन किया।

‘हमें काउंसिल्स की इस स्ट्रेटेजी विरोध करना चाहिए। बीस हज़ार पाउन्ड्स के लालच में जो भोले-भाले लोग अपना घर-बार छोड़ कर जा रहे हैं, उन्हें सावधान करना हमारा फ़र्ज़ है,’ ज़ाहिर था कि सुमित को सरकार को चुनौती देने के लिए एक नया मुद्दा मिल गया था।

‘बिलकुल बड़े भाई, इस पौलिसी के खिलाफ़ हमें वेस्टमिनिस्टर के सामने धरने पर बैठ जाना चाहिए।’ गिरगिट को आशा नहीं थी कि उसकी मंशा इतनी जल्दी पूरी हो जाएगी, उसके नीरस जीवन में बहार बस आने ही वाली थी। एक बार राजनीति में आ गया तो दसियों युवतियां उसके आगे पीछे घूमेंगी, जय हो सुमित वर्मा की।

‘मरा देखा जाए तो बीस हज़ार पाउन्डस मरे होते ही कितने हैं, मरे इतने पैसों में तो इंडिया के मरे एक थर्ड-क्लास शहर में एक छोटा सा घर भी नहीं खरीदा जा सकता,’

‘मोहिनी भाभी, मुद्दा बीस हज़ार पाउन्डस का नहीं, एथिक्स का है…,’ नरेश ने कहा।

‘एथिक्स को मारो गोली, यह खेल गहरी कूटनीति का है, इनके निशाने पर वे ग़रीब लोग हैं, जिन्हें बीस हज़ार पाउन्ड्स देकर निजात पाई जा सकती है,’ सुमित ने नरेश की बात काट दी।

‘जी हाँ, एक तरफ़ वे ऐसे ग़रीब और कम पढ़े-लिखे लोगों को वापिस भेज देना चाहते हैं, जिनकी अब उन्हें ज़रुरत नहीं रही और उनकी जगह पर वे लाएंगे हमारे डॉक्टर्स, इन्जीनियर्स और विद्वान्…।’ मिश्रा जी ने कहा।

‘हाउ क्लैवर!’ मीता बोली।

‘अब इन्हें खून-पसीना बहाने वाले मज़दूरों की ज़रुरत नहीं रही। खुद चुकीं इनकी सुरंगें और तैयार हो चुके इनके अंडर-ग्राउंड स्टेशंस। अब इन्हें मज़बूत शरीर नहीं, हमारे ब्रिल्लिएंट दिमाग़ चाहिएं।’ सुमित को जोश आ गया।

‘इंडिया का ब्रेन खुलेआम चूसा जा रहा है, कर लीजिए आप क्या कर सकते हैं,’ मोहन बोले।

‘इंडियंस की अक्ल क्या मरी घास चरने गयी है? उन्हें यहाँ आने से मरा साफ़ इन्कार कर देना चाहिए,’

‘अगर भारत ही उन्हें टके सेर घास भी नहीं डालेगा तो वे विदेश नहीं जाएंगे तो क्या करेंगे?’

‘पहले तो ये हमारा देश लूट-खसोट लाए और अब हमारा ब्रेन-ड्रेन करने पर तुले हैं,’ मोहन बोले।

‘फर्स्ट थिंग्स फर्स्ट, सुमित जी, सबसे पहले तो आप लोगों को इस बीस हज़ार वाले लालच के बारे में समझाइए,’

‘सुमित जी, हम तो यहाँ से आज जाने को तैयार हैं,’ मोहिनी समेत सारे मेहमान हैरानी से मोहन की शक्ल देखने लगे; जिन्होंने एकाएक बड़े ड्रामाई अंदाज़ में पैंतरा बदला था। मोहिनी भी अवाक खड़ी उन्हें निहार रही थी।

‘जी हाँ, हम जाने को तैयार हैं, अभी, इसी वक्त; एक कंडीशन, बस एक कंडीशन पर,’ मोहन की ‘कंडीशन’ वाली बात सुन कर मोहिनी की जान में जान आई।

‘कंडीशन यह है के भारत से ये गोरे जो भी लूट-खसोट कर लाए थे, सब हमें वापिस कर दें तो हम आज चले जाएंगे,’ मोहिनी, गिरगिट और घड़ियाल ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ पीटने लगे; मोहन के शरीर ने एकाएक फैलना शुरू कर दिया; वह आसाराम बापू की तरह मंद-मंद मुस्कुराने लगे।

‘भैन्चो, हम लोग क्या कम लूट-खसोट रहे हैं इन्हें? साले घर बैठे बोगस बेनेफ़िटस ले रहे हैं, किसी के साले घुटने बेकार हैं, तो किसी की भैन्चो कमर में परमानेंट दर्द। हज़ारों का प्राइवेट धंधा करते हैं पर साला टैक्स के नाम पर ज़ीरो अंडा,’ इसके पहले कि रंजीत कुछ और मेहमानों की पोल खोलता, गिरगिट ने उसे एक नया व्हिस्की का बिल्लौरी पैमाना थमा दिया। मोहन-मोहिनी दुबक गए, ब्लू-बैज और डिसेबिलिटी बेनिफिट के अलावा, वे दोनों न जाने कौन-कौन से सरकारी भत्ते ले रहे थे।

‘बड़े भाई, फिकर नोट, गोल्डन टेम्पल में मत्था टेकने गया था डेविड कैमरन, वो समय अब दूर नहीं जब हम गोरों पर राज करेंगे,’ गिरगिट ने आख़िरी सांस ले रही चर्चा को पुनर्जीवन दिया।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, राजेस ठीकै कै रा है, बैलबोटम का फैसन फेर आये रओ है, सब समय का फेर है,’ जिया ने अपना फ़लसफ़ा झाड़ा तो लोग अपने सिर खुजाने लगे।

‘भैंचो भाषण ही झाड़ने हैं तो क्यों न साले सब काले इकट्ठे होकर हाईड पार्क कॉर्नर चलें?’ रंजीत इस शोर से चिढ़ गया था।

‘लाहौलविलाकुव्वत मियाँ, हम काले कब से हो गए?’

