एक शहर, दो कुत्ते और कुछ लोग

एक बार कोई एक शहर था। आप चाहो तो उसका कोई एक नाम रख लो जैसे आदमपुर या
मानवगढ़ या कोई और। वो शहर कई वर्षों से इतिहास में चमकता सा और अपना बखान करता
सा जान पड़ता था लेकिन एक दिन उस शहर में एक छोटी सी घटना हुई। घटना छोटी थी
लेकिन शहर के लोगों ने उसे किसी जानवर की आंत की माफ़िक फैला कर रबर सरीखा लंबा
कर दिया।
…तो उस दिन उस शहर में हुआ ये था कि दो कुत्ते आपस में लड़ लिए थे। कुत्ते वाकई बड़े जबरे थे। ये जो दो कुत्ते थे न वो दो अलग-अलग किस्म के थे। एक कुत्ता जंगली और खूंखार किस्म का था तो वहीं दूसरे वाला किसी रिहायशी इलाके में रहने वाला सफेदपोश सा था मगर मूल बात ये थी कि दोनों कुत्ते ही थे।
इन दोनों किस्म वाले कुत्तों के बीच क्षेत्राधिकार और जीवन शैली को लेकर खटपट तो पहले से थी ही इसी कारण गाहे-ब गाहे दांत निपोरते रहते थे लेकिन एक दिन किसी कीमती हड्डी को लेकर झड़प कुछ ज्यादा ही हो गयी थी। मजे की बात ये थी कि झड़प के दौरान वो हड्डी वहीं कहीं फिसल के गिर गयी जिसका पता दोनों कुत्तों को नहीं लगा। दोनों के मन में यही था कि वो हड्डी मेरे विरोधी के पास चली गयी है।
रिहायशी इलाके में रहने वाला कुत्ता उस दिन झड़प के बाद वापिस अपने दड़बे में लौटा और काफी देर तक गुर्राता रहा कि उसके साथ गलत हुआ है और इस इलाके के कुत्तों को ही नहीं बल्कि आदमियों को भी उसकी हड्डी वापिस दिलवाने में मदद करनी चाहिए। आनन-फानन में भोंपू लाया गया और नगर की परिक्रमा लगा कर ये इत्तिला कर दी गयी लेकिन वहां के इंसानों ने उसकी बात को कोई तवज्ज़ो नहीं दी।
ऐसे में उसने खुद ही एक ख़ुफ़िया फ़ौज बनाना और बदला लेने के लिए मास्टर अटैक का प्लान शुरू कर दिया।
….तो दूसरी तरफ कौनसी महावर लगायी हुई थी। जंगली कुत्ता कुछ दिन शांत रहा और उस चमकीली हड्डी के सपने लेता रहा। वो अपने पंजे घिसता रहा, दांत रगड़ता रहा और अपने जैसे ही कुत्तों से सहायता की अपेक्षा में डोलता रहा! एक दिन उसका जोश, ज्वर में बदल गया और वो अपने कुछ पिल्लों समेत आ पहुंचा उस रिहायशी इलाके में जहाँ वो सफेदपोश कुत्ता बड़े ठाठ से गुर्राता रहता था।
उस झबरे और जंगली कुत्ते ने आव देखा न ताव आते ही झपट लिया गोलू-मोलू से उस कुत्ते को…..वो जब तक माजरा समझ पाता उसकी गर्दन जंगली कुत्ते के पंजों में थी और उसने उसे पूरे जोर से मरोड़ दिया। साथ ही साथ उसके शरीर में अपने जहरीले दांत भी गढ़ा दिए।
इस दौरान मौहल्ले के कुछ आदमी दौड़े हुए आये और उनको अलग करने की कोशिश करने लगे इसी बीच जंगली वाले कुत्ते के मुँह से जोरों के झाग निकल रहे थे और वो अपने काले होठों और फूले हुए नथुने से उन झागों को तितर-बितर कर रहा था, अब
सबसे खतरनाक हादसा हुआ।
……हुआ यूँ कि वो झाग उड़ते-गिरते वहां आये उन आदमियों के लग गए और अपने बचाव में भागते समय उस जंगली कुत्ते ने अपने पंजे उन आदमियों पर भी चला दिए।
वो आदमी ठहरे कुत्ते के द्वारा ऐसा अपमान थोड़े ही सहन कर सकते थे तो कुछ दूरी तक उस जंगली कुत्ते के पीछे-पीछे भागे और अपने पहरेदारों को भी जगाते हुए चिल्लाये जा रहे थे कि अब तो उठ जाओ वरन ये कुत्ता जान ले लेगा। …और इस तरह वो जंगली कुत्ता वापिस उसी जंगल में चला गया जहाँ से आया था।
बहरहाल आदमियों ने वापिस आकर देखा तो वो रिहायशी और सफेदपोश तासीर वाला कुत्ता मर चुका था। इत्ती देर में जिस कंपनी के ठेके पर जो पहरेदार वहां तैनात थे उन्होंने अपने अफसरों को इत्तिला भी कर दिया कि हमारे झपकी लेने के दौरान ये हादसा हो गया है। इसी बीच उस कंपनी वाले लोग भी वहां जुट गए जिसे पहरेदारी का ठेका नहीं मिला था और ठेका न मिलने के बाद से वो थोड़े एक्टिव भी हो गए थे,
ठेका अलॉट होने वाली फर्म के खिलाफ काम न होने का सबूत तलाशने के लिए। ”जो हुआ-सो हुआ सब भगवान् की मर्जी है, जीवन-मृत्यु सब उसी के हाथ है” ये कहते हुए उस शहर के आदमियों ने शोक प्रकट किया और उस कुत्ते का क्रिया-कर्म करने की सोची।
मगर विरोधी कंपनी वालों ने मौके का फायदा उठाने की ठान ली और क्रिया-कर्म से पहले एक बात वहां खुश-फुसाहट के रूप में फूट पड़ी कि क्यों
न विरोधी पहरेदारों के खिलाफ इस बारे में एक हुंकार भरी जाए और उसी की आड़ में थोड़ा हंगामा किया जाए ताकि अखबार और टी वी पर उनके कारनामे लोग देख सके। उस कंपनी के लोगों द्वारा उकसाये जाने पर सारे शहर के आदमी थोड़ा क्रोधित होकर अपने-अपने घरों से कुछ मशालें ले आये और अपने पहरेदारों और उनके ठेकेदारों के खिलाफ पुरजोर चिल्लाने लगे। इस दौरान वो ये भूल चुके थे कि उस जंगली कुत्ते के मुँह से जो झाग उनके शरीर पर लगे थे वे साफ़ ही नहीं किये थे।
…..फिर होना क्या था? जिसका सबसे ज्यादा डर था वही घटित हुआ वो झाग संक्रमण की तरह फैले और पूरे शहर के आदमियों को अपनी चपेट में ले लिया। अगली सुबह तक उस शहर में बहुत कुछ ऐसा हुआ जो आदमियों की बस्ती में कभी नहीं होना चाहिए था।
वो जंगली कुत्ता जो करना चाहता था वो हो चुका था जिसे वो उस शहर के ठीक सामने बने बड़े आलिशान मचान से अपनी खुली आँखों से बड़े लोमहर्षक अंदाज में देखे जा रहा था…..देखे जा रहा था।

 

 

- के डी चारण 

बाबा रामदेव चौक, भगत की कोठी, जोधपुर (राजस्थान)

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