एक था बचपन !

अभी गत माह मेरा बनारस जाना हुआ । वहाँ घर कि सफाई करते हुए मुझे अपने बचपन के कुछ खिलौने मिल गए। उन खिलौनों को देख कर बरबस ही बचपन कि वो सारी यादें ताज़ा हो गईं। वो सारी शरारतें और भोलापन, वो सारा कौतूहल और सब कुछ खुद ही कर लेने की उत्सुकता । वो उत्सुकता ही थी जो मुझे बचपन में ही बड़े होने के सपने दिखाने लगी थी ।

आज जब मैं अनुभवों को टटोलता हूँ तब एहसास होता है कि हमारा बचपन कितना प्यारा था न कुछ खोने की चिंता थी न कुछ पाने का जुनून। हमारे लिए तो हर दिन होली और हर रात दीवाली थी। लेकिन सच , सारा बचपन हमनें यही सोच के निकाल दिया कि हम बड़े क्यूँ नहीं हो रहे और अब ये सोचते हैं कि बड़े क्यूँ हो गए । खुशी किसे कहते हैं ये अब पता चला और बचपन क्या होता है इसका एहसास भी अब जा कर हुआ है। कुछ ऐसे ही जज्बात और बचपन की यादें आज की युवा पीढ़ी अक्सर ही एक-दुसरे के साथ साझा करती रहती है I हम सभी उन बीते दिनों को याद करते हैं और सोचते हैं कि कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन .

लेकिन बड़ी विनम्रता और आदर से मैं यह प्रश्न पूछना चाहता हूँ कि हम बड़े होने का या फिर बचपन के छिन जाने पर इतना अफसोस क्यूँ करते हैं। क्या हम बड़े हो कर भी उस बचपन को फिर से नहीं जी सकते ?

प्रख्यात कवि WilliamWordsworth ने अपनी प्रसिद्ध कविता “My Heart Leaps Up” में लिखा है कि “The Child is the father of Man”  । इसका आशय स्पष्ट है कि एक पिता भी अपने पुत्र से बाल-सुलभ हठ और चंचलता सीख सकता है । एक पिता भी अपने पुत्र से खुश रहने कि कला सीख सकता है। हमें कल कि फिक्र सताती है और बच्चे आज का जश्न मानते हैं । आज हम किसी से भी मदद मांगने से पहले कितना सोचते और संकोच करते हैं और बच्चे कितनी स्वाभाविकता के साथ किसी कि मदद मांग लेते हैं। बच्चे अपने आप को किसी भी माहौल के अनुरूप ढाल कर किसी से भी मित्रता कर लेते हैं पर हमें मित्रता कि पहल करने से पहले ही अपने आप से एक द्वंद युद्ध करना पड़ता है। बड़े होकर हमने अपने जज़्बातों को दबाना सीख लिया है । हम अंदर-अंदर घुट के रह जाते हैं परंतु अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं करते हैं वहीं बच्चे कितनी आसानी से अपनी खुशी, गम , गुस्सा और प्यार जता देते हैं। बच्चों को अगर कुछ नहीं आता तो वो इसे व्यक्त करने से या स्वीकार करने से नहीं हिचकते हैं । उनकी यही सोच हर पल उन्हे कुछ नया सीखने के लिए प्रेरित करती है । वो तो हर पल कुछ नया सीखना और करना चाहते हैं। परंतु हम इतना पढ़ लिख कर और अनुभव ले कर चेतना-उप चेतना के संघर्ष में फंस कर रह जाते हैं। बड़े होने पर हमारी हालत कुछ ऐसी हो गई है कि “ इरादे बांधता हूँ, जोड़ता हूँ, तोड़ देता हूँ । कहीं ऐसा न हो जाये, कही वैसा न हो जाये ॥ “। ऐसे कितने ही प्रसंग हैं जहां हम बच्चों से सीख सकते हैं उनकी आदतों को आत्मसात कर अपने जीवन को भी सरल और सुखमय बना सकते हैं।