‘अस्सी काले नई हन,’ सतनाम ने झूमते हुए कहा, जिसे रंजीत कोका-कोला की बोतल में व्हिस्की डाल कर पिला रहा था।

‘गोरों के लिए तो हम सभी काले हैं, जिया,’ रंजीत के बदले गिरगिट ने जवाब दिया।

‘अँगरेज़ हमें व्हीटिश या ब्राउन और समथिंग लाइक दैट कह सकते हैं,’ मीता ने अपनी राय दी।

‘हम भी तो सभी गोरों को गोरा ही कहते हैं, चाहें वे जर्मन, डेनिश, फ्रेंच या नौरवीजियन कोई भी हों, वैसे ही ये गोर लोग हम सभी को समझते हैं,’

‘अस्सी काले नईं हन,’ सतनाम ने अपनी बात दोहराई।

‘इन क..क..कालों की वजह से हम लोग म..म..मुफ़्त में ब..ब..बदनाम होते हैं, म..म..म..मारपीट, च..च..चोरी च..च..चकारी ये करते हैं और त..त..त..तोहमत सभी क..क..कालों पर ल..ल..लगाई जाती है,’ मितभाषी मकरंद ने शिकायत की; जो कुछ लम्बी हो गयी थी; परिणामस्वरुप, उनकी मोटी गर्दन को कई झटके झेलने पड़े।

‘ऐसी बात नहीं है, मैक, सब जानते हैं कि इंडियंस कितने मेहनती और शान्त क़िस्म के लोग होते हैं, पढ़ने लिखने में गोरों और कालों से कहीं ज़्यादा होशियार,’

‘वैसे भी, अफ़्रीकियों और हम लोगों में ज़मीन आसमान का फ़र्क है।’

‘तुस्सी मैंनू ऐ क्यूं नईं दसदे के अस्सी काले किद्रों हो गए?’ बेचारे सतनाम की कोई नहीं सुन रहा था। नशे में होने के बावजूद वह क्षुब्ध था।

‘मेरे तो पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा, एक तरफ तो आप कह रहे हैं कि वे हमें वापिस भेजना चाहते हैं, और दूसरी तरफ वे लाख़ों की तादाद में लोगों को यूके में घुसाए चले जा रहे हैं,’

‘इन्हें चीप लेबर जो चाहिए,’

‘पर होम-ऑफिस वाले अब सचमुच बहुत सख़्त हो गए हैं,’

‘बिज़नैस वालों को तो फटाफट वीज़ा मिल जाता है,’

‘क्यों नहीं मिलेगा? जानते हो कितना चार्ज करते हैं बिज़निस वीज़ा के लिए? पर बाकी जनता के लिए…’

‘मैं थानूं दसां, जद्दो अस्सी मुंडे नू व्या के लाऊंदे सी ते होम-आफिस वाल्यां ने प्रियंका नू साड्डे नाल नई आण दित्ता सी,’

‘आपकी बहु डॉक्टर, इंजीनियर या करोड़पति होती न तो ये  उसे फट घुसा लेते,’

‘प्रियांका जद्दो एत्थे पौंची, किन्नाक तंग कित्ता ओनू, रब जाने की पए आखदे सी। मैं थानूं दसां,’

‘मैंने सुना है कि एयरपोर्ट पर अब वर्जिनिटी टैस्ट की जाने लगी है,’ एक हल्की नींद लेकर घड़ियाल एकाएक ऊंघता हुआ उठ बैठा।

‘लाहौलविलाकुव्वत,’

‘आ शूँ जमानो आव्यो छे?’

‘हय राम, कलजुग है कलजुग,’ जिया वर्जिनिटी टैस्ट का अर्थ भी नहीं जानती थीं किन्तु क्योंकि आपा ने ‘लाहौलविलाकुव्वत’ कहा था, वह कैसे ख़ामोश रहतीं?

‘रब्बिश, ये सब साली अफ़वाहें हैं,’

‘जिन पर गुज़रती है न वही जानता है,’ घड़ियाल बोला।

‘लगता है कि आपका साला वर्जिनिटी टैस्ट हो चुका है।’ रंजीत ने घड़ियाल को घूरते हुए कहा तो मेहमान ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे।

‘बड़े भाई, असल बात तो यह है कि हमें अब गोरों पर विश्वास नहीं रहा,’ गिरगिट ने घड़ियाल की बात को सम्भालना चाहा।

‘या साला उन्हें हम पर विश्वास नहीं रहा?’

‘हो भी कैसे? एंटरटेनमेंट और एजुकेशन के नाम पर आए हुए न जाने कितने लोग यहाँ आकर ग़ायब हो जाते हैं.’

‘उन्हें पकड़ भी लिया जाए तो हम जैसे टैक्स-पेयर्स के पैसों से उन पर मुकदमें चलाए जाते हैं,’

‘मैंने कहीं पढ़ा था कि बौक्सड-बेडस की एक कंसाइनमैंट में सिक्खों को भर-भर कर यूके लाया जा रहा था,’

‘हय राम, मैं तोसे कऊं, बक्सों में दम नईं घुटा उनका?’

‘लाहौलविलाकुव्वत, बेचारों का क्या हश्र हुआ?’

‘होगा क्या, जेल में पड़े मौज कर रहे होंगे; अच्छा खाना-पीना और मुफ्त का मनोरंजन,’

‘क्या नाम है उसका, जिसने क्रिकेट बैट से मार मार कर अपनी बीवी की ह्त्या कर दी थी? सुना है के वह जेल में बैठा डिग्री कोर्स कर रहा है। और तो और, उसे कालेज जाने के लिए छूट भी दी जाती है,’

‘लाहौलविलाकुव्वत, फिर जेल का फ़ायदा क्या हुआ?’

‘गुंडे-बदमाश इतना बड़ा रिस्क लेने को तैय्यार हो जाते हैं,’

‘मरी इत्ती सख्त चेकिंग के बादजूद लोग मरे इम्मीग्रेशन वालों की आँखों में कैसे धूल झोंक देते हैं?’

‘इम्मीग्रेशन वाले कौन से दूध के धुले हैं,’ मोहन बोले।

‘इम्मीग्रेशन भी तो एशियंस से भरा पड़ा है, आई एम श्योर वहाँ भी धड़ल्ले से ब्राइबरी चल रही होगी,’

‘बड़े भाई, आजकल इंडिया में ऐसी-ऐसी एजेन्सीज़ हैं जो पैसा लेकर जाली डॉक्यूमैन्ट्स बनाती हैं, पासपोर्ट से लेकर नौकरी तक सब ख़रीदा जा सकता है,’

‘इन्हीं बोगस कम्पनीज़ की वजह से ये बेचारे लोग यहाँ आकर फंस जाते हैं। कम पैसों में अधिक काम करते हैं। जानवरों की तरह खाते-पीते और रहते हैं। बेचारे न तो किसी से शिकायत कर सकते हैं और न ही वापिस अपने देश जा सकते हैं,’ वायु ने कहा।

‘इंशा अल्लाह, वायु बी, आपने बिलकुल सही फ़रमाया, बेइन्तहा क़र्ज़ लेकर आते हैं ये मज़लूम, एक किश्त देने में भी चूक हो जाए तो इंडिया में उनकी फैमिली की जान पर बन आती है,’

शोर इतना बढ़ गया था कि किसी की बात भी ठीक से सुनाई नहीं दे रही थी, सब के सब एक साथ बोल रहे थे।

‘किसी ने कहा है न कि परेशानियां आदमी को गूंगा बना देती हैं किन्तु यह शोर इस बात का सुबूत है कि खाते-पीते घरों के इन मेहमानों को कोई ख़ास चिंता नहीं है,’ शोर से परेशान मिश्रा जी बुदबुदाए, जो ट्रांसिस्टर पर पुराने गाने सुन रहे थे, काश कि वह अपने साथ इयर-प्लगस लाए होते।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, मिसरा जी, ये सरकारी लोग का तास खेलने आए हैं हियाँ? बेचारी पिरभा को कैसन अकेले छोड़ दिऐ हैं?’ सब की नज़रें प्रभा पर जा टिकीं, जो अफ़सरों के बीच बैठी उनकी बातों को समझने का प्रयत्न कर रही थी। मिश्रा जी के भाषण से बचने के लिए रंजीत, नरेश, गिरगिट और सुमित भी कन्ज़र्वेटरी में आ बैठे, जहां ज़ोर-शोर से राजनीति पर बहस छिड़ी हुई थी।

 

‘सीरिया के मामले में अमेरिका का साथ न देकर ब्रिटेन ने बड़ी हिम्मत दिखाई है,’ नरेश बोले।

‘करेक्ट, ब्रिटेन ने ओबामा सरकार को  सोचने को मजबूर कर दिया,’ जोशी-सर ने अपना मुंह खोल कर सभा को कृतार्थ किया।

 

‘सर, अमेरिका की टिरैन्नी तो रुक नहीं सकती, कैमरन और नो कैमरन,’

 

‘अमेरिका के साले चूतड़ चाटने से तो अच्छा है के ब्रिटेन साला दूसरे देशों से दोस्ती करे,’

 

‘सर, रशिया विल नौट सिट क्वाइट इफ़ अमेरिका डिक्लेयर्ड वार,’ वेणु बोला।

 

‘सर, पूटीन ने तो धमकी दे ही दी है,’ बसंत कोडनानी क्यों पीछे रहता?

 

‘सर, यह इराक़ और अफ़गानिस्तान का मामला तो है नहीं।’

 

‘बिलकुल सर, इजिप्ट और सीरिया में जो घटनाएं हुई हैं, वे उनके अंदरूनी टकराव की वजह से हुई हैं…’ सुमित ने कहा।

 

‘भई, सीरिया के झगड़े नैशनल हैं, नस्ल के और धर्म के…’ जोशी-सर ने कहा।

 

‘आप ठीक कह रहे हैं, सर, शिया-सुन्नी साले आपस में ही कट-मर रहे हैं,’

 

‘सर, घटनाओं की ब्रूटैलिटी और पेचीदगी को देखते हुए ब्रिटेन को बहुत सोच-समझ कर कदम उठाना होगा…’ नरेश बोले।

 

‘सर, ब्रिटेन को तो अपनी ही जान के लाले पड़े हैं, दूसरों के फटे में पाँव फंसाने से इन्हें कुछ नहीं मिलने वाला,’ सुमित ने नरेश की बात काट दी।

 

‘सर, सीरिया से पंगा लिया न तो कैमरन को जनता की खिलाफ़त भी तो भुगतनी पड़ेगी,’

‘सर’ का संक्रमण तेज़ी से फ़ैल रहा था जैसे ‘सर’ के बिना किसी भी बात का कोई औचित्य न हो।

 

‘सर, अपना इंडिया तो यू.एन के डिसिशन की वेट कर रहा है,’

 

‘सर, अगर यू.एन की रिपोर्ट पौज़िटिव आती है, सर, तो अमेरिका, फ्रांस और इंडिया वगैरह सबको युद्ध में उतरना होगा,’

 

‘सर, मुझे तो डर है कि, सर, कहीं बाएलौजिकल-वार न छिड़ जाए, ओबामा…’

 

‘ऐ मैं तोसे कऊं, ये ‘सर सर सर’ क्या हो रई है? मर्दों से तो बस पत्ते फिटवा लो या जंग की बातें करवा लो,’ जिया ने कंजरवेटरी में आकर सबको ऐसी डांट पिलाई कि लगभग सभी खिलाड़ियों ने अपने चेहरे पत्तों के पीछे छिपा लिए।

‘लाहौलविलाकुव्वत, जिया के साहबज़ादे के निकाह की बीसवीं सालगिरह है और आप लोगों को जुए की सूझ रही है,’ आपा बोलीं; कुछ देर के लिए सर्वत्र शान्ति छा गयी।

प्रभा का हाथ पकड़े जिया बैठक में पहुँची भी नहीं थीं कि कंज़र्वेटरी से ज़ोर का शोर सुनाई दिया; मेनका ने बाज़ी मार ली थी।

 

‘पिरभा, चल तू मेरे धोरे बैठ, मीता कै रई थी के तू होली-डे पे गई थी,’

 

‘नको जीया जी, डैन्मार्क से वेनू का पोस्टिंग सीदा लन्दन हो गया ता।’

 

‘अच्छा, डैन्मार्क तो सुना है ख़ासी खूबसूरत कंट्री है,’ आपा बोलीं।

 

‘ब्यूटिफुल, व्हेरी व्हेरी क्लीन जी,’

‘मैं तोसे कहूं, हिंदी नाय आवे है का तुजे, पिरभा?