हमारे पास बच्चों से सीखने के लिए बहुत कुछ है तो उन्हें सिखाने और देने के लिए भी बहुत कुछ है I आज यह एक दुर्भाग्यपूर्ण सत्य है कि बच्चों का वो स्वाभाविक बल-सुलभ बचपन अब धीरे-धीरे विलुप्त होता जा रहा है। कारण भी स्पष्ट है ;हमारे पास बचपन की बहुत सारी यादें हैं जिन्हे हम सहेज कर अपने साथ रख सकते हैं परंतु क्या आज कल के बच्चों के पास ऐसी यादें हैं जिन्हे वो सहेज कर रख सकें ? यदि हम ईमानदारी से इस प्रश्न का उत्तर दें जवाब होगा नहीं । पहले संयुक्त परिवार थे बच्चों के साथ खेलने के लिए बहुत लोग थे, बच्चे घर के बाहर खेलते थे और खुल कर खेलते थे । बच्चे छुट्टियों  का इंतज़ार करते थे जिसमे वो अपने चचेरे और ममेरे भाई-बहनों के साथ मिल कर खेलते थे। आज बच्चों की दुनिया मोबाइल गेम में सिमट कर रह गई है । वो उसी में खुद से स्पर्धा करते हैं और खुश हो लेते हैं । उनके पास ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे वो बड़े हो कर याद कर सकें कि बचपन में उन्होने ऐसा किया था,वैसा किया था। माना कि समय बदल गया है, साधन बदल गए हैं , परिस्थितियाँ भी बदल गईं हैं;पर क्या बाल सुलभ चंचलता भी बदल सकती है ? बच्चे एक अंतर्द्वंद में फंस कर रह गए हैं कि वो अभी बच्चे हैं या बड़े हो गए हैं।  ये वास्तव में एक हृदय- विदारक सत्य है की हम बच्चों  को वैसा माहौल नहीं दे पा रहे हैं जिसके कि वो हकदार हैं । मैंने ये महसूस और अनुभव किया है की मेरा बेटा अविरल कभी मोबाइल पे खेल रहा होता है और मैं उसके साथ खेलने की बात करता हूँ  तो वो तुरंत ही तैयार हो जाता है और उसे उसमें ज्यादा खुशी मिलती है। ऐसा ही सभी बच्चों के साथ होगा। हमें बच्चो जैसा बनने के लिए, उनसे कुछ नया सीखने के लिए उनके बचपन को लौटाना होगा।  उनकी सुनहरी यादें सँजोने के लिए उनके लिए समय निकालना पड़ेगा, उन्हे वैसा माहौल देना पड़ेगा । अगर हम ऐसा नहीं कर सके तो शायद आने वाले समय में हम उनको कोई जवाब नहीं दे पाएंगे और न ही वो हमको कोई समय दे पाएंगे। सुभद्रा कुमारी चौहान की लिखी हुई ये अमर रचना “बारबार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी “ हमें तो उत्साहित करती है परन्तु यदि हमने सकारात्मक प्रयास नहीं किया तो शायद यह रचना आज के बच्चों के लिए भविष्य में उतनी प्रासंगिक न रहे I ये इतना मुश्किल भी नहीं है।एक प्रयास करने की ही देर है । आइये इस विलुप्त होते हुए बचपन को बचाने की एक कोशिश कर के देखते हैं। अन्यथा बचपन इतिहास के पन्नों में दफ़न हो जाएगा और हम कहते रह जाएंगे  एक था बचपन I


 - सिद्धार्थ सिन्हा

भारत सरकार के स्वामित्व वाले “ आइ. डी. बी. आइ. बैंक ”  में सहायक महा प्रबन्धक के पद पर कार्यरत हैं। इन्होने सांख्यिकी एवं प्रबंध शास्त्र में स्नातकोत्तर किया है । सिद्धार्थ सिन्हा बनारस के रहने वाले हैं और वर्तमान में मुंबई में कार्यरत हैं।

इन्होने आइ. डी. बी. आइ. बैंक की हिन्दी प्रतियोगिताओं में विभिन्न पुरस्कार जीते हैं और ये बचपन में सुमन सौरभ पत्रिका और दैनिक जागरण समाचार पत्र में भी कहानियाँ और लेख लिख चुके हैं । 

3 thoughts on “एक था बचपन !

  1. बहुत ही बढ़िया लिखा है । वैसे ये आज हर कोई महसूस कर रहा है पर उसको शब्दो मे उतारना भी एक कला है।
    सिद्धार्थ ने बहुत सुंदरता से ये काम किया है।

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