‘तोड़ा तोड़ा,’

‘तो फिर बोल न तोड़ा तोड़ा,’

‘कोपेनहेगन में होता तो टीक ता ऊदर, पन अमको ओडैन्से में रैने को मांगता जी, उदर अमारी चेची ता न जी लोग बौत फ्रैंन्डली होता, बौत स्माईल करता जी,’

‘बस रैन दे, थक गया होगा तेरा जबाड़ा,’ प्रभा की हिंदी सुनकर आपा और जिया ने अपने कानों पर हाथ रख लिए।

‘ओके आपा, इल्ला अमको बुलाता,’ हतप्रभ प्रभा सिर पर पांव रख कर इला की ओर चल दी।

‘मैं तोसे कऊं, ये इल्ला बी न पिरभा को अपने जइसा बना लेगी। मरद को पतुरिया के संग छोड़ के इकल्ली बैठी है,’

तभी मंजूषा और राजीव के हंसने की आवाज़ सुनाई दी।

‘शरीफ़ज़ादियों का मर्दों के बीच खी-खी करना क्या अच्छा लगता है?’

शमीम को अपनी ओर आते हुए देख आपा ने सोचा कि उनसे दुआ-सलाम कर ही लिया जाए।  उस नास-पीटे मंज़ूर की वजह से वह कब तक छिपती फिरेंगी? हसन के लिए ये बद्ज़ात यूं ही अफ़वाहें उड़ाता फिरता है।

‘और सुनाइए आपा, हम तो, इंशा अल्लाह, आपके दीदार को भी तरस गए, कहाँ छिपी बैठी थीं अब तक?’

‘वालेकुम सलाम, शमीम बीबी, छिपकर बैठें हमारे दुश्मन। अल्हमदुलिल्लाह, निकाह के बाद हमारी आयशा बहुत खुश नज़र आ रही है,’

‘खुदा का शुक्र है, आपा, हम तो यही दुआ मांगते हैं के रिचर्ड जैसा दामाद सबको नसीब हो,’

‘अल्हमदुलिल्लाह, जोड़ी सलामत रहे। सुना है के बड़ा अच्छा काम चल रहा है रिचर्ड मियाँ का।’ रिचर्ड को उच्चायोग के अधिकारियों के साथ बैठा देख कर आपा बेहद परेशान थीं।

‘इंशा अल्लाह, रिचर्ड ने इंडिया हाउस के साथ एक बहुत बड़ा कॉन्ट्रेक्ट साइन किया है, आपा। अल्हमदुलिल्लाह, दोनों मुतमइन हैं,’ शमीम ने बताया।

आपा को अंदाज़ा था कि ऐसा मीता और मकरंद की जान-पहचान से ही संभव हुआ होगा; तभी तो वाउचर्स लेकर आई थीं माँ-बेटी।

‘ए मैं तोसे कऊँ, समीम, इंडिया-हाउस में गोरे बी काम करे हैं का?’ अपनी धोती की चुन्नटें हाथ में समेटे, जिया भी दीवार की टेक लगा कर खड़ी हो गईं, उनका पेशाब बस निकलने को था किन्तु घुटनों में गठिया की वजह से बार-बार ऊपर चढ़ कर जाना अब उनके बस की बात नहीं रही थी और नीचे वाले शौचालय को किसी ने अन्दर से बंद किया हुआ था।

‘जिया, रिचर्ड वहाँ काम नहीं करते, उन्होंने ऐमबैस्सी के घरों को री-डैकोरेट करने का ठेका ले रखा है,’ शमीम ने खुलासा दिया।

‘मैं तोसे कऊँ, समीम, आयसा बी तो वईं काम करे थी, के नईं,’

‘आपकी याददाश्त तो माशा अल्लाह ख़ासी बढ़िया है, जिया। रिचर्ड से आयशा की मुलाक़ात वहीं तो हुई थी। इंशा अल्लाह, अब तो आयशा को ख़ासी अच्छी जौब मिल गयी है,’ शमीम जानती थी कि आपा बात की तह में जाए बगैर नहीं मानेंगी।

‘ये सब मरी तक़दीर की बातें हैं, शमीम, रिचर्ड से मरा मिलवाने के लिए ही भगवान ने शमीम को मरी ऐमबैस्सी में जॉब दिलाई होगी।’ मोहिनी ने आकर बड़े प्यार से शमीम के गलबहियाँ डालते हुए कहा।

‘आपने बजा फ़रमाया, मोहिनी बाजी। हमारे मियाँ ने बड़ी लानत मलानत भेजी पर आयशा टट्टू की तरह बस अड़ ही गयी कि निकाह करेगी तो रिचर्ड से, वरना..,’

‘मरा अच्छा ही किया न उसने, शमीम, रिचर्ड जैसे हज्बैंड्स क्या मरे आसानी से मिलते हैं?’

‘अल्हमदुलिल्लाह, रिचर्ड तो हमें अपने कुनबे से भी ज़ियादा इज़्ज़त बख्शते हैं। हम उन्हें कोई छोटा सा एक तोहफ़ा ही क्यों न दे दें तो वह हमारे आगे बिछे-बिछे जाते हैं, थैंक-यू, थैंक-यू कहते नहीं थकते,’ शमीम को तो बस एक मौक़ा चाहिए था अपने दामाद की तारीफ़ों के पुल बाँधने का।

 

‘शमीम बी, आप थैंक-यू, थैंक-यू की रट लगाए हैं, हमने तो, अल्हमदुलिल्लाह, रिचर्ड को अभी अभी ‘शुक्रिया’ कहते सुना,’ आपा ने खुशी ज़ाहिर की।

 

‘दुरुस्त फ़रमाया, आपने आपा। अल्हमदुलिल्लाह, आयशा उन्हें उर्दू सिखा रही है। खाने-पीने के मुत्तालिक आप रिचर्ड से कुछ भी पूछ कर देख लीजिए, उन्हें सब चीज़ों के नाम याद हैं,’

‘हाउ नाईज़, रिचर्ड इज़ रियली ए ग्रेट गाइ,’ मीता ने यहाँ भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवा ही ली हालांकि उसका दिमाग़ एक साथ कई अन्य जगहों पर था।

‘अपने यहां के दामाद तो दहेज़ लेकर डकार जाते हैं, मीनमेख निकालते हैं, सो अलग, क्यों मोहिनी?’ अपने पल्ले को सम्भालते हुए वायू भी जिया की बगल में आ बैठी।

सारी महिलाएं एकाएक टॉयलेट के पास आकर इकट्ठी हो गयी थीं; इतनी देर से अन्दर न जाने कौन था?

‘इंडिया में तो दहेज़ के लालच में ससुराल वाले बहुओं को जला मारते हैं या फिर वे बेचारी तंग आकर आत्महत्या कर लेती हैं,’ नैन्सी ने कहा।

‘खुदा न ख़ास्ता, पाकिस्तान का बी वई क़िस्सा है, बीबी,’

‘मैं तो कहती हूं कि हमें अपनी बेटियों की मरी शादियां गोरों से ही करनी चाहिएं। एक तो मरा ब्रिटिश पासपोर्ट मिल जाएगा, दूसरे वे उन्हें मरी इज़्ज़त से तो रखेंगे, हैं के नईं?’

‘बिलकुल, खुदा न ख़ास्ता तलाक़ हो भी गया तो मर्द की आधी जायदाद तो उन्हें मिलेगी ही मिलेगी,’

‘और बाल-बच्चे भी हो गए हों तो नो प्रॉब्लम, उनका ख़र्चा वाइफ़ को अलग से मिलेगा,’ वायु ने बताया।

‘ए मैं तोसे कऊँ, आपा, बिलैती लड़कियन के तो दोनों हाथन में लड्डू हैं लड्डू,’

‘हमारे एक्स-प्राइम मिनिस्टर गोर्डन ब्राउन ने ब्रिटिश-एशियंस को एडमौनिश किया था कि उन्हें अपने पार्टनर्स इसी कंट्री में ढूँढने चाहिएं,’ मीता ने बताया।

‘भाभी, जो भी हो, इंडियंस तो अपनी बहुएं और दामाद इंडिया से ही लाना चाहते हैं,’ वायु ने कहा।

‘क्यों न लाएं, वे टिकाऊ जो होते हैं, यहाँ के लड़के-लड़कियां तो एक महीना भी साथ रहने को राज़ी नहीं हैं…’

‘मरी ऐसी बात नहीं है, नैन्सी, यहाँ भी मरे एक से एक अच्छे इज्ज़तदार घराने हैं…’

‘हमारी नन्हीं के लिए भी न ढूंढ दो कोई गोरा काला, मोहिनी। उसके लिए हम दो साल से लड़का ढूंढ रहे हैं। नन्ही की शादी हो तो हम भी बहु लाएं। लड़की वालों की लाइन लगी है पर हमें तो पहले एक सूटेबल ब्वाय चाहिए…,’ वायू ने अपना पल्ला कंधे पर टिकाते हुए कहा।

‘ऐ मैं तोसे कऊं, बायु, जब हमारी नन्ही के भाग जागेंगे न तो देख लीजो सलोना दूल्हा खुदै चल कर आएगा तुमारे द्वार,’ जिया ने बेटी को ढाढस बंधाया।

‘आजकल के लड़के-लड़कियों को मरा कोई पसंद भी तो आवे,’ मोहिनी बिदक गयी कि वायु कहीं दामाद ढूँढने के लिए उसके पीछे ही न पड़ जाए।

‘इतनी अच्छी जगह काम करती है नन्ही, वहीं कहीं कोई क्यों ढूंढ लेती?’ नैन्सी ने अपनी छोटी बहन से पूछा।

‘दीदी, तुम तो जानती ही हो कि नन्ही ज़रुरत से ज़्यादा रिज़र्वड है। चौबीसों घंटे कम्प्यूटर में सिर घुसाये बैठी रहती है; मोटा चश्मा और चढ़ गया है उसकी आंखों पर। सच्ची, मैं तो बहुत परेशान हूं,’

‘ऐ मैं तोसे कऊं, बायु, राम जी सब भली करेंगे, तू बौत फिकर करती है,’ जिया से खुलेआम अपनी पोती की बुराई नहीं सुनी जा रही थी।

‘वैसे रमेश में क्या बुराई थी? वे लोग तो नन्हीं में इन्ट्रेस्टड भी थे?’ नैन्सी ने छोटी बहन के ज़ख़्म पर मानों नमक छिड़क दिया; बहन की पूरी पोल खोले बग़ैर अब नैन्सी को चैन थोड़े ही पड़ेगा।

‘नन्हीं को रमेश पसंद ही नहीं था, दीदी। उससे तो तीन ए-लैवलस भी पास नहीं हुए; आजकल फल­-सब्ज़ी की दुकान चलाता है। हमारी नन्हीं ग्रैजुएट है और मैकडोनाल्ड में सुपरवाइज़र है।’ वायू ने पल्ला अपने बायें कंधे पर अच्छे से टिका लिया जैसे कि वह युद्ध के लिए तैय्यार हो।

‘लाहौलविलाकुव्वत, फल-सब्जियां तो भई रोज़ की ज़रूरत हैं, उसमें क्या बुराई है?’ आपा ने हाथ नचाते हुए पूछा।

‘पढ़ाई-लिखाई का फ़ायदा तो तब होता, वायु, कि नन्हीं मैकडोनाल्ड में काम करने के बजाय रमेश की दुकान को बढ़ा कर सुपरस्टोर बना देती,’ नैन्सी की बस यही आदत वायु को नहीं पसंद। हर चीज़ में फ़ायदा देखती है। अपनी तो अधेड़ बेटी कुंवारी बैठी है और चली है उसे सलाह देने।

‘बच्चों की मरी ज़िद के आगे किसकी चलती है, वायु? मरे सोलह के हुए नहीं कि हो गए मरे एडल्ट। अलग रहना चाहें तो मरी काउंसिल उन्हें घर भी दे देती है,’

‘कितने मज़े हैं न बच्चों के यहां? ज़रा सा टोका नहीं कि घर छोड़ के चले जाने की धमकी दे देते हैं,’ मंजूषा टायलेट से निकली तो जिया ने शुक्र मनाया।

‘फिर भी सिर फिरों को कहां क़द्र है हमारी? इंडिया में होते न तो अक़्ल ठिकाने आ जाती,’

‘इंडिया में अब तक जॉइंट फैमिली का रिवाज़ चल रहा है, वहाँ बच्चे इंडिपेंडैन्ट रह कर गुज़ारा नहीं कर सकते,’

‘अब तो यहाँ भी बच्चे घर छोड़ कर जाना नहीं चाहते,’

‘जाएं कैसे? बेचारों को मॉर्गेज भी तो मिले। किराए आसमान छू रहे हैं, काउन्सिल-टैक्स और बिल्स देने के बाद बस खाने-पीने के लायक पैसे बचते हैं। ऊपर से पढ़ाई का क़र्ज़ जो उनकी सेलरी में से जीवन भर कटेगा।’ घड़ियाल के इस करुण रुदन ने कमरे में सर्वत्र उदासी फैला दी।

‘वायु, तुम तो अमित की बहु ले ही आओ, उसकी किस्मत से शायद तुम्हें दामाद भी मिल जाए,’

‘और नहीं तो क्या, लड़की तो मरी मिली मिलाई है, क्यूं वायु?’ मोहिनी की इस बात से गेंद एक बार फिर वायु के कोर्ट में आ गिरी; कोई नैन्सी की बेटी के बारे में क्यों बात नहीं करता?

‘क्या कहती हो मोहिनी? अमित और रीना तो बस अच्छे दोस्त भर हैं, शादी वादी जैसी कोई बात नहीं है। बहु तो भई मैं दिल्ली से ही लाऊंगी। नज़र में है एक लड़की, लाखों में एक, ख़ूबसूरत है, खाते-पीते घर से है।’

‘हू आर यू टाकिंग एबाउट, दीदी? लैट मी ओलसो नो,’ मीता ने ऐसे पूछा कि जैसे वह कोई भेद की बात जानती हो।

‘अरे वही, अमीर चन्द की पोती नन्दिनी। आप भी तो जानती हैं उन लोगों को। मार्च में मैं जब दिल्ली गई थी तो बात पक्की कर आई थी। बस नन्हीं की शादी हो जाए…’

‘आप क्या उसी नन्दिनी की बात कर रही हैं जो मेरी आंटी की सिस्टर-इन-लॉ की नीज़ है? परहैप्स आपको न्यूज़ नहीं मिली…,’ मीता ने वायु को विश्वास दिलाने के लिए कि जो विस्फ़ोटक बात वह बताने जा रही थी, वह उसी नंदिनी की थी, रिश्ते की तफ़सील दी। मीता को यह बात खटक गयी थी कि वायु ने इस रिश्ते का ज़िक्र उससे नहीं किया था।

एकाएक माहौल सनसनीखेज़ हो उठा। मेहमानों के कान खड़े हो गए और वायु का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।

‘क्या नहीं बताया, मीता भाभी? क्या हुआ?’ आसमान से नीचे आ गिरी वायु और उसका पल्ला। आशंकित वायु मन ही मन अपनी भाभी पर झल्ला उठी; इतना नाटक करने से बेहतर था कि वह सीधे मुद्दे पर आती।

‘वी तो हर्ड फ़्रौम रिलायबल सोरसेज़, वायु, के नन्दिनी अपने फर्स्ट-कज़िन के साथ इलोप हो गयी। जामा मस्ज़िद के किसी स्ट्रीट में छिपे हैं वो दीज़ ड़ेज। इटस ऐ बिग स्कैंडल, यू नो,’

कुछ देर के लिए बैठक में सन्नाटा छा गया, वायु की आँखें मीता के चेहरे पर टिकीं थीं और साँस बंद। गेंद एक बार फिर वायु के कोर्ट में आकर ठहर गयी थी; खिलाड़ियों के हाथ मिलाए बगैर खेल खत्म हो गया था।

‘लाहौलविलाकुव्वत, सब्र से काम लीजिए, वायु बी,’ आपा ने ख़ामोशी भंग की तो लोगों ने सांस ली।

‘या ख़ुदा, रहम कर,’ शमीम ने भी वायु के कंधे पर हाथ रखते हुए हमदर्दी जताई।

‘राम जी सब भली करेंगे, बायु, तू फिकर नाय कर,’ जिया का दिल दहल उठा; उन्होंने अपनी छोटी और दुलारी बेटी को सीने से लगा कर तसल्ली देनी चाही।

‘कैसी बुरी खबर सुनाई, मीता तुमने तो,’ अपने सीने पर हाथ रखे नैन्सी ने मीता को घूरते हुए कहा और वायु और जिया से जा चिपकी। तीनों महिलाएं मीता को ग़ुस्से में देख रही थीं; मुंह खोलने से पहले उसे समय और स्थान का तो ख़याल रखना चाहिए था।

‘आइ एम रियली सौरी, वायु।’ मीता को समझ नहीं आ रहा था कि वह बात को कैसे संभाले? घबराहट में वह वहाँ से उठ कर ही चल दी।

बेहाल वायु को काटो तो ख़ून नहीं, सोफ़े पर बिखरा उसका पल्ला अपनी बदक़िस्मती को रहा था। वे सब भी जो अपने पल्लों से अधिक वायु के पल्ले के गिरने और सम्भलने पर नज़र रखते थे, व्यथित थे।

‘वायु, अभी कौन सी अमित की मरी उम्र निकली जा रही है? मरा सताइस का ही तो हुआ है। उसके लिए मरी कोई अच्छी से लड़की यहीं देखो,’ वायु की पीठ को सहलाते हुए मोहनी उसे ढांढस बन्धा रही थी।

‘मोहिनी ठीक कह रही है, वायु, इन्डिया से लड़की ले तो आओ पर क्या जाने वह वो यहां रच बस पाए के नहीं,’

‘वायु, जो हुआ अच्छा ही हुआ। अमित यहां पला-बढ़ा है, ब्रिटिश है, इंडिया में तो लड़के-लड़कियों को एक दूसरे को जानने का मौक़ा भी नहीं मिलता,’

‘इंडिया में क्या, नैन्सी दीदी, यह तो हर कंट्री में होता है, सारी-सारी उम्र साथ रह कर भी मियाँ-बीवी एक दूसरे को जान नहीं पाते…,’ इसके पहले कि घड़ियाल अपनी बीवी का रोना शुरू करता, शमीम बोल उठी।

‘घनश्याम भाई जान, यह सब मुकद्दर की बात है, अपने आग़ा साहब मुरादाबाद से दुल्हन लाए, उसे अपने सिर आंखों पर बैठाया, तीन महीने भी तो नहीं टिकीं,’

‘लाहौलविलाकुव्वत! आग़ा साहब के साथ तो भई बड़ी नाइन्साफ़ी हुई। कोई वजह भी तो हो? ऐसे कहाँ ग़ायब हो गयी? दाल में ज़रूर कुछ काला है, किसी ने तो उसकी मदद ज़रूर की होगी?’ आपा ने शमीम पर सवालों की बौछार कर दी।

‘तफ़सील तो हमें मालूम नहीं, आपा, पर इसमें बेचारी दुल्हन का कोई क़ुसूर नहीं था…अब क्या बताएं…,’ एकाएक शमीम ख़ामोश हो गईं।

‘आपा, आग़ा साहब ने सोचा था कि उनके ‘गे’ साहबज़ादे का ब्याह हो जाएगा तो उनका राज़ छिपा रहेगा, सीधी-सादी दुल्हन जुबां नहीं खोलेगी और खोलेगी भी तो जाएगी कहाँ?’ आयशा ने अपनी माँ की बात पूरी की।

‘लाहौलविलाकुव्वत,’ आश्चर्य यह था कि आपा अवाक बैठी थीं।

‘ऐ मैं तोसे का कऊं, ये ‘गे’ का बला है?’ जिया के कान खड़े हो गए। वायु अब तक संभल चुकी थी, वह पल्ला संभाल कर सीधी बैठ गयी; कम से कम अब किसी और की भद्द पिट रही थी।

‘गे, होमोसैक्सुअल, हैट्रोसैक्सुअल, लैसबियन्स, बाईसैक्सुयल्स, होमोज़, बहुत से लफड़े हैं, जिया, आजकल,’ नैन्सी ने अपना ज्ञान बघारा। जिया ने अपना माथा पीट लिया; वह ‘गे’ के विषय में पूछ रही थीं, पांच भारी-भरकम शब्द और जोड़ दिए थे नैन्सी ने।

‘भई आजकल तो यही पता लगाना मुश्किल है कि कौन नॉर्मल है, कौन गे,’ आपा बोलीं।

‘ऐ मैं तोसे का कऊं, कोई हमें ये बी तो बताओ के ये होमो हीटरो है का बलाय?’ जिया का ग़ुस्सा जायज़ था कि उन्हीं के घर में मेहमान उन्हीं की उपेक्षा किए चले जा रहे थे।

‘जिया, आई थिंक, जो न लड़की हो न लड़का या दोनों?’ मंजूषा ने अपनी जीभ काट ली क्योंकि उसे अपने ही कथन पर संदेह था।

‘ऐ मैं तोसे का कऊं, मंजूसा, तो हिजड़ा च्यों न कैती?’

‘जिया, शब्दकोष में ‘गे’ का अर्थ ‘समलैंगिक व्यक्ति’ अथवा ‘समलिंगकामुक’ दिया गया है…’ मिश्रा जी ने बाकी के शब्दों का भी अर्थ बताने वाले थे कि  नैन्सी ने उन्हें टोक दिया। जिया ने आपा की ओर देखा जो अपना सिर स्वीकृति में हिला रही थीं जैसे उन्हें सब समझ आ गया हो।

‘जो भी हो, टीवी और फ़िल्मों में इन निगोड़ों को ऐसी शान से दिखाया जाता है के  बच्चे सोचते हैं कि ‘गे’ होना बड़ी अच्छी बात है,’

‘ब्वाय-जार्ज को ही देख लो, कमबख्त हिजड़ा सा। पता नहीं गोरों को क्या मज़ा आता है ऐेसे पिरोग्राम दिखाने में,’ आपा ने एक गिलौरी अपने मुंह में रख कर अपना चांदी का पानदान शमीम की ओर बढ़ाया; उसे पटाए रखना ज़रूरी था, कहीं वह उस नामाकूल मंज़ूर की अफ़वाहों को सच न मान बैठे।

‘टीवी के अधिकतर कार्यक्रमों के प्रस्तुतकर्ता आजकल‘गे’ युवक ही हैं, जो मोटी मोटी गालियाँ देना शान समझते हैं और उनकी गालियाँ सुनकर यहाँ के लोग भी खूब तालियाँ पीटते हैं,’ मिश्रा जी को एक और विषय मिला अपनी भड़ास निकालने का।

‘कोई मुझे आजकल की एक ऐसी फ़िल्म या सीरीज़ का नाम बता सकता है जिसमें कम से कम एक ‘गे’ कैरेक्टर न हो?’ मोहन ने पूछा।

‘बड़े भाई, अमरीका में तो अब गे-मैरिजेस खुले आम होने लगी हैं,’

‘अरे यहाँ नहीं हुईं क्या? वो क्या नाम है मरा उसका, मिक? बन्दर सा मरा गौग्ल्स पहने पियानो पर बैठा गाने गाता है…’ अपना सिर ज़ोर-ज़ोर से खुजाते हुए मोहिनी अपनी आँखों को घुमाते हुए मोहन को जैसे टिप्स देना चाह रही थी।

‘एलटन जौन,’ पत्नीव्रता मोहन झट समझ गए कि मोहिनी को किसकी तलाश थी।

‘हाँ वही, मरा वो भी तो गे है, अब तो उसने एक बच्चा भी गोद ले लिया है, मरा क्या नाम है उसके पार्टनर का, मिक?’अपना सिर खुजाते खुजाते मोहिनी गंजी हो जाए तो दूसरी बात है, किन्तु मोहन यदि पास न हों तो मोहिनी की न जाने कितनी बातें अधूरी रह जाएं।

‘डेविड फर्निश,’

‘लाहौलविलाकुव्वत, दोनों मर्द? तो फिर बच्चे की माँ कौन होगा?’

‘आजकल लैस्बियन्स  की कौन सी कमी है,’ मोहन बोले।

‘मैं तोसे कऊं, ये लैस बीन्स क्या बलाय है?’

‘या खुदा, यह समझ लीजिए, जिया, के क़यामत का दिन बस अब दूर नहीं है, जिया,’ ज़ाहिर था कि आपा को भी लैस्बियन्स के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।

‘मरे अपनी ही फ्यूचर जैनरेशन बिगाड़ रहे हैं,’

‘सुना है कि कुछ अफ़्रीकी देशों में ‘गे’ लोगों को फांसी तक दे दी जाती है,’

‘भैन्चो ‘गे’ लोगों के क्या साले दिल नहीं होते? सदियों से वो साले भुगत रहे हैं हम सबकी साली नफ़रत, हिकारत और न जाने क्या-क्या। साली अब जाकर उन्हें कुछ आज़ादी मिली है तो भैन्चो सब जले-मरे जा रहे हैं, साला क्यों?’

‘महिलाओं के बीच ऐसी बातें शोभा नहीं देतीं,’ घड़ियाल घुड़का; उसे यह आशा नहीं थी कि रंजीत के कान इतने तेज़ थे।

‘साले घड़ियाल, तुम्हें शोभा देता है लेडीज़ से जाकर चिपक जाना और उन्हें साला हैरास करना?’ लोगों ने सोचा कि शायद प्रभा ने रंजीत से घड़ियाल की शिकायत की थी, तभी वह घनश्याम से इतना ख़फ़ा दिखाई दे रहा था।

ऐसा पहली मर्तबा हुआ था कि किसी ने घनश्याम को खुले आम ‘घड़ियाल’ के नाम से पुकारा था। अचम्भे की बात यह थी कि वह अपनी बेइज्ज़ती होते देख भी चुप था।

‘हमारे घर में हमारे ही कज़िन का अपमान, क्या अंधेर है?’ लंगड़ाते हुए मोहन एक बार फिर रंजीत के सामने आ खड़े हुए, जो अपनी ही सनक में था। मोहन को नज़रंदाज़ करते हुए वह व्हिस्की पीता रहा।

‘आप बी मरे किसके मूं लग रए हैं? मरे करोड़पति क्या जाने कि मरा मान-अपमान होता क्या है? इन्हें तो सिर्फ मरे पाउंडस की बात समझ आती है,’ थानेदार की तरह मोहिनी अपने पति की बांह पकड़ कर उन्हें एक ओर खींचने लगी।

‘ऐसे धन का क्या फ़ायदा जो किसी के काम न आ सके? कुछ थोड़े से लोग लाखों करोड़ों की संपत्ति पर फन उठाए बैठे हैं,’ वायु ने कहा।

‘एक तरफ़ सैंकड़ों बच्चे और बूढ़े सड़कों पर रुल रहे हैं तो दूसरी ओर इनके महलनुमा कोठियां ख़ाली पड़ी सड़ रही हैं,’ सुमित ने कहा।

नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा था कि सम्पन्नता धन के संग्रह में नहीं, बल्कि उसके उपयोग में होती है, बैंक्स अथवा मटके में रखे धन का क्या फ़ायदा?’ मिश्रा जी ने कहा।

 

 क्रमशः

 

- दिव्या माथुर

दिव्या माथुर 1984 में भारतीय उच्चायोग से जुड़ीं, 1992-2012 के बीच नेहरु केंद्र में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी रहीं और आजकल भारतीय उच्चायोग के प्रेस और सूचना विभाग में वरिष्ठ अधिकारी हैं। रौयल सोसाइटी की फ़ेलो, दिव्या वातायन कविता संस्था की संस्थापक और आशा फ़ाउंडेशन की संस्थापक सदस्य हैं।

कहानी संग्रह - आक्रोश (पद्मानंद साहित्य सम्मान, हिन्दी बुक सैंटर, दिल्ली), पंगा और अन्य कहानियां (मेधा बुक्स, दिल्ली), 2050 और अन्य कहानियां (डायमंड पौकेट बुक्स, दिल्ली) और हिन्दी@स्वर्ग.इन (सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली)।

अँग्रेज़ी में कहानी संग्रह (संपादन) – औडिस्सी: विदेश में बसी भारतीय महिला कहानीकारों की कहानियां (स्टार पब्लिशर्स), एवं आशा: भारतीय महिला कहानीकारों की कहानियां (इंडियन बुकशैल्फ़, लन्दन)।

कविता संग्रह - अंतःसलिला, रेत का लिखा, ख़्याल तेरा, चंदन पानी, 11 सितम्बर, और झूठ, झूठ और झूठ (राष्ट्रकवि मैथलीशरणगुप्त सम्मान)।

अनुवाद - मंत्रा लिंगुआ के लिए बच्चों की छै पुस्तकों का हिंन्दी में अनुवाद : औगसटस और उसकी मुस्कुराहट; बुकटाइम, दीपक की दीवाली; चाँद को लेकर संग सैर को मैं निकला; चीते से मुकाबला और सुनो भई सुनो। नैशनल फ़िल्म थियेटर के लिये सत्यजित रे-फ़िल्म-रैट्रो के अनुवाद के अतिरिक्त बी बी सी द्वारा निर्मित फ़िल्म, कैंसर, का हिंदी रूपांतर। इनकी रचनाओं का भी विभिन्न भाषाओं में अनुवाद।

नाटक : Tête-à-tête और ठुल्ला किलब का सफल मंचन, टेलि-फ़िल्म : सांप सीढी (दूरदर्शन)।

सम्मान/पुरस्कार : भारत सम्मान, डॉ हरिवंश राय बच्चन लेखन सम्मान, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त प्रवासी भारतीय पुरस्कार, पदमानंद साहित्य सम्मान, प्रवासी हिन्दी साहित्य सम्मान, आर्ट्स काउंसिल औफ़ इंगलैंड का आर्टस एचीवर पुरस्कार, चिन्मौय मिशन का प्रेरणात्मक व्यक्ति सम्मान, इंटरनैशनल लाइब्रेरी ऑफ़ पोइटरी द्वारा पुरस्कृत कविता, बौनी बूंद ‘Poems for the Waiting Room’ परियोजना में सम्मलित, ‘दिव्या माथुर की साहित्यिक उपलब्धियाँ’ नामक स्नातकोत्तर शोध निबन्ध, ‘इक्कीसवीं सदी की प्रेणात्मक महिलाएं’, ‘ऐशियंस हू ज़ हू’ और विकिपीडिया की सूचियों में सम्मलित।

संप्रति : भारतीय उच्चायोग, लंदन, में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी।

 

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